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श्री महागणपति चतुरावृत्ति तर्पणम् (Sri Maha Ganapathi Chaturavrutti Tarpanam)

श्री महागणपति चतुरावृत्ति तर्पणम् (Sri Maha Ganapathi Chaturavrutti Tarpanam)

श्री महागणपति चतुरावृत्ति तर्पणम्

Sri Maha Ganapathi Chaturavrutti Tarpanam

श्री महागणपति चतुरावृत्ति तर्पणम्
यह भगवान गणेश को प्रसन्न करने की एक विशेष तांत्रिक और वैदिक विधि है। इसमें चार आवृत्तियों (चक्रों) में विभिन्न नामों और मन्त्रों के साथ जल के माध्यम से देवों को तृप्त किया जाता है।

चतुरावृत्ति का अर्थ है चार बार की आवृत्ति - मिथुनद्वय, अष्ट नाम, षोडश नाम और मूलमन्त्र तर्पण। यह विधि अति शीघ्र फलदायी मानी जाती है और इसे किसी योग्य गुरु के निर्देशन में करना उत्तम है।

॥ श्री महागणपति चतुरावृत्ति तर्पणम् ॥ सङ्कल्पः ममोपात्त-समस्त-दुरितक्षयद्वारा श्री महागणपति-प्रीत्यर्थं चतुरावृत्ति-तर्पणं करिष्ये । (जलपात्रं पुरतः संस्थापन तस्मिन् गन्धपुष्पाक्षतान् क्षिप्त्वा, तर्जनीमध्यमानामिकाग्रेण जलं गृहीत्वा तर्पणं कुर्यात्) ॥ प्रथमावृत्तिः (मिथुनद्वय तर्पणम्) ॥ १. ओं गां गीं गूं गैं गौं गः गणपतये वरवरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा । श्री महागणपतिं तर्पयामि । २. ओं श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वरवरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा । श्री विद्यागणपतिं तर्पयामि । ॥ द्वितीयावृत्तिः (अष्ट तर्पणम्) ॥ १. ओं विनायकाय नमः । विनायकं तर्पयामि । २. ओं विघ्नराजाय नमः । विघ्नराजं तर्पयामि । ३. ओं गौरीपुत्राय नमः । गौरीपुत्रं तर्पयामि । ओं गणेश्वराय नमः । गणेश्वरं तर्पयामि । ५. ओं स्कन्दाग्रजाय नमः । स्कन्दाग्रजं तर्पयामि । ६. ओं अव्ययाय नमः । अव्ययं तर्पयामि । ७. ओं पूताय नमः । पूतं तर्पयामि । ८. ओं दक्षाय नमः । दक्षं तर्पयामि । ॥ तृतीयावृत्तिः (षोडश तर्पणम्) ॥ १. ओं सुमुखाय नमः । सुमुखं तर्पयामि । २. ओं एकदन्ताय नमः । एकदन्तं तर्पयामि । ३. ओं कपिलाय नमः । कपिलं तर्पयामि । ४. ओं गजकर्णकाय नमः । गजकर्णकं तर्पयामि । ५. ओं लम्बोदराय नमः । लम्बोदरं तर्पयामि । ६. ओं विकटाय नमः । विकटं तर्पयामि । ७. ओं विघ्नराजाय नमः । विघ्नराजं तर्पयामि । ८. ओं गणाधिपाय नमः । गणाधिपं तर्पयामि । ९. ओं धूम्रकेतवे नमः । धूम्रकेतुं तर्पयामि । १०. ओं गणाध्यक्षाय नमः । गणाध्यक्षं तर्पयामि । ११. ओं भालचन्द्राय नमः । भालचन्द्रं तर्पयामि । १२. ओं गजाननाय नमः । गजाननं तर्पयामि । १३. ओं वक्रतुण्डाय नमः । वक्रतुण्डं तर्पयामि । १४. ओं शूर्पकर्णाय नमः । शूर्पकर्णं तर्पयामि । १५. ओं हेरम्बाय नमः । हेरम्बं तर्पयामि । १६. ओं स्कन्दपूर्वजाय नमः । स्कन्दपूर्वजं तर्पयामि । ॥ चतुर्थी आवृत्तिः (ईशानादि तर्पणम्) ॥ (मूलमन्त्रेण अष्टाविंशति वारं, चत्वारिंशद् वारं वा तर्पणं कुर्यात्) ओं श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वरवरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा । श्री महागणपतिं तर्पयामि । (यथाशक्ति तर्पणं कृत्वा) ॥ समापनम् ॥ अनेन चतुरावृत्ति तर्पणेन भगवान् श्री महागणपतिः प्रीयताम् । न मम । (टीका: यह तर्पण विधि विशेष कामनाओं की पूर्ति और सिद्धियों के लिए की जाती है। इसे किसी योग्य गुरु के निर्देशन में करना उत्तम है।) ॥ इति श्री महागणपति चतुरावृत्ति तर्पणम् सम्पूर्णम् ॥

महत्व एवं लाभ (Significance)

  • चतुर्विध तर्पण: चार आवृत्तियों में गणेश जी के विभिन्न स्वरूपों का तर्पण किया जाता है, जिससे सम्पूर्ण कृपा प्राप्त होती है।
  • शीघ्र फलदायी: यह विधि अत्यंत प्रभावी और शीघ्र फल देने वाली मानी जाती है।
  • सर्व विघ्न शान्ति: सभी प्रकार के विघ्नों और बाधाओं का शमन होता है।
  • मनोकामना पूर्ति: विशेष कामनाओं की पूर्ति और सिद्धियों की प्राप्ति के लिए यह विधि विशेष प्रभावी है।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

प्रश्न 1: चतुरावृत्ति तर्पणम् क्या है?

चतुरावृत्ति तर्पणम् का अर्थ है चार बार की आवृत्ति (चक्र) में किया जाने वाला तर्पण। इसमें भगवान गणेश के विभिन्न नामों और मंत्रों से जल अर्पित किया जाता है।

प्रश्न 2: चार आवृत्तियाँ कौन-कौन सी हैं?

प्रथम आवृत्ति - मिथुनद्वय तर्पणम् (2 तर्पण), द्वितीय आवृत्ति - अष्ट तर्पणम् (8 नाम), तृतीय आवृत्ति - षोडश तर्पणम् (16 नाम), और चतुर्थी आवृत्ति - ईशानादि मूलमन्त्र तर्पणम्।

प्रश्न 3: तर्पण कब करना चाहिए?

यह तर्पण विशेष रूप से गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी, बुधवार या किसी भी शुभ अवसर पर किया जा सकता है। नित्य साधना के रूप में भी इसे किया जा सकता है।

प्रश्न 4: तर्पण के लिए क्या सामग्री चाहिए?

तर्पण के लिए एक जलपात्र, गंध (चंदन), पुष्प, अक्षत (चावल) और शुद्ध जल की आवश्यकता होती है। तर्जनी, मध्यमा और अनामिका के अग्रभाग से जल ग्रहण कर तर्पण करना चाहिए।

प्रश्न 5: तर्पण और पूजा में क्या अंतर है?

पूजा में षोडशोपचार (16 उपचार) के माध्यम से देवता की सेवा की जाती है, जबकि तर्पण में विशेष मंत्रों के साथ जल अर्पित कर देवता को तृप्त किया जाता है।

प्रश्न 6: क्या गुरु दीक्षा आवश्यक है?

यह तर्पण विधि विशेष कामनाओं की पूर्ति और सिद्धियों के लिए की जाती है। इसे किसी योग्य गुरु के निर्देशन में करना उत्तम और अधिक फलदायी माना जाता है।

।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः ।।