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Chatushashti (64) Yogini Nama Stotram 1 – चतुःषष्टि योगिनी नाम स्तोत्रम् (प्रथम)

Chatushashti (64) Yogini Nama Stotram 1 – चतुःषष्टि योगिनी नाम स्तोत्रम् (प्रथम)
॥ अथ श्री चतुःषष्टि योगिनी नाम स्तोत्रम् (प्रथम) ॥ गजास्या सिंहवक्त्रा च गृध्रास्या काकतुण्डिका । उष्ट्रास्याऽश्वखरग्रीवा वाराहास्या शिवानना ॥ १ ॥ उलूकाक्षी घोररवा मायूरी शरभानना । कोटराक्षी चाष्टवक्त्रा कुब्जा च विकटानना ॥ २ ॥ शुष्कोदरी ललज्जिह्वा श्वदंष्ट्रा वानरानना । ऋक्षाक्षी केकराक्षी च बृहत्तुण्डा सुराप्रिया ॥ ३ ॥ कपालहस्ता रक्ताक्षी शुकी श्येनी कपोतिका । पाशहस्ता दण्डहस्ता प्रचण्डा चण्डविक्रमा ॥ ४ ॥ शिशुघ्नी पाशहन्त्री च काली रुधिरपायिनी । वसापाना गर्भभक्षा शवहस्ताऽऽन्त्रमालिका ॥ ५ ॥ ऋक्षकेशी महाकुक्षिर्नागास्या प्रेतपृष्ठका । दग्धशूकधरा क्रौञ्ची मृगशृङ्गा वृषानना ॥ ६ ॥ फाटितास्या धूम्रश्वासा व्योमपादोर्ध्वदृष्टिका । तापिनी शोषिणी स्थूलघोणोष्ठा कोटरी तथा ॥ ७ ॥ विद्युल्लोला बलाकास्या मार्जारी कटपूतना । अट्‍टहास्या च कामाक्षी मृगाक्षी चेति ता मताः ॥ ८ ॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ चतुःषष्टिस्तु योगिन्यः पूजिता नवरात्रके । दुष्टबाधां नाशयन्ति गर्भबालादिरक्षिकाः ॥ ९ ॥ न डाकिन्यो न शाकिन्यो न कूष्माण्डा न राक्षसाः । तस्य पीडां प्रकुर्वन्ति नामान्येतानि यः पठेत् ॥ १० ॥ रणे राजकुले वापि विवादे जयदान्यपि । बलिपूजोपहारैश्च धूपदीपसमर्पणैः । क्षिप्रं प्रसन्ना योगिन्यो प्रयच्छेयुर्मनोरथान् ॥ ११ ॥ ॥ इति श्रीलक्ष्मीनारायण संहितायां कृतयुगसन्तानाख्यानं नाम प्रथम खण्डे त्र्यशीतितमोऽध्याये चतुःषष्टियोगिनी स्तवराजः ॥

64 योगिनियाँ - परिचय (Introduction)

चतुःषष्टि योगिनी स्तोत्रम् (प्रथम) शक्ति साधना का एक अत्यंत विशिष्ट ग्रंथ है। यह स्तोत्र साधारण नामावली नहीं है, बल्कि इसमें 64 योगिनियों के उग्र और विचित्र स्वरूपों का वर्णन है, जो विभिन्न पशु-पक्षियों के मुख (Animal-faced) धारण करती हैं।

ग्रंथ संदर्भ:
यह स्तोत्र श्री लक्ष्मीनारायण संहिता (Sri Lakshmi Narayana Samhita) के प्रथम खंड (कृतयुग संतानाख्यान) के 83वें अध्याय से लिया गया है। यह वैष्णव ग्रंथ होने के बावजूद शक्ति के इस रूप को पूर्ण मान्यता देता है।

स्वरूप और रहस्य (Form & Mystery)

  • गजास्या (Gajasya) - हाथी मुख: बल और बुद्धि का प्रतीक। विघ्न विनाशक शक्ति।

  • सिंहवक्त्रा (Simhavaktra) - शेर मुख: अतुलनीय शक्ति और राजसी तेज। भय को नष्ट करने वाली।

  • गृध्रास्या (Gridhrasya) - गिद्ध मुख: श्मशान चारिणी, जो अशुद्धि और मृत्यु के भय को खा जाती है।

  • काकतुण्डिका (Kakatundika) - कौवा मुख: समय (Time) और भविष्य का ज्ञान रखने वाली।

  • उष्ट्रास्या (Ushtrasya) - ऊंट मुख: कठिन परिस्थितियों और रेगिस्तान जैसी शून्यता में भी जीवन देने वाली।

भक्तों के लिए यह समझना आवश्यक है कि ये भयानक रूप (Terrifying forms) बुराई के लिए हैं, जबकि अपने बच्चों (साधकों) के लिए ये अत्यंत सौम्य और रक्षक हैं।

64 योगिनियों के स्वरूप और अर्थ (Forms & Meanings)

#नाम (Sanskrit Name)अर्थ / स्वरूप (Meaning/Form)
1गजास्या (Gajasya)हाथी मुख (Elephant-faced) - बुद्धि और बल।
2सिंहवक्त्रा (Simhavaktra)शेर मुख (Lion-faced) - शक्ति और पराक्रम।
3गृध्रास्या (Gridhrasya)गिद्ध मुख (Vulture-faced) - श्मशान वासिनी।
4काकतुण्डिका (Kakatundika)कौवा मुख (Crow-faced) - समय और भविष्य ज्ञान।
5उष्ट्रास्या (Ushtrasya)ऊंट मुख (Camel-faced) - सहनशक्ति।
6अश्वग्रीवा (Ashvagriva)घोड़े की गर्दन (Horse-necked) - गति और वेग।
7खरग्रीवा (Kharagriva)गधे की गर्दन (Donkey-necked) - कठोर परिश्रम।
8वाराहास्या (Varahasya)वाराह मुख (Boar-faced) - भूमि उद्धार।
9शिवानना (Shivanana)शृगाल/सियार मुख (Jackal-faced) - घोर नाद।
10उलूकाक्षी (Ulukakshi)उल्लू जैसी आँखें (Owl-eyed) - रात्रि दृष्टि।
11घोररवा (Ghorarava)भयानक ध्वनि (Terrible-voiced) - शत्रु भय।
12मायूरी (Mayuri)मोर मुख (Peacock-faced) - सर्प नाशनी।
13शरभानना (Sharabhanana)शरभ मुख (Mythical Beast) - नृसिंह से भी उग्र।
14कोटराक्षी (Kotarakshi)गहरी आँखें (Hollow-eyed) - अदृश्य दर्शन।
15अष्टवक्त्रा (Ashtavaktra)आठ मुख वाली (Eight-faced) - अष्ट दिशा रक्षक।
16कुब्जा (Kubja)कुबड़ी (Hunchbacked) - विनम्रता/छल रूप।
17विकटानना (Vikatanana)डरावना मुख (Frightful-faced)।
18शुष्कोदरी (Sushkodari)सूखे पेट वाली (Dried-belly) - तपस्या का प्रतीक।
19ललज्जिह्वा (Lalajjihva)लपलपाती जीभ (Lolling-tongue) - रक्त पिपासा।
20श्वदंष्ट्रा (Shvadamshtra)कुत्ते के दांत (Dog-toothed) - रक्षक शक्ति।
21वानरानना (Vanaranana)बंदर मुख (Monkey-faced) - चंचलता और वेग।
22ऋक्षाक्षी (Rikshakshi)रिछ/भालू आँखें (Bear-eyed)।
23केकराक्षी (Kekarakshi)तिरछी आँखें (Squint-eyed) - सम्मोहन।
24बृहत्तुण्डा (Brihattunda)बड़ी चोंच/तुंड (Large-snouted)।
25सुराप्रिया (Surapriya)मदिरा प्रिय (Lover of wine) - आनंद मयी।
26कपालहस्ता (Kapalahasta)हाथ में कपाल (Skull-holder) - संहार।
27रक्ताक्षी (Raktakshi)लाल आँखें (Red-eyed) - क्रोध मुद्रा।
28शुकी (Shuki)तोता मुख (Parrot-faced) - वाणी सिद्धि।
29श्येनी (Shyeni)बाज/शिकारी पक्षी (Hawk-faced) - तीक्ष्ण दृष्टि।
30कपोतिका (Kapotika)कबूतर मुख (Pigeon-faced) - शांति/संदेश।
31पाशहस्ता (Pashahasta)हाथ में पाश (Noose-holder) - बंधन।
32दण्डहस्ता (Dandahasta)हाथ में दंड (Staff-holder) - शासन।
33प्रचण्डा (Prachanda)अत्यंत उग्र (Fierce)।
34चण्डविक्रमा (Chandavikrama)प्रचंड पराक्रमी (Terrible valour)।
35शिशुघ्नी (Shishughni)शिशु हंता (Child-slayer) - बाल अरिष्ट निवारण
36पाशहन्त्री (Pashahantri)बंधन काटने वाली (Destroyer of noose) - मोक्ष।
37काली (Kali)काल रूपा (Black/Time) - समय का अंत।
38रुधिरपायिनी (Rudhirapayini)रक्त पीने वाली (Blood-drinker) - शत्रु नाश।
39वसापाना (Vasapana)वसा पीने वाली (Fat-drinker)।
40गर्भभक्षा (Garbhabhaksha)गर्भ भक्षक (Womb-eater) - गर्भ रक्षा देवी
41शवहस्ता (Shavahasta)हाथ में शव (Corpse-holder)।
42आन्त्रमालिका (Antramalika)आंतों की माला (Garland of intestines)।
43ऋक्षकेशी (Rikshakeshi)भालू जैसे बाल (Bear-haired)।
44महाकुक्षि (Mahakukshi)विशाल पेट (Big-bellied) - ब्रह्मांड समाहित।
45नागास्या (Nagasya)सर्प/नाग मुख (Snake-faced) - विष हरण।
46प्रेतपृष्ठका (Pretaprishtbha)प्रेत पर सवार (Riding a corpse)।
47दग्धशूकधरा (Dagdhashukadhara)जला हुआ शूल धारण करने वाली (Burnt-spike holder)।
48क्रौञ्ची (Kraunchi)क्रौञ्च पक्षी मुख (Crane/Heron-faced)।
49मृगशृङ्गा (Mrigashringa)हिरण के सींग वाली (Deer-horned)।
50वृषानना (Vrishanana)बैल मुख (Bull-faced) - धर्म।
51फाटितास्या (Phatitasya)फटे हुए मुख वाली (Gaping-mouthed)।
52धूम्रश्वासा (Dhumrashvasa)धुएं की सांस (Smoke-breathing)।
53व्योमपादा (Vyomapada)आकाश पैर (Sky-footed) - सर्वव्यापी।
54ऊर्ध्वदृष्टिका (Urdhvadrishtika)ऊपर देखने वाली (Upward-gazing)।
55तापिनी (Tapini)तपाने वाली (Heating) - संताप नाश।
56शोषिणी (Shoshini)सुखाने वाली (Drying)।
57स्थूलघोणोष्ठा (Sthulaghonoshtha)मोटे होंठ/नाक (Thick-lipped/nosed)।
58कोटरा (Kotari/Kotara)नग्न/कोटर वासिनी (Naked/Hollow-dweller)।
59विद्युल्लोला (Vidyullola)बिजली सी चंचल (Lightning-tongued)।
60बलाकास्या (Balakasya)बगुला मुख (Crane-faced)।
61मार्जारी (Marjari)बिल्ली मुख (Cat-faced) - गुप्त ज्ञान।
62कटपूतना (Kataputana)शव पिशाचिनी (Corpse-demoness) - शुद्धि।
63अट्टहास्या (Attahasya)जोर से हंसने वाली (Loud-laughing)।
64कामाक्षी (Kamakshi)काम/इच्छा नेत्र (Desire-eyed) - कामना पूर्ति।
*मृगाक्षी (Mrigakshi)हिरण नैनी (Doe-eyed) - यह 64 का पूरक नाम है।

विशेष नोट: इनमें से कई नाम (जैसे 'शिशुघ्नी' या 'गर्भभक्षा') भयानक प्रतीत होते हैं। तंत्र शास्त्र में इनका अर्थ है - "वह देवी जो शिशु या गर्भ पर आने वाले संकटों को खा जाती है या नष्ट कर देती है"। इसलिए इन्हें रक्षक के रूप में पूजा जाता है, न कि भक्षक के रूप में।

पाठ विधि (Ritual Method)

  • समय (Time): इस स्तोत्र की फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है—"पूजिता नवरात्रके"। नवरात्रि (चैत्र या शारदीय) के 9 दिनों में इसका नित्य पाठ फलदायी होता है।

  • बलि और उपहार (Offering): श्लोक 11 में 'बलिपूजोपहारैश्च' का विधान है। यहाँ बलि का अर्थ सात्विक बलि है—जैसे नारियल फोड़ना, नींबू काटना या कुष्मांड (पेठा/कद्दू) की बलि देना।

  • दीपक (Lamp): सरसों या तिल के तेल का दीपक दक्षिण दिशा की ओर जलाएं।

  • विशेष प्रयोग: यदि कोई बच्चा बार-बार बीमार पड़ता हो या गर्भवस्था में कष्ट हो, तो इस स्तोत्र का जल अभिमंत्रित करके (7 बार पाठ करके) पिलाने से 'गर्भबालादिरक्षा' होती है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. यह स्तोत्र किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र 'श्री लक्ष्मीनारायण संहिता' (Sri Lakshmi Narayana Samhita) के 'कृतयुग संतानाख्यान' (Krita Yuga Santana Akhyana) खंड के 83वें अध्याय से लिया गया है। यह वैष्णव और शाक्त परंपरा का एक अद्भुत संगम है।

2. इस स्तोत्र में योगिनियों के मुख पशुओं जैसे क्यों हैं?

पशु-मुख (Animal-faced/Theriocephalic) स्वरूप यह दर्शाता है कि माँ आदिशक्ति केवल मनुष्यों की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्रकृति (Nature) और सभी जीव-जंतुओं की माता और स्वामिनी हैं। गजास्या (हाथी) बुद्धि का, सिंहवक्त्रा (शेर) शक्ति का और मयूरी (मोर) सौंदर्य का प्रतीक है।

3. इस पाठ का मुख्य उद्देश्य क्या है?

फलश्रुति के अनुसार, इसका मुख्य उद्देश्य 'गर्भ रक्षा' (Protection of womb), 'बाल रक्षा' (Protection of children), और 'दुष्ट बाधा नाश' (Removal of evil spirits) है। यह 'रण' (युद्ध) और 'विवाद' (Court cases) में भी विजय दिलाता है।

4. क्या नवरात्रि में इसका विशेष महत्व है?

हाँ, स्वयं श्लोक में कहा गया है—'चतुःषष्टिस्तु योगिन्यः पूजिता नवरात्रके'। नवरात्रि के 9 दिनों में प्रतिदिन इसका पाठ करने से देवी की विशेष कृपा और सुरक्षा प्राप्त होती है।

5. 'बलि' (Sacrifice) का यहाँ क्या अर्थ है?

श्लोक में 'बलिपूजोपहारैश्च' का उल्लेख है। सात्विक साधना में 'बलि' का अर्थ हिंसा नहीं, बल्कि अपने अहंकार का त्याग है। प्रतीकात्मक रूप से नींबू, नारियल या कुष्मांड (पेठा) की बलि दी जाती है।

6. क्या गर्भवती स्त्रियाँ यह पाठ कर सकती हैं?

अत्यंत लाभकारी है। यह स्तोत्र विशेष रूप से 'गर्भबालादिरक्षिकाः' (गर्भ और बालक की रक्षा करने वाला) कहा गया है। यह गर्भस्थ शिशु को नकारात्मक ऊर्जाओं से बचाता है।

7. डाकिनी और शाकिनी भय क्या है?

ये निम्न स्तर की नकारात्मक शक्तियां या तंत्र बाधाएं मानी जाती हैं। इस स्तोत्र का पाठ एक 'कवच' (Shield) की तरह कार्य करता है, जिससे ये शक्तियां साधक को स्पर्श नहीं कर पातीं।

8. पाठ करने की सही दिशा कौन सी है?

योगिनी साधना के लिए दक्षिण (South) या पूर्व (East) दिशा श्रेष्ठ मानी गई है। रात्रि के समय, विशेषकर अष्टमी या चतुर्दशी को दक्षिण मुख होकर पाठ करना शत्रु नाश के लिए उत्तम है।

9. क्या इसे बिना गुरु के पढ़ा जा सकता है?

यह एक स्तोत्र (Hymn) है, कोई बीज मंत्र नहीं, इसलिए इसे भक्ति भाव से कोई भी पढ़ सकता है। परंतु किसी विशिष्ट कामना सिद्धि के लिए संकल्प लेकर पाठ करना हो तो गुरु का मार्गदर्शन श्रेयस्कर है।

10. भोग में क्या अर्पित करें?

देवी को लाल फूल (गुड़हल/गुलाब), धूप, दीप और मिष्ठान्न (जैसे खीर या हलवा) प्रिय हैं। 'धूपदीपसमर्पणैः'—धूप और दीप का अर्पण अनिवार्य बताया गया है।