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Sri Nrusimha Saraswati Stotram 2 – श्री नृसिंहसरस्वती स्तोत्रम् २

Sri Nrusimha Saraswati Stotram 2 – श्री नृसिंहसरस्वती स्तोत्रम् २
॥ श्री नृसिंहसरस्वती स्तोत्रम् २ ॥ विजय तेऽज यते जयते यतेरिह तमो हतमोहतमो नमः । हृदिकदाय पदाय सदा यदा तदुदयो न दयो न वियोनयः ॥ १ ॥ उदयते नयते यतेर्यदा मनसि कामनिकामगतिस्तदा । पदुदयो हृदयोकसि ते सिते भवति योऽवति योगिवरावरान् ॥ २ ॥ भवति भावभवोऽवभवो यदा भवति कामानिकामहतिस्तदा । भवति मानव मानवदुत्तमे भवतिरोधिरतो विरतोत्तमे ॥ ३ ॥ तव सतां वसतां मनसाऽनसा प्रपदयोः पदयोरजसाञ्जसा । सुसहितः सहितस्तव तावता यदवतारवता जनताविता ॥ ४ ॥ कृतफलं तु विहाय विहायसा सममजं भजतामज तामसात् । मिलति तारकमत्र कमत्रसत्पदरजो भ्रमहारिमहारिसत् ॥ ५ ॥ तदजरामरकोशविलक्षणं सदजधीगुणवेत्तृकलक्षणम् । भुवनहेत्वघहत्रिपुरादिकं तव न जातु पदं कुपुराधिकम् ॥ ६ ॥ विविध भेद परं सम दृश्यते त्रिविधवेदपरं कमदृश्य ते । पदमिदं सदु चिद्घनमुद्धिया सदनिदं प्रजहात्यघनुद्धिया ॥ ७ ॥ अज नमो जनमोहनमोहनः प्रिय नियोजय तेनयतेन ते । य इह वेद निवेश निवेदवेत्यजपदं जपदं तपदं पदम् ॥ ८ ॥ ॥ इति श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचितं श्री नृसिंहसरस्वती स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी और टेंबे स्वामी की दिव्य रचना (Introduction)

श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराज (1378-1458 ईस्वी) भगवान दत्तात्रेय के द्वितीय जाग्रत अवतार माने जाते हैं। उनका प्राकट्य महाराष्ट्र के कारंजा (लाड़) में हुआ और उनकी लीलाओं का मुख्य केंद्र औदुंबर, नरसोबावाड़ी और गाणगापुर रहा। वे "गुरुचरित्र" के नायक हैं और दत्त संप्रदाय में उनकी पूजा साक्षात परमात्मा के रूप में की जाती है। इस स्तोत्र की रचना आधुनिक काल के महान दत्त अवतार और परम योगी श्री वासुदेवानन्द सरस्वती (टेंबे स्वामी) ने की है।

श्री टेंबे स्वामी स्वयं नृसिंह सरस्वती स्वामी के अनन्य भक्त और उनके कार्यों के पुनरुद्धारक थे। उन्होंने इस स्तोत्र में जिस भाषा का प्रयोग किया है, वह संस्कृत साहित्य में 'यमक' और 'अनुप्रास' अलंकारों की पराकाष्ठा है। स्तोत्र का पहला श्लोक "विजय तेऽज यते जयते यतेरिह..." अपनी ध्वनि और अर्थ दोनों से साधक को एक उच्च आध्यात्मिक चेतना में ले जाता है। यहाँ 'अज' (अजन्मा), 'यते' (यति/सन्यासी) और 'जयते' (विजयी) शब्दों का ताना-बाना भगवान के निराकार और साकार स्वरूप के मिलन को दर्शाता है।

यह स्तोत्र केवल एक काव्य नहीं, बल्कि एक अद्वैत साधना का सूत्र है। इसमें नृसिंह सरस्वती स्वामी को 'तमो हतमोहतमो' कहा गया है, जिसका अर्थ है— अज्ञान और मोह के घोर अंधकार का नाश करने वाला साक्षात सूर्य। टेंबे स्वामी महाराज ने इस रचना के माध्यम से यह प्रतिपादित किया है कि गुरु के चरणों की धूल मात्र से संसार का भ्रम (माया) विलीन हो जाता है। दत्त सम्प्रदाय के साधकों के लिए यह स्तोत्र नित्य उपासना का एक अनिवार्य हिस्सा है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो गाणगापुर या नरसोबावाड़ी की यात्रा पर जाते हैं।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance)

श्री नृसिंहसरस्वती स्तोत्रम् २ का महत्व इसकी दार्शनिक गहराई में निहित है। श्लोक ५ में टेंबे स्वामी जी कहते हैं— "मिलति तारकमत्र कमत्रसत्पदरजो भ्रमहारिमहारिसत्"। इसका अर्थ है कि गुरुदेव के चरणों की वह रज (धूल), जो समस्त भ्रमों का नाश करती है, हमें इस भवसागर से तारने वाली 'तारक' शक्ति प्रदान करती है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि भक्ति का मार्ग केवल भावुकता नहीं, बल्कि विवेक और गुरु-आज्ञा के पालन का मार्ग है।

गाणगापुर में भगवान नृसिंह सरस्वती ने प्रतिज्ञा की थी कि वे अदृश्य रूप में आज भी संगम स्थान पर भिक्षा ग्रहण करते हैं और अपने भक्तों के लिए "निर्गुण पादुका" के रूप में सदा उपस्थित हैं। यह स्तोत्र उसी 'निर्गुण' (formless) सत्य को सगुण (form) गुरु के माध्यम से प्राप्त करने का विज्ञान है। इसमें भगवान के अष्ट रूपों की झलक मिलती है जो पंचमहाभूतों के अधिपति हैं। जो साधक इस स्तोत्र का अर्थ सहित पाठ करता है, उसकी बुद्धि शुद्ध होती है और उसमें 'आत्म-साक्षात्कार' की पात्रता उत्पन्न होती है।

फलश्रुति: आध्यात्मिक एवं सांसारिक लाभ (Benefits)

यद्यपि टेंबे स्वामी महाराज की रचनाएं मुख्य रूप से आत्म-कल्याण के लिए हैं, लेकिन दत्त संप्रदाय की परंपरा में इसके निम्नलिखित लाभ बताए गए हैं:

  • मोह और भ्रम का नाश: स्तोत्र के प्रथम श्लोक के अनुसार, यह मोह (Delusion) के घने अंधकार को मिटाकर जीवन में स्पष्टता और शांति लाता है।
  • गुरु तत्व की प्राप्ति: जो लोग किसी सद्गुरु की खोज में हैं, उन्हें इस पाठ से शीघ्र ही उचित मार्गदर्शन और गुरु कृपा प्राप्त होती है।
  • मानसिक रोगों से मुक्ति: "नादविलीनचित्तपवनं" जैसी अनुभूतियाँ चित्त को स्थिर करती हैं, जिससे तनाव, चिंता और नकारात्मक विचार दूर होते हैं।
  • अद्वैत बोध: यह स्तोत्र वेदांत के सार को सरल बनाता है, जिससे साधक को 'अहं ब्रह्मास्मि' के भाव का अनुभव करने में सहायता मिलती है।
  • पाप नाश: भगवान नृसिंह सरस्वती 'अघनुद्धिया' (पापों को उखाड़ फेंकने वाली बुद्धि) के प्रदाता हैं। इसके नियमित पाठ से संचित कर्मों का प्रभाव कम होता है।
  • पितृ दोष शांति: दत्त अवतारों की स्तुति से पितरों को सद्गति मिलती है और कुल की रक्षा होती है।

पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Method)

भगवान दत्तात्रेय और श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी की साधना में 'सात्विकता' और 'नियम' का बहुत महत्व है। इस स्तोत्र को सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाई जा सकती है।

साधना के नियम

  • शुभ दिन: गुरुवार (Thursday) गुरु कृपा के लिए सर्वोत्तम है। इसके अतिरिक्त प्रदोष काल या दत्त जयंती पर पाठ करना विशेष फलदायी है।
  • आसन: ऊनी आसन या कुश के आसन पर बैठकर पाठ करें। मुख उत्तर या पूर्व की ओर होना चाहिए।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात भस्म (विभूति) धारण करें और गोपीचंदन का तिलक लगाएं।
  • नैवेद्य: श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी को 'मधुकरी' (भिक्षा) का अन्न प्रिय है। घर में शुद्ध सात्विक भोजन का भोग लगाएं।

अनुष्ठान विधि

यदि आप किसी विशेष समस्या के समाधान के लिए पाठ कर रहे हैं, तो लगातार ७ या २१ दिनों तक प्रतिदिन ११ बार इस स्तोत्र का पाठ करें। पाठ के पूर्व भगवान दत्तात्रेय के षडक्षरी मंत्र 'ॐ द्राम दत्तात्रेयाय नमः' का एक माला जप अवश्य करें। इससे स्तोत्र की शक्ति जाग्रत होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10+ FAQs)

1. श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराज कौन थे?

वे भगवान दत्तात्रेय के द्वितीय अवतार थे। उनका जीवन "श्री गुरुचरित्र" में वर्णित है और उन्हें गाणगापुर के जाग्रत अधिपति के रूप में पूजा जाता है।

2. इस स्तोत्र की रचना किसने की है?

इसकी रचना आधुनिक काल के महान दत्त अवतार श्री वासुदेवानन्द सरस्वती (टेंबे स्वामी) ने की है, जिन्होंने दत्त संप्रदाय के शास्त्रों का पुनरुद्धार किया।

3. क्या इस स्तोत्र का पाठ घर में किया जा सकता है?

हाँ, शुद्धि और भक्ति के साथ इसे घर में कहीं भी पढ़ा जा सकता है। दत्त अवतारों की स्तुति घर के वातावरण को पवित्र करती है।

4. दत्त संप्रदाय में 'मधुकरी' का क्या महत्व है?

भगवान नृसिंह सरस्वती आज भी गाणगापुर में दोपहर के समय भिक्षा (मधुकरी) मांगते हैं। इसलिए उनके भक्तों के लिए भिक्षा का अन्न ग्रहण करना और दूसरों को अन्न दान करना परम पुण्यदायी है।

5. क्या यह स्तोत्र कठिन संस्कृत में है?

यह स्तोत्र उच्च श्रेणी के संस्कृत अलंकारों से युक्त है। इसका अर्थ समझना थोड़ा कठिन हो सकता है, लेकिन इसका लयबद्ध पाठ ही साधक के मन में दिव्य स्पंदन उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त है।

6. क्या इसके पाठ से ग्रह बाधा दूर होती है?

जी हाँ। गुरु तत्व सभी ग्रहों का नियंता है। नृसिंह सरस्वती स्वामी की कृपा से विशेषकर शनि, राहु और केतु की प्रतिकूलता शांत होती है।

7. गाणगापुर की 'निर्गुण पादुका' का क्या अर्थ है?

निर्गुण पादुका का अर्थ है वे चरण चिह्न जो भौतिक नहीं हैं, बल्कि चैतन्य स्वरूप हैं। भगवान ने अवतार समाप्ति के समय अपनी शक्ति इन पादुकाओं में स्थापित की थी।

8. टेंबे स्वामी जी का दूसरा नाम क्या है?

उन्हें श्री वासुदेवानन्द सरस्वती स्वामी महाराज के नाम से जाना जाता है। उन्होंने महाराष्ट्र से लेकर काशी और कन्याकुमारी तक दत्त भक्ति का प्रसार किया।

9. क्या स्त्रियों के लिए यह पाठ वर्जित है?

नहीं, दत्त अवतारों की भक्ति सभी के लिए खुली है। भक्ति का कोई भेद नहीं होता। शुद्ध चित्त से कोई भी स्त्री इसका पाठ कर सकती है।

10. पाठ के लिए सबसे उत्तम समय क्या है?

प्रातः काल सूर्योदय के समय या सायं संध्या काल के समय पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।