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पूजा विधानम - पूर्वांग (स्मार्त पद्धति) | Puja Vidhanam - Poorvangam

पूजा विधानम - पूर्वांग (स्मार्त पद्धति) | Puja Vidhanam - Poorvangam

पूजा विधानम - पूर्वांग (स्मार्त पद्धति)

Puja Vidhanam - Poorvangam (Smartha Paddhati)

पूजा विधानम (पूर्वांग) (Puja Poorvangam) वह नींव है जिस पर किसी भी धार्मिक अनुष्ठान का भव्य भवन खड़ा होता है। यह स्मार्त पद्धति (Smartha Tradition) के अनुसार पूजा आरम्भ करने की प्रामाणिक वैदिक विधि है।

मुख्य देवता (जैसे गणेश, शिव, विष्णु या दुर्गा) की मूर्ति पूजा शुरू करने से पहले, साधक को अपने शरीर, मन और पूजा सामग्री को पवित्र करना होता है। इसी प्रारंभिक प्रक्रिया को 'पूर्वांग' कहा जाता है। इसमें पवित्रिकरण, आचमन (आंतरिक शुद्धि), प्राणायाम (प्राण प्रतिष्ठा), दीप-कलश-शंख-घंटा पूजन और सबसे महत्वपूर्ण संकल्प सम्मिलित हैं। सही विधि से किया गया पूर्वांग पूजा की सफलता सुनिश्चित करता है।

पूर्वांग का महत्व (Significance)

1. शुद्धि (Purification): पूजा में सबसे पहले बाह्य (शरीर) और आभ्यन्तर (मन) शुद्धि आवश्यक है। 'अपवित्रः पवित्रो वा' मंत्र से साधक अपने आप को शुद्ध करता है।

2. संकल्प (Resolution): संकल्प पूजा का हृदय है। यह ब्रह्मांड में हमारे स्थान (देश-काल) और पूजा के उद्देश्य को स्पष्ट करता है। यह हमारे मन की शक्ति को एक बिंदु पर केंद्रित करता है।

3. विघ्न निवारण: विघ्नहर्ता गणेश और गुरु का स्मरण करके हम पूजा में आने वाली बाधाओं को दूर करते हैं। 'भूतोच्चाटन' से नकारात्मक ऊर्जाओं को स्थान से हटाया जाता है।

4. उपकरण पूजा: कलश (जल के देवता), शंख (नाद ब्रह्म), और घंटा (काल) की पूजा करके हम इन उपकरणों को दिव्यता प्रदान करते हैं, जिससे ये साधारण वस्तुएं न रहकर देवत्व का माध्यम बन जाती हैं।

॥ अथ पूजाविधानम् (पूर्वाङ्गम् – स्मार्तपद्धतिः) ॥ १. शुचिः (Pavitrity) (अपने ऊपर जल छिड़कें) अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥ पुण्डरीकाक्ष पुण्डरीकाक्ष पुण्डरीकाक्षाय नमः ॥ २. प्रार्थना (Prayer) (हाथ जोड़कर गणेश और गुरु का ध्यान करें) शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ अगजानन पद्मार्कं गजाननमहर्निशम् । अनेकदं तं भक्तानां एकदन्तमुपास्महे ॥ देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु ॥ यः शिवो नाम रूपाभ्यां या देवी सर्वमङ्गला । तयोः संस्मरणान्नित्यं सर्वदा जय मङ्गलम् ॥ तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव । विद्याबलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेऽङ्घ्रियुगं स्मरामि ॥ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराभवः । एषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ॥ सर्वमङ्गल माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ नमस्कार: श्रीलक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः । उमामहेश्वराभ्यां नमः । वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः । शचीपुरन्दराभ्यां नमः । अरुन्धतीवसिष्ठाभ्यां नमः । श्रीसीतारामाभ्यां नमः । मातापितृभ्यो नमः । सर्वेभ्यो महाजनेभ्यो नमः । ३. आचम्य (Sipping Water) (दाहिने हाथ में जल लेकर तीन बार पिएं) ॐ केशवाय स्वाहा । ॐ नारायणाय स्वाहा । ॐ माधवाय स्वाहा । (हाथ धोकर निम्न नामों से अंगों का स्पर्श करें) ॐ गोविन्दाय नमः । ॐ विष्णवे नमः । ॐ मधुसूदनाय नमः । ॐ त्रिविक्रमाय नमः । ॐ वामनाय नमः । ॐ श्रीधराय नमः । ॐ हृषीकेशाय नमः । ॐ पद्मनाभाय नमः । ॐ दामोदराय नमः । ॐ सङ्कर्षणाय नमः । ॐ वासुदेवाय नमः । ॐ प्रद्युम्नाय नमः । ॐ अनिरुद्धाय नमः । ॐ पुरुषोत्तमाय नमः । ॐ अधोक्षजाय नमः । ॐ नारसिंहाय नमः । ॐ अच्युताय नमः । ॐ जनार्दनाय नमः । ॐ उपेन्द्राय नमः । ॐ हरये नमः । ॐ श्रीकृष्णाय नमः । ४. दीपाराधनम् (Lamp Worship) (दीपक जलाकर उसे नमस्कार करें) दीपस्त्वं ब्रह्मरूपोऽसि ज्योतिषां प्रभुरव्ययः । सौभाग्यं देहि पुत्रांश्च सर्वान्कामांश्च देहि मे ॥ भो दीप देवि रूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत् । यावत्पूजां करिष्यामि तावत्त्वं सुस्थिरो भव ॥ दीपाराधन मुहूर्तः सुमुहूर्तोऽस्तु ॥ (दीपक के पास थोड़ा कुमकुम या अक्षत छोड़ें) पूजार्थे हरिद्रा कुङ्कुम विलेपनं करिष्ये ॥ ५. भूतोच्चाटनम् (Dispersing Negative Energies) (अक्षत लेकर चारों दिशाओं में फेंकें) उत्तिष्ठन्तु भूतपिशाचाः य एते भूमि भारकाः । एतेषामविरोधेन ब्रह्मकर्म समारभे ॥ अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूमिसंस्थिताः । ये भूता विघ्नकर्तारस्ते गच्छन्तु शिवाऽज्ञया ॥ ६. प्राणायामम् (Breath Control) (दाहिने हाथ से नाक पकड़कर श्वास रोकें और मंत्र मन में बोलें) ॐ भूः ॐ भुव: ॐ सुव: ॐ मह: ॐ जन: ॐ तप: ॐ सत्यम् । ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो न: प्रचोदयात् । ओमापो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवस्सुवरोम् ॥ ७. सङ्कल्पम् (Sankalpa) (दाहिने हाथ में अक्षत, पुष्प और जल लेकर संकल्प करें) मम उपात्त समस्त दुरितक्षय द्वारा श्रीपरमेश्वरमुद्दिश्य श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थं शुभाभ्यां शुभे शोभने मुहूर्ते श्रीमहाविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्मणः द्वितीयपरार्थे श्वेतवराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे कलियुगे प्रथमपादे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे मेरोः दक्षिण दिग्भागे श्रीशैलस्य ___ (दिशा) प्रदेशे ___, ___ नद्योः (नदी) मध्यप्रदेशे लक्ष्मीनिवासगृहे समस्त देवता ब्राह्मण आचार्य हरि हर गुरु चरण सन्निधौ अस्मिन् वर्तमने व्यावहरिक चान्द्रमानेन श्री ____ (*संवत्सर) नाम संवत्सरे ___ अयने (*अयन) ___ ऋतौ (*ऋतु) ___ मासे(*मास) ___ पक्षे (*पक्ष) ___ तिथौ (*तिथि) ___ वासरे (*वार) ___ नक्षत्रे (*नक्षत्र) ___ योगे (*योग) ___ करण (*करण) एवं गुण विशेषण विशिष्टायां शुभतिथौ... श्रीमान् ___ गोत्रोद्भवस्य ___ नामधेयस्य (मम धर्मपत्नी श्रीमतः ___ गोत्रस्य ___ नामधेयः समेतस्य) मम/अस्माकं सहकुटुम्बस्य क्षेम स्थैर्य धैर्य वीर्य विजय अभय आयुः आरोग्य ऐश्वर अभिवृद्ध्यर्थं धर्म अर्थ काम मोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ फल सिद्ध्यर्थं धन कनक वस्तु वाहन समृद्ध्यर्थं सर्वाभीष्ट सिद्ध्यर्थं श्री _____ (देवता का नाम) उद्दिश्य श्री _____ प्रीत्यर्थं सम्भवद्भिः द्रव्यैः सम्भवद्भिः उपचारैश्च सम्भवता नियमेन सम्भविता प्रकारेण यावच्छक्ति ध्यान आवाहनादि षोडशोपचार पूजां करिष्ये ॥ (जल और अक्षत छोड़ दें) (निर्विघ्न पूजा परिसमाप्त्यर्थं आदौ श्रीमहागणपति पूजां करिष्ये ।) तदङ्ग कलशाराधनं करिष्ये । ८. कलशाराधनम् (Kalasha Puja) (कलश को गंध-अक्षत से पूजें और जल भरें) कलशे गन्ध पुष्पाक्षतैरभ्यर्च्य । कलशे उदकं पूरयित्वा । (कलश पर हाथ रखें) कलशस्योपरि हस्तं निधाय । कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः । मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृता ॥ कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा । ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदो सामवेदो ह्यथर्वणः ॥ अङ्गैश्च सहिताः सर्वे कलशाम्बु समाश्रिताः । ॐ आकलशेषु धावति पवित्रे परिषिच्यते । उक्थैर्यज्ञेषु वर्धते । आपो वा इदं सर्वं विश्वा भूतान्याप: प्राणा वा आप: पशव आपोऽन्नमापोऽमृतमाप: सम्राडापो विराडाप: स्वराडापश्छन्दाग्स्यापो ज्योतीग्ष्यापो यजूग्ष्याप: सत्यमाप: सर्वा देवता आपो भूर्भुव: सुवराप ॐ ॥ गङ्गे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती । नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥ कावेरी तुङ्गभद्रा च कृष्णवेणी च गौतमी । भागीरथीति विख्याताः पञ्चगङ्गाः प्रकीर्तिताः ॥ आयान्तु श्री ____ (देवता) पूजार्थं मम दुरितक्षयकारकाः । ॐ ॐ ॐ (कलश के जल को पूजा सामग्री, देव और स्वयं पर छिड़कें) कलशोदकेन पूजा द्रव्याणि सम्प्रोक्ष्य, देवं सम्प्रोक्ष्य, आत्मानं च सम्प्रोक्ष्य ॥ ९. शङ्खपूजा (Conch Worship) (शंख को धोकर उसमें जल भरें और गंध-तुलसी चढ़ाएं) कलशोदकेन शङ्खं पूरयित्वा ॥ शङ्खे गन्धकुङ्कुमपुष्पतुलसीपत्रैरलङ्कृत्य ॥ शङ्खं चन्द्रार्क दैवतं मध्ये वरुण देवताम् । पृष्ठे प्रजापतिं विन्द्यादग्रे गङ्गा सरस्वतीम् ॥ त्रैलोक्येयानि तीर्थानि वासुदेवस्यदद्रया । शङ्खे तिष्ठन्तु विप्रेन्द्रा तस्मात् शङ्खं प्रपूजयेत् ॥ त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे । पूजितः सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते ॥ गर्भादेवारिनारीणां विशीर्यन्ते सहस्रधा । नवनादेनपाताले पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते ॥ ॐ शङ्खाय नमः । ॐ धवलाय नमः । ॐ पाञ्चजन्याय नमः । ॐ शङ्खदेवताभ्यो नमः । सकलपूजार्थे अक्षतान् समर्पयामि ॥ (शंख के जल को केवल पूजा सामग्री पर छिड़कें, देव पर नहीं, यदि शिव पूजा हो) १०. घण्टपूजा (Bell Worship) (घंटी को गंध-अक्षत लगाएं) ॐ जयध्वनि मन्त्रमातः स्वाहा । घण्टदेवताभ्यो नमः । सकलोपचार पूजार्थे अक्षतान् समर्पयामि । घण्टानादम् (बाएं हाथ से घंटी बजाते हुए) आगमार्थं तु देवानां गमनार्थं तु राक्षसाम् । घण्टारवं करोम्यादौ देवताह्वान लाञ्छनम् ॥ इति घण्टानादं कृत्वा ॥

संबंधित पूजा विधियाँ

पूर्वांग (Poorvangam) क्या है?

'पूर्वांग' का अर्थ है "पूजा का पूर्व अंग"। मुख्य देवता की पूजा शुरू करने से पहले शरीर शुद्धि, स्थान शुद्धि, संकल्प और विघ्न निवारण के लिए जो क्रियाएं की जाती हैं, उन्हें पूर्वांग कहा जाता है।

क्या यह विधि सभी पूजाओं के लिए है?

जी हाँ, स्मार्त (स्मृति को मानने वाले) परंपरा में लगभग सभी देवी-देवताओं की पूजा (गणेश, शिव, देवी, विष्णु आदि) इसी पूर्वांग विधि से शुरू होती है। वैष्णव परंपरा में इसमें थोड़ा अंतर हो सकता है।

संकल्प लेना क्यों महत्वपूर्ण है?

संकल्प हमारे मन की 'इच्छा शक्ति' को जागृत करता है। यह पूजा के उद्देश्य (जैसे शांति, समृद्धि या मोक्ष) को स्पष्ट करता है और उसे ब्रह्मांडीय शक्ति से जोड़ता है। बिना संकल्प के पूजा का पूर्ण प्रभाव नहीं मिलता।

घंटा पूजा (Bell Worship) क्यों की जाती है?

घंटी की ध्वनि से मन एकाग्र होता है और वातावरण शुद्ध होता है। यह देवताओं के आगमन (आगमार्थं) और राक्षसों के पलायन (गमनार्थं) का संकेत है।

।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः ।।