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चन्द्रमस्स्तोत्रम्

Chandramas Stotram — महर्षि दुर्वासा रचित (मन्त्रमहार्णव से)

चन्द्रमस्स्तोत्रम्
॥ चन्द्रमस्स्तोत्रम् ॥ ॐ श्वेताम्बरः श्वेतवपुः किरीटी श्वेतद्युतिर्दण्डधरो द्विबाहुः । चन्द्रोऽमृतात्मा वरदः शुशाङ्कः श्रेयांसि मह्यं प्रददातु देवः ॥ १॥ (ॐ! श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, श्वेत शरीर वाले, मुकुटधारी, श्वेत आभा से युक्त, हाथ में दण्ड धारण करने वाले, दो भुजाओं वाले, अमृत-स्वरूप, वरदान देने वाले चन्द्र देव मुझे कल्याण प्रदान करें।) दधिशङ्खतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम् । नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम् ॥ २॥ (दही, शंख और हिम (ओस) के समान उज्ज्वल आभा वाले, क्षीर सागर से उत्पन्न, चन्द्र देव (शशि/सोम) को मैं नमस्कार करता हूँ, जो भगवान शिव के मस्तक के आभूषण हैं।) क्षीरसिन्धुसमुत्पन्नो रोहिणीसहितः प्रभुः । हरस्य मुकुटावासः बालचन्द्र नमोऽस्तु ते ॥ ३॥ (क्षीर सागर से उत्पन्न, अपनी प्रिया रोहिणी के साथ सुशोभित प्रभु, भगवान शिव (हर) के मुकुट पर निवास करने वाले बालचन्द्र को मेरा नमस्कार है।) सुधामया यत्किरणाः पोषयन्त्योषधीवनम् । सर्वान्नरसहेतुं तं नमामि सिन्धुनन्दनम् ॥ ४॥ (जिनकी अमृतमयी किरणें समस्त औषधियों और वनस्पतियों का पोषण करती हैं, उन सभी अन्नों और रसों के कारण (स्वामी) और क्षीर सागर के पुत्र को मैं नमस्कार करता हूँ।) राकेशं तारकेशं च रोहिणीप्रियसुन्दरम् । ध्यायतां सर्वदोषघ्नं नमामीन्दुं मुहुर्मुहुः ॥ ५॥ (पूर्णिमा के स्वामी, नक्षत्रों के अधिपति (तारकेश), रोहिणी के अत्यंत प्रिय एवं सुंदर, और ध्यान करने वालों के सभी दोषों का नाश करने वाले चन्द्रमा (इन्दु) को मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ।) इति चन्द्रमस्स्तोत्रं सम्पूर्णम् । (मन्त्रमहार्णवे पूर्वखण्डे मिश्रतन्त्रे एकादशस्तरङ्गः)

चन्द्रमस्स्तोत्रम्: मन्त्रमहार्णव का दुर्लभ आध्यात्मिक रत्न

चन्द्रमस्स्तोत्रम् (Chandramas Stotram) तंत्र और आगम शास्त्रों के महाग्रंथ 'मन्त्रमहार्णव' (Mantramaharnava) के पूर्वखण्ड से उद्धृत है। यह स्तोत्र न केवल चन्द्र देव की स्तुति है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा के उस पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है जो हमारे 'मन' (Subconscious Mind) को नियंत्रित करता है। वैदिक ऋषि महर्षि दुर्वासा जिन्हें उनकी उग्रता के लिए जाना जाता है, उन्होंने चन्द्रमा की सौम्यता और अमृतमयी शक्ति को इस स्तोत्र के माध्यम से बांधा है।

मन्त्रमहार्णव के ग्यारहवें तरङ्ग (मिश्रतन्त्र) में वर्णित यह स्तोत्र विशेष रूप से 'मिश्र तन्त्र' पद्धति पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि यह गृहस्थ और साधक दोनों के लिए समान रूप से कल्याणकारी है। चन्द्रमा को 'अमृतात्मा' कहा गया है, जिसका सीधा संबंध प्राचीन काल के उस 'सोम रस' से है जो देवताओं को अमरता प्रदान करता था। जब हम इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, तो हम केवल शब्दों का उच्चारण नहीं कर रहे होते, बल्कि अपने शरीर के भीतर स्थित 'चंद्र नाड़ी' (Ida Nadi) को जागृत कर रहे होते हैं।

पौराणिक कथा: क्षीर सागर से चन्द्रमा का प्राकट्य

पुराणों के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन (Samudra Manthan) हुआ, तो उसमें से चौदह दिव्य रत्न निकले। चन्द्र देव उन्हीं रत्नों में से एक थे। इसीलिए उन्हें 'सिन्धुनन्दन' (सिंधु या सागर का पुत्र) कहा जाता है। मन्त्रमहार्णव में वर्णित श्लोक 2 में इसी संदर्भ का उपयोग किया गया है—"क्षीरोदार्णवसम्भवम्"

मंथन के समय जब भगवान शिव ने हलाहल विष का पान किया, तब उनके मस्तक पर स्थित चन्द्र देव ने अपनी शीतलता से शिव के विष-ताप को कम किया। इसीलिए उन्हें 'शम्भोर्मुकुटभूषणम्' कहा गया है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि जिस प्रकार चन्द्रमा ने महादेव के कष्ट को हरा, उसी प्रकार वह हमारे जीवन के दुखों और संतापों को भी हर लेते हैं।

श्लोकों का सूक्ष्म अर्थ और भावार्थ

प्रथम श्लोक: स्वरूप दर्शन

"ॐ श्वेताम्बरः श्वेतवपुः किरीटी..."

यहाँ चन्द्र देव के बाह्य और आंतरिक स्वरूप का वर्णन है। 'श्वेत' रंग सात्विक गुण का प्रतीक है। 'किरीटी' का अर्थ है कि वे ग्रहों के राजाओं में से एक हैं। 'दण्डधर' का अर्थ केवल सजा देना नहीं, बल्कि व्यवस्था बनाए रखना भी है। चन्द्र देव सृष्टि के रसों की व्यवस्था बनाये रखते हैं।

चतुर्थ श्लोक: ओषधीपति रूप

"सुधामया यत्किरणाः पोषयन्त्योषधीवनम्..."

यह श्लोक विज्ञान और आध्यात्म का संगम है। जिस प्रकार सूर्य प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के लिए आवश्यक है, उसी प्रकार चन्द्रमा की किरणें वनस्पतियों में 'रस' और 'औषधीय गुण' भरती हैं। बिना चन्द्रमा के, कोई भी फल मीठा नहीं हो सकता और कोई भी जड़ी-बूटी प्रभावी नहीं बन सकती। अतः यह श्लोक आरोग्य प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ है।

ज्योतिषीय महत्व

  • मन का कारक: चन्द्रमा मन और भावनाओं का स्वामी है। कमजोर चन्द्रमा अनिद्रा, अवसाद (Depression) और निर्णय लेने में असमर्थता लाता है।
  • चन्द्र-दोष शांति: जन्म कुंडली में केतु, राहु या शनि के साथ चन्द्रमा की युति (जैसे ग्रहण दोष या विष योग) होने पर इस स्तोत्र का पाठ कवच के समान कार्य करता है।

वैज्ञानिक पुट

वैज्ञानिक रूप से चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के समुद्रों में ज्वार-भाटा (Tides) लाता है। चूंकि मानव शरीर भी 70% जल से बना है, अतः चन्द्रमा की कलाएं हमारी मानसिक ऊर्जा को सीधे प्रभावित करती हैं। इस स्तोत्र का उच्चारण उन आंतरिक ज्वारों को शांत करता है।

चन्द्रमस्स्तोत्र पाठ के अद्भुत लाभ

नियमित रूप से चन्द्रमस्स्तोत्र का पाठ करने वाले साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

मानसिक शांति

तनाव और क्रोध का तत्काल शमन।

उत्तम एकाग्रता

छात्रों के लिए पढ़ाई में एकाग्रता बढ़ाने में सहायक।

मातृ सुख

माता के स्वास्थ्य में सुधार और उनसे संबंधों में मधुरता।

वैवाहिक सुख

रोहिणी (जो चन्द्रमा की प्रिय पत्नी हैं) के प्रभाव से वैवाहिक जीवन में प्रेम की वृद्धि।

त्वचा और नेत्र लाभ

चन्द्रमा की शीतलता से त्वचा संबंधी रोगों और नेत्र ज्योति में सुधार।

शीघ्र फलदायी

चन्द्रमा सबसे तीव्र गति से चलने वाला ग्रह है, इसीलिए इसकी प्रार्थना का फल शीघ्र मिलता है।

साधना विधि और नियम (Ritual Guide)

चन्द्रमस्स्तोत्रम एक तंत्रोक्त स्तोत्र है, अतः इसके लिए कुछ विशेष नियमों का पालन करना इसकी शक्ति को बढ़ा देता है:

  • आसन: सफेद रंग के ऊनी या सूती आसन का प्रयोग करें।
  • माला: यदि मन्त्र जप करना हो तो सफेद चन्दन या स्फटिक की माला का प्रयोग करें।
  • अर्ध्य: पाठ के बाद चन्द्रमा के उदय होने पर तांबे या चांदी के पात्र में दूध-मिश्रित जल लेकर चन्द्रमा को अर्ध्य दें।
  • दान: सोमवार को चावल, दूध, चीनी या सफेद वस्त्र का दान करने से स्तोत्र का फल अनंत गुना बढ़ जाता है।
  • महा उपाय: यदि मानसिक परेशानी बहुत अधिक हो, तो पूर्णिमा की रात को चन्द्रमा की रोशनी में बैठकर इस स्तोत्र का 21 बार पाठ करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10 Detailed FAQs)

1. चन्द्रमस्स्तोत्र और चन्द्र मङ्गल स्तोत्र में क्या अंतर है?

चन्द्रमस्स्तोत्र विशेष रूप से 'मन्त्रमहार्णव' ग्रंथ से लिया गया है और इसमें तन्त्र सम्मत 5 श्लोक हैं। जबकि चन्द्र मङ्गल स्तोत्र अधिक प्रचलित पौराणिक स्तोत्र है। दोनों का उद्देश्य चन्द्र शांति है, परन्तु चन्द्रमस्स्तोत्र अधिक प्राचीन और शास्त्रीय मन्त्रों से युक्त है।

2. मन्त्रमहार्णव के रचयिता कौन हैं?

इस ग्रंथ के मूल सम्पादक नीलकंठ चतुर्वेदी थे, परन्तु इस स्तोत्र के रचयिता महर्षि दुर्वासा माने जाते हैं।

3. क्या यह स्तोत्र बच्चों के डर को दूर करने में सहायक है?

हाँ, चन्द्रमा मन का स्वामी है। जिन बच्चों को रात में डर लगता है या बुरे सपने आते हैं, उनके सिरहाने बैठकर इस स्तोत्र का पाठ करने से उनकी रक्षा होती है।

4. क्या दिन में इस स्तोत्र का पाठ वर्जित है?

वर्जित नहीं है, परन्तु चन्द्रमा रजनीपति (रात्रि के स्वामी) हैं। अतः सूर्यास्त के बाद पाठ करना विशेष रूप से प्रभावशाली होता है।

5. चन्द्रमा को 'सुधारूप' क्यों कहा जाता है?

सुधा का अर्थ है 'अमृत'। चन्द्रमा को अमृत का कलश माना गया है। उनकी किरणें संसार में शीतलता और जीवन शक्ति (अमृत) का प्रसार करती हैं।

6. पाठ के समय कौन से मन्त्र का साथ में प्रयोग करें?

स्तोत्र के अंत में 'ॐ सोम सोमाय नमः' या 'ॐ सों सोमाय नमः' बीज मंत्र का 108 बार जाप करना अत्यंत शुभ होता है।

7. कुंडली में नीच का चंद्रमा होने पर क्या करें?

यदि चंद्रमा वृश्चिक राशि (नीच) में है, तो प्रत्येक सोमवार को शिव मंदिर में इस स्तोत्र का पाठ करके शिवलिंग पर दूध चढ़ाएं।

8. 'मिश्रतन्त्र' का क्या अर्थ है?

यह तंत्र की वह शाखा है जिसमें सात्विक और तांत्रिक दोनों विधियों का समावेश होता है। इसमें कोई जटिल कर्मकांड नहीं होता, केवल श्रद्धा महत्वपूर्ण है।

9. क्या यह स्तोत्र धन प्राप्ति में भी सहायक है?

चन्द्रमा 'महालक्ष्मी' के सगे भाई माने जाते हैं (दोनों की उत्पत्ति सागर से हुई है)। अतः चन्द्र देव की प्रसन्नता से आर्थिक तंगी दूर होती है और सुख-सुविधाएं बढ़ती हैं।

10. 'सिन्धुनन्दन' शब्द का क्या तात्पर्य है?

सिन्धु का अर्थ है समुद्र। समुद्र मन्थन के समय प्राप्त होने के कारण भगवान चन्द्र को समुद्र का पुत्र या 'सिन्धुनन्दन' कहा जाता है।