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Sri Durga Chandrakala Stuti – श्री दुर्गा चन्द्रकला स्तुतिः (Appayya Dikshita)

Sri Durga Chandrakala Stuti – श्री दुर्गा चन्द्रकला स्तुतिः (Appayya Dikshita)
॥ श्री दुर्गा चन्द्रकला स्तुतिः ॥ वेधोहरीश्वरस्तुत्यां विहर्त्रीं विन्ध्यभूधरे । हरप्राणेश्वरीं वन्दे हन्त्रीं विबुधविद्विषाम् ॥ १ ॥ अभ्यर्थनेन सरसीरुहसम्भवस्य त्यक्त्वोदिता भगवदक्षिपिधानलीलाम् । विश्वेश्वरी विपदपाकरणे पुरस्तात् माता ममास्तु मधुकैटभयोर्निहन्त्री ॥ २ ॥ प्राङ्निर्जरेषु निहतैर्निजशक्तिलेशैः एकीभवद्भिरुदिताऽखिललोकगुप्त्यै । सम्पन्नशस्त्रनिकरा च तदायुधस्थैः माता ममास्तु महिषान्तकरी पुरस्तात् ॥ ३ ॥ प्रालेयशैलतनया तनुकान्तिसम्पत् कोशोदिता कुवलयच्छविचारुदेहा । नारायणी नमदभीप्सितकल्पवल्ली सुप्रीतिमावहतु शुम्भनिशुम्भहन्त्री ॥ ४ ॥ विश्वेश्वरीति महिषान्तकरीति यस्याः नारायणीत्यपि च नामभिरङ्कितानि । सूक्तानि पङ्कजभुवा च सुरर्षिभिश्च दृष्टानि पावकमुखैश्च शिवां भजे ताम् ॥ ५ ॥ उत्पत्तिदैत्यहननस्तवनात्मकानि संरक्षकाण्यखिलभूतहिताय यस्याः । सूक्तान्यशेषनिगमान्तविदः पठन्ति तां विश्वमातरमजस्रमभिष्टवीमि ॥ ६ ॥ ये वैप्रचित्तपुनरुत्थितशुम्भमुख्यैः दुर्भिक्षघोरसमयेन च कारितासु । आविष्कृतास्त्रिजगदार्तिषु रूपभेदाः तैरम्बिका समभिरक्षतु मां विपद्भ्यः ॥ ७ ॥ सूक्तं यदीयमरविन्दभवादि दृष्टं आवर्त्य देव्यनुपदं सुरथः समाधिः । द्वावप्यवापतुरभीष्टमनन्यलभ्यं तामादिदेवतरुणीं प्रणमामि मूर्ध्ना ॥ ८ ॥ माहिष्मतीतनुभवं च रुरुं च हन्तुं आविष्कृतैर्निजरसादवतारभेदैः । अष्टादशाहतनवाहतकोटिसङ्ख्यैः अम्बा सदा समभिरक्षतु मां विपद्भ्यः ॥ ९ ॥ एतच्चरित्रमखिलं लिखितं हि यस्याः सम्पूजितं सदन एव निवेशितं वा । दुर्गं च तारयति दुस्तरमप्यशेषं श्रेयः प्रयच्छति च सर्वमुमां भजे ताम् ॥ १० ॥ यत्पूजनस्तुतिनमस्कृतिभिर्भवन्ति प्रीताः पितामहरमेशहरास्त्रयोऽपि । तेषामपि स्वकगुणैर्ददती वपूंषि तामीश्वरस्य तरुणीं शरणं प्रपद्ये ॥ ११ ॥ कान्तारमध्यदृढलग्नतयाऽवसन्नाः मग्नाश्च वारिधिजले रिपुभिश्च रुद्धाः । यस्याः प्रपद्य चरणौ विपदस्तरन्ति सा मे सदाऽस्तु हृदि सर्वजगत्सवित्री ॥ १२ ॥ बन्धे वधे महति मृत्युभये प्रसक्ते वित्तक्षये च विविधे य महोपतापे । यत्पादपूजनमिह प्रतिकारमाहुः सा मे समस्तजननी शरणं भवानी ॥ १३ ॥ बाणासुरप्रहितपन्नगबन्धमोक्षः तद्बाहुदर्पदलनादुषया च योगः । प्राद्युम्निना द्रुतमलभ्यत यत्प्रसादात् सा मे शिवा सकलमप्यशुभं क्षिणोतु ॥ १४ ॥ पापः पुलस्त्यतनयः पुनरुत्थितो मां अद्यापि हर्तुमयमागत इत्युदीतम् । यत्सेवनेन भयमिन्दिरयाऽवधूतं तामादिदेवतरुणीं शरणं गतोऽस्मि ॥ १५ ॥ यद्ध्यानजं सुखमवाप्यमनन्तपुण्यैः साक्षात्तमच्युत परिग्रहमाश्ववापुः । गोपाङ्गनाः किल यदर्चनपुण्यमात्राः सा मे सदा भगवती भवतु प्रसन्ना ॥ १६ ॥ रात्रिं प्रपद्य इति मन्त्रविदः प्रपन्नान् उद्बोध्य मृत्युवधिमन्यफलैः प्रलोभ्य । बुद्ध्वा च तद्विमुखतां प्रतनं नयन्तीं आकाशमादिजननीं जगतां भजे ताम् ॥ १७ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ देशकालेषु दुष्टेषु दुर्गाचन्द्रकलास्तुतिः । सन्ध्ययोरनुसन्धेया सर्वापद्विनिवृत्तये ॥ १८ ॥ ॥ इति श्रीमदपय्यदीक्षितविरचिता दुर्गाचन्द्रकलास्तुतिः सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र का महत्त्व (Significance and Legend)

श्री दुर्गा चन्द्रकला स्तुतिः केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि एक 'संकट मोचन' कवच की तरह है। इसके रचयिता अप्पय्य दीक्षित दक्षिण भारत के एक महान विद्वान थे, जिन्होंने 104 ग्रंथ लिखे थे।

एक बार वे अत्यंत भयानक पेट दर्द (संभवतः अपेंडिसाइटिस या कोलिक) से ग्रस्त हो गए। वैद्य हार मान चुके थे। तब उन्होंने चिदंबरम नटराज मंदिर में जाकर व्याकुलता से माँ दुर्गा का आह्वान किया और 18 श्लोकों का यह स्तोत्र रचा।

श्लोक 13 ("वित्तक्षये च विविधे य महोपतापे") में उन्होंने अपने 'महोपताप' (महान पीड़ा) का उल्लेख किया है। स्तोत्र पूरा करते ही वे पूर्णतः स्वस्थ हो गए। यह स्तोत्र 'दुर्गा सप्तशती' के तीनों चरित्रों (प्रथम, मध्यम, उत्तम) का सार भी अपने में समेटे हुए है।

श्लोकों का भावार्थ (Essence of Verses)

  • श्लोक 1 (वन्दना): "वेधोहरीश्वरस्तुत्यां..." - ब्रह्मा, विष्णु और शिव द्वारा स्तुत, विन्ध्याचल पर्वत पर निवास करने वाली और शिव की प्राणेश्वरी को मैं प्रणाम करता हूँ।

  • श्लोक 2-3 (मधु-कैटभ और महिषासुर वध): कवि प्रार्थना करते हैं कि जिस देवी ने ब्रह्मा की रक्षा के लिए मधु-कैटभ का नाश किया और देवताओं के तेज से प्रकट होकर महिषासुर का संहार किया, वे मेरे सामने उपस्थित होकर मेरी रक्षा करें।

  • श्लोक 4 (शुम्भ-निशुम्भ वध): हिमालय पुत्री, नीलकमल जैसी सुंदर कांति वाली 'नारायणी', जिन्होंने शुम्भ और निशुम्भ का वध किया, वे मुझ पर प्रसन्न हों।

  • श्लोक 10 (सप्तशती माहात्म्य): जिसके घर में देवी का चरित्र (दुर्गा सप्तशती) लिखा हुआ है या पूजा जाता है, वह व्यक्ति दुस्तर (कठिन से कठिन) संकटों को भी पार कर जाता है।

  • श्लोक 12 (संकट रक्षक): घने जंगल (कान्तार) में भटकने पर, समुद्र में डूबने पर, या शत्रुओं से घिर जाने पर, जो भी देवी के चरणों का आश्रय लेता है, वह सुरक्षित बच निकलता है।

पाठ के लाभ (Benefits)

1. असाध्य रोग निवारण

चूंकि इसकी रचना रोग मुक्ति के लिए हुई थी, इसलिए गंभीर बीमारियों से लड़ने वाले साधकों के लिए यह 'रामबाण' औषधि के समान है।

2. सर्व बाधा मुक्ति

श्लोक 18 में कहा गया है - "सर्वापद्विनिवृत्तये" (सभी आपदाओं की निवृत्ति के लिए)। यह धन हानि, राज भय, और पारिवारिक कलेश को दूर करता है।

3. परम शांति

यह स्तोत्र मन को असीम शांति प्रदान करता है और मृत्यु भय (Fear of Death) को समाप्त करता है।

4. दुर्गा सप्तशती का फल

यह स्तोत्र संक्षिप्त में दुर्गा सप्तशती के तीनों चरित्रों का स्मरण कराता है, अतः इसके पाठ से सप्तशती के पाठ जैसा पुण्य प्राप्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. इस स्तोत्र की रचना किसने की?

इसकी रचना 16वीं सदी के महान विद्वान और शिव भक्त श्री अप्पय्य दीक्षित (Sri Appayya Dikshita) ने की थी।

2. 'चन्द्रकला' (Chandrakala) का क्या अर्थ है?

चन्द्रमा की 16 कलाएं होती हैं। यह स्तोत्र भी 16 मुख्य श्लोकों (कुल 18) का समूह है, जो शीतलता और पूर्णता का प्रतीक है।

3. अप्पय्य दीक्षित ने यह स्तोत्र क्यों लिखा?

कहा जाता है कि उन्हें शत्रुओं द्वारा दिए गए विष या किसी गंभीर रोग के कारण पेट में असहनीय पीड़ा थी। इस स्तोत्र के पाठ से वे पूर्णतः स्वस्थ हो गए थे।

4. विन्ध्यवासिनी (Vindhyavasini) का उल्लेख कहाँ है?

पहले ही श्लोक में 'विहर्त्रीं विन्ध्यभूधरे' कहकर देवी को विन्ध्य पर्वत पर विहार करने वाली बताया गया है।

5. क्या यह स्तोत्र भय नाशक है?

हाँ, श्लोक 12-13 में स्पष्ट लिखा है कि जंगल में खो जाने, समुद्र में डूबने, या शत्रुओं से घिर जाने पर यह स्तोत्र रक्षा करता है।

6. 'सुरथ और समाधि' कौन थे?

श्लोक 8 में राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य का उल्लेख है (जो दुर्गा सप्तशती के मुख्य पात्र हैं)। उन्होंने देवी की आराधना से अपना खोया हुआ राज्य और ज्ञान पुनः प्राप्त किया।

7. संध्या समय पाठ का क्या महत्व है?

अंतिम श्लोक (18) में निर्देश है: 'सन्ध्ययोरनुसन्धेया' - यानी दोनों संध्याओं (सुबह और शाम) में इसका पाठ करने से सभी आपदाएं दूर होती हैं।

8. क्या वैष्णव जन भी इसका पाठ कर सकते हैं?

अवश्य। श्लोक 2 और 5 में देवी को 'नारायणी' और 'हरि की बहन' के रूप में पूजा गया है। अप्पय्य दीक्षित ने स्वयं शिव और विष्णु में अभेद माना है।

9. रोग निवारण के लिए कौन सा श्लोक है?

पूरा स्तोत्र ही रोग नाशक है, किन्तु विशेष रूप से श्लोक 13 ('विविधे य महोपतापे') शारीरिक और मानसिक संताप को दूर करने के लिए प्रभावशाली है।

10. बाणासुर की कथा का क्या संदर्भ है?

श्लोक 14 में अनिरुद्ध (कृष्ण के पोते) और उषा की कथा का संकेत है, जहाँ देवी की कृपा से ही वे बाणासुर के बंधन से मुक्त हुए थे।

11. क्या यह मोक्ष देता है?

हाँ, श्लोक 16 में गोपियों का उदाहरण है, जिन्होंने देवी अर्चना के पुण्य से साक्षात् 'अच्युत' (भगवान कृष्ण/मोक्ष) को प्राप्त किया।

12. 'विश्वेश्वरी' का क्या अर्थ है?

जो पूरे विश्व (ब्रह्मांड) की ईश्वरी (स्वामिनी) और माता हैं। वे ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार करती हैं।