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चन्द्रस्तोत्रम् (द्वितीय)

Chandra Stotram 2 — निषाकरस्तोत्रम् (Nishakara Stotram)

चन्द्रस्तोत्रम् (द्वितीय)
॥ चन्द्रस्तोत्रम् (द्वितीय) ॥ ध्यानं श्वेताम्बरान्वितवपुर्वरशुभ्रवर्णं श्वेताश्वयुक्तरथगं सुरसेविताङ्घ्रिम् । दोर्भ्यां वृताभयगदं वरदं सुधांशुं श्रीवत्समौक्तिकधरं प्रणमामि चन्द्रम् ॥ १॥ (श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, श्रेष्ठ और शुभ्र वर्ण वाले, सफेद घोड़ों से युक्त रथ पर सवार, देवताओं द्वारा पूजित चरणों वाले, अपनी दो भुजाओं में अभय और गदा धारण करने वाले, वरदान देने वाले, अमृत की किरणों वाले और श्रीवत्स एवं मोतियों के आभूषण धारण करने वाले चन्द्र देव को मैं प्रणाम करता हूँ।) आग्नेयभागे सरथो दशाश्वश्चात्रेयजो यामुनदेशजश्च । प्रत्यङ्मुखस्थश्चतुरस्रपीठे गदाधराङ्गो वररोहिणीशः ॥ २॥ (आग्नेय दिशा में स्थित, रथ और दस घोड़ों से युक्त, अत्रि ऋषि के पुत्र, यमुना तट के प्रदेश में जन्मे, पश्चिम मुख होकर वर्गाकार पीठ पर विराजमान, गदा धारण करने वाले और श्रेष्ठ रोहिणी के स्वामी को मैं नमस्कार करता हूँ।) चन्द्रं चतुर्भुजं देवं केयूरमकुटोज्ज्वलम् । वासुदेवस्य नयनं शङ्करस्य च भूषणम् ॥ ३॥ (चार भुजाओं वाले, बाजूबंद और मुकुट से चमकते हुए, भगवान वासुदेव (विष्णु) के नेत्र स्वरूप और भगवान शंकर के मस्तक के आभूषण चंद्र देव की मैं स्तुति करता हूँ।) चन्द्रं च द्विभुजं ज्ञेयं श्वेतवस्त्रधरं विभुम् । श्वेतमाल्याम्बरधरं श्वेतगन्धानुलेपनम् ॥ ४॥ (दो भुजाओं वाले, श्वेत वस्त्र धारण करने वाले सर्वव्यापी प्रभु, जो श्वेत माला और श्वेत लेपन से सुशोभित हैं, उन चन्द्र देव का ध्यान करना चाहिए।) श्वेतछत्रधरं देवं सर्वाभरणभूषणम् । एतत्स्तोत्रं तु पठतां सर्वसम्पत्करं शुभम् ॥ ५॥ (सफेद छत्र धारण करने वाले और सभी आभूषणों से अलंकृत देव चन्द्रमा का यह स्तोत्र पढ़ने वालों के लिए सभी सम्पत्तियों को देने वाला और शुभ है।) फलश्रुतिः क्षयापस्मारकुष्ठादि तापज्वरनिवारणम् । इदं निशाकरस्तोत्रं यः पठेत् सततं नरः । सोपद्रवादविमुच्येत नात्र कार्या विचारणा ॥ ६॥ (क्षय, मिरगी (अपस्मार), कुष्ठ और ज्वर के संताप का निवारण करने वाले इस 'निशाकर स्तोत्र' का जो मनुष्य निरंतर पाठ करता है, वह सभी उपद्रवों और बाधाओं से मुक्त हो जाता है—इसमें कोई संदेह नहीं है।) इति चन्द्रस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

चन्द्रस्तोत्रम् २: निषाकर स्तोत्र की महत्ता

चन्द्रस्तोत्रम् २ (Nishakara Stotram) चन्द्रमा की स्तुति का एक विशिष्ट पाठ है जो मुख्य रूप से आरोग्य और शांति के लिए प्रसिद्ध है। इसे 'निशाकर' स्तोत्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह 'निशा' (रात्रि) करने वाले उन देव की स्तुति करता है जो अंधकार में प्रकाश और शीतलता की किरणें बिखेरते हैं। यह स्तोत्र अन्य प्रचलित स्तोत्रों से भिन्न है क्योंकि इसमें चन्द्रमा के ध्यान के साथ-साथ उनके विशिष्ट निवास स्थान (यामुन देश) और उनके रथ की विशेषताओं (दश अश्व) का भी चित्रण किया गया है।

वैदिक शास्त्रों में चन्द्रमा को 'नक्षत्रराज' कहा गया है। यह स्तोत्र हमें बताता है कि चन्द्रमा केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि एक चेतना है। श्वेत रंग के वस्त्र, श्वेत छत्र और श्वेत गंध का लेपन—यह सब चन्द्रमा की सादगी और उसकी सात्विकता को दर्शाता है। जब व्यक्ति का मन अशांत होता है, तो वह 'तम' में होता है; इस स्तोत्र का पाठ उस तामसिक अंधकार को हटाकर सात्विक ज्ञान का संचार करता है।

रहस्यमयी वर्णन: दस घोड़ों का रथ और आत्रेय कुल

श्लोक २ में कहा गया है—"दशाश्वश्चात्रेयजो"। इसका अर्थ है कि चन्द्रमा के रथ में दस सफेद घोड़े जुते हुए हैं। ये दस घोड़े हमारी दस इंद्रियों (5 ज्ञानेंद्रियां और 5 कर्मेंद्रियां) का प्रतीक हैं। चन्द्रमा मन का स्वामी है, और मन ही इन इंद्रियों को चलाता है। इस स्तोत्र के पाठ का अर्थ है इंद्रियों पर नियंत्रण पाना।

साथ ही, चन्द्रमा को 'आत्रेय' कहा गया है, क्योंकि वे महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के पुत्र हैं। इसी कारण से चन्द्रमा को भगवान दत्तात्रेय का भाई भी माना जाता है। यह वंश परम्परा दर्शाती है कि चन्द्रमा में ज्ञान और भक्ति दोनों का समन्वय है।

रोग निवारण और ज्योतिषीय लाभ

असाध्य रोगों का उपचार (Health Benefits)

फलश्रुति में चन्द्र देव ने स्वयं को "क्षयापस्मारकुष्ठादि तापज्वरनिवारणम्" कहा है:

  • क्षय (TB): शरीर की कमजोरी और फेफड़ों संबंधी समस्याओं में सुधार।
  • अपस्मार (Epilepsy): मिर्गी या दिमाग के झटकों में मानसिक शांति प्रदान करना।
  • कुष्ठ (Skin Diseases): त्वचा संबंधी रोगों की जलन और संताप को कम करना।
  • ताप ज्वर: शरीर की अतिरिक्त गर्मी और बुखार के कष्ट को अपनी शीतलता से हरना।

ज्योतिषीय लाभ (Astrology)

जिनकी कुंडली में चन्द्रमा का बल कम होता है, वे अक्सर अनिर्णय की स्थिति में रहते हैं। यह स्तोत्र 'वासुदेवस्य नयनं' (विष्णु की आंख) होने के कारण साधक को दूरदृष्टि और स्पष्ट विचार शक्ति प्रदान करता है।

श्वेत वर्ण का महत्व

इस स्तोत्र में 'श्वेत' (White) शब्द का बार-बार प्रयोग हुआ है। श्वेत रंग शांति, पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक है। अध्यात्म में, चन्द्रमा की चांदनी को 'ईश्वर की हंसी' माना गया है। श्वेत वस्त्र पहनकर इस स्तोत्र का पाठ करने से हमारे आभा-मंडल (Aura) की सफाई होती है।

गदा और अभय मुद्रा

चन्द्रमा के हाथों में 'गदा' असुरक्षित भावनाओं को नष्ट करने की शक्ति का प्रतीक है, जबकि 'अभय' मुद्रा साधक को यह आश्वासन देती है कि चन्द्र देव के संरक्षण में किसी भी मानसिक भय की कोई जगह नहीं है।

साधना विधि और नियम (Ritual Guide)

निशाकर स्तोत्र के पाठ के लिए निम्नलिखित विधि सर्वोत्तम मानी गई है:

  • आसन: ऊनी या लकड़ी का ऐसा आसन जो जमीन से ऊंचा हो।
  • समय: प्रदोष काल (सूर्यास्त के ठीक बाद) या पूर्णिमा की रात्रि।
  • उपाय: पाठ के समय तांबे के लोटे में पानी भरकर रखें और पाठ खत्म होने के बाद वह जल तुलसी में डाल दें या स्वयं ग्रहण करें।
  • भगवान शिव: यदि संभव हो तो शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाते हुए इस स्तोत्र का पाठ करें, क्योंकि चन्द्रमा शिव के मस्तक का आभूषण हैं।
  • अभिषेक: आरोग्य प्राप्ति के लिए सफेद तिल मिश्रित जल से चन्द्रमा को अर्ध्य दें।

स्तोत्र पाठ के अद्भुत अनुभव

भयमुक्ति

अज्ञात भय और असुरक्षा की भावना का अंत।

सौभाग्य वृद्धि

जीवन में रुके हुए कार्यों की गति बढ़ना।

शांति दायक

क्रोध और मानसिक अशांति का तत्काल शमन।

संतान सुख

चन्द्र देव की कृपा से वंश वृद्धि और स्वस्थ संतान।

नेत्र स्वास्थ्य

आंखों की जलन और तनाव में कमी।

आर्थिक उन्नति

चन्द्रमा को सुख-सुविधाओं का कारक भी माना गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10 Detailed FAQs)

1. चन्द्रस्तोत्रम् २ को 'निशाकर स्तोत्र' क्यों कहते हैं?

निशा का अर्थ है रात और कर का अर्थ है करने वाला। चन्द्रमा रात्रि को अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाते हैं, इसीलिए उन्हें निशाकर कहा जाता है।

2. क्या इस स्तोत्र का पाठ बीमार व्यक्ति कर सकता है?

हाँ, यह स्तोत्र विशेष रूप से 'आरोग्य' दायक है। यदि बीमार व्यक्ति स्वयं पाठ न कर सके, तो कोई अन्य सदस्य उनके समीप बैठकर इसका पाठ कर सकता है।

3. 'वासुदेवस्य नयनं' का क्या आध्यात्मिक अर्थ है?

वेदों के अनुसार चन्द्रमा भगवान विष्णु (वासुदेव) के मन से उत्पन्न हुए हैं, अतः उन्हें प्रभु का नेत्र स्वरूप माना जाता है जो जगत की रक्षा करता है।

4. क्या दिन में इस स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है?

दिन में पाठ किया जा सकता है, परन्तु रात्रि में चन्द्रमा की दृश्यता में पाठ करना अधिक तरंग पैदा करता है और शीघ्र फल देता है।

5. चन्द्रमा को 'सुधांशु' क्यों कहते हैं?

सुधा का अर्थ है अमृत और अंशु का अर्थ है किरणें। जिनकी किरणें अमृत की वर्षा करती हों, वे सुधांशु (चन्द्रमा) हैं।

6. क्या यह स्तोत्र तनाव और डिप्रेशन में काम आता है?

जी हाँ, चन्द्रमा मन का अधिष्ठाता है। इसके श्लोकों के कंपन मानसिक उथल-पुथल को शांत करने में अमोघ हैं।

7. 'आग्नेयभागे' (Agneya Bhaga) का क्या महत्व है?

नवग्रह मण्डल में चन्द्रमा का स्थान आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) दिशा में माना गया है। ज्योतिषी के अनुसार यह सही दिशा में ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है।

8. चन्द्रमा के ४ हाथ क्या दर्शाते हैं?

चार भुजाएं चार पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—की प्राप्ति और उनके संरक्षण को दर्शाती हैं।

9. 'यामुनदेशज' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि चन्द्रमा का विशेष संबंध यमुना नदी के तटीय प्रदेशों से है। आध्यात्मिक रूप से यमुना को यम की बहन और सूर्य की पुत्री माना गया है, जो मोक्ष दायिनी है।

10. क्या यह स्तोत्र बच्चों के लिए भी सुरक्षित है?

हाँ, यह पूर्णतः सात्विक स्तोत्र है। बच्चों के हाथ से दूध का दान कराने और इसका पाठ सुनाने से उनका मानसिक विकास बहुत तेज होता है।