Sri Bala Vimsathi Stava – श्री बाला विंशति स्तवः (कालिदास कृत)

श्री बाला विंशति स्तवः का परिचय
श्री बाला विंशति स्तवः (Sri Bala Vimsathi Stava) महाकवि कालिदास द्वारा रचित एक अत्यंत दुर्लभ और प्रभावशाली स्तोत्र है। 'विंशति' का अर्थ है 20 — इसमें 20 मुख्य श्लोक हैं और 21वाँ श्लोक उपसंहार है। कालिदास, जो रघुवंश, मेघदूत और शकुन्तला जैसी अमर रचनाओं के लिए प्रसिद्ध हैं, ने स्वयं को देवी की कृपा का पात्र मानते हुए इस स्तोत्र की रचना की।
"त्वद्भक्त्या मुखरीकृतेन रचितं यस्मान्मयापि ध्रुवम्" — कालिदास कहते हैं कि यह स्तोत्र देवी की भक्ति से प्रेरित होकर उनकी वाणी से स्वतः निकला है।
वाग्बीज और कुण्डलिनी: श्लोक 2 में कालिदास वाग्बीज 'ऐं' की महिमा वर्णित करते हैं — 'वाग्बीजे प्रथमे स्थिता'। देवी को कुण्डलिनी शक्ति के रूप में भी संबोधित किया गया है जो विश्व की सृष्टि का कारण हैं। जो इस रहस्य को जान लेता है, वह पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है।
देवी का स्वरूप वर्णन: श्लोक 7 में देवी का श्वेत रूप वर्णित है — बाएं हाथ में पुस्तक और अभय मुद्रा, दाएं हाथ में अक्षमाला और वरद मुद्रा, कर्पूर-कुन्द के समान उज्ज्वल कांति, और खिले कमल के समान नेत्र। जो इस रूप का ध्यान नहीं करते, उन्हें कवित्व शक्ति कैसे मिल सकती है?
श्रीवत्सराज की कथा: श्लोक 12 में एक ऐतिहासिक उदाहरण है — श्रीवत्सराज जो एक सामान्य कुल में जन्मे थे, देवी की चरणों में प्रणाम करने से चक्रवर्ती सम्राट बने और विद्याधरों द्वारा वंदित हुए। यह देवी के प्रसाद की महिमा है।
विभिन्न विपत्तियों में देवी के रूप (श्लोक 17): राजकुल में लक्ष्मी, युद्ध में जया, मार्ग में क्षेमङ्करी, जंगल में शबरी, पर्वत में दुर्गा, भूत-प्रेत-पिशाच भय में महाभैरवी, मोह में त्रिपुरा, और जल-संकट में तारा — इन रूपों का स्मरण करने से सभी विपत्तियाँ दूर होती हैं।
देवी के 18 नाम (श्लोक 18): माया, कुण्डलिनी, क्रिया, मधुमती, काली, कलामालिनी, मातङ्गी, विजया, जया, भगवती, देवी, शिवा, शाम्भवी, शक्ति, शङ्करवल्लभा, त्रिनयना, वाग्वादिनी, भैरवी, ह्रींकारी, त्रिपुरा, परापरमयी, माता, कुमारी।
20,000 गुह्य नाम: श्लोक 19 में कहा गया है कि देवी के 20,000 (विंशति सहस्र) अत्यंत गुह्य नाम हैं जो विशेष मंत्र विधि से उद्धृत होते हैं।