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Narayani Stuti – श्री नारायणी स्तुति | Durga Saptashati Chapter 11

Narayani Stuti – श्री नारायणी स्तुति | Durga Saptashati Chapter 11
॥ श्री नारायणी स्तुति (दुर्गा सप्तशती अध्याय ११) ॥ सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते । स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥ कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनि । विश्वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ २ ॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ३ ॥ सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि । गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ४ ॥ शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे । सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ५ ॥ हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणीरूपधारिणि । कौशाम्भःक्षरिके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ६ ॥ त्रिशूलचन्द्राहिधरे महावृषभवाहिनि । माहेश्वरीस्वरूपेण नारायणि नमोऽस्तुते ॥ ७ ॥ मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरेऽनघे । कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ८ ॥ शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गगृहीतपरमायुधे । प्रसीद वैष्णवीरूपे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ९ ॥ गृहीतोग्रमहाचक्रे दम्ष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे । वराहरूपिणि शिवे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १० ॥ नृसिंहरूपेणोग्रेण हन्तुं दैत्यान् कृतोद्यमे । त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११ ॥ किरीटिनि महावज्रे सहस्रनयनोज्ज्वले । वृत्रप्राणहरे चैन्द्रि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १२ ॥ शिवदूतीस्वरूपेण हतदैत्यमहाबले । घोररूपे महारावे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १३ ॥ दम्ष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे । चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १४ ॥ लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टि स्वधे ध्रुवे । महारात्रि महामाये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १५ ॥ मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि तामसि । नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमोऽस्तुते ॥ १६ ॥ ॥ इति श्री नारायणी स्तुति सम्पूर्णम् ॥

नारायणी स्तुति का महात्म्य

नारायणी स्तुति केवल देवताओं की कृतज्ञता (Gratitude) नहीं, बल्कि एक दार्शनिक उद्घोषणा है। सप्तशती के युद्ध के बाद देवता समझ गए कि जो शक्ति (Energy) ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कार्य कर रही है, वह वास्तव में 'नारायणी' ही है।

इस स्तोत्र में देवी को 'बुद्धिरूपेण' (Intellect) कहा गया है। अर्थात हर मनुष्य के हृदय में जो बुद्धि और विवेक है, वह देवी का ही रूप है। जब हम सही निर्णय लेते हैं, तो वह देवी की कृपा होती है।

सप्त मातृकाओं का रहस्य

इस स्तोत्र में 7 मातृकाओं की स्तुति है, जो वास्तव में देवी की युद्ध-शक्तियां हैं:

  • ब्रह्माणी: हंस पर सवार, कमंडल से पवित्र जल छिड़कती हुई। यह ज्ञान और शुद्धता की प्रतीक हैं।

  • माहेश्वरी: वृषभ (Bull) पर सवार, त्रिशूल धारण किए हुए। यह शिव की संहार शक्ति हैं।

  • कौमारी: मोर पर सवार, शक्ति (Spear) धारण किए हुए। यह कार्तिकेय की वीरता हैं।

  • वैष्णवी: गरुड़ पर सवार, शंख-चक्र-गदा-पद्म लिए हुए। यह पालन-पोषण की शक्ति हैं।

  • वाराही: वराह अवतार की शक्ति। यह पृथ्वी को ऊपर उठाने वाली (Uplifting) शक्ति हैं।

  • नारसिंही: नृसिंह अवतार की उग्र शक्ति। यह भक्तों की रक्षा के लिए तत्पर हैं।

  • ऐन्द्री (इन्द्राणी): हजार नेत्रों वाली और वज्र धारण करने वाली। यह शासन और अधिकार (Authority) की शक्ति हैं।

स्तोत्र पाठ के 5 बड़े लाभ

1. सर्व-मंगल की प्राप्ति

'सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये' - यह मंत्र जीवन के हर क्षेत्र (विवाह, नौकरी, संतान, स्वास्थ्य) में शुभता और सफलता लाता है।

2. बुद्धि और विवेक

'बुद्धिरूपेण संस्थिते' - विद्यार्थियों और निर्णय लेने वालों (Decision Makers) के लिए यह स्तोत्र बुद्धि को कुशाग्र करता है।

3. संकट से रक्षा

जैसे देवताओं की रक्षा हुई, वैसे ही जो साधक 'शरणागतदीनार्त...' श्लोक (5) का पाठ करता है, उसके बड़े से बड़े संकट टल जाते हैं।

4. मोक्ष और मुक्ति

'स्वर्गापवर्गदे देवि' - यह स्तोत्र भोग के साथ-साथ अपवर्ग (मोक्ष/मुक्ति) भी प्रदान करता है। यह जीवन का अंतिम लक्ष्य सिद्ध करता है।

5. सभी देवताओं का आशीर्वाद

चूंकि इसमें सभी देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र) की शक्तियों का आह्वान है, इसलिए इसके पाठ से सभी देवी-देवता एक साथ प्रसन्न होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. नारायणी स्तुति का मूल स्रोत क्या है?

यह 'दुर्गा सप्तशती' (Devi Mahatmyam) के 11वें अध्याय से लिया गया है। इसे 'देवता-कृत स्तुति' भी कहा जाता है, जो शुम्भ-निशुम्भ वध के बाद गाई गई थी।

2. 'सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये' मंत्र का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है - 'हे देवी! आप सभी मंगलों में सबसे शुभ मंगल (Most Auspicious) हैं। आप शिवे (कल्याणकारी) हैं और भक्तों के सभी पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को सिद्ध करने वाली हैं।'

3. सप्त मातृकाएं कौन हैं?

इस स्तोत्र में 1. ब्रह्माणी, 2. माहेश्वरी, 3. कौमारी, 4. वैष्णवी, 5. वाराही, 6. नारसिंही और 7. ऐन्द्री (इन्द्राणी) की स्तुति है। चामुंडा को आठवीं शक्ति माना जाता है।

4. देवी को 'नारायणी' क्यों कहा गया है?

'नारायण' का अर्थ है जो जल (नार) में निवास करे या जो नरों (मनुष्यों/जीवों) का आश्रय हो। देवी ही वह 'शक्ति' (Energy) हैं जो नारायण की भी आधारशक्ति हैं, इसलिए वे 'नारायणी' हैं।

5. शरण्ये त्र्यम्बके गौरि का क्या महत्व है?

यहाँ देवी को 'शरण देने वाली' (Rescuer) और 'तीन नेत्रों वाली' (Trinetra - भूत, भविष्य, वर्तमान की ज्ञाता) कहा गया है। गौरी रूप में वे सौम्यता और करुणा की मूर्ति हैं।

6. वाराही रूप की क्या विशेषता है?

श्लोक 10 में वाराही रूप का वर्णन है, जिन्होंने अपने दाढ़ (Tusk) से धरती का उद्धार किया था। यह रूप शत्रुओं को जड़ सहित उखाड़ने और भूमि विवाद सुलझाने के लिए पूजा जाता है।

7. क्या पुरुष यह पाठ कर सकते हैं?

जी हाँ, यह स्तोत्र सार्वभौमिक (Universal) है। देवता (जो पुरुष थे) ने ही यह स्तुति की थी। इसलिए पुरुष इसका पाठ निसंकोच कर सकते हैं।

8. क्या यह स्तोत्र भय (Fear) को दूर करता है?

हाँ, श्लोक 5 में कहा गया है - 'शरणागत... परित्राणपरायणे'। जो भी देवी की शरण में आता है, देवी उसके भय और पीड़ा को हर लेती हैं।

9. शिवदूती रूप क्या है?

युद्ध में देवी ने भगवान शिव को दूत बनाकर दैत्यों के पास भेजा था, इसलिए इनका एक नाम 'शिवदूती' पड़ा। शत्रु-संहार के लिए यह रूप अत्यंत उग्र है।

10. क्या विवाह के लिए यह स्तोत्र पढ़ सकते हैं?

'सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये' मंत्र का जप विवाह योग्य युवक-युवतियों के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। यह मंगल दोष और विवाह बाधाओं को दूर करता है।

11. पाठ के बाद 'नमोऽस्तु ते' बोलना क्यों जरूरी है?

'नमोऽस्तु ते' का अर्थ है 'आपको मेरा नमस्कार हो'। यह समर्पण (Surrender) का भाव है। बिना अहंकार छोड़े भक्ति सिद्ध नहीं होती।

12. क्या इसे गुप्त नवरात्रि में पढ़ा जा सकता है?

अवश्य! यह तंत्र और मंत्र दोनों का सार है। गुप्त नवरात्रि में विशेष कामना सिद्धि के लिए इसका अनुष्ठान बहुत फलदायी होता है।