Sri Bala Muktavali Stotram – श्री बाला मुक्तावली स्तोत्रम् (विष्णुयामल)

॥ श्री बाला मुक्तावली स्तोत्रम् ॥
(श्रीविष्णुयामले)
॥ बालार्क कोटि कान्ति ॥
बालार्ककोटिरुचिरां कोटिब्रह्माण्डभूषिताम् ।
कन्दर्पकोटिलावण्यां बालां वन्दे शिवप्रियाम् ॥ १ ॥
॥ वह्नि कोटि प्रभा ॥
वह्निकोटिप्रभां सूक्ष्मां कोटिकोटिसहेलिनीम् ।
वरदां रक्तवर्णां च बालां वन्दे सनातनीम् ॥ २ ॥
॥ ज्ञानरत्नाकर ॥
ज्ञानरत्नाकरां भीमां परब्रह्मावतारिणीम् ।
पञ्चप्रेतासनगतां बालां वन्दे गुहाशयाम् ॥ ३ ॥
॥ पशुपाश छेदिनी ॥
पराप्रासादमूर्ध्निस्थां पवित्रां पात्रधारिणीम् ।
पशुपाशच्छिदां तीक्ष्णां बालां वन्दे शिवासनाम् ॥ ४ ॥
॥ गिरिजा ज्ञानदायिनी ॥
गिरिजां गिरिमध्यस्थां गीः रूपां ज्ञानदायिनीम् ।
गुह्यतत्त्वपरां चाद्यां बालां वन्दे पुरातनीम् ॥ ५ ॥
॥ चन्द्र कोटि शीतला ॥
बौद्धकोटिसुसौन्दर्यां चन्द्रकोटिसुशीतलाम् ।
आशावासां परां देवीं वन्दे बालां कपर्दिनीम् ॥ ६ ॥
॥ कालग्रसन सामर्थ्या ॥
सृष्टिस्थित्यन्तकारिणीं त्रिगुणात्मकरूपिणीम् ।
कालग्रसनसामर्थ्यां बालां वन्दे फलप्रदाम् ॥ ७ ॥
॥ जीवात्म विश्वजननी ॥
यज्ञनाशीं यज्ञदेहां यज्ञकर्मशुभप्रदाम् ।
जीवात्मविश्वजननीं बालां वन्दे परात्पराम् ॥ ८ ॥
॥ फलश्रुतिः — मुक्तावली नाम ॥
इत्येतत्परमं गुह्यं नाम्ना मुक्तावलीस्तवम् ।
ये पठन्ति महेशानि फलं वक्तुं न शक्यते ॥ ९ ॥
॥ गुह्याद्गुह्यतरं — विद्या-धन प्राप्ति ॥
गुह्याद्गुह्यतरं गुह्यं महागुह्यं वरानने ।
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ॥ १० ॥
॥ चिन्तामणि तुल्य — कन्या-मोक्ष प्राप्ति ॥
कन्यार्थी लभते कन्यां मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात् ।
बहुनात्र किमुक्तेन चिन्तामणिरिवापरम् ॥ ११ ॥
॥ गोपनीय वचन ॥
गोपनीयं प्रयत्नेन गोपनीयं न संशयः ।
अन्येभ्यो नैव दातव्यं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ १२ ॥
॥ इति श्रीविष्णुयामले श्री बाला मुक्तावली स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
मुक्तावली क्या है?
'मुक्ता' का मतलब है मोती और 'आवली' का मतलब है माला। तो मुक्तावली यानी — मोतियों की माला। इस स्तोत्र के 12 श्लोक मोतियों की माला की तरह सुंदर और कीमती हैं।
"बहुनात्र किमुक्तेन चिन्तामणिरिवापरम्" — श्लोक 11: ज्यादा क्या कहें, ये स्तोत्र चिंतामणि रत्न जैसा है — जो चाहो वो मिले!
ये स्तोत्र विष्णुयामल ग्रंथ से है — वही ग्रंथ जिसमें बाला के कई और गोपनीय स्तोत्र हैं। खास बात ये है कि इसमें खुद कहा गया है — "गुह्याद्गुह्यतरं गुह्यं महागुह्यं" — गोपनीय से भी गोपनीय, उससे भी गोपनीय, महा-गोपनीय!
8 श्लोकों में देवी का वर्णन
पहले 8 श्लोकों में देवी की अद्भुत स्तुति है। हर श्लोक में 'कोटि' (करोड़) शब्द का प्रयोग है:
- श्लोक 1: बालार्क-कोटि (करोड़ उगते सूर्यों) जैसी कान्ति, कोटि-ब्रह्माण्ड की भूषण, कन्दर्प-कोटि (करोड़ कामदेवों) जैसा लावण्य। शिवप्रिया।
- श्लोक 2: वह्नि-कोटि (करोड़ अग्नियों) जैसी प्रभा, सूक्ष्म, कोटि-कोटि सखियों वाली, वरदा, रक्तवर्णा, सनातनी।
- श्लोक 3: ज्ञान-रत्नाकर (ज्ञान का सागर), भीम, परब्रह्म अवतारिणी, पञ्चप्रेतासन पर विराजमान, गुहाशया (गुहा में निवास)।
- श्लोक 4: परा-प्रासाद (श्री चक्र) के शिखर पर स्थित, पवित्र, पात्रधारिणी, पशुपाश छेदने वाली, तीक्ष्ण, शिवासन पर बैठी।
- श्लोक 5: गिरिजा, गिरि (मेरु) के मध्य में स्थित, वाणी-स्वरूप, ज्ञानदायिनी, गुह्य तत्व में परायण, आद्या, पुरातनी।
- श्लोक 6: बौद्ध-कोटि (करोड़ विद्वानों) जैसी सुंदरता, चन्द्र-कोटि जैसी शीतल, दिशाओं में निवास करने वाली, परा देवी, कपर्दिनी (जटाधारी)।
- श्लोक 7: सृष्टि-स्थिति-अंत करने वाली, त्रिगुणात्मक, काल को भी ग्रसने की सामर्थ्य वाली, फलप्रदा।
- श्लोक 8: यज्ञ नाशिनी (असुरों के यज्ञ का), यज्ञदेहा, यज्ञकर्म में शुभ देने वाली, जीवात्मा और विश्व की जननी, परात्परा।
फलश्रुति — चिन्तामणि जैसा फल
श्लोक 9-12 में फलश्रुति है। ये बहुत स्पष्ट और शक्तिशाली है:
- श्लोक 9: "ये पठन्ति महेशानि फलं वक्तुं न शक्यते" — हे महेश्वरी, जो इसे पढ़ते हैं उनका फल बताना असंभव है।
- श्लोक 10: विद्यार्थी को विद्या मिलती है, धनार्थी को धन मिलता है।
- श्लोक 11: कन्यार्थी को कन्या (पुत्री/वधू) मिलती है, मोक्षार्थी को मोक्ष मिलता है। "बहुनात्र किमुक्तेन" — ज्यादा क्या कहें? "चिन्तामणिरिवापरम्" — ये दूसरी चिंतामणि है!
- श्लोक 12: "गोपनीयं प्रयत्नेन" — इसे प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिए। "अन्येभ्यो नैव दातव्यं" — अयोग्य को नहीं देना चाहिए।
चिंतामणि क्या है? ये एक पौराणिक रत्न है जो सोचने मात्र से सब कुछ दे देता है। स्तोत्र कह रहा है — ये मुक्तावली उसी जैसी है!
कैसे पढ़ें?
- सिर्फ 12 श्लोक हैं — 2 मिनट में पूरा हो जाता है।
- सुबह या शाम कभी भी पढ़ सकते हैं।
- शुक्रवार को पढ़ना विशेष फलदायी।
- परीक्षा से पहले, नौकरी के इंटरव्यू से पहले, किसी भी इच्छापूर्ति के लिए।
- 11 या 21 दिन का नियम बना लें तो और अच्छा।
आम सवाल
1. 'मुक्तावली' का मतलब?
मुक्ता = मोती, आवली = माला। मोतियों की माला जैसा सुंदर स्तोत्र।
2. ये किस ग्रंथ से है?
विष्णुयामल। कोलोफोन में लिखा है: "इति श्रीविष्णुयामले"।
3. 'गुह्याद्गुह्यतरं' का मतलब?
गोपनीय से भी गोपनीय, उससे भी गोपनीय — यानी अति गोपनीय।
4. 'चिंतामणि' क्या है?
एक पौराणिक रत्न जो सोचने मात्र से सब कुछ दे देता है। स्तोत्र कहता है — ये उसी जैसा है।
5. 'पञ्चप्रेतासन' क्या है?
श्लोक 3: पांच प्रेतों (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव) का आसन — देवी का सिंहासन।
6. 'पशुपाश' का मतलब?
श्लोक 4: पशु = जीव, पाश = बंधन। अज्ञान का बंधन। देवी इसे काटती हैं।
7. 'कालग्रसन' का मतलब?
श्लोक 7: काल (समय/मृत्यु) को भी निगलने की शक्ति — देवी काल से परे हैं।
8. विद्यार्थी को कैसे फायदा?
श्लोक 10: "विद्यार्थी लभते विद्यां" — विद्या चाहने वाले को विद्या मिलती है। परीक्षा से पहले पढ़ें।
9. 'गोपनीयं प्रयत्नेन' — क्या इसे शेयर नहीं करना चाहिए?
अयोग्य को नहीं। लेकिन श्रद्धालुओं के लिए उपलब्ध है। जो सम्मान से पढ़े, उसके लिए खुला है।
10. बिना दीक्षा के पढ़ सकते हैं?
हाँ। ये स्तोत्र है, मंत्र नहीं। श्रद्धा से कोई भी पढ़ सकता है।