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Sri Lakshmi Ashtottara Shatanamavali 3 – श्री लक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामावली ३

Sri Lakshmi Ashtottara Shatanamavali 3 – श्री लक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामावली ३
॥ श्री लक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामावली (नारदीय पुराण) ॥ ओं ब्रह्मज्ञायै नमः । ओं ब्रह्मसुखदायै नमः । ओं ब्रह्मण्यायै नमः । ओं ब्रह्मरूपिण्यै नमः । ओं सुमत्यै नमः । ओं सुभगायै नमः । ओं सुन्दायै नमः । ओं प्रयत्यै नमः । ओं नियत्यै नमः । ओं यत्यै नमः । ओं सर्वप्राणस्वरूपायै नमः । ओं सर्वेन्द्रियसुखप्रदायै नमः । ओं संविन्मय्यै नमः । ओं सदाचारायै नमः । ओं सदातुष्टायै नमः । ओं सदानतायै नमः । ओं कौमुद्यै नमः । ओं कुमुदानन्दायै नमः । ओं क्वै नमः । ओं कुत्सिततमोहर्यै नमः । ओं हृदयार्तिहर्यै नमः । ओं हारशोभिन्यै नमः । ओं हानिवारिण्यै नमः । ओं सम्भाज्यायै नमः । ओं संविभज्यायै नमः । ओं आज्ञायै नमः । ओं ज्यायस्यै नमः । ओं जनिहारिण्यै नमः । ओं महाक्रोधायै नमः । ओं महातर्षायै नमः । ओं महर्षिजनसेवितायै नमः । ओं कैटभारिप्रियायै नमः । ओं कीर्त्यै नमः । ओं कीर्तितायै नमः । ओं कैतवोज्झितायै नमः । ओं कौमुद्यै नमः । ओं शीतलमनसे नमः । ओं कौसल्यासुतभामिन्यै नमः । ओं कासारनाभ्यै नमः । ओं कस्यै नमः । ओं तस्यै नमः । ओं यस्यै नमः । ओं एतस्यै नमः । ओं इयत्ताविवर्जितायै नमः । ओं अन्तिकस्थायै नमः । ओं अतिदूरस्थायै नमः । ओं हृदयस्थायै नमः । ओं अम्बुजस्थितायै नमः । ओं मुनिचित्तस्थितायै नमः । ओं मौनिगम्यायै नमः । ओं मान्धातृपूजितायै नमः । ओं मतिस्थिरीकर्तृकार्यनित्यनिर्वहणोत्सुकायै नमः । ओं महीस्थितायै नमः । ओं मध्यस्थायै नमः । ओं द्युस्थितायै नमः । ओं अधःस्थितायै नमः । ओं ऊर्ध्वगायै नमः । ओं भूत्यै नमः । ओं विभूत्यै नमः । ओं सुरभ्यै नमः । ओं सुरसिद्धार्तिहारिण्यै नमः । ओं अतिभोगायै नमः । ओं अतिदानायै नमः । ओं अतिरूपायै नमः । ओं अतिकरुणायै नमः । ओं अतिभासे नमः । ओं विज्वरायै नमः । ओं वियदाभोगायै नमः । ओं वितन्द्रायै नमः । ओं विरहासहायै नमः । ओं शूर्पकारातिजनन्यै नमः । ओं शून्यदोषायै नमः । ओं शुचिप्रियायै नमः । ओं निःस्पृहायै नमः । ओं सस्पृहायै नमः । ओं नीलासपत्न्यै नमः । ओं निधिदायिन्यै नमः । ओं कुम्भस्तन्यै नमः । ओं कुन्दरदायै नमः । ओं कुङ्कुमालेपितायै नमः । ओं कुजायै नमः । ओं शास्त्रज्ञायै नमः । ओं शास्त्रजनन्यै नमः । ओं शास्त्रज्ञेयायै नमः । ओं शरीरगायै नमः । ओं सत्यभासे नमः । ओं सत्यसङ्कल्पायै नमः । ओं सत्यकामायै नमः । ओं सरोजिन्यै नमः । ओं चन्द्रप्रियायै नमः । ओं चन्द्रगतायै नमः । ओं चन्द्रायै नमः । ओं चन्द्रसहोदर्यै नमः । ओं औदर्यै नमः । ओं औपयिक्यै नमः । ओं प्रीतायै नमः । ओं गीतायै नमः । ओं ओतायै नमः । ओं गिरिस्थितायै नमः । ओं अनन्वितायै नमः । ओं अमूलायै नमः । ओं आर्तिध्वान्तपुञ्जरविप्रभायै नमः । ओं मङ्गलायै नमः । ओं मङ्गलपरायै नमः । ओं मृग्यायै नमः । ओं मङ्गलदेवतायै नमः । ओं कोमलायै नमः । ओं महालक्ष्म्यै नमः । ॥ इति श्री नारदीयोपपुराणान्तर्गतं श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णा ॥

श्री लक्ष्मी अष्टोत्तरशतनामावली ३: अर्चन का महत्व

तुलसीदलमात्रेण जलस्य चुलुकेन वा... अर्थात, भगवान केवल भक्ति भाव से अर्पित एक तुलसी दल या जल से भी प्रसन्न हो जाते हैं। नामावली (Namavali) इसी भक्ति का स्वरूप है।
जब साधक अपने हाथों से एक-एक नाम के साथ 'नमः' कहकर माँ लक्ष्मी के चरणों में पुष्प अर्पित करता है, तो उसका संबंध देवी के साथ प्रगाढ़ हो जाता है। नारदीय पुराण की यह नामावली विशेष रूप से ज्ञान और मोक्ष की कामना रखने वाले साधकों के लिए है। यह मन की चंचलता को समाप्त कर एकाग्रता प्रदान करती है।

नामावली जाप की विशिष्टता

स्तोत्र पाठ जहाँ देवी के गुणों का वर्णन है, वहीं नामावली जाप (Archana) देवी का साक्षात आह्वान है। यह अधिक क्रियात्मक (Interactive) पूजा है।
इस नामावली के 108 नाम सिद्ध मंत्रों के समान हैं। जैसे - 'ॐ निधिदायिन्यै नमः' कहने से धन के भंडार खुलते हैं और 'ॐ हानिवारिण्यै नमः' कहने से व्यापार या जीवन में हो रही हानि तुरंत रुक जाती है।

अर्चन विधि (Rituals)

घर पर अर्चन करने की सरल विधि:
  1. तैयारी: एक थाली में 108 ताजे फूल (गुलाब/कमल), कुमकुम, हल्दी, या साबुत अक्षत (चावल) रख लें।
  2. आह्वान: माँ लक्ष्मी की प्रतिमा के सामने दीपक जलाएं और उनका ध्यान करें।
  3. समर्पण: दाएँ हाथ (Right hand) की अनामिका और मध्यमा उंगली से फूल या अक्षत उठाएं।
  4. जाप: एक नाम बोलें (जैसे 'ॐ ब्रह्मज्ञायै नमः') और सामग्री माँ के चरणों में छोड़ दें।
  5. समापन: अंत में सभी एकत्रित फूलों को किसी पवित्र स्थान पर विसर्जित करें।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

  1. नामावली और स्तोत्र में क्या अंतर है?

स्तोत्र लयात्मक होता है और निरंतर पाठ (Recitation) के लिए होता है। नामावली में प्रत्येक नाम अलग-अलग होता है और इसके अंत में 'नमः' लगता है, जिसका उपयोग देवी को फूल या अक्षत अर्पित (Archana) करने के लिए किया जाता है।

  1. इस नामावली का विशिष्ट लाभ क्या है?

यह नामावली (नारदीय पुराण) विशेष रूप से 'ब्रह्मज्ञान' और 'आत्मिक शांति' प्रदान करती है। यह केवल भौतिक धन ही नहीं, बल्कि बौद्धिक विकास और मानसिक स्थिरता के लिए भी श्रेष्ठ है।

  1. अर्चन के लिए कौन से फूल सबसे शुभ हैं?

माँ लक्ष्मी को कमल (Lotus) सबसे प्रिय है। इसके अलावा लाल गुलाब या कोई भी सुगंधित लाल/पीला फूल अर्चन के लिए उत्तम है। अभाव में कुमकुम या केसर रंगे चावल भी प्रयोग कर सकते हैं।

  1. क्या पुरुष और स्त्रियाँ दोनों अर्चन कर सकते हैं?

जी हाँ, कोई भी श्रद्धालु शुद्ध मन से अर्चन कर सकता है। सुहागिन स्त्रियाँ यदि हल्दी-कुमकुम से अर्चन करें तो यह उनके सौभाग्य और दांपत्य जीवन के लिए विशेष फलदायी होता है।

  1. इस नामावली में 'ब्रह्म' शब्द बार-बार क्यों आया है?

क्योंकि नारदीय पुराण की दृष्टि में लक्ष्मी केवल विष्णु की पत्नी ही नहीं, बल्कि साक्षात 'ब्रह्म शक्ति' (Supreme Cosmic Power) हैं। वह सृष्टि की उत्पत्ति और ज्ञान का स्रोत हैं।

  1. अर्चन करने का सही समय क्या है?

प्रदोष काल (सूर्यास्त के ठीक बाद का समय) अर्चन के लिए सबसे शक्तिशाली माना जाता है। शुक्रवार की सुबह भी इसके लिए अत्यंत शुभ है।

  1. 'कौमुदी' नाम का क्या अर्थ है?

'कौमुदी' का अर्थ है चाँदनी (Moonlight)। जैसे चाँदनी रात को शीतलता देती है, वैसे ही यह नाम जपने से माँ लक्ष्मी भक्त के जीवन के ताप और कष्टों को हर कर शीतलता प्रदान करती हैं।

  1. क्या टूटे हुए चावल (अक्षत) प्रयोग कर सकते हैं?

नहीं, अर्चन 'अक्षत' (जिसका क्षय न हुआ हो) से होना चाहिए। इसलिए सदैव साबुत (Whole) चावल का ही प्रयोग करें। टूटा हुआ चावल पूजा में वर्जित है।

  1. क्या अर्चन के बाद प्रसाद ग्रहण करना चाहिए?

हाँ, अर्चन पूर्ण होने के बाद यदि आपने कोई खाद्य पदार्थ चढ़ाया है तो उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करें। यदि फूल/अक्षत हैं, तो उन्हें मस्तक से लगाकर आशीर्वाद लें।

  1. अर्चन सामग्री का विसर्जन कैसे करें?

अर्चन में चढ़ाए हुए फूलों को पैरों के नीचे नहीं आने देना चाहिए। उन्हें किसी गमले में, पेड़ की जड़ में या बहते जल में विसर्जित करें। कुमकुम/चावल को आप दैनिक तिलक के लिए उपयोग कर सकते हैं।