Sri Kakaradi Adya Kalika Shatanama Namavali – ककारादि आद्या कालिकाशतनामावली

॥ श्रीककारकूटघटितं आद्या कालिकाशतनामावली ॥
॥ पूर्वपीठिका ॥
श्रीसदाशिव उवाच ।
शृणु देवि जगद्वन्द्ये स्तोत्रमेतदमुत्तमम् ।
पठनाच्छ्रवणाद्यस्य सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ॥
असौभाग्य प्रशमनं सुखसम्पद्विवर्धनम् ।
अकालमृत्युहरणं सर्वापद्निवारणम् ॥
श्रीमदाद्याकालिकायाः सुखसान्निध्यकारणम् ।
स्तवस्यास्य प्रसादेन त्रिपुरारिरहं प्रिये ॥
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य ककारकूटघटितं श्रीआद्याकालिकाशतनामस्तोत्रमन्त्रस्य
श्रीसदाशिवऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । श्री आद्याकालिका देवता ।
धर्मकामार्थमोक्ष सिध्यर्थे जपे विनियोगः ॥
॥ नामावलिः ॥
श्रीकाल्यै नमः ।
श्रीकराल्यै नमः ।
श्रीकल्याण्यै नमः ।
श्रीकलावत्यै नमः ।
श्रीकमलायै नमः ।
श्रीकलिदर्पघ्न्यै नमः ।
श्रीकपर्दीशकृपान्वितायै नमः ।
श्रीकालिकायै नमः ।
श्रीकालमात्रे नमः ।
श्रीकालानलसमद्युतये नमः । १०
श्रीकपर्दिन्यै नमः ।
श्रीकरालास्यायै नमः ।
श्रीकरुणाऽमृतसागरायै नमः ।
श्रीकृपामय्यै नमः ।
श्रीकृपाधारायै नमः ।
श्रीकृपापारायै नमः ।
श्रीकृपागमायै नमः ।
श्रीकृशानवे नमः ।
श्रीकपिलायै नमः ।
श्रीकृष्णायै नमः । २०
श्रीकृष्णानन्दविवर्द्धिन्यै नमः ।
श्रीकालरात्र्यै नमः ।
श्रीकामरूपायै नमः ।
श्रीकामशापविमोचन्यै नमः ।
श्रीकादम्बिन्यै नमः ।
श्रीकलाधारायै नमः ।
श्रीकलिकल्मषनाशिन्यै नमः ।
श्रीकुमारीपूजनप्रीतायै नमः ।
श्रीकुमारीपूजकालयायै नमः ।
श्रीकुमारीभोजनानन्दायै नमः । ३०
श्रीकुमारीरूपधारिण्यै नमः ।
श्रीकदम्बवनसञ्चारायै नमः ।
श्रीकदम्बवनवासिन्यै नमः ।
श्रीकदम्बपुष्पसन्तोषायै नमः ।
श्रीकदम्बपुष्पमालिन्यै नमः ।
श्रीकिशोर्यै नमः ।
श्रीकलकण्ठायै नमः ।
श्रीकलनादनिनादिन्यै नमः ।
श्रीकादम्बरीपानरतायै नमः ।
श्रीकादम्बरीप्रियायै नमः । ४०
श्रीकपालपात्रनिरतायै नमः ।
श्रीकङ्कालमाल्यधारिण्यै नमः ।
श्रीकमलासनसन्तुष्टायै नमः ।
श्रीकमलासनवासिन्यै नमः ।
श्रीकमलालयमध्यस्थायै नमः ।
श्रीकमलामोदमोदिन्यै नमः ।
श्रीकलहंसगत्यै नमः ।
श्रीकलैव्यनाशिन्यै नमः ।
श्रीकामरूपिण्यै नमः ।
श्रीकामरूपकृतावासायै नमः । ५०
श्रीकामपीठविलासिन्यै नमः ।
श्रीकमनीयायै नमः ।
श्रीकल्पलतायै नमः ।
श्रीकमनीयविभूषणायै नमः ।
श्रीकमनीयगुणाराध्यायै नमः ।
श्रीकोमलाङ्ग्यै नमः ।
श्रीकृशोदर्यै नमः ।
श्रीकरणामृतसन्तोषायै नमः ।
श्रीकारणानन्दसिद्धिदायै नमः ।
श्रीकारणानन्दजापेष्टायै नमः । ६०
श्रीकारणार्चनहर्षितायै नमः ।
श्रीकारणार्णवसम्मग्नायै नमः ।
श्रीकारणव्रतपालिन्यै नमः ।
श्रीकस्तूरीसौरभामोदायै नमः ।
श्रीकस्तूरीतिलकोज्ज्वलायै नमः ।
श्रीकस्तूरीपूजनरतायै नमः ।
श्रीकस्तूरीपूजकप्रियायै नमः ।
श्रीकस्तूरीदाहजनन्यै नमः ।
श्रीकस्तूरीमृगतोषिण्यै नमः ।
श्रीकस्तूरीभोजनप्रीतायै नमः । ७०
श्रीकर्पूरामोदमोदितायै नमः ।
श्रीकर्पूरचन्दनोक्षितायै नमः ।
श्रीकर्पूरमालाऽऽभरणायै नमः ।
श्रीकर्पूरकारणाह्लादायै नमः ।
श्रीकर्पूरामृतपायिन्यै नमः ।
श्रीकर्पूरसागरस्नातायै नमः ।
श्रीकर्पूरसागरालयायै नमः ।
श्रीकूर्चबीजजपप्रीतायै नमः ।
श्रीकूर्चजापपरायणायै नमः ।
श्रीकुलीनायै नमः । ८०
श्रीकौलिकाराध्यायै नमः ।
श्रीकौलिकप्रियकारिण्यै नमः ।
श्रीकुलाचारायै नमः ।
श्रीकौतुकिन्यै नमः ।
श्रीकुलमार्गप्रदर्शिन्यै नमः ।
श्रीकाशीश्वर्यै नमः ।
श्रीकष्टहर्त्र्यै नमः ।
श्रीकाशीशवरदायिन्यै नमः ।
श्रीकाशीश्वरीकृतामोदायै नमः ।
श्रीकाशीश्वरमनोरमायै नमः । ९०
श्रीकलमञ्जीरचरणायै नमः ।
श्रीक्वणत्काञ्चीविभूषणायै नमः ।
श्रीकाञ्चनाद्रिकृताधारायै नमः ।
श्रीकाञ्चनाञ्चलकौमुद्यै नमः ।
श्रीकामबीजजपानन्दायै नमः ।
श्रीकामबिजस्वरूपिण्यै नमः ।
श्रीकुमतिघ्न्यै नमः ।
श्रीकुलीनार्तिनाशिन्यै नमः ।
श्रीकुलकामिन्यै नमः ।
श्रीक्रींह्रींश्रींमन्त्रवर्णेनकालकण्टकघातिन्यै नमः । १००
॥ इति महानिर्वाणतन्त्रे सप्तमोल्लासान्तर्गता श्रीककारकूटघटितं आद्या अथवा कालिका शतनामावली सम्पूर्णा ॥
संलिखित ग्रंथ (Related Content)
ककारादि आद्या कालिकाशतनामावली: तांत्रिक परिचय (Introduction & Tantric Significance)
श्रीककारकूटघटितं आद्या कालिकाशतनामावली तन्त्र शास्त्र के महान ग्रंथ 'महानिर्वाण तंत्र' के सप्तम उल्लास (अध्याय) से ली गई है। यह केवल एक नामावली नहीं, बल्कि 'अक्षर विज्ञान' (Sound Science) का एक अद्भुत प्रयोग है। इसमें माता काली के 100 नाम हैं और प्रत्येक नाम देवनागरी वर्णमाला के प्रथम व्यंजन 'क' (ककार) से आरंभ होता है।
'क' (ककार) का रहस्य: तन्त्र में 'क' वर्ण को सृष्टि का आदि बीज माना गया है। 'क' से ही 'काम' (इच्छा), 'काली' (शक्ति), 'कराल' (उग्रता) और 'कल्याण' (शुभता) की उत्पत्ति होती है। जब साधक लगातार 'क' वर्ण से युक्त नामों का उच्चारण करता है, तो उसके भीतर एक विशेष ध्वनि स्पंदन (Vibration) उत्पन्न होता है, जो कुण्डलिनी शक्ति को मूलाधार (जहाँ 'क' स्थित है) से जागृत करने में सहायक होता है।
आद्या शक्ति: यहाँ देवी को 'आद्या' कहा गया है, जिसका अर्थ है 'प्राइमोर्डियल' (Primordial) या जो सबसे पहले थी। वे ही परब्रह्म की मूल प्रकृति हैं। भगवान सदाशिव कहते हैं कि इस स्तुति के प्रसाद से ही वे 'त्रिपुरारि' (तीनों लोकों और त्रिपुरासुर के विजेता) बने हैं।
नामावली का विशिष्ट स्वरूप और अर्थ (Unique Form & Meaning)
इस नामावली में देवी के सौम्य और उग्र, दोनों रूपों का 'क' अक्षर के माध्यम से सुंदर चित्रण है:
- सौम्य और मनोहर रूप: 'श्रीकमलायै' (लक्ष्मी स्वरूप), 'श्रीकल्याण्यै' (कल्याणकारी), 'श्रीकोमलाङ्ग्यै' (कोमल अंगों वाली), और 'श्रीकिशोर्यै' (बालिका स्वरूप) जैसे नाम देवी की ममता और सौंदर्य को दर्शाते हैं।
- उग्र और संहारक रूप: 'श्रीकराल्यै' (भयंकर), 'श्रीकालरात्र्यै' (प्रलयंकारी रात्रि), 'श्रीकङ्कालमाल्यधारिण्यै' (कंकालों की माला पहनने वाली) और 'श्रीकलिदर्पघ्न्यै' (कलियुग का घमंड तोड़ने वाली) जैसे नाम उनकी शक्ति और दुष्ट-दलन क्षमता को प्रकट करते हैं।
- कृष्ण और काली का अभेद: नाम 20 और 21 में 'श्रीकृष्णायै' और 'श्रीकृष्णानन्दविवर्द्धिन्यै' का उल्लेख है। यह शाक्त और वैष्णव मत के उस गूढ़ सिद्धांत को पुष्ट करता है कि "कलयुग में कृष्ण ही काली हैं और काली ही कृष्ण हैं" (कलौ कृष्णः कलौ काली)।
- कामरूप और कामपीठ: 'श्रीकामरूपिण्यै' और 'श्रीकामरूपकृतावासायै' नाम कामाख्या शक्तिपीठ (असम) की महिमा का गान करते हैं, जो तन्त्र का सर्वोच्च केंद्र है।
फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले सिद्ध लाभ (Benefits of Recitation)
भगवान सदाशिव ने पूर्वपीठिका में इस नामावली के पाठ के अद्भुत फलों का वर्णन किया है:
- सर्वसिद्धि की प्राप्ति: 'पठनाच्छ्रवणाद्यस्य सर्वसिद्धीश्वरो भवेत्' — इसके पढ़ने या सुनने मात्र से साधक सभी सिद्धियों का स्वामी बन जाता है।
- दुर्भाग्य और दरिद्रता का नाश: 'असौभाग्य प्रशमनं' — यह पाठ दुर्भाग्य (Bad Luck), दरिद्रता और जीवन के संघर्षों को शांत कर देता है।
- सुख-संपत्ति की वृद्धि: 'सुखसम्पद्विवर्धनम्' — इसके नित्य पाठ से घर में सुख, शांति और धन-संपत्ति की निरंतर वृद्धि होती है।
- अकाल मृत्यु हरण: 'अकालमृत्युहरणं' — यह कवच की भांति साधक की रक्षा करता है और अकाल मृत्यु (Premature Death), दुर्घटनाओं तथा रोगों को टाल देता है।
- भोग और मोक्ष: विनियोग में स्पष्ट है — 'धर्मकामार्थमोक्ष सिध्यर्थे'। यह नामावली चारों पुरुषार्थों को देने वाली है।
पाठ विधि एवं अनुष्ठान के नियम (Ritual Method & Guidelines)
तन्त्रोक्त होने के कारण इसकी विधि में थोड़ी विशेष सावधानी और श्रद्धा की आवश्यकता होती है।
दैनिक अर्चन विधि:
प्रातःकाल या संध्या समय स्नान करके लाल वस्त्र धारण करें। लाल आसन पर उत्तर या पूर्व मुख करके बैठें। माँ काली का चित्र या यंत्र स्थापित करें। सबसे पहले विनियोग करें। फिर 100 लाल पुष्प (गुड़हल/गुलाब) लें। प्रत्येक नाम के अंत में 'नमः' बोलते हुए एक पुष्प देवी को अर्पित करें। इसे 'शतनामार्चन' कहते हैं। यदि 100 पुष्प न हों, तो अक्षत (चावल) या कुमकुम से अर्चन करें।
कपूर और कस्तूरी का प्रयोग:
नामावली में 'श्रीकस्तूरीतिलकोज्ज्वलायै' और 'श्रीकर्पूरामोदमोदितायै' नाम आए हैं। अतः पूजा में कस्तूरी (इत्र) और कपूर की आरती का प्रयोग देवी को शीघ्र प्रसन्न करता है।
विशेष अवसर:
अमावस्या, नवरात्रि (विशेषकर सप्तमी/अष्टमी), और मंगलवार/शनिवार को इसका पाठ और अर्चन करने से मन्त्रसिद्धि और मनोकामना पूर्ति शीघ्र होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. यह नामावली किस ग्रंथ से ली गई है?
यह शाक्त परंपरा के अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ 'महानिर्वाण तंत्र' के सप्तम उल्लास (7वें अध्याय) से ली गई है।
2. 'ककारकूटघटितं' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'क' अक्षर (ककार) के समूह (कूट) से बनी हुई। चूँकि इसमें सभी नाम 'क' से शुरू होते हैं, इसलिए इसे यह विशिष्ट नाम दिया गया है।
3. क्या इस नामावली में 'आद्या स्तोत्र' का संबंध है?
जी हाँ। महानिर्वाण तंत्र में 'आद्या स्तोत्र' और यह 'शतनाम' एक साथ वर्णित हैं। दोनों आद्या काली की ही स्तुति हैं। भक्त अक्सर इनका पाठ एक साथ करते हैं।
4. 'कादम्बरी' (नाम 39-40) का क्या अर्थ है?
'कादम्बरी' का एक अर्थ मदिरा (सुरा) है और दूसरा अर्थ वर्षा का जल या कोयल है। तंत्र में मदिरा 'ईश्वरीय मस्ती' का प्रतीक है। देवी उस परमानंद की अवस्था में रमी रहती हैं।
5. क्या कुमारी पूजन अनिवार्य है?
नामावली में 'श्रीकुमारीपूजनप्रीतायै' (श्लोक 28) कहा गया है। यद्यपि अनिवार्य नहीं है, परन्तु नवरात्रि में या विशेष अनुष्ठान के समय कुमारी कन्याओं का पूजन करने से देवी अतिशीघ्र प्रसन्न होती हैं।
6. अंतिम नाम (100वाँ) इतना लंबा क्यों है?
100वाँ नाम — 'श्रीक्रींह्रींश्रींमन्त्रवर्णेनकालकण्टकघातिन्यै' — देवी के तीन प्रमुख बीजों (क्रीं, ह्रीं, श्रीं) का एकीकरण है। इसका अर्थ है कि देवी इन बीजों के द्वारा 'काल रूपी कांटे' (मृत्यु और बाधाओं) का नाश करती हैं।
7. क्या गृहस्थ इसका पाठ कर सकते हैं?
बिल्कुल। महानिर्वाण तंत्र गृहस्थों के लिए ही रचा गया है। यह नामावली पूरी तरह सात्विक और सुरक्षित है। कोई भी गृहस्थ अपनी सुख-शांति के लिए इसका पाठ कर सकता है।
8. 'कर्पूर' का उल्लेख बार-बार क्यों है?
श्लोक 71-77 तक 'कर्पूर' (Camphor) का उल्लेख है। कर्पूर शीतलता, सुगन्ध और 'सफेद' रंग (सत्व गुण) का प्रतीक है। कर्पूर जलकर पूर्णतः लुप्त हो जाता है (कोई राख नहीं बचती), जो पूर्ण समर्पण (Ego dissolution) का प्रतीक है।
9. 'कूर्च बीज' क्या है?
'कूर्च' बीज 'हूँ' (Hoom) को कहते हैं। यह क्रोध, शक्ति और नकारात्मकता के विनाश का बीज है। देवी इस बीज के जप से प्रसन्न होती हैं (श्रीकूर्चबीजजपप्रीतायै)।
10. 'कुल' और 'कौल' का क्या अर्थ है?
'कुल' का अर्थ है शक्ति और 'अकुल' का अर्थ है शिव। 'कौल' वह साधक है जो शक्ति और शिव के सामंजस्य को जानता है। यह तंत्र की एक विशिष्ट साधना पद्धति है। देवी कुल मार्ग की अधिष्ठात्री हैं।