Logoपवित्र ग्रंथ

Panchastavi 2. Charcha Stava – पञ्चस्तवि - २. चर्चास्तवः (Kashmir Shaivism)

Panchastavi 2: Charcha Stava

Panchastavi 2. Charcha Stava – पञ्चस्तवि - २. चर्चास्तवः (Kashmir Shaivism)
सौन्दर्यविभ्रमभुवो भुवनाधिपत्य- -सङ्कल्पकल्पतरवस्त्रिपुरे जयन्ति । एते कवित्वकुमदप्रकरावबोध- -पूर्णेन्दवस्त्वयि जगज्जननि प्रणामाः ॥ १ ॥ देवि स्तुतिव्यतिकरे कृतबुद्धयस्ते वाचस्पति प्रभृतयोऽपि जडी भवन्ति । तस्मान्निसर्गजडिमा कतमोऽहमत्र स्तोत्रं तव त्रिपुरतापनपत्नि कर्तुम् ॥ २ ॥ मातस्तथापि भवतीं भवतीव्रताप- -विच्छित्तये स्तुतिमहार्णव कर्णधारः । स्तोतुं भवानि स भवच्चरणारविन्द- -भक्तिग्रहः किमपि मां मुखरी करोति ॥ ३ ॥ सूते जगन्ति भवती भवती बिभर्ति जागर्ति तत्क्षयकृते भवती भवानि । मोहं भिनत्ति भवती भवती रुणद्धि लीलायितं जयति चित्रमिदं भवत्याः ॥ ४ ॥ यस्मिन्मनागपि नवाम्बुजपत्रगौरीं गौरीं प्रसादमधुरां दृशमादधासि । तस्मिन्निरन्तरमनङ्गशरावकीर्ण- -सीमन्तिनीनयनसन्ततयः पतन्ति ॥ ५ ॥ पृथ्वीभुजोऽप्युदयनप्रभवस्य तस्य विद्याधर प्रणति चुम्बित पादपीठः । तच्चक्रवर्तिपदवीप्रणयः स एषः त्वत्पादपङ्कजरजः कणजः प्रसादः ॥ ६ ॥ त्वत्पादपङ्कजरज प्रणिपातपूर्वैः पुण्यैरनल्पमतिभिः कृतिभिः कवीन्द्रैः । क्षीरक्षपाकरदुकूलहिमावदाता कैरप्यवापि भुवनत्रितयेऽपि कीर्तिः ॥ ७ ॥ कल्पद्रुमप्रसवकल्पितचित्रपूजां उद्दीपित प्रियतमामदरक्तगीतिम् । नित्यं भवानि भवतीमुपवीणयन्ति विद्याधराः कनकशैलगुहागृहेषु ॥ ८ ॥ लक्ष्मीवशीकरणकर्मणि कामिनीनां आकर्षणव्यतिकरेषु च सिद्धमन्त्रः । नीरन्ध्रमोहतिमिरच्छिदुरप्रदीपो देवि त्वदङ्घ्रिजनितो जयति प्रसादः ॥ ९ ॥ देवि त्वदङ्घ्रिनखरत्नभुवो मयूखाः प्रत्यग्रमौक्तिकरुचो मुदमुद्वहन्ति । सेवानतिव्यतिकरे सुरसुन्दरीणां सीमन्तसीम्नि कुसुमस्तबकायितं यैः ॥ १० ॥ मूर्ध्नि स्फुरत्तुहिनदीधितिदीप्तिदीप्तं मध्ये ललाटममरायुधरश्मिचित्रम् । हृच्चक्रचुम्बि हुतभुक्कणिकानुकारि ज्योतिर्यदेतदिदमम्ब तव स्वरूपम् ॥ ११ ॥ रूपं तव स्फुरितचन्द्रमरीचिगौरं आलोकते शिरसि वागधिदैवतं यः । निःसीमसूक्तिरचनामृतनिर्झरस्य तस्य प्रसादमधुराः प्रसरन्ति वाचः ॥ १२ ॥ सिन्दूरपांसुपटलच्छुरितामिव द्यां त्वत्तेजसा जतुरसस्नपितामिवोर्वीम् । यः पश्यति क्षणमपि त्रिपुरे विहाय व्रीडां मृडानि सुदृशस्तमनुद्रवन्ति ॥ १३ ॥ मातर्मुहूर्तमपि यः स्मरति स्वरूपं लाक्षारसप्रसरतन्तुनिभं भवत्याः । ध्यायन्त्यनन्यमनसस्तमनङ्गतप्ताः प्रद्युम्नसीम्नि सुभगत्वगुणं तरुण्यः ॥ १४ ॥ योऽयं चकास्ति गगनार्णवरत्नमिन्दुः योऽयं सुरासुरगुरुः पुरुषः पुराणः । यद्वाममर्धमिदमन्धकसूदनस्य देवि त्वमेव तदिति प्रतिपादयन्ति ॥ १५ ॥ इच्छानुरूपमनुरूपगुणप्रकर्ष सङ्कर्षिणि त्वमभिमृश्य यदा बिभर्षि । जायेत स त्रिभुवनैक गुरुस्तदानीं देवः शिवोऽपि भुवनत्रयसूत्रधारः ॥ १६ ॥ ध्यातासि हैमवति येन हिमांशुरश्मि- -मालामलद्युतिरकल्मषमानसेन । तस्याविलम्बमनवद्यमनन्तकल्पं अल्पैर्दिनैः सृजसि सुन्दरि वाग्विलासम् ॥ १७ ॥ आधारमारुतनिरोधवशेन येषां सिन्दूररञ्जितसरोजगुणानुकारि । दीप्तं हृदि स्फुरति देवि वपुस्त्वदीयं ध्यायन्ति तानिह समीहितसिद्धिसार्थाः ॥ १८ ॥ ये चिन्तयन्त्यरुणमण्डलमध्यवर्ति रूपं तवाम्ब नवयावकपङ्कपिङ्गम् । तेषां सदैव कुसुमायुधबाणभिन्न- -वक्षःस्थला मृगदृशो वशगा भवन्ति ॥ १९ ॥ त्वामैन्दवीमिव कलामनुफालदेशं उद्भासिताम्बरतलामवलोकयन्तः । सद्यो भवानि सुधियः कवयो भवन्ति त्वं भावनाहितधियां कुलकामधेनुः ॥ २० ॥ शर्वाणि सर्वजनवन्दितपादपद्मे पद्मच्छदद्युतिविडम्बितनेत्रलक्ष्मि । निष्पापमूर्तिजनमानसराजहंसि हंसि त्वमापदमनेकविधां जनस्य ॥ २१ ॥ उत्तप्तहेमरुचिरे त्रिपुरे पुनीहि चेतश्चिरन्तनमघौघवनं लुनीहि । कारागृहे निगलबन्धनयन्त्रितस्य त्वत्संस्मृतौ झटिति मे निगलास्त्रुटन्ति ॥ २२ ॥ त्वां व्यापिनीति सुमना इति कुण्डलीति त्वां कामिनीति कमलेति कलावतीति । त्वां मालिनीति ललितेत्यपराजितेति देवि स्तुवन्ति विजयेति जयेत्युमेति ॥ २३ ॥ उद्दामकामपरमार्थसरोजखण्ड- चण्डद्युतिद्युतिमपासितषड्विकाराम् । मोहद्विपेन्द्रकदनोद्यतबोधसिंह- -लीलागुहां भगवतीं त्रिपुरां नमामि ॥ २४ ॥ गणेशवटुकस्तुता रतिसहायकामान्विता स्मरारिवरविष्टरा कुसुमबाणबाणैर्युता । अनङ्गकुसुमादिभिः परिवृता च सिद्धैस्त्रिभिः कदम्बवनमध्यगा त्रिपुरसुन्दरी पातु नः ॥ २५ ॥ रुद्राणि विद्रुममयीं प्रतिमामिव त्वां ये चिन्तयन्त्यरुणकान्तिमनन्यरूपाम् । तानेत्य पक्ष्मलदृशः प्रसभं भजन्ते कण्ठावसक्तमृदुबाहुलतास्तरुण्यः ॥ २६ ॥ त्वद्रूपैकनिरूपणप्रणयिताबन्धो दृशोस्त्वद्गुण- -ग्रामाकर्णनरागिता श्रवणयोस्त्वत्संस्मृतिश्चेतसि । त्वत्पादार्चनचातुरी करयुगे त्वत्कीर्तितं वाचि मे कुत्रापि त्वदुपासनव्यसनिता मे देवि मा शाम्यतु ॥ २७ ॥ त्वद्रूपमुल्लसितदाडिमपुष्परक्तं उद्भावयेन्मदनदैवतमक्षरं यः । तं रूपहीनमपि मन्मथनिर्विशेषं आलोकयन्त्युरुनितम्बतटास्तरुण्यः ॥ २८ ॥ ब्रह्मेन्द्ररुद्रहरिचन्द्रसहस्ररश्मि- -स्कन्दद्विपाननहुताशनवन्दितायै । वागीश्वरि त्रिभुवनेश्वरि विश्वमातः अन्तर्बहिश्च कृतसंस्थितये नमस्ते ॥ २९ ॥ कस्तोत्रमेतदनुवासरमीश्वरायाः श्रेयस्करं पठति वा यदि वा शृणोति । तस्येप्सितं फलति राजभिरीड्यतेऽसौ जायेत स प्रियतमो मदिरेक्षणानाम् ॥ ३० ॥ इति श्रीकालिदास विरचित पञ्चस्तव्यां द्वितीयः चर्चास्तवः ।

पञ्चस्तवि 2. चर्चास्तवः - परिचय (Introduction)

'पञ्चस्तवि' (Panchastavi), जैसा कि नाम से ज्ञात होता है, पाँच स्तवों (स्तुतियों) का एक दिव्य संग्रह है। यह कश्मीर शैव दर्शन (Kashmir Shaivism) की शाक्त परंपरा का एक अमूल्य ग्रंथ है। यद्यपि इसके रचयिता के विषय में विद्वानों में एकमत नहीं है—कुछ इसे महाकवि कालिदास की रचना मानते हैं, जबकि कश्मीरी परंपरा में इसे 'धर्माचार्य' या 'लघु-भट्टारक' की कृति माना जाता है—तथापि इसकी आध्यात्मिक गहराई और काव्य-सौन्दर्य अद्वितीय है।

इस संग्रह का दूसरा पुष्प है—'चर्चास्तवः' (Charcha Stava)। जहाँ प्रथम स्तव 'लघुस्तव' देवी के स्वरूप का एक संक्षिप्त और त्वरित परिचय देता है, वहीं 'चर्चास्तव' साधक को गहरे चिंतन और मनन की ओर ले जाता है। संस्कृत में 'चर्चा' शब्द का अर्थ केवल बातचीत नहीं, बल्कि 'मीमांसा', 'गहन विचार' या 'विवेचना' (Discussion/Reflection) होता है। इस स्तोत्र में भक्त और देवी के बीच, या यूं कहें कि जीव और शिव के बीच के संबंधों की दार्शनिक चर्चा की गई है।

चर्चास्तव में कुल 30 (कुछ संस्करणों में 31) श्लोक हैं। प्रत्येक श्लोक अपने आप में एक मंत्र है और तांत्रिक रहस्यों से भरा है। यहाँ कवि देवी त्रिपुरसुन्दरी को केवल एक मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि उस परमसत्ता (Supreme Consciousness) के रूप में पूजते हैं जो 'प्रकाश' (शिव) और 'विमर्श' (शक्ति) का सम्मिलित रूप है। यह स्तोत्र विशेष रूप से उन साधकों के लिए है जो भक्ति के साथ-साथ ज्ञान के मार्ग पर भी चलना चाहते हैं।

इस स्तोत्र की भाषा अत्यंत प्रांजल, मधुर और ओजस्वी है। इसमें देवी को 'व्यापिनी', 'कुण्डलिनी', 'कामिनी', 'हंसि' आदि तांत्रिक नामों से संबोधित किया गया है, जो यह दर्शाता है कि रचयिता स्वयं एक उच्च कोटि के सिद्ध योगी थे। चर्चास्तव का पाठ साधक के अंतःकरण में छिपी 'कवित्व शक्ति' को ठीक उसी तरह जाग्रत कर देता है जैसे पूर्णिमा का चन्द्रमा समुद्र में ज्वार उत्पन्न करता है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

कश्मीर शैव दर्शन में चर्चास्तव का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यह केवल स्तुति गान नहीं है, बल्कि यह 'शाक्त उपाय' (Shakta Upaya) का एक सशक्त माध्यम है। शाक्त उपाय में साधक 'भावना' और 'ज्ञान' के माध्यम से अपनी चेतना को ऊपर उठाता है, और चर्चास्तव इस प्रक्रिया में उत्प्रेरक का कार्य करता है।

  • शिव-शक्ति का अद्वैत: सामान्यतः लोग शिव और शक्ति को अलग मानते हैं, परन्तु चर्चास्तव (विशेषकर श्लोक 16) में स्पष्ट किया गया है कि शक्ति के बिना शिव शव-तुल्य हैं। जब शक्ति (क्रिया शक्ति) शिव (शुद्ध चैतन्य) का आलिंगन करती है, तभी सृष्टि का चक्र चलता है। यह अद्वैत दर्शन का सार है।

  • वाक और अर्थ का मिलन: इस स्तोत्र को 'वाक-सिद्धि' का खजाना माना जाता है। यहाँ देवी को 'वागीश्वरी' रूप में पूजा गया है। यह स्तोत्र वाणी (Speech) और उसके अर्थ (Meaning) के बीच के रहस्यमयी संबंध को उजागर करता है। जो साधक इसका निरन्तर पाठ करता है, उसकी वाणी में सरस्वती का वास हो जाता है।

  • कुण्डलिनी जागरण: चर्चास्तव में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कुण्डलिनी योग के संकेत हैं। श्लोक 18 में 'आधारमारुतनिरोध' (कुम्भक और मूलाधार में प्राण का निरोध) और हृदय में 'दीप्त वपु' के ध्यान का उल्लेख है। यह स्पष्ट करता है कि यह केवल बाह्य पूजा नहीं, बल्कि आन्तरिक योग का मार्ग भी है।

  • सौन्दर्य लहरी का पूर्वगामी: कई विद्वान मानते हैं कि आदि शंकराचार्य का 'सौन्दर्य लहरी' और 'चर्चास्तव' में अद्भुत समानता है। दोनों ही श्रीविद्या (Sri Vidya) उपासना के प्रमुख ग्रंथ हैं और दोनों में ही देवी के सौन्दर्य का वर्णन दार्शनिक ऊंचाइयों को छूता है।

फलश्रुति लाभ (Benefits)

प्राचीन ग्रंथों में किसी भी स्तोत्र के पाठ का फल (फलश्रुति) बताया जाता है ताकि साधक का उत्साह वर्धन हो। चर्चास्तव के श्लोकों में ही इसके अद्भुत लाभों का वर्णन मिलता है:

  • अद्भुत कवित्व शक्ति (Poetic Genius): जैसा कि प्रथम श्लोक में ही कहा गया है—"कवित्व-कुमुद-प्रकर-अवबोध-पूर्णेन्दवः"—यह स्तोत्र कवित्व शक्ति को जाग्रत करने के लिए रामबाण है। इसके पाठ से मूक भी वाचाल हो सकता है और साधक में कविता, लेखन और वक्तृत्व की अद्भुत क्षमता उत्पन्न होती है।

  • राज-सम्मान और ख्याति: श्लोक 6 और 30 में स्पष्ट उल्लेख है कि इसके पाठ से साधक को राजाओं (शासकों/उच्च अधिकारियों) से सम्मान प्राप्त होता है। उसे समाज में कीर्ति और उच्च पदवी मिलती है। "राजभिरीड्यतेऽसौ" — वह राजाओं द्वारा भी पूजित होता है।

  • आकर्षण और वशीकरण (Attraction): यह स्तोत्र सम्मोहन विद्या का भी गुप्त ग्रंथ माना जाता है। श्लोक 9, 13, 19 और 28 में देवी के सौन्दर्य ध्यान से प्राप्त होने वाले वशीकरण प्रभाव का वर्णन है। साधक का व्यक्तित्व इतना चुम्बकीय हो जाता है कि लोग स्वतः उसकी ओर खिंचे चले आते हैं।

  • संकट नाशन और बन्धन मुक्ति: श्लोक 21 और 22 में प्रार्थना की गई है कि देवी "आपदं अनेकविधां" (अनेक प्रकार की आपदाओं) का नाश करें और "निगलास्त्रुटन्ति" (बेड़ियाँ तोड़ दें)। चाहे वह कारावास का भय हो, शत्रुओं का भय हो, या संसार रूपी भव-बंधन हो, चर्चास्तव का पाठ अभय प्रदान करता है।

  • मनोकामना पूर्ति: श्लोक 18 में कहा गया है—"समीहितसिद्धिसार्थाः"—अर्थात् जो भक्त हृदय गुहा में देवी का ध्यान करते हैं, उनकी समस्त मनोकामनाएँ सिद्ध होती हैं। यह कल्पवृक्ष के समान फलदायी है।

पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Method)

यद्यपि माँ त्रिपुरसुन्दरी भाव की भूखी हैं और प्रेम से पुकारने पर वे नियमों को नहीं देखतीं, तथापि शास्त्रों में स्तोत्र पाठ की एक मर्यादित विधि बताई गई है जिससे पाठ का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

साधारण नित्य पाठ विधि:

  1. समय: सर्वोत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) है। यदि संभव न हो, तो प्रातः स्नान के बाद या संध्या वंदन के समय पाठ करें।
  2. शुद्धि: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र (श्वेत या रक्त वर्ण उत्तम है) धारण करें।
  3. आसन: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा, ऊनी कंबल या मृगचर्म के आसन पर बैठें।
  4. दीप प्रज्वलन: माँ के चित्र या यंत्र के समक्ष घी का दीपक और अगरबत्ती जलाएं। संभव हो तो लाल पुष्प (गुलाब या गुड़हल) अर्पित करें।
  5. संकल्प: हाथ में जल लेकर अपनी मनोकामना का स्मरण करें और संकल्प लें—"मैं (अमुक नाम) अपनी (अमुक कामना) की सिद्धि हेतु चर्चास्तव का पाठ कर रहा हूँ।" जल भूमि पर छोड़ दें।
  6. पाठ: अब स्थिर चित्त होकर, स्पष्ट उच्चारण के साथ चर्चास्तव के 30 श्लोकों का पाठ करें। पाठ न बहुत शीघ्र हो, न बहुत धीमा। मध्यम गति से आदरपूर्वक पाठ करें।
  7. क्षमा प्रार्थना: अंत में, पाठ में हुई किसी भी त्रुटि के लिए देवी से क्षमा माँगें।

विशेष पुरश्चरण विधि (काम्य प्रयोग):

किसी विशेष कार्य की सिद्धि (जैसे मुकद्मे में जीत, परीक्षा में सफलता, या विशेष आकर्षण) के लिए 41 दिनों का अनुष्ठान किया जा सकता है। इसमें प्रतिदिन एक निश्चित संख्या (जैसे 11 या 21 पाठ) में पाठ का नियम लेना चाहिए। नवरात्रि, गुप्त नवरात्रि या शुक्रवार के दिन से इसकी शुरुआत करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

ध्यान (Meditation):

पाठ करते समय देवी के उस स्वरूप का ध्यान करें जिसका वर्णन श्लोक 11 और 28 में है—ललाट पर चन्द्रमा, हृदय में अग्नि के समान तेज, और अनार के फूल जैसा लाल वर्ण। यह ध्यान पाठ की शक्ति को कई गुना बढ़ा देता है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. चर्चास्तव (Charcha Stava) का क्या अर्थ है?

'चर्चा' का अर्थ है विचार-विमर्श या गहन चिंतन। इस स्तोत्र में देवी के रहस्यमयी स्वरूप, उनके गुण और निर्गुण रूपों पर दार्शनिक विवेचना की गई है, इसलिए इसे चर्चास्तव कहा जाता है।

2. पञ्चस्तवि के रचयिता कौन हैं?

इसके रचयिता के बारे में मतभेद है। कश्मीरी परंपरा में इन्हें 'लघु-भट्टारक' या 'धर्माचार्य' माना जाता है। कुछ विद्वान इसे महाकवि कालिदास की रचना मानते हैं, क्योंकि इसकी शैली कालिदास जैसी है और पुष्पिका में उनका नाम भी आता है।

3. क्या गृहस्थ लोग इसका पाठ कर सकते हैं?

हाँ, अवश्य। पञ्चस्तवि की रचना ही गृहस्थ साधकों के लिए की गई है ताकि वे संसार में रहते हुए भी शिवत्व और मोक्ष प्राप्त कर सकें। इसके लिए सन्यास लेने की आवश्यकता नहीं है।

4. चर्चास्तव के पाठ से क्या विशेष लाभ होता है?

सबसे बड़ा लाभ 'वाक-सिद्धि' (वाणी की शक्ति) और कवित्व शक्ति का जागरण है। इसके अलावा, यह राज-सम्मान, आकर्षण (वशीकरण), बुद्धि का विकास और संकटों से रक्षा प्रदान करता है।

5. क्या इसे बिना गुरु के पढ़ा जा सकता है?

स्तोत्र के रूप में इसे भक्ति भाव से कोई भी पढ़ सकता है। लेकिन यदि आप इसे मंत्र मानकर साधना या सिद्धि के उद्देश्य से पढ़ रहे हैं, तो गुरु का मार्गदर्शन श्रेयस्कर होता है।

6. पञ्चस्तवि में कुल कितने स्तव हैं?

पञ्चस्तवि में पाँच स्तव हैं: 1. लघुस्तव (Laghu Stava), 2. चर्चास्तव (Charcha Stava), 3. घटस्तव (Ghata Stava), 4. अम्बास्तव (Amba Stava), और 5. सकलजननीस्तव (Sakalajanani Stava)।

7. चर्चास्तव में किस देवी की स्तुति है?

इसमें मुख्य रूप से देवी त्रिपुरसुन्दरी (ललिता महात्रिपुरसुन्दरी) की स्तुति है, जो श्रीविद्या की अधिष्ठात्री देवी और कश्मीर शैव दर्शन में परशक्ति मानी जाती हैं।

8. 'शाक्त उपाय' क्या है?

कश्मीर शैव दर्शन में 'शाक्त उपाय' वह मार्ग है जिसमें साधक ज्ञान, ध्यान और भावना की शक्ति (तर्क और विचार) का उपयोग करके अपनी चेतना को शिव में विलीन करता है। चर्चास्तव इसी उपाय का अंग है।

9. क्या स्त्रियाँ इसका पाठ कर सकती हैं?

जी हाँ, शाक्त परंपरा में स्त्री और पुरुष का भेद नहीं है। स्त्रियाँ भी पूर्ण अधिकार और श्रद्धा के साथ इसका पाठ कर सकती हैं। मासिक धर्म के दौरान मानसिक पाठ करना उत्तम माना जाता है।

10. चर्चास्तव का पाठ संस्कृत में ही करना जरूरी है?

मूल संस्कृत पाठ की ध्वनि तरंगों (vibrations) का अपना विशेष महत्व है, इसलिए संस्कृत में पाठ करना सर्वोत्तम है। यदि संस्कृत कठिन लगे, तो भावार्थ को समझते हुए धीरे-धीरे प्रयास करें या हिंदी अनुवाद का पाठ भी कर सकते हैं, पर मूल पाठ अधिक प्रभावशाली होता है।