Sri Durga Ashtottara Shatanamavali (Shriyai Namah) – श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामावली ॥
ॐ श्रियै नमः ।
ॐ उमायै नमः ।
ॐ भारत्यै नमः ।
ॐ भद्रायै नमः ।
ॐ शर्वाण्यै नमः ।
ॐ विजयायै नमः ।
ॐ जयायै नमः ।
ॐ वाण्यै नमः ।
ॐ सर्वगतायै नमः ।
ॐ गौर्यै नमः । १०
ॐ वाराह्यै नमः ।
ॐ कमलप्रियायै नमः ।
ॐ सरस्वत्यै नमः ।
ॐ कमलायै नमः ।
ॐ मायायै नमः ।
ॐ मातंग्यै नमः ।
ॐ अपरायै नमः ।
ॐ अजायै नमः ।
ॐ शांकभर्यै नमः ।
ॐ शिवायै नमः । २०
ॐ चण्डयै नमः ।
ॐ कुण्डल्यै नमः ।
ॐ वैष्णव्यै नमः ।
ॐ क्रियायै नमः ।
ॐ श्रियै नमः ।
ॐ ऐन्द्रयै नमः ।
ॐ मधुमत्यै नमः ।
ॐ गिरिजायै नमः ।
ॐ सुभगायै नमः ।
ॐ अम्बिकायै नमः । ३०
ॐ तारायै नमः ।
ॐ पद्मावत्यै नमः ।
ॐ हंसायै नमः ।
ॐ पद्मनाभसहोदर्यै नमः ।
ॐ अपर्णायै नमः ।
ॐ ललितायै नमः ।
ॐ धात्र्यै नमः ।
ॐ कुमार्यै नमः ।
ॐ शिखवाहिन्यै नमः ।
ॐ शाम्भव्यै नमः । ४०
ॐ सुमुख्यै नमः ।
ॐ मैत्र्यै नमः ।
ॐ त्रिनेत्रायै नमः ।
ॐ विश्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ आर्यायै नमः ।
ॐ मृडान्यै नमः ।
ॐ हीङ्कार्यै नमः ।
ॐ क्रोधिन्यै नमः ।
ॐ सुदिनायै नमः ।
ॐ अचलायै नमः । ५०
ॐ सूक्ष्मायै नमः ।
ॐ परात्परायै नमः ।
ॐ शोभायै नमः ।
ॐ सर्ववर्णायै नमः ।
ॐ हरप्रियायै नमः ।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः ।
ॐ महासिद्धयै नमः ।
ॐ स्वधायै नमः ।
ॐ स्वाहायै नमः ।
ॐ मनोन्मन्यै नमः । ६०
ॐ त्रिलोकपालिन्यै नमः ।
ॐ उद्भूतायै नमः ।
ॐ त्रिसन्ध्यायै नमः ।
ॐ त्रिपुरान्तक्यै नमः ।
ॐ त्रिशक्त्यै नमः ।
ॐ त्रिपदायै नमः ।
ॐ दुर्गायै नमः ।
ॐ ब्राह्मयै नमः ।
ॐ त्रैलोक्यवासिन्यै नमः ।
ॐ पुष्करायै नमः । ७०
ॐ अत्रिसुतायै नमः ।
ॐ गूढ़ायै नमः ।
ॐ त्रिवर्णायै नमः ।
ॐ त्रिस्वरायै नमः ।
ॐ त्रिगुणायै नमः ।
ॐ निर्गुणायै नमः ।
ॐ सत्यायै नमः ।
ॐ निर्विकल्पायै नमः ।
ॐ निरंजिन्यै नमः ।
ॐ ज्वालिन्यै नमः । ८०
ॐ मालिन्यै नमः ।
ॐ चर्चायै नमः ।
ॐ क्रव्यादोप निबर्हिण्यै नमः ।
ॐ कामाक्ष्यै नमः ।
ॐ कामिन्यै नमः ।
ॐ कान्तायै नमः ।
ॐ कामदायै नमः ।
ॐ कलहंसिन्यै नमः ।
ॐ सलज्जायै नमः ।
ॐ कुलजायै नमः । ९०
ॐ प्राज्ञ्यै नमः ।
ॐ प्रभायै नमः ।
ॐ मदनसुन्दर्यै नमः ।
ॐ वागीश्वर्यै नमः ।
ॐ विशालाक्ष्यै नमः ।
ॐ सुमंगल्यै नमः ।
ॐ काल्यै नमः ।
ॐ महेश्वर्यै नमः ।
ॐ चण्ड्यै नमः ।
ॐ भैरव्यै नमः । १००
ॐ भुवनेश्वर्यै नमः ।
ॐ नित्यायै नमः ।
ॐ सानन्दविभवायै नमः ।
ॐ सत्यज्ञानायै नमः ।
ॐ तमोपहायै नमः ।
ॐ महेश्वरप्रियङ्कर्यै नमः ।
ॐ महात्रिपुरसुन्दर्यै नमः ।
ॐ दुर्गापरमेश्वर्यै नमः । १०८
॥ इति श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामावलिः समाप्ता ॥
संलिखित ग्रंथ (Related Content)
श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामावली: तात्विक परिचय एवं रहस्य (Introduction & Mystical Secrets)
सनातन धर्म के शाक्त संप्रदाय में माँ दुर्गा की अनेक नामावलियां प्रचलित हैं, परंतु 'ॐ श्रियै नमः' से आरंभ होने वाली यह अष्टोत्तरशतनामावली (108 नाम) अपने आप में अत्यंत विशिष्ट और परिपूर्ण है। इस नामावली की सबसे बड़ी विशेषता इसका 'त्रि-शक्ति' (Trishakti) स्वरूप है। यह नामावली स्पष्ट करती है कि माँ दुर्गा केवल संहार की या युद्ध की देवी नहीं हैं, बल्कि वे साक्षात् महालक्ष्मी (धन-धान्य), महासरस्वती (ज्ञान-विद्या) और महाकाली (शक्ति-पराक्रम) का एकीकृत परमब्रह्म स्वरूप हैं।
आरंभिक नामों का अद्वैत रहस्य: इस स्तोत्र के प्रथम तीन नाम 'श्रियै नमः' (लक्ष्मी), 'उमायै नमः' (पार्वती), और 'भारत्यै नमः' (सरस्वती) हैं। यह त्रिवेणी इस बात का प्रमाण है कि संपूर्ण सृष्टि की संपदा, शक्ति और ज्ञान एक ही परमसत्ता से उद्भूत हुए हैं। इसके पश्चात् 'भद्रायै' (कल्याण करने वाली) और 'शर्वाण्यै' (भगवान शिव की पत्नी) जैसे नाम आते हैं। यह नामावली साधक को स्पष्ट संदेश देती है कि दुर्गा की उपासना करने वाले को स्वतः ही लक्ष्मी और सरस्वती की कृपा प्राप्त हो जाती है।
श्रीविद्या और दशमहाविद्या का संगम: इस नामावली में तंत्र शास्त्र की दशमहाविद्याओं और श्रीविद्या का अद्भुत संगम है। इसमें 'मातंग्यै', 'तारायै', 'भैरव्यै', 'कमलायै' और 'काल्यै' जैसे नाम आते हैं जो महाविद्याओं के हैं। वहीं, 'ललितायै' और अंत में 'महात्रिपुरसुन्दर्यै नमः' जैसे नाम स्पष्ट रूप से श्रीविद्या (Sri Vidya) परंपरा को स्थापित करते हैं। 108वाँ नाम 'दुर्गापरमेश्वर्यै नमः' है, जो यह सिद्ध करता है कि वे ही इस ब्रह्मांड की सर्वोच्च ईश्वरी (Supreme Goddess) हैं।
नामावली का आध्यात्मिक और ब्रह्मांडीय स्वरूप (Spiritual & Cosmic Significance)
यह नामावली साधक को सगुण रूप (Form) से निर्गुण निराकार (Formless) तक की यात्रा कराती है। इसमें देवी के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्वरूपों का वर्णन है।
- विष्णु और शिव की एकात्मकता: नाम 34 — 'पद्मनाभसहोदर्यै नमः' का अर्थ है पद्मनाभ (भगवान विष्णु) की सगी बहन। यह नाम हरि (विष्णु) और हर (शिव) के बीच के परम प्रेम और संबंध को दर्शाता है। देवी दुर्गा ही योगमाया के रूप में भगवान कृष्ण (विष्णु) की बहन बनकर अवतरित हुई थीं।
- त्रिगुणात्मक और निर्गुण स्वरूप: 'त्रिगुणायै' (सत्त्व, रज और तम से युक्त) और ठीक उसके बाद 'निर्गुणायै' (तीनों गुणों से परे) नाम यह बताते हैं कि जो देवी सृष्टि के संचालन के लिए माया (त्रिगुण) का रूप लेती हैं, वे ही अपने मूल स्वरूप में परम शांत और निराकार हैं। 'निर्विकल्पायै' और 'निरंजिन्यै' नाम इसी परम शून्यता और अद्वैत स्थिति के सूचक हैं।
- कुण्डलिनी शक्ति: 'कुण्डल्यै', 'सूक्ष्मायै' और 'मनोन्मन्यै' जैसे नाम योग और तंत्र के हैं। मनोन्मनी वह उच्च अवस्था है जहाँ मन शांत होकर आत्मा में लीन हो जाता है और कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होकर सहस्रार चक्र तक पहुँच जाती है।
- प्रकृति और वनस्पति की रक्षा: 'शांकभर्यै' (शाकम्भरी) नाम उस अवतार का स्मरण कराता है जब पृथ्वी पर भयंकर अकाल पड़ा था और माता ने अपने शरीर से उत्पन्न शाक (सब्जियों और वनस्पतियों) से संपूर्ण संसार का भरण-पोषण किया था।
फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले सिद्ध लाभ (Benefits of Recitation)
यह नामावली अपने आप में एक कल्पवृक्ष है। 'श्रियै नमः' से आरम्भ होने के कारण यह मुख्य रूप से दरिद्रता का नाश और ऐश्वर्य प्रदान करने वाली मानी जाती है। इसके नित्य पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- दरिद्रता का समूल नाश और अपार धन प्राप्ति: 'श्रियै', 'कमलायै' और 'महालक्ष्म्यै' नामों के प्रभाव से साधक के घर में कभी भी आर्थिक तंगी नहीं रहती। व्यापार में वृद्धि होती है और घर में अखंड सौभाग्य व धन-धान्य का वास होता है।
- ज्ञान, विद्या और वाकसिद्धि: 'भारत्यै', 'वाण्यै', 'सरस्वत्यै' और 'वागीश्वर्यै' नामों के नित्य जप से विद्यार्थियों को कुशाग्र बुद्धि मिलती है और साधक की वाणी सिद्ध हो जाती है (अर्थात् वह जो बोलता है, वह सत्य होने लगता है)।
- शत्रु और नकारात्मकता पर विजय: 'विजयायै', 'जयायै', 'चण्ड्यै' और 'क्रव्यादोप निबर्हिण्यै' (मांसभक्षी राक्षसों का नाश करने वाली) नामों से बड़े से बड़े शत्रु, मुकदमों और तांत्रिक अभिचारों (Black Magic) का नाश हो जाता है।
- आंतरिक शांति और मानसिक बल: 'सत्यायै', 'सत्यज्ञानायै' और 'तमोपहायै' (अंधकार/अज्ञान को हरने वाली) नामों के जप से डिप्रेशन, मानसिक तनाव और अनजाना भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
- अखंड सुहाग और पारिवारिक सुख: 'सुमंगल्यै', 'कान्तायै' और 'मदनसुन्दर्यै' नामों के स्मरण से पति-पत्नी के बीच प्रेम बढ़ता है और महिलाओं को अखंड सुहाग का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पाठ विधि एवं अनुष्ठान के नियम (Ritual Method & Guidelines)
इस नामावली की साधना अत्यंत सात्विक और सरल है। चूँकि इसमें माँ लक्ष्मी का भी आवाहन है, इसलिए स्वच्छता और श्रद्धा का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
दैनिक पाठ विधि:
प्रातःकाल या गोधूलि वेला (शाम) में स्नानादि से निवृत्त होकर लाल या पीले आसन पर बैठें। माँ दुर्गा परमेश्वरी या श्रीयंत्र स्थापित करें। गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। हाथ में जल लेकर संकल्प करें और फिर पूर्ण भक्ति भाव से 'ॐ' और 'नमः' के साथ 108 नामों का पाठ करें।
कमलगट्टे और पुष्प अर्पण:
यदि किसी विशेष मनोकामना (विशेषकर धन प्राप्ति) के लिए पाठ कर रहे हैं, तो प्रत्येक नाम के साथ कमलगट्टे का बीज (Lotus Seed) या लाल गुलाब/कमल का पुष्प देवी के चरणों में अर्पित करें। यह प्रयोग 'कमलायै' और 'महालक्ष्म्यै' की कृपा को त्वरित आकर्षित करता है।
विशेष मुहूर्त (Auspicious Occasions):
यह पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है, परंतु शुक्रवार (महालक्ष्मी और त्रिपुरसुन्दरी का दिन), मंगलवार (दुर्गा का दिन), तथा नवरात्रि के नौ दिन इस अनुष्ठान के लिए सर्वाधिक फलदायी माने गए हैं। दीपावली की रात्रि में इस नामावली का पाठ अचूक धनदायक होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. इस नामावली का 'ॐ श्रियै नमः' से आरंभ होने का क्या रहस्य है?
'श्री' का अर्थ है लक्ष्मी, ऐश्वर्य और शुभता। यह दर्शाता है कि माँ दुर्गा संहारक शक्ति होने के साथ-साथ परम कल्याणकारी और धन-धान्य प्रदान करने वाली आद्या महालक्ष्मी भी हैं।
2. क्या इस पाठ को धन प्राप्ति (आर्थिक उन्नति) के लिए किया जा सकता है?
जी हाँ, बिल्कुल। इसमें 'श्रियै', 'कमलायै', 'महालक्ष्म्यै', और 'पद्मावत्यै' जैसे अनेक नाम हैं जो साक्षात् माता लक्ष्मी के हैं। आर्थिक संकट दूर करने के लिए यह एक अत्यंत प्रभावशाली पाठ है।
3. 'पद्मनाभसहोदर्यै' का क्या अर्थ है?
पद्मनाभ भगवान विष्णु का नाम है, और सहोदरी का अर्थ है सगी बहन। माता पार्वती (दुर्गा) योगमाया के रूप में भगवान विष्णु (कृष्ण) की बहन के रूप में अवतरित हुई थीं। यह नाम हरि और हर के एकीकरण का प्रतीक है।
4. इस नामावली में महाविद्याओं के नाम (तारा, मातंगी) क्यों शामिल हैं?
तंत्र शास्त्र के अनुसार, समस्त दशमहाविद्याएं उसी एक आद्या शक्ति (दुर्गा) के ही विभिन्न स्वरूप हैं। उनके ये नाम सिद्ध करते हैं कि दुर्गा परमेश्वरी ही समस्त विद्याओं का मूल स्रोत हैं।
5. 'त्रिशक्त्यै' शब्द का इस संदर्भ में क्या अर्थ है?
त्रिशक्ति का अर्थ है तीन महाशक्तियां — महासरस्वती (सृष्टि-ज्ञान), महालक्ष्मी (पालन-ऐश्वर्य), और महाकाली (संहार-पराक्रम)। देवी दुर्गा इन तीनों शक्तियों का एकीकृत (Combined) महास्वरूप हैं।
6. क्या पुरुष और महिलाएँ दोनों इस नामावली का पाठ कर सकते हैं?
हाँ, सनातन धर्म में माता की उपासना का अधिकार हर जीव को है। पूर्ण श्रद्धा, पवित्रता और सात्विक भाव से पुरुष, महिलाएँ, और विद्यार्थी सभी इसका पाठ कर सकते हैं।
7. अंतिम नाम 'दुर्गापरमेश्वर्यै नमः' का क्या महत्व है?
परमेश्वरी का अर्थ है 'सर्वोच्च ईश्वरी'। 108वें स्थान पर यह नाम इस बात की पुष्टि करता है कि ब्रह्मांड में देवी से ऊपर कोई सत्ता नहीं है; वे ही परमब्रह्म स्वरूपिणी हैं।
8. पाठ करते समय माता को कौन से पुष्प अर्पित करने चाहिए?
इस नामावली (विशेषकर लक्ष्मी स्वरूप) के लिए कमल का फूल (Lotus) और लाल गुलाब सबसे अधिक शुभ और देवी को प्रिय माने गए हैं।
9. 'शांकभर्यै' (शाकम्भरी) अवतार का क्या महत्व है?
जब भयंकर अकाल पड़ा था, तब माता ने सौ नेत्रों से जल बरसाया और अपने शरीर से उत्पन्न वनस्पतियों (शाक) से संसार की भूख मिटाई थी। यह देवी का परम करुणामयी और अन्नपूर्णा स्वरूप है।
10. क्या इसे नवरात्रि में करना विशेष फलदायी है?
अवश्य। नवरात्रि के नौ दिन शक्ति उपासना का सर्वश्रेष्ठ समय होते हैं। इन दिनों में इस नामावली से अर्चन (पुष्प चढ़ाना) या हवन करने से कोटि गुना पुण्य प्राप्त होता है।