Sri Durga Ashtottara Shatanama Stotram – श्री दुर्गा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

श्री दुर्गा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्: परिचय एवं महत्व
श्री दुर्गा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (108 Names of Durga) हिंदू धर्म के शाक्त संप्रदाय का एक अत्यंत पूजनीय पाठ है। यह स्तोत्र 'विश्वसार तंत्र' (Vishvasara Tantra) से लिया गया है। इसमें भगवान शिव (ईश्वर), जगत जननी माँ पार्वती (कमलानना) को उनके ही 108 दिव्य नामों का रहस्य बताते हैं।
'दुर्गा' शब्द का अर्थ है — 'दुःखेन गम्यते प्राप्यते इति दुर्गा', अर्थात जिसे बड़ी कठिनाई से प्राप्त किया जा सके, या जो 'दुर्गति' (कष्टों) का नाश करने वाली हों। इस स्तोत्र में माँ के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन है, जैसे — सती (सत्य स्वरूप), भवानी (ब्रह्मांड को धारण करने वाली), शूलधारिणी (शूल धारण करने वाली), और महिषासुरमर्दिनी (बुराई का अंत करने वाली)।
साधकों के लिए यह स्तोत्र 'दुर्गा सप्तशती' के पाठ का एक अनिवार्य अंग माना जाता है। कई भक्त समय के अभाव में यदि पूरी सप्तशती का पाठ नहीं कर पाते, तो केवल इस अष्टोत्तरशतनाम का पाठ करके भी माँ की पूर्ण कृपा प्राप्त कर लेते हैं। यह नाम-जप (Nama Japa) की महिमा है कि केवल नामों के उच्चारण से ही सूक्ष्म शरीर शुद्ध हो जाता है और आसुरी शक्तियां (नकारात्मक ऊर्जा) दूर भाग जाती हैं।
फलश्रुति: पाठ के दिव्य लाभ
विश्वसार तंत्र में भगवान शिव ने स्वयं इस स्तोत्र की फलश्रुति (Benefits) का वर्णन श्लोक 16 से 21 में किया है। इसके प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:
असाध्य की सिद्धि: श्लोक 16 में शिव जी स्पष्ट कहते हैं — "नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति"। अर्थात, जो इसका नित्य पाठ करता है, उसके लिए तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) में कोई भी कार्य असंभव नहीं रह जाता।
चतुर्वर्ग प्राप्ति: श्लोक 17 के अनुसार, साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। उसे धन, धान्य, उत्तम संतान, और वाहन (घोड़े, हाथी - आज के संदर्भ में गाड़ियाँ) का सुख मिलता है।
शत्रु और बाधा नाश: चूंकि इसमें "महिषासुरमर्दिनी" और "चण्डमुण्डविनाशिनी" जैसे नाम हैं, यह पाठ शत्रुओं के भय और जीवन की रुकावटों को तत्काल नष्ट करता है।
राजकीय सम्मान और वशीकरण: श्लोक 19 में कहा गया है — "राजानो दासतां यान्ति"। इसका अर्थ है कि बड़े-बड़े अधिकारी या राजा भी साधक के अनुकूल हो जाते हैं (दास समान व्यवहार करते हैं) और उसे राज्य लक्ष्मी (Power and Position) प्राप्त होती है।
मोक्ष: अंत में, भोगों को भोगने के बाद साधक को "मुक्तिं च शाश्वतीम्" (शाश्वत मुक्ति) प्राप्त होती है।
पाठ विधि एवं विशेष तंत्र प्रयोग (Ritual Method)
इस स्तोत्र का पाठ सामान्य पूजा और विशेष तंत्र साधना, दोनों रूपों में किया जा सकता है।
दैनिक सामान्य विधि
- समय: प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या संध्या समय। नवरात्रि में तीनों समय (त्रिकाल) पाठ करना श्रेष्ठ है।
- शुद्धि: स्नान आदि से निवृत्त होकर लाल वस्त्र धारण करें।
- आसन: लाल ऊनी आसन या कुश के आसन पर उत्तर या पूर्व मुख करके बैठें।
- दीपक: माँ के चित्र के सामने गाय के घी का दीपक जलाएं।
- प्रक्रिया: पहले गणेश जी का ध्यान करें, फिर संकल्प लें, और भक्ति भाव से 108 नामों का पाठ करें। अंत में क्षमा प्रार्थना करें।
विशेष यन्त्र प्रयोग (Tantric Application)
श्लोक 20 और 21 में एक विशेष तांत्रिक प्रयोग बताया गया है, जो बहुत कम लोग जानते हैं:
- सामग्री: गोरोचन, लाक्षा (लाख), कुंकुम, सिन्दूर, कपूर, और मधु (शहद) — इन छः वस्तुओं को मिलाकर स्याही बनाएं।
- यन्त्र लेखन: किसी भोजपत्र पर या स्वर्ण/रजत पत्र पर विधिपूर्वक दुर्गा यन्त्र लिखें।
- मुहूर्त: यह कार्य 'भौमवती अमावस्या' (मंगलवार को पड़ने वाली अमावस्या) की रात को या जब चंद्रमा 'शतभिषा नक्षत्र' में हो, तब करना चाहिए।
- लाभ: इस विधि से तैयार यन्त्र को धारण करने वाला व्यक्ति साक्षात् शिव (पुरारि) के समान शक्ति संपन्न हो जाता है और वह "सम्पदां पदम्" (संपत्तियों का स्वामी) बन जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)