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Sri Bala Ashtottara Shatanamavali 2 – श्री बालाष्टोत्तरशतनामावली २

Sri Bala Ashtottara Shatanamavali 2 – श्री बालाष्टोत्तरशतनामावली २
ॐ श्रीबालायै नमः । ॐ श्रीमहादेव्यै नमः । ॐ श्रीमत्पञ्चासनेश्वर्यै नमः । ॐ शिववामाङ्गसम्भूतायै नमः । ॐ शिवमानसहंसिन्यै नमः । ॐ त्रिस्थायै नमः । ॐ त्रिनेत्रायै नमः । ॐ त्रिगुणायै नमः । ॐ त्रिमूर्तिवशवर्तिन्यै नमः । ९ ॐ त्रिजन्मपापसंहर्त्र्यै नमः । ॐ त्रियम्बककुटम्बिन्यै नमः । ॐ बालार्ककोटिसङ्काशायै नमः । ॐ नीलालकलसत्कचायै नमः । ॐ फालस्थहेमतिलकायै नमः । ॐ लोलमौक्तिकनासिकायै नमः । ॐ पूर्णचन्द्राननायै नमः । ॐ स्वर्णताटङ्कशोभितायै नमः । ॐ हरिणीनेत्रसाकारकरुणापूर्णलोचनायै नमः । १८ ॐ दाडिमीबीजरदनायै नमः । ॐ बिम्बोष्ठ्यै नमः । ॐ मन्दहासिन्यै नमः । ॐ शङ्खग्रीवायै नमः । ॐ चतुर्हस्तायै नमः । ॐ कुचपङ्कजकुड्मलायै नमः । ॐ ग्रैवेयाङ्गदमाङ्गल्यसूत्रशोभितकन्धरायै नमः । ॐ वटपत्रोदरायै नमः । ॐ निर्मलायै नमः । २७ ॐ घनमण्डितायै नमः । ॐ मन्दावलोकिन्यै नमः । ॐ मध्यायै नमः । ॐ कुसुम्भवदनोज्ज्वलायै नमः । ॐ तप्तकाञ्चनकान्त्याढ्यायै नमः । ॐ हेमभूषितविग्रहायै नमः । ॐ माणिक्यमुकुरादर्शजानुद्वयविराजितायै नमः । ॐ कामतूणीरजघनायै नमः । ॐ कामप्रेष्ठगतल्पगायै नमः । ३६ ॐ रक्ताब्जपादयुगलायै नमः । ॐ क्वणन्माणिक्यनूपुरायै नमः । ॐ वासवादिदिशानाथपूजिताङ्घ्रिसरोरुहायै नमः । ॐ वराभयस्फाटिकाक्षमालापुस्तकधारिण्यै नमः । ॐ स्वर्णकङ्कणज्वालाभकराङ्गुष्ठविराजितायै नमः । ॐ सर्वाभरणभूषाढ्यायै नमः । ॐ सर्वावयवसुन्दर्यै नमः । ॐ ऐङ्काररूपायै नमः । ॐ ऐङ्कार्यै नमः । ४५ ॐ ऐश्वर्यफलदायिन्यै नमः । ॐ क्लीङ्काररूपायै नमः । ॐ क्लीङ्कार्यै नमः । ॐ क्लुप्तब्रह्माण्डमण्डलायै नमः । ॐ सौःकाररूपायै नमः । ॐ सौःकार्यै नमः । ॐ सौन्दर्यगुणसम्युतायै नमः । ॐ सचामररतीन्द्राणीसव्यदक्षिणसेवितायै नमः । ॐ बिन्दुत्रिकोणषट्कोणवृत्ताष्टदलसम्युतायै नमः । ५४ ॐ सत्यादिलोकपालान्तदेव्यावरणसंवृतायै नमः । ॐ ओड्याणपीठनिलयायै नमः । ॐ ओजस्तेजःस्वरूपिण्यै नमः । ॐ अनङ्गपीठनिलयायै नमः । ॐ कामितार्थफलप्रदायै नमः । ॐ जालन्धरमहापीठायै नमः । ॐ जानकीनाथसोदर्यै नमः । ॐ पूर्णागिरिपीठगतायै नमः । ॐ पूर्णायुः सुप्रदायिन्यै नमः । ६३ ॐ मन्त्रमूर्त्यै नमः । ॐ महायोगायै नमः । ॐ महावेगायै नमः । ॐ महाबलायै नमः । ॐ महाबुद्ध्यै नमः । ॐ महासिद्ध्यै नमः । ॐ महादेवमनोहर्यै नमः । ॐ कीर्तियुक्तायै नमः । ॐ कीर्तिधरायै नमः । ७२ ॐ कीर्तिदायै नमः । ॐ कीर्तिवैभवायै नमः । ॐ व्याधिशैलव्यूहवज्रायै नमः । ॐ यमवृक्षकुठारिकायै नमः । ॐ वरमूर्तिगृहावासायै नमः । ॐ परमार्थस्वरूपिण्यै नमः । ॐ कृपानिधये नमः । ॐ कृपापूरायै नमः । ॐ कृतार्थफलदायिन्यै नमः । ८१ ॐ अष्टत्रिंशत्कलामूर्त्यै नमः । ॐ चतुःषष्टिकलात्मिकायै नमः । ॐ चतुरङ्गबलादात्र्यै नमः । ॐ बिन्दुनादस्वरूपिण्यै नमः । ॐ दशाब्दवयसोपेतायै नमः । ॐ दिविपूज्यायै नमः । ॐ शिवाभिधायै नमः । ॐ आगमारण्यमायूर्यै नमः । ॐ आदिमध्यान्तवर्जितायै नमः । ९० ॐ कदम्बवनसम्पन्नायै नमः । ॐ सर्वदोषविनाशिन्यै नमः । ॐ सामगानप्रियायै नमः । ॐ ध्येयायै नमः । ॐ ध्यानसिद्धाभिवन्दितायै नमः । ॐ ज्ञानमूर्त्यै नमः । ॐ ज्ञानरूपायै नमः । ॐ ज्ञानदायै नमः । ॐ भयसंहरायै नमः । ९९ ॐ तत्त्वज्ञानायै नमः । ॐ तत्त्वरूपायै नमः । ॐ तत्त्वमय्यै नमः । ॐ आश्रितावन्यै नमः । ॐ दीर्घायुर्विजयारोग्यपुत्रपौत्रप्रदायिन्यै नमः । ॐ मन्दस्मितमुखाम्भोजायै नमः । ॐ मङ्गलप्रदमङ्गलायै नमः । ॐ वरदाभयमुद्राढ्यायै नमः । ॐ बालात्रिपुरसुन्दर्यै नमः । १०८ इतर पश्यतु ।

परिचय: 108 नामों का रहस्य

श्री बालाष्टोत्तरशतनामावली २ (Sri Bala Ashtottara Shatanamavali 2) देवी बाला का वह दुर्लभ स्तोत्र है जो उनके १०८ विशिष्ट गुणों और शक्तियों का सार प्रस्तुत करता है। 'अष्टोत्तर' का अर्थ है १०८, और यह संख्या ब्रह्मांड की पूर्णता का प्रतीक है। सहस्रनाम (1000 नाम) का पाठ अत्यंत विस्तृत होता है और उसमें समय अधिक लगता है, परन्तु अष्टोत्तरशतनामावली एक संक्षिप्त और सुलभ मार्ग है, जो व्यस्त जीवनशैली में भी देवी की पूर्ण कृपा प्राप्त करने में सक्षम है।
यह नामावली विशेष रूप से बाला के सौन्दर्य (Beauty) और वात्सल्य (Compassion) पर केंद्रित है। इसमें वर्णित प्रत्येक नाम एक मंत्र है, जो साधक के अंतस और बाह्य जीवन, दोनों को प्रकाशित करता है।

नामों का विशिष्ट महत्व

इस नामावली के प्रत्येक नाम का अपना गहन अर्थ और प्रभाव है:

१. पाप नाशक शक्ति (Sin Destroyer):

नाम 'त्रिजन्मपापसंहर्त्र्यै' (22) स्पष्ट करता है कि बाला केवल इस जन्म के नहीं, बल्कि पिछले तीन जन्मों के संचित पापों को भी जला सकती हैं। यह शुद्धि की परम प्रक्रिया है।

२. अलौकिक सौन्दर्य (Divine Beauty):

नाम जैसे 'पूर्णचन्द्राननायै' (पूर्ण चाँद जैसा मुख), 'माणिक्यमुकुरादर्श' (माणिक्य दर्पण जैसे घुटने), और 'सर्वावयवसुन्दर्यै' (जिसके सभी अंग सुंदर हैं) साधक को शारीरिक और आत्मिक सौन्दर्य प्रदान करते हैं। यह 'कामकला' (Art of Attraction) की सिद्धि देता है।

३. ज्ञान और बुद्धि (Wisdom):

नाम 'महाबुद्ध्यै' (Great Intellect) और 'ज्ञानरूपायै' बताते हैं कि बाला स्वयं 'सरस्वती' का रूप हैं। जो साधक बुद्धि से कमजोर हैं या जिन्हें भूलने की समस्या है, उनके लिए ये नाम औषधि समान हैं।

४. अभय और वरदान:

'वरदाभयमुद्राढ्यायै' (129) नाम दर्शाता है कि बाला का एक हाथ वरदान देने की मुद्रा में है और दूसरा अभय (भय-मुक्ति) की मुद्रा में। वह अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करतीं।

फलश्रुति: पाठ के लाभ

श्रद्धापूर्वक इस अष्टोत्तरशतनामावली का पाठ करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • आकर्षण और वशीकरण (Attraction): बाला त्रिपुरसुन्दरी साक्षात् कामेश्वरी हैं। इनके पाठ से साधक के व्यक्तित्व में अद्भुत आकर्षण (Magnetism) उत्पन्न होता है, जिससे सभी (राजा, प्रजा, परिवार) वशीभूत होते हैं।
  • रोग और दोष निवारण: नाम 'सर्वदोषविनाशिन्यै' (Destroyer of all faults) कुंडली के दोषों और शारीरिक व्याधियों को दूर करता है।
  • दीर्घायु और आरोग्य: 'दीर्घायुर्विजयारोग्य...' (Long Life & Health) नाम का स्मरण अकाल मृत्यु को टालता है और पूर्ण आयु प्रदान करता है।
  • शत्रु दमन: गुप्त शत्रुॐ और ईर्ष्या करने वालों का प्रभाव स्वतः समाप्त हो जाता है।

कुंकुमार्चन विधि (10-Minute Daily Ritual)

सबसे सरल और शक्तिशाली विधि है—कुंकुमार्चन। इसमें केवल १० मिनट लगते हैं, परन्तु प्रभाव १००० यज्ञों के समान है।

नित्य पूजा विधि:

  1. तैयारी: स्नान कर लाल वस्त्र पहनें। श्रीयंत्र या बाला यंत्र (या चित्र) स्थापित करें।
  2. सामग्री: एक कटोरी में कुमकुम (Vermilion) लें।
  3. संकल्प: "हूँ (अपना नाम), माँ बाला की प्रसन्नता के लिए अष्टोत्तरशतनामावली अर्चन करता/करती हूँ।"
  4. अर्चन: अब नाम बोलना शुरू करें। "ॐ श्रीबालायै नमः" बोलते समय चुटकी भर कुमकुम यंत्र के मध्य बिंदु (बिंदुस्थान) पर चढ़ाएं।
  5. प्रक्रिया: इसी प्रकार 108 नामों का उच्चारण करते हुए 108 बार कुमकुम अर्पित करें।
  6. प्रसाद: अंत में आरती करें। चढ़ा हुआ कुमकुम प्रसाद है, जिसे माथे पर लगाएं। यह अद्भुत तेज देता है।

FAQ - साधक जिज्ञासा

1. यह अष्टोत्तर (108 नाम) प्रथम संस्करण से कैसे भिन्न है?

प्रथम अष्टोत्तर में बाला के 'बीज मंत्रों' (ऐं, क्लीं, सौः) की प्रधानता है, जबकि यह संस्करण उनके 'सौन्दर्य' (Tripurasundari) और 'शिव-शक्ति' अभेद स्वरूप का वर्णन करता है। इसमें भक्ति भाव (Devotion) अधिक है।

2. क्या इसके 108 नामों से हवन किया जा सकता है?

जी हाँ। प्रत्येक नाम के अंत में 'स्वाहा' लगाकर (जैसे 'ॐ बालायै स्वाहा') इन 108 नामों से हवन करने पर घर में सुख-शांति और समृद्धि का स्थायी वास होता है। यह दोष निवारण का अचूक उपाय है।

3. कुंकुमार्चन के लिए यह क्यों श्रेष्ठ है?

चूंकि इसमें केवल 108 नाम हैं, कुमकुम अर्चन में मात्र 10-15 मिनट लगते हैं। यह उन साधकों के लिए आदर्श है जिनके पास विस्तृत 'सहस्रनाम' (1000 नाम) अर्चन का समय नहीं है।

4. 'त्रिजन्मपापसंहर्त्र्यै' (नाम 22) का क्या अर्थ है?

इसका शाब्दिक अर्थ है 'तीन जन्मों के पापों का नाश करने वाली'। यह नाम सिद्ध करता है कि बाला न केवल वर्तमान, बल्कि पूर्वजन्मों के संचित कर्मों (Sanchita Karma) को भी काटने में सक्षम हैं।

5. विद्यार्थियों के लिए इसका क्या लाभ है?

बाला 'ज्ञानरूपा' (नाम 118) और 'बुद्ध्यै' (नाम 86) भी हैं। विद्यार्थी यदि बुधवार (Wednesday) को इसका पाठ करें, तो उनकी स्मरण शक्ति, एकाग्रता और वाक्पटुता में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।

6. क्या पाठ के लिए कोई विशेष दिशा (Direction) है?

पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर मुख करके पाठ करना सर्वोत्तम है। पूर्व दिशा ज्ञान और तेज के लिए है, जबकि उत्तर दिशा धन और स्थिरता (Stability) के लिए है।

7. क्या स्त्रियाँ मासिक धर्म में इसका पाठ कर सकती हैं?

तुलनात्मक रूप से, मानसिक जप (Mental chanting) किया जा सकता है, परन्तु स्पर्श (अर्चन) या जोर से उच्चारण नहीं करना चाहिए। शुद्धि के बाद ही अर्चन करें।

8. 'कामतूणीरजघनायै' (नाम 49) का भाव क्या है?

यह देवी के अलौकिक और दिव्य सौन्दर्य का वर्णन है, जो कामदेव के तूणीर (Quiver) के समान आकर्षक है। यह साधक को सकारात्मक आकर्षण शक्ति (Positive Magnetism) प्रदान करता है।

9. पाठ का सर्वोत्तम समय क्या है?

ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व 4-6 बजे) या प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय)। शुक्रवार का प्रदोष काल बाला पूजन के लिए विशेष रूप से सिद्ध माना गया है।

10. क्या केवल सुनने (Audio) से लाभ मिलता है?

सुनने से वातावरण शुद्ध होता है, परन्तु पूर्ण फल (विशेषकर वाक सिद्धि और पाप नाश) के लिए स्वयं उच्चारण करना अनिवार्य है। श्रवण भक्ति का पहला चरण है, कीर्तन उसका विस्तार है।