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Sri Rudra Chandi Stotram – श्री रुद्रचण्डी स्तोत्रम् | Rudra Yamala Tantra

Sri Rudra Chandi Stotram – श्री रुद्रचण्डी स्तोत्रम् | Rudra Yamala Tantra
॥ श्री रुद्रचण्डी स्तोत्रम् ॥ ॥ ध्यानम् ॥ रक्तवर्णां महादेवी लसच्चन्द्रविभूषितां पट्‍टवस्त्रपरीधानां स्वर्णालङ्कारभूषितम् । वराभयकरां देवीं मुण्डमालाविभूषितां कोटिचन्द्रसमासीनां वदनैः शोभितां पराम् ॥ करालवदनां देवीं किञ्चिजिह्वां च लोलितां स्वर्णवर्णमहादेवहृदयोपरिसंस्थिताम् । अक्षमालाधरां देवीं जपकर्मसमाहितां वाञ्छितार्थप्रदायिनीं रुद्रचण्डीमहं भजे ॥ ॥ श्रीशङ्कर उवाच ॥ चण्डिका हृदयं न्यस्य शरणं यः करोत्यपि । अनन्तफलमाप्नोति देवी चण्डीप्रसादतः ॥ १ ॥ घोरचण्डी महाचण्डी चण्डमुण्डविखण्डिनी । चतुर्वक्त्रा महावीर्या महादेवविभूषिता ॥ २ ॥ रक्तदन्ता वरारोहा महिषासुरमर्दिनी । तारिणी जननी दुर्गा चण्डिका चण्डविक्रमा ॥ ३ ॥ गुह्यकाली जगद्धात्री चण्डी च यामलोद्भवा । श्मशानवासिनी देवी घोरचण्डी भयानका ॥ ४ ॥ शिवा घोरा रुद्रचण्डी महेशी गणभूषिता । जाह्नवी परमा कृष्णा महात्रिपुरसुन्दरी ॥ ५ ॥ श्रीविद्या परमाविद्या चण्डिका वैरिमर्दिनी । दुर्गा दुर्गशिवा घोरा चण्डहस्ता प्रचण्डिका ॥ ६ ॥ माहेशी बगला देवी भैरवी चण्डविक्रमा । प्रमथैर्भूषिता कृष्णा चामुण्डा मुण्डमर्दिनी ॥ ७ ॥ रणखण्डा चन्द्रघण्टा रणे रामवरप्रदा । मारणी भद्रकाली च शिवा घोरभयानका ॥ ८ ॥ विष्णुप्रिया महामाया नन्दगोपगृहोद्भवा । मङ्गला जननी चण्डी महाक्रुद्धा भयङ्करी ॥ ९ ॥ विमला भैरवी निद्रा जातिरूपा मनोहरा । तृष्णा निद्रा क्षुधा माया शक्तिर्मायामनोहरा ॥ १० ॥ तस्यै देव्यै नमो या वै सर्वरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ११ ॥ ॥ फलाश्रुति (Benefits) ॥ इमां चण्डी जगद्धात्रीं ब्राह्मणस्तु सदा पठेत् । नान्यस्तु सम्पठेद्देवि पठने ब्रह्महा भवेत् ॥ १२ ॥ यः शृणोति धरायां च मुच्यते सर्वपातकैः । ब्रह्महत्या च गोहत्या स्त्रीवधोद्भवपातकम् ॥ १३ ॥ श्वश्रूगमनपापं च कन्यागमनपातकम् । तत्सर्वं पातकं दुर्गे मातुर्गमनपातकम् ॥ १४ ॥ सुतस्त्रीगमनं चैव यद्यत्पापं प्रजायते । परदारकृतं पापं तत् क्षणादेव नश्यति ॥ १५ ॥ जन्मजन्मान्तरात्पापाद्गुरुहत्यादिपातकात् । मुच्यते मुच्यते देवि गुरुपत्नीसुसङ्गमात् ॥ १६ ॥ मनसा वचसा पापं यत्पापं ब्रह्महिंसने । मिथ्याजन्यं च यत्पापं तत्पापं नश्यति क्षणात् ॥ १७ ॥ श्रवणं पठनं चैव यः करोति धरातले । स धन्यश्च कृतार्थश्च राजा राजाधिपो भवेत् ॥ १८ ॥ रविवारे यदा चण्डी पठेदागमसम्मताम् । नवावृत्तिफलं तस्य जायते नात्र संशयः ॥ १९ ॥ सोमवारे यदा चण्डी पठेद्यस्तु समाहितः । सहस्रावृत्तिपाठस्य फलं जानीहि सुव्रत ॥ २० ॥ कुजवारे जगद्धात्रीं पठेदागमसम्मताम् । शतावृत्तिफलं तस्य बुधे लक्षफलं ध्रुवम् ॥ २१ ॥ गुरौ यदि महामाये लक्षयुग्मफलं ध्रुवम् । शुक्रे देवि जगद्धात्रि चण्डीपाठेन शाङ्करी ॥ २२ ॥ ज्ञेयं तुल्यफलं दुर्गे यदि चण्डीसमाहितः । शनिवारे जगद्धात्रि कोट्यावृत्तिफलं ध्रुवम् ॥ २३ ॥ अत एव महेशानि यो वै चण्डी समभ्यसेत् । स सद्यश्च कृतार्थः स्याद्राजराजाधिपो भवेत् ॥ २४ ॥ आरोग्यं विजयं सौख्यं वस्त्ररत्नप्रवालकम् । पठनाच्छ्रवणाच्चैव जायते नात्र संशयः ॥ २५ ॥ धनं धान्यं प्रवालं च वस्त्रं रत्नविभूषणम् । चण्डीश्रवणमात्रेण कुर्यात्सर्वं महेश्वरी ॥ २६ ॥ यः करिष्यत्वविज्ञाय रुद्रयामलचण्डिकाम् । पापैरेतैः समायुक्तो रौरवं नरकं व्रजेत् ॥ २७ ॥ अश्रद्धया च कुर्वन्ति ते च पातकिनो नराः । रौरवं नरकं कुण्डं कृमिकुण्डं मलस्य वै ॥ २८ ॥ शुक्रस्य कुण्डं स्त्रीकुण्डं यान्ति ते ह्यचिरेण वै । ततः पितृगणैः सार्धं विष्ठायां जायते कृमिः ॥ २९ ॥ शृणु देवि महामाये चण्डीपाठं करोति यः । गङ्गायां चैव यत्पुण्यं काश्यां विश्वेश्वराग्रतः ॥ ३० ॥ प्रयागे मुण्डने चैव हरिद्वारे हरेर्गृहे । तस्य पुण्यं भवेद्देवि सत्यं दुर्गे रमे शिवे ॥ ३१ ॥ त्रिगयायां त्रिकाश्यां वै यच्च पुण्यं समुत्थितम् । तच्च पुण्यं तच्च पुण्यं तच्च पुण्यं न संशयः ॥ ३२ ॥ अन्यच्च – भवानी च भवानी च भवानी चोच्यते बुधैः । भकारस्तु भकारस्तु भकारः केवलः शिवः ॥ ३३ ॥ वाणी चैव जगद्धात्री वरारोहे भकारकः । प्रेतवद्देवि विश्वेशि भकारः प्रेतवत्सदा ॥ ३४ ॥ आरोग्यं च जयं पुण्यं नातः सुखविवर्धनम् । धनं पुत्र जरारोग्यं कुष्ठं गलितनाशनम् ॥ ३५ ॥ अर्धाङ्गरोगान्मुच्येत दद्रुरोगाच्च पार्वति । सत्यं सत्यं जगद्धात्रि महामाये शिवे शिवे ॥ ३६ ॥ चण्डे चण्डि महारावे चण्डिका व्याधिनाशिनी । मन्दे दिने महेशानि विशेषफलदायिनी ॥ ३७ ॥ सर्वदुःखादिमुच्यते भक्त्या चण्डी शृणोति यः । ब्राह्मणो हितकारी च पठेन्नियतमानसः ॥ ३८ ॥ मङ्गलं मङ्गलं ज्ञेयं मङ्गलं जयमङ्गलम् । भवेद्धि पुत्रपौत्रैश्च कन्यादासादिभिर्युतः ॥ ३९ ॥ तत्त्वज्ञानेन निधनकाले निर्वाणमाप्नुयात् । मणिदानोद्भवं पुण्यं तुलाहिरण्यके तथा ॥ ४० ॥ चण्डीश्रवणमात्रेण पठनाद्ब्राह्मणोऽपि च । निर्वाणमेति देवेशि महास्वस्त्ययने हितः ॥ ४१ ॥ सर्वत्र विजयं याति श्रवणाद्ग्रहदोषतः । मुच्यते च जगद्धात्रि राजराजाधिपो भवेत् ॥ ४२ ॥ महाचण्डी शिवा घोरा महाभीमा भयानका । काञ्चनी कमला विद्या महारोगविमर्दिनी ॥ ४३ ॥ गुह्यचण्डी घोरचण्डी चण्डी त्रैलोक्यदुर्लभा । देवानां दुर्लभा चण्डी रुद्रयामलसम्मता ॥ ४४ ॥ अप्रकाश्या महादेवी प्रिया रावणमर्दिनी । मत्स्यप्रिया मांसरता मत्स्यमांसबलिप्रिया ॥ ४५ ॥ मदमत्ता महानित्या भूतप्रमथसङ्गता । महाभागा महारामा धान्यदा धनरत्नदा ॥ ४६ ॥ वस्त्रदा मणिराज्यादिसदाविषयवर्धिनी । मुक्तिदा सर्वदा चण्डी महापत्तिविनाशिनी ॥ ४७ ॥ इमां हि चण्डीं पठते मनुष्यः शृणोति भक्त्या परमां शिवस्य । चण्डीं धरण्यामतिपुण्ययुक्तां स वै न गच्छेत्परमन्दिरं किल ॥ ४८ ॥ जप्यं मनोरथं दुर्गे तनोति धरणीतले । रुद्रचण्डीप्रसादेन किं न सिद्ध्यति भूतले ॥ ४९ ॥ अन्यच्च – रुद्रध्येया रुद्ररूपा रुद्राणी रुद्रवल्लभा । रुद्रशक्ती रुद्ररूपा रुद्राननसमन्विता ॥ ५० ॥ शिवचण्डी महाचण्डी शिवप्रेतगणान्विता । भैरवी परमा विद्या महाविद्या च षोडशी ॥ ५१ ॥ सुन्दरी परमा पूज्या महात्रिपुरसुन्दरी । गुह्यकाली भद्रकाली महाकालविमर्दिनी ॥ ५२ ॥ कृष्णा तृष्णा स्वरूपा सा जगन्मोहनकारिणी । अतिमात्रा महालज्जा सर्वमङ्गलदायिनि ॥ ५३ ॥ घोरतन्द्री भीमरूपा भीमा देवी मनोहरा । मङ्गला बगला सिद्धिदायिनी सर्वदा शिवा ॥ ५४ ॥ स्मृतिरूपा कीर्तिरूपा योगीन्द्रैरपि सेविता । भयानका महादेवी भयदुःखविनाशिनी ॥ ५५ ॥ चण्डिका शक्तिहस्ता च कौमारी सर्वकामदा । वाराही च वराहास्या इन्द्राणी शक्रपूजिता ॥ ५६ ॥ माहेश्वरी महेशस्य महेशगणभूषिता । चामुण्डा नारसिंही च नृसिंहरिपुमर्दिनी ॥ ५७ ॥ सर्वशत्रुप्रशमनी सर्वारोग्यप्रदायिनी । इति सत्यं महादेवि सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ५८ ॥ नैव शोको नैव रोगो नैव दुःखं भयं तथा । आरोग्यं मङ्गलं नित्यं करोति शुभमङ्गलम् ॥ ५९ ॥ महेशानि वरारोहे ब्रवीमि सदिदं वचः । अभक्ताय न दातव्यं मम प्राणाधिकं शुभम् ॥ ६० ॥ तव भक्त्या प्रशान्ताय शिवविष्णुप्रियाय च । दद्यात्कदाचिद्देवेशि सत्यं सत्यं महेश्वरि ॥ ६१ ॥ अनन्तफलमाप्नोति शिवचण्डीप्रसादतः । अश्वमेधं वाजपेयं राजसूयशतानि च ॥ ६२ ॥ तुष्टाश्च पितरो देवास्तथा च सर्वदेवताः । दुर्गेयं मृन्मयी ज्ञानं रुद्रयामलपुस्तकम् ॥ ६३ ॥ मन्त्रमक्षरसञ्ज्ञानं करोत्यपि नराधमः । अत एव महेशानि किं वक्ष्ये तव सन्निधौ ॥ ६४ ॥ लम्बोदराधिकश्चण्डीपठनाच्छ्रवणात्तु यः । तत्त्वमस्यादिवाक्येन मुक्तिमाप्नोति दुर्लभाम् ॥ ६५ ॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले देवीश्वरसंवादे श्री रुद्रचण्डी स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

रुद्रचण्डी स्तोत्र का महत्व

'रुद्रयामल तंत्र' (Rudra Yamala Tantra) हिंदुओं के सबसे प्रामाणिक और शक्तिशाली तंत्र ग्रंथों में से एक है। इसमें भगवान शिव (रुद्र) और देवी (शक्ति) के संवाद के रूप में अनेक रहस्यमयी साधनाएं दी गई हैं। 'रुद्रचण्डी स्तोत्र' उसी का एक अद्भुत रत्न है।

इसमें शिव कहते हैं - "चण्डिका हृदयं न्यस्य शरणं यः करोत्यपि" (श्लोक 1)। अर्थात, जो देवी चण्डी को हृदय में धारण कर उनकी शरण में जाता है, उसे अनंत फल मिलता है। यह स्तोत्र मोक्ष और भोग दोनों प्रदान करने वाला है।

स्तोत्र के प्रमुख भाव (Key Aspects)

1. रुद्रचण्डी (Rudra Chandi)

देवी का यह रूप 'रुद्र' (शिव के संहारक रूप) की शक्ति है। वह घोर (Fierce) होते हुए भी अपने भक्तों के लिए 'शिवा' (कल्याणकारी) हैं। श्लोक 5 में कहा गया है - "शिवा घोरा रुद्रचण्डी महेशी गणभूषिता"

2. पाप नाश (Removal of Sins)

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता 'पाप-नाश' है। श्लोक 13-17 में विस्तार से बताया गया है कि ब्रह्महत्या, गोहत्या और अन्य जघन्य पाप भी इसके श्रवण/पठन से नष्ट हो जाते हैं (प्रायश्चित के रूप में)।

3. वाराही और नारसिंही रूप

श्लोक 56-57 में देवी को वाराही (Varahi) और नारसिंही (Narasimhi) कहा गया है, जो मातृका (Matrika) शक्तियां हैं और शत्रुओं का नाश करती हैं।

पाठ के लाभ (Benefits)

मोक्ष की प्राप्ति

अंतिम श्लोक (65) में कहा गया है कि साधक को 'तत्वमसि' आदि महावाक्यों का ज्ञान होकर दुर्लभ मोक्ष प्राप्त होता है।

शत्रु/रोग विजय

यह 'सर्वशत्रुप्रशमनी' (शत्रुओं को शांत करने वाली) और 'सर्वारोग्यप्रदायिनी' (आरोग्य देने वाली) है। कुष्ठ जैसे रोग भी इससे ठीक होते हैं।

राजा के समान वैभव

बार-बार कहा गया है कि इसका पाठ करने वाला 'राजराजाधिपो भवेत्' (राजाओं का भी राजा बनता है)। धन, धान्य और रत्न की कोई कमी नहीं रहती।

तीर्थों का पुण्य

गंगा, काशी, प्रयाग और गया में स्नान/दान करने से जो पुण्य मिलता है, वह केवल इस स्तोत्र को सुनने से मिल जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. रुद्रचण्डी स्तोत्र क्या है?

यह 'रुद्रयामल तंत्र' (Rudra Yamala Tantra) का एक भाग है, जिसमें भगवान शंकर ने देवी के 'चण्डी' स्वरूप की स्तुति की है जो शिव और शक्ति के अभेद (Non-dual) रूप को दर्शाता है।

2. इसके पाठ का क्या फल है?

इसके पाठ से ब्रह्महत्या और गुरुहत्या जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं। यह शत्रुओं का शमन, रोगों का नाश और अंत में मोक्ष प्रदान करता है।

3. रुद्रचण्डी और सामान्य चण्डी पाठ में क्या अंतर है?

सप्तशती का चण्डी पाठ विस्तृत है (700 श्लोक), जबकि यह संक्षिप्त (65 श्लोक) तन्त्रोक्त स्तुति है जो विशेष रूप से शिव-शक्ति की एकात्मता पर केंद्रित है।

4. क्या इसे घर पर पढ़ा जा सकता है?

हाँ, इसे नित्य पूजा में शामिल किया जा सकता है। विशेष रूप से नवरात्रि, अष्टमी और चतुर्दशी को इसका पाठ करना सिद्धियों को देने वाला माना गया है।

5. किस दिन इसका पाठ विशेष फलदायी है?

फलाश्रुति के अनुसार, रविवार (9 आवृत्ति), सोमवार (1000 आवृत्ति), मंगलवार (100 आवृत्ति) और शनिवार (1 करोड़ आवृत्ति - सिद्धि के लिए) का विशेष महत्व बताया गया है।

6. 'रौरव नरक' से मुक्ति का क्या संदर्भ है?

स्तोत्र में चेतावनी दी गई है कि जो इसे बिना श्रद्धा या अशुद्ध भावना से करता है, उसे पाप लगता है। लेकिन श्रद्धापूर्वक पाठ करने वाला सभी नरकों से मुक्त हो जाता है।