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बृहद्धर्मपुराणान्तर्गतं श्रीचन्द्राष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् — १०८ दिव्य नाम

Brihaddharma Purana Chandra Ashtottara Shatanamastotram — 108 Divine Names

बृहद्धर्मपुराणान्तर्गतं श्रीचन्द्राष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् — १०८ दिव्य नाम
॥ श्रीचन्द्राष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् ॥ अथ वक्ष्ये शशिस्तोत्रं तच्छृणुष्व मुदान्वितः । चन्द्रोऽमृतमयः श्वेतो विधुर्विमलरूपवान् ॥ १ ॥ विशालमण्डलः श्रीमान् पीयूषकिरणः करी । द्विजराजः शशधरः शशी शिवशिरोगृहः ॥ २ ॥ क्षीराब्धितनयो दिव्यो महात्माऽमृतवर्षणः । रात्रिनाथो ध्वान्तहर्ता निर्मलो लोकलोचनः ॥ ३ ॥ चक्षुराह्लादजनकस्तारापतिरखण्डितः । षोडशात्मा कलानाथो मदनः कामवल्लभः ॥ ४ ॥ हंसःस्वामी क्षीणवृद्धो गौरः सततसुन्दरः । मनोहरो देवभोग्यो ब्रह्मकर्मविवर्धनः ॥ ५ ॥ वेदप्रियो वेदकर्मकर्ता हर्ता हरो हरिः । ऊर्द्ध्ववासी निशानाथः शृङ्गारभावकर्षणः ॥ ६ ॥ मुक्तिद्वारं शिवात्मा च तिथिकर्ता कलानिधिः । ओषधीपतिरब्जश्च सोमो जैवातृकः शुचिः ॥ ७ ॥ मृगाङ्को ग्लौः पुण्यनामा चित्रकर्मा सुरार्चितः । रोहिणीशो बुधपिता आत्रेयः पुण्यकीर्तकः ॥ ८ ॥ निरामयो मन्त्ररूपः सत्यो राजा धनप्रदः । सौन्दर्यदायको दाता राहुग्रासपराङ्मुखः ॥ ९ ॥ शरण्यः पार्वतीभालभूषणं भगवानपि । पुण्यारण्यप्रियः पूर्णः पूर्णमण्डलमण्डितः ॥ १० ॥ हास्यरूपो हास्यकर्ता शुद्धः शुद्धस्वरूपकः । शरत्कालपरिप्रीतः शारदः कुमुदप्रियः ॥ ११ ॥ द्युमणिर्दक्षजामाता यक्ष्मारिः पापमोचनः । इन्दुः कलङ्कनाशी च सूर्यसङ्गमपण्डितः ॥ १२ ॥ सूर्योद्भूतः सूर्यगतः सूर्यप्रियपरःपरः । स्निग्धरूपः प्रसन्नश्च मुक्ताकर्पूरसुन्दरः ॥ १३ ॥ जगदाह्लादसन्दर्शो ज्योतिः शास्त्रप्रमाणकः । सूर्याभावदुःखहर्ता वनस्पतिगतः कृती ॥ १४ ॥ यज्ञरूपो यज्ञभागी वैद्यो विद्याविशारदः । रश्मिकोटिर्दीप्तिकारी गौरभानुरिति द्विज ॥ १५ ॥ नाम्नामष्टोत्तरशतं चन्द्रस्य पापनाशनम् । चन्द्रोदये पठेद्यस्तु स तु सौन्दर्यवान् भवेत् ॥ १६ ॥ पौर्णमास्यां पठेदेतं स्तवं दिव्यं विशेषतः । स्तवस्यास्य प्रसादेन त्रिसन्ध्यापठितस्य च ॥ १७ ॥ सदाप्रसादास्तिष्ठन्ति ब्राह्मणाश्च द्विजोत्तम । श्राद्धे चापि पठेदेतं स्तवं पीयूषरूपिणम् ॥ १८ ॥ तत्तु श्राद्धमनन्तञ्च कलानाथप्रसादतः । दुःस्वप्ननाशनं पुण्यं दाहज्वरविनाशनम् ॥ १९ ॥ ब्राह्मणाद्याः पठेयुस्तु स्त्रीशूद्राः शृणुयुस्तथा । ॥ इति बृहद्धर्मपुराणान्तर्गतं श्रीचन्द्राष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

बृहद्धर्मपुराण चन्द्र स्तोत्र: अमृतमयी नामों की महिमा

भगवान चन्द्र देव 'मन' के अधिपति और 'औषधियों' के स्वामी हैं। बृहद्धर्मपुराण में वर्णित यह स्तोत्र उन्हें 'अमृतमय' और 'पीयूषकिरण' (अमृत की किरणों वाले) के रूप में प्रतिष्ठित करता है। इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें चन्द्रमा को न केवल एक ग्रह, बल्कि शिव के मस्तक की शोभा (शिवशिरोगृहः) और श्रीहरि का ही एक स्वरूप (हरो-हरिः) माना गया है।

चन्द्रमा जब हमारी कुंडली में पीड़ित होते हैं, तो व्यक्ति मानसिक अस्थिरता, अनिद्रा और आंतरिक अशांति का अनुभव करता है। यह स्तोत्र 'ध्वान्तहर्ता' (अंधकार को हरने वाला) और 'पापमोचन' (पापों से मुक्त करने वाला) है। इसके १०८ नामों का पाठ साधक के भीतर सात्विक ऊर्जा का संचार करता है और जीवन की तपिश को शांत कर उसे शीतल चांदनी के समान सुखदायक बनाता है।

स्तोत्र पाठ के दिव्य फल

सौन्दर्य और स्वास्थ्य

स्तोत्र के अनुसार, जो व्यक्ति चन्द्रोदय के समय इसे पढ़ता है, वह चन्द्रमा के समान कांतिवान और सौन्दर्यवान (स तु सौन्दर्यवान् भवेत्) हो जाता है। यह 'यक्ष्मारि' (टीबी जैसे रोगों का शत्रु) भी है।

पितृ दोष और श्राद्ध

श्राद्ध के समय इसका पाठ करने से पितरों को कलानाथ की कृपा से अक्षय तृप्ति प्राप्त होती है और 'अनंत' पुण्य की प्राप्ति होती है।

मानसिक शांति

यह स्तोत्र 'दुःस्वप्ननाशनं' (बुरे स्वप्नों को नष्ट करने वाला) और 'दाहज्वरविनाशनम्' (मानसिक संताप को हरने वाला) है।

सर्वकल्याण

ब्राह्मणों के लिए यह सर्वसिद्धिदायक है और स्त्रियाँ व अन्य व्यक्ति इसे सुनकर भी समान पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।

साधना विधि (Ritual Guide)

  • समय: चन्द्रोदय के समय या पूर्णिमा की रात्रि को पाठ करना 'पीयूष' (अमृत) प्राप्ति के समान है।
  • आवृत्ति: त्रिसन्ध्या (सुबह, दोपहर, शाम) पाठ करने से चन्द्र देव की कृपा सदा बनी रहती है।
  • पूर्णिमा विशेष: पूर्णिमा की चांदनी में बैठकर १०८ नामों का पाठ करने से मानसिक रोगों में तुरंत लाभ मिलता है।
  • शिव उपासना: चन्द्रमा को 'शिवशिरोगृहः' कहा गया है, अतः शिवलिंग का अभिषेक करते हुए इसका पाठ करना अत्यंत फलदायी है।

नामों का गूढ़ अर्थ

षोडशात्मा (Shodashatma)

चन्द्रमा की १६ कलाओं के स्वामी होने के कारण उन्हें षोडशात्मा कहा जाता है, जो मनुष्य के १६ संस्कारों और उसकी चेतना की पूर्णता का प्रतीक है।

नभोदीप (Nabhodipa)

वे आकाश (नभ) के दीपक हैं जो रात्रि के गहन अंधकार में ज्ञान और शीतलता का प्रकाश फैलाते हैं।

ओषधिपति (Oshadhipati)

चन्द्रमा अपनी किरणों से वनस्पतियों और जड़ी-बूटियों में रस भरते हैं, जिससे वे औषधीय गुणों से युक्त होती हैं।

कलानिधि (Kalanidhi)

समस्त कलाओं के भंडार। संगीत, चित्रकला और रचनात्मकता के क्षेत्र में सफलता के लिए यह नाम जागृत करना आवश्यक है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. क्या यह स्तोत्र सामान्य १०८ नाम स्तोत्र से भिन्न है?

हाँ, यह स्तोत्र बृहद्धर्मपुराण से लिया गया है। इसमें अन्य स्तोत्रों की तुलना में चन्द्रमा के अधिक ज्योतिषीय और आध्यात्मिक स्वरूपों (जैसे सूर्य के साथ संबंध) का वर्णन है।

2. श्राद्ध के समय इसका पाठ क्यों किया जाता है?

पुराणों के अनुसार, चन्द्रमा पितरों के स्वामी माने गए हैं। श्राद्ध में इस 'पीयूषरूपी' स्तोत्र के पाठ से पितरों को परम शांति और अक्षय लोक की प्राप्ति होती है।

3. क्या इसे मानसिक अशांति के लिए रोज पढ़ सकते हैं?

अवश्य। 'दाहज्वरविनाशनम्' होने के कारण यह तनाव, क्रोध और मानसिक चंचलता को मिटाने के लिए सर्वश्रेष्ठ है।

4. क्या 'स्त्री' और 'शूद्र' भी इसे पढ़ सकते हैं?

स्तोत्र के श्लोक २० में स्पष्ट कहा गया है कि ब्राह्मण आदि इसका पाठ करें और स्त्रियाँ व अन्य इसे 'सुनें' (शृणुयस्तथा)। सुनने से भी पूर्ण फल की प्राप्ति होती है।

5. राहुग्रासपराङ्मुखः नाम का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है वह जो राहु द्वारा ग्रसित (ग्रहण) होने से विमुख या ऊपर उठ चुका है। यह ग्रहण दोष की शांति के लिए महत्वपूर्ण नाम है।

6. क्या इसे पढ़ने से सुंदरता बढ़ती है?

हाँ, स्तोत्र का फलश्रुति (Verse 16) वचन है कि चन्द्रोदय के समय पाठ करने वाला व्यक्ति 'सौन्दर्यवान' होता है।

7. दक्षजामाता नाम का रहस्य क्या है?

चन्द्रमा का विवाह प्रजापति दक्ष की २७ कन्याओं (२७ नक्षत्रों) से हुआ था, इसलिए उन्हें दक्ष का दामाद (दक्षजामाता) कहा जाता है।

8. सूर्योद्भूत' का क्या अर्थ है?

वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से चन्द्रमा का प्रकाश सूर्य से ही उत्पन्न (Sourced) माना गया है, यह नाम उसी सत्य को प्रकट करता है।

9. क्या बच्चों के लिए यह उपयोगी है?

'दुःस्वप्ननाशनं' होने के कारण जो बच्चे रात में डरते हैं या चौंकते हैं, उन्हें यह स्तोत्र सुनाना बहुत लाभकारी है।

10. इसे पूर्ण करने के बाद क्या करना चाहिए?

पाठ के बाद चन्द्र देव को सफेद दूध या जल का अर्ध्य देना और 'चन्द्र देव की आरती' करना उत्तम रहता है।