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अगस्त्यप्रोक्तं चन्द्रस्तोत्रम्

Agastya Prokta Chandra Stotram — Skanda Purana

अगस्त्यप्रोक्तं चन्द्रस्तोत्रम्
॥ अगस्त्यप्रोक्तं चन्द्रस्तोत्रम् ॥ हिमांशवे नमश्चैव सोमचन्द्राय वै नमः । चन्द्राय विधवे नित्यं नमः कुमुदबन्धवे ॥ ७०॥ (शीतल किरणों वाले 'हिमांशु' को नमस्कार है, 'सोमचन्द्र' को नमस्कार है। 'विभु' (व्यापक) चन्द्रमा को नित्य नमस्कार है और कुमुद (सफेद कमल) के मित्र 'कुमुदबन्धु' को नमस्कार है।) सुधांशवे च सोमाय ओषधीशाय वै नमः । नमोऽब्जाय मृगाङ्काय कलानां निधये नमः ॥ ७१॥ (अमृतमयी किरणों वाले 'सुधांशु' और 'सोम' को नमस्कार है, औषधियों के स्वामी 'ओषधीश' को नमस्कार है। जल से उत्पन्न 'अब्ज', मृग के चिह्न वाले 'मृगाङ्क' और सोलह कलाओं के भंडार 'कलानीधि' को नमस्कार है।) नमो नक्षत्रनाथाय शर्वरीपतये नमः । जैवातृकाय सततं द्विजराजाय वै नमः ॥ ७२॥ (नक्षत्रों के स्वामी 'नक्षत्रनाथ' और रात्रि के अधिपति 'शर्वरीपति' को नमस्कार है। दीर्घायु प्रदान करने वाले 'जैवातृक' और ब्राह्मणों के राजा 'द्विजराज' को सतत नमस्कार है।) इति श्रीस्कन्दपुराणे वैष्णवखण्डे अयोध्यामाहात्म्ये तृतीयाध्यायान्तर्गतं अगस्त्यप्रोक्तं चन्द्रस्तोत्रं समाप्तम् ।

पौराणिक संदर्भ: स्कन्द पुराण और अयोध्या माहात्म्य

अगस्त्यप्रोक्तं चन्द्रस्तोत्रम् का मूल स्रोत हिन्दू धर्म के १८ महापुराणों में से एक 'स्कन्द पुराण' है। यह पुराण भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय (स्कन्द) को समर्पित है। इस स्तोत्र का वर्णन वैष्णव खण्ड के अन्तर्गत आने वाले 'अयोध्या माहात्म्य' के तीसरे अध्याय में मिलता है। अयोध्या की पवित्र भूमि की महिमा गाते हुए जब महर्षि अगस्त्य विभिन्न देवताओं की आराधना करते हैं, तब वे चन्द्र देव की इन ३ श्लोकों में अत्यंत भावपूर्ण स्तुति करते हैं।

अयोध्या माहात्म्य में इस स्तोत्र का होना यह दर्शाता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की नगरी में भी नवग्रहों की शांति और विशेष रूप से 'चन्द्र' (जो मन के अधिष्ठाता हैं) की प्रसन्नता अनिवार्य मानी गई है। महर्षि अगस्त्य स्वयं एक महान तपस्वी और 'अगस्त्य संहिता' के रचयिता हैं, उनके द्वारा रचित यह स्तोत्र सिद्ध मन्त्रों के समान प्रभावशाली है।

१०८ पर्यायवाची नामों का सार

इन ३ श्लोकों में चन्द्र देव के १२ मुख्य विशेषणों का प्रयोग किया गया है, जिनमें से प्रत्येक का गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक अर्थ है:

  • हिमांशु: जिसकी किरणें बर्फ जैसी शीतल (Ice-cold) हों।
  • सोम: अमृत का पर्याय, जो शांति और सुख देता है।
  • विधु: प्रकाश का वह पुंज जो अंधकार को भेदता है।
  • कुमुदबन्धु: जो सफेद कमलों (Water Lily) को खिलाता है।
  • सुधांशु: जिसमें 'सुधा' (Nectar) का अंश समाहित हो।
  • ओषधीश: सभी जड़ी-बूटियों और औषधियों का प्राण।
  • अब्ज: जो समुद्र मंथन (जल) से उत्पन्न हुए हैं।
  • मृगाङ्क: जिनके हृदय में मृग का चिह्न अंकित है।
  • कलानिधि: जो १६ कलाओं (Phases) के अधिपति हैं।
  • नक्षत्रनाथ: २७ नक्षत्रों (रोहिणी आदि) के स्वामी।
  • शर्वरीपति: पूरी रात्रि को प्रकाशित करने वाले स्वामी।
  • द्विजराज: ब्राह्मणों और ऋषियों के रक्षक एवं राजा।

ज्योतिषीय महत्व और प्रभाव

चन्द्र-सूर्य दोष निवारण

स्कन्द पुराण के अनुसार, यह स्तोत्र उस व्यक्ति के लिए वरदान है जिसकी कुंडली में चन्द्रमा नीच का हो या राहु-केतु के साथ ग्रहण दोष बना रहा हो। महर्षि अगस्त्य का तप इस पाठ को एक 'सुरक्षा कवच' में बदल देता है।

मानसिक स्वास्थ्य का विज्ञान

'शर्वरीपतये नमः' कहने से अनिद्रा (Insomnia) और रात्रि में आने वाले डरावने सपनों से मुक्ति मिलती है। यह स्तोत्र मस्तिष्क के रसायनों (Serotonin/Melatonin) को संतुलित करने में आध्यात्मिक आधार प्रदान करता है।

साधना के ५ मुख्य लाभ

  • वंश वृद्धि: 'जैवातृक' नाम के सम्बोधन से वंश में दीर्घायु संतान की प्राप्ति होती है।
  • ब्रह्मचर्य और ज्ञान: 'द्विजराज' होने के कारण यह विद्यार्थियों के लिए एकाग्रता बढ़ाता है।
  • आरोग्य: 'ओषधीश' का ध्यान करने से पुरानी बीमारियों में दवाओं का असर बढ़ने लगता है।
  • सौन्दर्य प्राप्ति: चन्द्र देव का आकर्षण साधक के व्यक्तित्व में झलकता है।
  • यात्रा सुरक्षा: पुराने समय में यात्री रात में सुरक्षा के लिए इस अगस्त्य स्तोत्र का पाठ करते थे।

FAQ: अगस्त्यप्रोक्तं चन्द्रस्तोत्रम् से जुड़े प्रश्न

१. यह स्तोत्र अन्य चन्द्र स्तोत्रों से कैसे अलग है?

यह स्तोत्र 'स्कन्द पुराण' से होने के कारण अत्यधिक प्राचीन और 'पौराणिक' ऊर्जा से युक्त है। इसमें बहुत कम शब्दों में चन्द्रमा के सभी मुख्य गुणों का समावेश कर दिया गया है।

२. महर्षि अगस्त्य का चन्द्रमा से क्या संबंध है?

महर्षि अगस्त्य ने दक्षिण भारत की ओर प्रस्थान करते समय समुद्र का पान किया था, और चन्द्रमा समुद्र से उत्पन्न हुए हैं। अतः अगस्त्य मुनि द्वारा की गई यह स्तुति चन्द्र देव को सहर्ष प्रसन्न करती है।

३. 'कुमुदबन्धु' का क्या अर्थ है?

कुमुदिनी का फूल केवल चन्द्रमा की चांदनी में खिलता है। इसीलिए चन्द्रमा को उनका मित्र या 'बन्धु' कहा जाता है।

४. क्या यह स्तोत्र 'अयोध्या' जाने पर ही पढ़ना चाहिए?

यद्यपि यह 'अयोध्या माहात्म्य' का हिस्सा है, परन्तु इसे कहीं भी श्रद्धापूर्वक पढ़ा जा सकता है। अयोध्या में इसका पाठ करना विशेष फलदायी है।

५. चन्द्रमा को 'द्विजराज' क्यों कहते हैं?

दक्ष प्रजापति द्वारा यज्ञ के समय चन्द्रमा को श्रेष्ठ स्थान दिया गया था और उन्हें ब्राह्मणों का अधिपति घोषित किया गया था।

६. क्या 'मृगाङ्क' का अर्थ चन्द्रमा में हिरण है?

हाँ, भारतीय ज्योतिषीय कथाओं के अनुसार चन्द्रमा के मध्य में दिखने वाली आकृति को 'मृग' (हिरण) माना गया है, इसीलिए उन्हें मृगाङ्क कहा जाता है।

७. इस पाठ का उत्तम समय क्या है?

सोमवार की रात्रि या किसी भी शुक्ल पक्ष की चतुर्थी, अष्टमी या पूर्णिमा को इसका पाठ करना श्रेष्ठ है।

८. 'जैवातृक' नाम का क्या फल है?

यह नाम सम्बोधित करने से अल्पायु योग कटता है और स्वास्थ्य में सुधार होता है।

९. क्या बच्चे इसे अपनी पढ़ाई के लिए पढ़ सकते हैं?

हाँ, क्योंकि चन्द्रमा याददाश्त और 'स्मृति' के कारक हैं, अतः छात्रों के लिए यह बहुत लाभकारी है।

१०. 'कलानिधि' शब्द से क्या प्रेरणा मिलती है?

यह हमें सिखाता है कि जीवन में उतार-चढ़ाव (चन्द्र की कलाओं की तरह) स्वाभाविक हैं, परन्तु प्रभु की शरण में रहने से हम अपनी मूल आभा कभी नहीं खोते।