Sri Tara Shatanama Namavali (Swarnamala Tantra) – श्रीताराशतनामावलिः

॥ श्रीताराशतनामावलिः (स्वर्णमाला तन्त्रे) ॥
ॐ श्रीतारिण्यै नमः ।
ॐ श्रीतरलायै नमः ।
ॐ श्रीतन्व्यै नमः ।
ॐ श्रीतारायै नमः ।
ॐ श्रीतरुणवल्लर्यै नमः ।
ॐ श्रीतीव्ररूपयै नमः ।
ॐ श्रीतर्यै नमः ।
ॐ श्रीश्यामायै नमः ।
ॐ श्रीतनुक्षीणायै नमः ।
ॐ श्रीपयोधरायै नमः । १०
ॐ श्रीतुरीयायै नमः ।
ॐ श्रीतरुणायै नमः ।
ॐ श्रीतीव्रायै नमः ।
ॐ श्रीतीव्रगमनायै नमः ।
ॐ श्रीनीलवाहिन्यै नमः ।
ॐ श्रीउग्रतारायै नमः ।
ॐ श्रीजयायै नमः ।
ॐ श्रीचण्ड्यै नमः ।
ॐ श्रीश्रीमदेकजटायै नमः ।
ॐ श्रीशिवायै नमः । २०
ॐ श्रीतरुण्यै नमः ।
ॐ श्रीशाम्भव्यै नमः ।
ॐ श्रीछिन्नभालायै नमः ।
ॐ श्रीभद्रतारिण्यै नमः ।
ॐ श्रीउग्रायै नमः ।
ॐ श्रीउग्रप्रभायै नमः ।
ॐ श्रीनीलायै नमः ।
ॐ श्रीकृष्णायै नमः ।
ॐ श्रीनीलसरस्वत्यै नमः ।
ॐ श्रीद्वितीयायै नमः । ३०
ॐ श्रीशोभिन्यै नमः ।
ॐ श्रीनित्यायै नमः ।
ॐ श्रीनवीनायै नमः ।
ॐ श्रीनित्यनूतनायै नमः ।
ॐ श्रीचण्डिकायै नमः ।
ॐ श्रीविजयायै नमः ।
ॐ श्रीआराध्यायै नमः ।
ॐ श्रीदेव्यै नमः ।
ॐ श्रीगगनवाहिन्यै नमः ।
ॐ श्रीअट्टहास्यायै नमः । ४०
ॐ श्रीकरालास्यायै नमः ।
ॐ श्रीचतुरास्यापूजितायै नमः ।
ॐ श्रीअदितिपूजितायै नमः ।
ॐ श्रीरुद्रायै नमः ।
ॐ श्रीरौद्रमय्यै नमः ।
ॐ श्रीमूर्त्यै नमः ।
ॐ श्रीविशोकायै नमः ।
ॐ श्रीशोकनाशिन्यै नमः ।
ॐ श्रीशिवपूज्यायै नमः ।
ॐ श्रीशिवाराध्यायै नमः । ५०
ॐ श्रीशिवध्येयायै नमः ।
ॐ श्रीसनातन्यै नमः ।
ॐ श्रीब्रह्मविद्यायै नमः ।
ॐ श्रीजगद्धात्र्यै नमः ।
ॐ श्रीनिर्गुणायै नमः ।
ॐ श्रीगुणपूजितायै नमः ।
ॐ श्रीसगुणायै नमः ।
ॐ श्रीसगुणाराध्यायै नमः ।
ॐ श्रीहरिपूजितायै नमः ।
ॐ श्रीइन्द्रपूजितायै नमः । ६०
ॐ श्रीदेवपूजितायै नमः ।
ॐ श्रीरक्तप्रियायै नमः ।
ॐ श्रीरक्ताक्ष्यै नमः ।
ॐ श्रीरुधिरभूषितायै नमः ।
ॐ श्रीआसवभूषितायै नमः ।
ॐ श्रीबलिप्रियायै नमः ।
ॐ श्रीबलिरतायै नमः ।
ॐ श्रीदुर्गायै नमः ।
ॐ श्रीबलवत्यै नमः ।
ॐ श्रीबलायै नमः । ७०
ॐ श्रीबलप्रियायै नमः ।
ॐ श्रीबलरतायै नमः ।
ॐ श्रीबलरामप्रपूजितायै नमः ।
ॐ श्रीअर्द्धकेशायै नमः ।
ॐ श्रीईश्वर्यै नमः ।
ॐ श्रीकेशायै नमः ।
ॐ श्रीकेशवविभूषितायै नमः ।
ॐ श्रीईशविभूषितायै नमः ।
ॐ श्रीपद्ममालायै नमः ।
ॐ श्रीपद्माक्ष्यै नमः । ८०
ॐ श्रीकामाख्यायै नमः ।
ॐ श्रीगिरिनन्दिन्यै नमः ।
ॐ श्रीदक्षिणायै नमः ।
ॐ श्रीदक्षायै नमः ।
ॐ श्रीदक्षजायै नमः ।
ॐ श्रीदक्षिणेरतायै नमः ।
ॐ श्रीवज्रपुष्पप्रियायै नमः ।
ॐ श्रीरक्तप्रियायै नमः ।
ॐ श्रीकुसुमभूषितायै नमः ।
ॐ श्रीमाहेश्वर्यै नमः । ९०
ॐ श्रीमहादेवप्रियायै नमः ।
ॐ श्रीपञ्चविभूषितायै नमः ।
ॐ श्रीइडायै नमः ।
ॐ श्रीपिङ्ग्लायै नमः ।
ॐ श्रीसुषुम्णायै नमः ।
ॐ श्रीप्राणरूपिण्यै नमः ।
ॐ श्रीगान्धार्यै नमः ।
ॐ श्रीपञ्चम्यै नमः ।
ॐ श्रीपञ्चाननपरिपूजितायै नमः ।
ॐ श्रीआदिपरिपूजितायै नमः । १००
॥ इति स्वर्णमालातन्त्रान्तर्गता श्रीताराशतनामावलिः समाप्ता ॥
संलिखित ग्रंथ (Related Content)
श्रीताराशतनामावलिः: तांत्रिक परिचय एवं महत्व (Introduction & Tantric Significance)
श्रीताराशतनामावलिः तंत्र साहित्य के दो अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रामाणिक ग्रंथों — 'स्वर्णमाला तन्त्र' और 'मुण्डमाला तन्त्र' — में समान रूप से वर्णित 'ताराशतनामस्तोत्रम्' का नामावली स्वरूप है। नामावली का प्रयोग मुख्य रूप से 'अर्चन' (Archana) अर्थात् देवी को पुष्प, कुमकुम, अक्षत या अन्य पवित्र सामग्रियां अर्पित करने के लिए किया जाता है। माँ तारा दशमहाविद्याओं में दूसरी शक्ति हैं, जो 'तारने' (भवसागर से पार लगाने) और 'तीव्र गति' से फल देने के लिए जानी जाती हैं।
'त' (तकार) की प्रधानता: इस नामावली के कई नाम 'त' वर्ण से शुरू होते हैं (जैसे तारिणी, तरला, तन्वी, तारा, तुरीया, तीव्ररूपा)। तंत्र में 'त' वर्ण को 'तारक बीज' माना गया है। यह ध्वनि अज्ञान के अंधकार को चीरकर ज्ञान का प्रकाश फैलाती है।
उग्र और सौम्य का संगम: इस नामावली में देवी के 'उग्रतारा', 'करालास्या', 'रक्तप्रिया' जैसे भयंकर रूप भी हैं और 'शोभिनी', 'नित्या', 'नवीना' जैसे सौम्य रूप भी। यह दर्शाता है कि तारा ही विध्वंस और सृजन दोनों की शक्ति हैं।
नामावली का विशिष्ट आध्यात्मिक और यौगिक महत्व (Spiritual Significance)
यह नामावली केवल नामों की सूची नहीं है, बल्कि इसमें योग और तत्वज्ञान के गहरे रहस्य छिपे हैं:
- नाड़ी विज्ञान: नाम 93-95 में 'श्रीइडायै', 'श्रीपिङ्गलायै' और 'श्रीसुषुम्णायै' का स्पष्ट उल्लेख है। तारा ही हमारे शरीर में प्राण शक्ति बनकर इडा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों में प्रवाहित होती हैं। यह कुण्डलिनी योग का आधार है।
- तत्व ज्ञान: नाम 83-85 में देवी को 'श्रीतत्त्वप्रियायै' और 'श्रीतत्त्वज्ञानात्मिकायै' कहा गया है। वे केवल मूर्ति नहीं, बल्कि पंचतत्वों और आत्म-तत्व का ज्ञान हैं।
- नील सरस्वती: नाम 29 में देवी को 'श्रीनीलसरस्वत्यै' कहा गया है। यह उनका ज्ञान-प्रदायक रूप है। जो साधक विद्या और वाक-सिद्धि चाहता है, उसके लिए यह नाम कल्पवृक्ष है।
- एकजटा: नाम 19 में 'श्रीश्रीमदेकजटायै' का उल्लेख है। यह तारा का उग्र स्वरूप है जहाँ उनकी जटाएं एक साथ बंधी होती हैं, जो एकाग्रता का प्रतीक है।
फलश्रुति: अर्चन से प्राप्त होने वाले सिद्ध लाभ (Benefits of Archanam)
इस सिद्ध नामावली से अर्चन करने पर साधक को निम्नलिखित दुर्लभ फल प्राप्त होते हैं:
- मन्त्रसिद्धि: यदि साधक का कोई मन्त्र सिद्ध नहीं हो रहा हो, तो इस नामावली से अर्चन करने पर वह मन्त्र 'जाग्रत' हो जाता है।
- गाणपत्य और सर्वसिद्धि: साधक को गणों का अधिपति (नेता) बनने का सौभाग्य मिलता है। वह पृथ्वी पर 'सर्वसिद्धियुतो' (सभी सिद्धियों से युक्त) होकर विचरण करता है।
- जीवन्मुक्ति: चाहे श्रद्धा से अर्चन करें या बिना श्रद्धा के, साधक शीघ्र ही 'जीवन्मुक्त' (जीते जी मोक्ष प्राप्त) हो जाता है और शिव स्वरूप बन जाता है।
- पुरश्चरण का फल: इस नामावली का 1000 बार अर्चन करने से एक पूर्ण 'पुरश्चरण' का फल मिलता है।
- शत्रु नाश और विजय: 'उग्रतारा', 'जया', 'विजयाराध्या' जैसे नामों के अर्चन से साधक के सभी शत्रु परास्त होते हैं और उसे सर्वत्र विजय मिलती है।
पाठ विधि एवं अर्चन के नियम (Ritual Method & Guidelines)
यह एक सिद्ध तांत्रिक नामावली है, इसलिए इसका अर्चन विधि-विधान से करना चाहिए।
दैनिक अर्चन विधि:
स्नानादि से निवृत्त होकर नीले या काले वस्त्र धारण करें। उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। माँ तारा के चित्र या यंत्र के सामने घी या तेल का दीपक जलाएं। एक पात्र में 100 नीले कमल, जवा कुसुम (गुड़हल) या अक्षत रख लें। प्रत्येक नाम के अंत में 'नमः' बोलते हुए एक फूल देवी के चरणों में अर्पित करें।
विशेष मुहूर्त (Siddha Muhurat):
शनिवार (मंद) और मंगलवार की रात्रि (निशीथ काल) में अर्चन करना मन्त्रसिद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ है। इसके अलावा नवरात्रि और ग्रहण काल भी श्रेष्ठ हैं।
जप और अर्चन का क्रम:
अर्चन से पहले तारा के मूल मंत्र (ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं फट्) का 108 बार जप करें, फिर नामावली से अर्चन करें, और अंत में पुनः 108 बार जप करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. यह नामावली किस ग्रंथ से है?
यह 'स्वर्णमाला तन्त्र' (और मुण्डमाला तन्त्र के 13वें पटल) से ली गई है।
2. 'एकजटा' का क्या अर्थ है?
एकजटा माँ तारा का ही एक उग्र स्वरूप है। इनकी जटाएं (बाल) बिखरी नहीं होतीं, बल्कि एक ही जटा के रूप में ऊपर बंधी होती हैं, जो एकाग्रता का प्रतीक है।
3. क्या गृहस्थ इसका अर्चन कर सकते हैं?
जी हाँ। सात्विक भाव से और अपनी सुरक्षा तथा मनोकामना पूर्ति के लिए कोई भी गृहस्थ इसका अर्चन कर सकता है।
4. 'छिन्नभाला' का क्या मतलब है?
इसका अर्थ है 'मस्तक कटी हुई'। यह छिन्नमस्ता देवी का संकेत है। तारा और छिन्नमस्ता दोनों उग्र महाविद्याएं हैं।
5. अर्चन के लिए कौन से पुष्प सर्वोत्तम हैं?
माँ तारा के अर्चन के लिए नीले कमल (Indivara), जवा कुसुम (गुड़हल) या लाल कनेर के फूल सर्वोत्तम माने जाते हैं।
6. क्या इस अर्चन के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?
सामान्य अर्चन के लिए अनिवार्य नहीं है, लेकिन मन्त्रसिद्धि और तांत्रिक प्रयोगों के लिए गुरु दीक्षा आवश्यक है।
7. 'बलरामप्रपूजिता' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि भगवान बलराम (कृष्ण के भाई) ने भी माँ तारा की पूजा की थी। यह उनकी सर्वव्यापकता को दर्शाता है।
8. 'पंचमी' नाम क्यों है?
पंचमी का अर्थ है पांचवीं शक्ति या पांच मकारों की अधिष्ठात्री। साथ ही, शुक्ल और कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि देवी को प्रिय है।
9. क्या इस अर्चन से वाक-सिद्धि मिलती है?
जी हाँ। तारा 'नील सरस्वती' हैं। इस नामावली के अर्चन से वाणी में तेज आता है और साधक जो बोलता है, वह सत्य होने लगता है।
10. अर्चन का सबसे अच्छा समय क्या है?
तांत्रिक देवी होने के कारण, मध्यरात्रि (निशीथ काल), अमावस्या, और मंगलवार/शनिवार की रातें इस अर्चन के लिए सबसे शक्तिशाली मानी जाती हैं।