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श्री दुर्गा अष्टोत्तर शतनामावली १ (विश्वसार तंत्र) – Sri Durga Ashtottara Shatanamavali 1

श्री दुर्गा अष्टोत्तर शतनामावली १ (विश्वसार तंत्र) – Sri Durga Ashtottara Shatanamavali 1
॥ श्री दुर्गा अष्टोत्तर शतनामावली (विश्वसारतंत्रोक्तम्) ॥ ओं सत्यै नमः । ओं साध्व्यै नमः । ओं भवप्रीतायै नमः । ओं भवान्यै नमः । ओं भवमोचन्यै नमः । ओं आर्यायै नमः । ओं दुर्गायै नमः । ओं जयायै नमः । ओं आद्यायै नमः । ९ ओं त्रिनेत्रायै नमः । ओं शूलधारिण्यै नमः । ओं पिनाकधारिण्यै नमः । ओं चित्रायै नमः । ओं चन्द्रघण्टायै नमः । ओं महातपायै नमः । ओं मनसे नमः । ओं बुद्ध्यै नमः । ओं अहङ्कारायै नमः । १८ ओं चित्तरूपायै नमः । ओं चितायै नमः । ओं चित्यै नमः । ओं सर्वमन्त्रमय्यै नमः । ओं सत्यायै नमः । ओं सत्यानन्दस्वरूपिण्यै नमः । ओं अनन्तायै नमः । ओं भाविन्यै नमः । ओं भाव्यायै नमः । २७ ओं भवायै नमः । ओं भव्यायै नमः । ओं सदागत्यै नमः । ओं शम्भुपत्न्यै नमः । ओं देवमात्रे नमः । ओं चिन्तायै नमः । ओं सदा रत्नप्रियायै नमः । ओं सर्वविद्यायै नमः । ओं दक्षकन्यायै नमः । ३६ ओं दक्षयज्ञविनाशिन्यै नमः । ओं अपर्णायै नमः । ओं पर्णायै नमः । ओं पाटलायै नमः । ओं पाटलावत्यै नमः । ओं पट्‍टाम्बरपरीधानायै नमः । ओं कलमञ्जीररञ्जिन्यै नमः । ओं अमेयायै नमः । ओं विक्रमायै नमः । ४५ ओं क्रूरायै नमः । ओं सुन्दर्यै नमः । ओं सुरसुन्दर्यै नमः । ओं वनदुर्गायै नमः । ओं मातङ्ग्यै नमः । ओं मतङ्गमुनिपूजितायै नमः । ओं ब्राह्म्यै नमः । ओं माहेश्वर्यै नमः । ओं ऐन्द्र्यै नमः । ५४ ओं कौमार्यै नमः । ओं वैष्णव्यै नमः । ओं चामुण्डायै नमः । ओं वाराह्यै नमः । ओं लक्ष्म्यै नमः । ओं पुरुषाकृत्यै नमः । ओं विमलायै नमः । ओं उत्कर्षिण्यै नमः । ओं ज्ञानक्रियायै नमः । ६३ ओं सत्यायै नमः । ओं वाक्प्रदायै नमः । ओं बहुलायै नमः । ओं बहुलप्रेमायै नमः । ओं सर्ववाहनवाहनायै नमः । ओं निशुम्भशुम्भहनन्यै नमः । ओं महिषासुरमर्दिन्यै नमः । ओं मधुकैटभहन्त्र्यै नमः । ओं चण्डमुण्डविनाशिन्यै नमः । ७२ ओं सर्वासुरविनाशायै नमः । ओं सर्वदानवघातिन्यै नमः । ओं सर्वशास्त्रमय्यै नमः । ओं विद्यायै नमः । ओं सर्वास्त्रधारिण्यै नमः । ओं अनेकशस्त्रहस्तायै नमः । ओं अनेकास्त्रविधारिण्यै नमः । ओं कुमार्यै नमः । ओं कन्यायै नमः । ८१ ओं कौमार्यै नमः । ओं युवत्यै नमः । ओं यत्यै नमः । ओं अप्रौढायै नमः । ओं प्रौढायै नमः । ओं वृद्धमात्रे नमः । ओं बलप्रदायै नमः । ओं श्रद्धायै नमः । ओं शान्त्यै नमः । ९० ओं धृत्यै नमः । ओं कान्त्यै नमः । ओं लक्ष्म्यै नमः । ओं जात्यै नमः । ओं स्मृत्यै नमः । ओं दयायै नमः । ओं तुष्ट्यै नमः । ओं पुष्ट्यै नमः । ओं चित्त्यै नमः । ९९ ओं भ्रान्त्यै नमः । ओं मात्रे नमः । ओं क्षुधे नमः । ओं चेतनायै नमः । ओं मत्यै नमः । ओं विष्णुमायायै नमः । ओं निद्रायै नमः । ओं छायायै नमः । ओं कामप्रपूरण्यै नमः । १०८ ॥ इति श्री विश्वसारतन्त्रोक्त श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णम् ॥

श्री दुर्गा अष्टोत्तर शतनामावली: एक विस्तृत परिचय (Introduction)

श्री दुर्गा अष्टोत्तर शतनामावली (Sri Durga Ashtottara Shatanamavali) माँ भगवती दुर्गा के उन १०८ नामों का दिव्य संकलन है, जो उनके अनंत स्वरूपों और शक्तियों की व्याख्या करते हैं। यह नामावली विशेष रूप से प्रसिद्ध तांत्रिक ग्रंथ 'विश्वसार तंत्र' (Vishvasara Tantra) से ली गई है। सनातन परंपरा में १०८ की संख्या अत्यंत पवित्र मानी गई है, जो ब्रह्मांडीय चेतना और मानवीय सूक्ष्म शरीर के १०८ ऊर्जा केंद्रों (नाड़ियों) के बीच सामंजस्य का प्रतीक है।
नामावली और स्तोत्र में अंतर: जहाँ स्तोत्र का पाठ लयबद्ध तरीके से काव्यात्मक रूप में किया जाता है, वहीं नामावली का प्रत्येक नाम स्वतंत्र होता है (जैसे 'ओं दुर्गायै नमः')। नामावली का मुख्य उपयोग 'अर्चना' (Archana) पद्धति में होता है। अर्चना के दौरान साधक प्रत्येक नाम का उच्चारण करते हुए माँ की मूर्ति या श्री यंत्र पर रक्त-चंदन, लाल पुष्प, अक्षत या कुमकुम अर्पित करता है। यह क्रिया साधक की एकाग्रता को बढ़ाती है और उसके भीतर माँ की शक्ति का संचार करती है।
विश्वसार तंत्र का संदर्भ: विश्वसार तंत्र के अनुसार, भगवान शिव ने स्वयं इन नामों का उपदेश दिया है। इस नामावली में माँ के शांत (जैसे 'साध्वी', 'सत्या') और उग्र (जैसे 'क्रूरा', 'चण्डमुण्डविनाशिनी') दोनों पक्षों का अद्भुत चित्रण है। यह नामावली साधक को यह बोध कराती है कि माँ दुर्गा ही इस सृष्टि का सृजन, पालन और संहार करने वाली मूल शक्ति हैं।
दार्शनिक आधार: नामावली का प्रारंभ 'सत्यै' और 'साध्व्यै' नामों से होता है, जो देवी के नैतिक और शुद्ध स्वरूप को दर्शाता है। आगे चलकर इसमें 'बुद्ध्यै' (बुद्धि), 'अहङ्कारायै' (अहंकार) और 'चित्तरूपायै' (चित्त) जैसे नाम आते हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि हमारी बुद्धि और मन भी माँ के ही सूक्ष्म रूप हैं। अतः इस नामावली का पाठ मानसिक विकारों को दूर करने का एक उत्कृष्ट मनोवैज्ञानिक उपचार भी है।

नामावली का विशिष्ट महत्व एवं प्रतीकवाद (Significance)

माँ दुर्गा के १०८ नामों का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और तांत्रिक भी है। प्रत्येक नाम एक विशेष 'बीज' शक्ति को धारण करता है। उदाहरण के लिए, 'भवमोचनी' नाम का अर्थ है संसार (भव) के बंधनों से मुक्त करने वाली। जो साधक इस नाम से अर्चना करता है, वह धीरे-धीरे मोह-माया के जाल से बाहर निकलने लगता है।
शक्ति का एकीकरण: इस नामावली में माँ के विभिन्न अवतारों और शक्तियों का समावेश है, जैसे सप्तमातृकाएँ (ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, ऐन्द्री और चामुण्डा)। इनका नमन करने से साधक को सभी मातृ-शक्तियों का सामूहिक आशीर्वाद प्राप्त होता है। 'शूलधारिणी' और 'पिनाकधारिणी' नाम माँ के अजेय स्वरूप को दर्शाते हैं, जो शत्रुओं और बुरी शक्तियों का दमन करती हैं।

अष्टोत्तर शतनामावली पाठ के लाभ — फलश्रुति (Benefits)

माँ दुर्गा की अर्चना और नामावली पाठ से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • शारीरिक और मानसिक शक्ति: 'बलप्रदायै' (बल देने वाली) नाम के प्रभाव से साधक को रोगों से मुक्ति और आंतरिक शक्ति मिलती है।
  • अखंड सौभाग्य: कुमकुम अर्चना द्वारा सुहागिन स्त्रियों को अखंड सौभाग्य और वैवाहिक सुख की प्राप्ति होती है।
  • भय और दरिद्रता का नाश: 'दारिद्र्यदुःखभयहारिणी' स्वरूप का ध्यान करने से आर्थिक तंगी और मानसिक भय दूर होते हैं।
  • ज्ञान और विवेक: 'ज्ञानक्रिया' और 'वाक्प्रदा' (वाणी देने वाली) नामों के उच्चारण से मेधा और बुद्धिमत्ता में वृद्धि होती है।
  • शत्रु पराजय: 'निशुम्भशुम्भहननी' और 'महिषासुरमर्दिनी' जैसे नामों का आह्वान साधक के शत्रुओं का दमन करता है।
  • कार्य सिद्धि: नवरात्रि में इस नामावली से अर्चना करने पर असंभव कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं।

अर्चना विधि एवं नियम (Ritual Method for Archana)

नामावली का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इसे 'अर्चना' के रूप में करना सर्वोत्तम है। यहाँ इसकी सटीक विधि दी गई है:

पूजा की तैयारी

  • समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय या संध्या वंदन के समय पाठ करना शुभ है। नवरात्रि, मंगलवार और शुक्रवार इसके लिए विशेष दिन हैं।
  • शुद्धि: स्नान के बाद लाल रंग के वस्त्र पहनना माँ दुर्गा को अत्यंत प्रिय है।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
  • सामग्री: एक थाली में लाल पुष्प (गुलाब या गुड़हल), कुमकुम, चावल (अक्षत) और जल रखें।

अर्चना की प्रक्रिया

  • संकल्प: हाथ में जल लेकर अपनी मनोकामना बोलें और उसे माँ के चरणों में अर्पित करें।
  • अर्पण: प्रत्येक नाम (जैसे— 'ओं दुर्गायै नमः') का उच्चारण करें और एक चुटकी कुमकुम या एक पुष्प माँ की मूर्ति या श्री यंत्र पर चढ़ाते जाएँ।
  • एकाग्रता: नाम बोलते समय माँ के उस विशेष स्वरूप का ध्यान करें।
  • समापन: १०८ नाम पूर्ण होने के बाद माँ की कपूर से आरती करें और क्षमा प्रार्थना करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. नामावली और स्तोत्र में क्या मुख्य अंतर है?

स्तोत्र छंदों और श्लोकों में बंधा होता है जिसे एक लय में पढ़ा जाता है। नामावली में नामों की सूची होती है जिसमें प्रत्येक नाम के साथ 'ॐ' और 'नमः' जुड़ा होता है, जिसका उपयोग विशेष रूप से अर्चना (अर्पण) के लिए किया जाता है।

2. इस नामावली का मूल स्रोत क्या है?

यह नामावली प्रसिद्ध तांत्रिक ग्रंथ 'विश्वसार तंत्र' (Vishvasara Tantra) से उद्धृत है। भगवान शिव ने इसे पार्वती जी को सुनाया था।

3. कुमकुम अर्चना (Kumkum Archana) क्या है और इसके क्या लाभ हैं?

जब प्रत्येक नाम के साथ माँ के चरणों या श्री यंत्र पर कुमकुम चढ़ाया जाता है, तो उसे कुमकुम अर्चना कहते हैं। यह सुहाग की रक्षा, समृद्धि और घर में शांति लाने के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रयोग माना जाता है।

4. क्या पुरुष भी इस नामावली का पाठ कर सकते हैं?

हाँ, माँ दुर्गा की भक्ति में लिंग का कोई भेदभाव नहीं है। पुरुष और स्त्रियाँ दोनों ही आत्मबल, सफलता और आध्यात्मिक प्रगति के लिए माँ की अर्चना कर सकते हैं।

5. 'भवमोचनी' (Bhavamochani) नाम का क्या अर्थ है?

'भव' का अर्थ है संसार या जन्म-मरण का चक्र, और 'मोचनी' का अर्थ है मुक्त करने वाली। अर्थात, जो संसार के कष्टों और बंधनों से मुक्ति प्रदान करे।

6. क्या बिना किसी सामग्री के भी नामावली का पाठ किया जा सकता है?

हाँ, यदि सामग्री उपलब्ध न हो, तो केवल मानसिक रूप से (मानस पूजा) नामों का उच्चारण करना भी उतना ही फलदायी है। भाव की प्रधानता सर्वोपरि है।

7. 'त्रिनेत्रा' (Trinetra) नाम का क्या रहस्य है?

माँ दुर्गा के तीन नेत्र सूर्य, चन्द्र और अग्नि के प्रतीक हैं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों को देखने वाली 'सर्वज्ञा' हैं।

8. 'अपर्णा' (Aparna) नाम माँ को कैसे प्राप्त हुआ?

भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए माँ ने इतनी कठोर तपस्या की थी कि उन्होंने पत्तों (पर्ण) का आहार भी छोड़ दिया था, इसलिए उन्हें 'अपर्णा' कहा जाता है।

9. 'क्रिया शक्ति' (Kriya Shakti) का क्या अर्थ है?

ब्रह्मांड में तीन शक्तियाँ हैं—इच्छा, ज्ञान और क्रिया। माँ दुर्गा ही वह 'क्रिया शक्ति' हैं जो किसी भी कार्य को संपन्न करने की ऊर्जा प्रदान करती हैं।

10. 'चन्द्रघण्टा' (Chandraghanta) नाम का क्या महत्व है?

जिनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है। इनके घंटे की ध्वनि मात्र से असुर और बुरी शक्तियाँ भाग खड़ी होती हैं। यह शांति और वीरता का प्रतीक है।