Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Durga Pancharatnam – श्री दुर्गा पञ्चरत्नम् (Kanchi Paramacharya)

Sri Durga Pancharatnam – श्री दुर्गा पञ्चरत्नम् (Kanchi Paramacharya)
॥ श्री दुर्गा पञ्चरत्नम् ॥ ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् त्वामेव देवीं स्वगुणैर्निगूढाम् । त्वमेव शक्तिः परमेश्वरस्य मां पाहि सर्वेश्वरि मोक्षदात्रि ॥ १ ॥ देवात्मशक्तिः श्रुतिवाक्यगीता महर्षिलोकस्य पुरः प्रसन्ना । गुहा परं व्योम सतः प्रतिष्ठा मां पाहि सर्वेश्वरि मोक्षदात्रि ॥ २ ॥ परास्य शक्तिः विविधैव श्रूयसे श्वेताश्ववाक्योदितदेवि दुर्गे । स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया ते मां पाहि सर्वेश्वरि मोक्षदात्रि ॥ ३ ॥ देवात्मशब्देन शिवात्मभूता यत्कूर्मवायव्यवचोविवृत्या त्वं पाशविच्छेदकरी प्रसिद्धा मां पाहि सर्वेश्वरि मोक्षदात्रि ॥ ४ ॥ त्वं ब्रह्मपुच्छा विविधा मयूरी ब्रह्मप्रतिष्ठास्युपदिष्टगीता । ज्ञानस्वरूपात्मतयाखिलानां मां पाहि सर्वेश्वरि मोक्षदात्रि ॥ ५ ॥ ॥ इति परमपूज्य श्रीचन्द्रशेखरेन्द्रसरस्वती स्वामि कृतं दुर्गा पञ्चरत्नं सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र का दार्शनिक महत्व (Philosophical Significance)

श्री दुर्गा पञ्चरत्नम् भक्ति और वेदांत का एक दुर्लभ मिश्रण है। कांची परमाचार्य ने इसमें दिखाया है कि माँ दुर्गा केवल एक पौराणिक देवी नहीं, बल्कि स्वयं उपनिषदों का ब्रह्म हैं।

श्लोक 1 की पंक्ति "ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्..." सीधे श्वेताश्वतर उपनिषद (1.3) से ली गई है। ऋषियों ने ध्यान की गहराइयों में जाकर जिस शक्ति को देखा, वह कोई और नहीं बल्कि स्वयं परमेश्वर की शक्ति (दुर्गा) थीं, जो अपने ही गुणों (सत्व, रज, तम) से छिपी हुई थीं।

यह स्तोत्र सिद्ध करता है कि शैव (शिव भक्त), शाक्त (देवी भक्त) और वेदान्ती (ज्ञान मार्गी) में कोई भेद नहीं है। सब एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं।

रत्नों (श्लोकों) का भावार्थ (Essence of Gems/Verses)

  • रत्न 1 (आत्म-शक्ति): ऋषियों ने ध्यान-योग द्वारा आपको ही परमेश्वर की आत्म-शक्ति के रूप में देखा। हे मोक्षदात्री! मेरी रक्षा करो।

  • रत्न 2 (हृदय गुहा): आप ही वेदों का सार हैं और महर्षियों के हृदयरूपी गुफा में 'दहर आकाश' (परम व्योम) के रूप में विराजमान हैं।

  • रत्न 3 (परा शक्ति): उपनिषद कहते हैं "परास्य शक्ति विविधैव श्रूयसे" - उस ब्रह्म की परा शक्ति अनेक रूपों में सुनी जाती है। वही ज्ञान, बल और क्रिया रूपा आप ही हैं।

  • रत्न 4 (पाश विमोचिनी): कूर्म और वायु पुराण में आपको 'पाशविच्छेदकरी' कहा गया है। आप जीव के अज्ञान रूपी बंधनों (पाश) को काटकर उसे मुक्त करती हैं।

  • रत्न 5 (ब्रह्म पुच्छ): तैत्तिरीय उपनिषद में ब्रह्म को मयूर (पक्षी) के रूप में कल्पित किया गया है, जहाँ 'पुच्छ' (पूंछ) आधार है। आप वही 'ब्रह्म पुच्छ' हैं, जिस पर सब टिका है।

पाठ के लाभ (Benefits)

1. मोक्ष की प्राप्ति

स्तोत्र का मुख्य टेक (Refrain) ही है - 'मोक्षदात्री'। इसका नियमित पाठ साधक को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाने में सहायक है।

2. ब्रह्म ज्ञान का उदय

जो साधक वेदों और उपनिषदों को नहीं पढ़ सकते, वे केवल इस पञ्चरत्न के पाठ से ही वेदांत का सार (Essence) ग्रहण कर सकते हैं।

3. भय और अज्ञान का नाश

'पाशविच्छेदकरी' होने के नाते, देवी साधक के मन से अज्ञान और संसार के प्रति झूठे मोह (Attachment) को काट देती हैं।

4. परमाचार्य की कृपा

चूंकि यह एक सिद्ध संत (महापेरियावा) की वाणी है, इसके पाठ से गुरु कृपा भी स्वतः प्राप्त होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. इस स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

इसकी रचना कांची कामकोटि पीठ के 68वें जगद्गुरु श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती स्वामी (Mahaperiyava) ने की थी।

2. 'पञ्चरत्नम्' का क्या अर्थ है?

'पञ्चरत्नम्' का अर्थ है 'पांच रत्न'। इस स्तोत्र में 5 श्लोक हैं, जो वैदिक ज्ञान के पांच बहुमूल्य रत्नों के समान हैं।

3. इस स्तोत्र की मुख्य विशेषता क्या है?

यह स्तोत्र उपनिषदों (विशेषकर श्वेताश्वतर उपनिषद) के कठिन दार्शनिक सिद्धांतों को सरल श्लोकों में प्रस्तुत करता है। यह भक्ति और ज्ञान का संगम है।

4. 'मोक्षदात्री' का क्या अर्थ है?

हर श्लोक के अंत में 'मां पाहि सर्वेश्वरि मोक्षदात्रि' आता है। इसका अर्थ है - 'हे सर्वेश्वरी! हे मोक्ष देने वाली माँ! मेरी रक्षा करो।' यह स्पष्ट करता है कि दुर्गा ही मोक्ष प्रदान करती हैं।

5. श्लोक 3 में किस उपनिषद का संदर्भ है?

श्लोक 3 में 'श्वेताश्ववाक्योदितदेवि' कहा गया है, जो सीधे श्वेताश्वतर उपनिषद का संदर्भ देता है, जहाँ परमात्मा की शक्ति का वर्णन है।

6. क्या इसे नवरात्रि में पढ़ सकते हैं?

हाँ, नवरात्रि में इसका पाठ विशेष फलदायी है क्योंकि यह देवी के 'ब्रह्म स्वरूप' का ज्ञान कराता है।

7. 'मयूरी' शब्द का प्रयोग क्यों किया गया है?

श्लोक 5 में 'त्वं ब्रह्मपुच्छा विविधा मयूरी' कहा गया है। यह तैत्तिरीय उपनिषद के 'आनंदवल्ली' अध्याय का संकेत है, जहाँ ब्रह्म को मयूर (मोर) की पूंछ (आधार) के रूप में वर्णित किया गया है।

8. क्या यह केवल संन्यासियों के लिए है?

नहीं, यह गृहस्थों के लिए भी उतना ही लाभकारी है। यह हमें सांसारिक कार्यों के बीच भी ईश्वर के प्रति समर्पित रहना सिखाता है।

9. परमाचार्य ने इसकी रचना कब की?

यह निश्चित तिथि ज्ञात नहीं है, लेकिन उन्होंने अपने लम्बे जीवनकाल (1894-1994) में भक्तों को अद्वैत वेदांत समझाने के लिए इसकी रचना की थी।

10. 'स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया' का क्या अर्थ है?

यह उपनिषद का एक प्रसिद्ध वाक्य है। इसका अर्थ है कि ईश्वर (देवी) का ज्ञान, बल और क्रिया 'स्वाभाविक' है, उन्हें इसके लिए किसी बाहरी साधन की आवश्यकता नहीं है।

11. क्या इसका पाठ मानसिक शांति देता है?

अत्यधिक। चूँकि यह अद्वैत भाव (Non-duality) पर केंद्रित है, इसका पाठ मन के द्वंद्वों (Conflicts) को समाप्त कर गहरी शांति देता है।

12. कूर्म पुराण का संदर्भ किस श्लोक में है?

श्लोक 4 में 'यत्कूर्मवायव्यवचोविवृत्या' कहकर कूर्म पुराण और वायु पुराण का संदर्भ दिया गया है, जहाँ देवी को 'पाशविच्छेदकरी' (बंधनों को काटने वाली) कहा गया है।