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Bhrigu Kruta Sri Dattatreya Stotram – श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् (भृगु कृतम्)

Bhrigu Kruta Sri Dattatreya Stotram – श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् (भृगु कृतम्)
॥ श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् (भृगु कृतम्) ॥ बालार्कप्रभमिन्द्रनीलजटिलं भस्माङ्गरागोज्ज्वलं शान्तं नादविलीनचित्तपवनं शार्दूलचर्माम्बरम् । ब्रह्मज्ञैः सनकादिभिः परिवृतं सिद्धैः समाराधितं आत्रेयं समुपास्महे हृदि मुदा ध्येयं सदा योगिभिः ॥ १ ॥ दिगम्बरं भस्मविलेपिताङ्गं चक्रं त्रिशूलं डमरुं गदां च । पद्मासनस्थं शशिसूर्यनेत्रं दत्तात्रेयं ध्येयमभीष्टसिद्ध्यै ॥ २ ॥ ओं नमः श्रीगुरुं दत्तं दत्तदेवं जगद्गुरुम् । निष्कलं निर्गुणं वन्दे दत्तात्रेयं नमाम्यहम् ॥ ३ ॥ ब्रह्म लोकेश भूतेश शङ्खचक्रगदाधरम् । पाणिपात्रधरं देवं दत्तात्रेयं नमाम्यहम् ॥ ४ ॥ सुरेशवन्दितं देवं त्रैलोक्य लोकवन्दितम् । हरिहरात्मकं देवं दत्तात्रेयं नमाम्यहम् ॥ ५ ॥ निर्मलं नीलवर्णं च सुन्दरं श्यामशोभितम् । सुलोचनं विशालाक्षं दत्तात्रेयं नमाम्यहम् ॥ ६ ॥ त्रिशूलं डमरुं मालां जटामुकुटमण्डितम् । मण्डितं कुण्डलं कर्णे दत्तात्रेयं नमाम्यहम् ॥ ७ ॥ विभूतिभूषितदेहं हारकेयूरशोभितम् । अनन्तप्रणवाकारं दत्तात्रेयं नमाम्यहम् ॥ ८ ॥ प्रसन्नवदनं देवं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । जनार्दनं जगत्त्राणं दत्तात्रेयं नमाम्यहम् ॥ ९ ॥ राजराजं मिताचारं कार्तवीर्यवरप्रदम् । सुभद्रं भद्रकल्याणं दत्तात्रेयं नमाम्यहम् ॥ १० ॥ अनसूयाप्रियकरं अत्रिपुत्रं सुरेश्वरम् । विख्यातयोगिनां मोक्षं दत्तात्रेयं नमाम्यहम् ॥ ११ ॥ दिगम्बरतनुं श्रेष्ठं ब्रह्मचर्यव्रते स्थितम् । हंसं हंसात्मकं नित्यं दत्तात्रेयं नमाम्यहम् ॥ १२ ॥ कदा योगी कदा भोगी बाललीलाविनोदकः । दशनैः रत्नसङ्काशैः दत्तात्रेयं नमाम्यहम् ॥ १३ ॥ भूतबाधा भवत्रासः ग्रहपीडा तथैव च । दरिद्रव्यसनध्वंसी दत्तात्रेयं नमाम्यहम् ॥ १४ ॥ चतुर्दश्यां बुधे वारे जन्ममार्गशिरे शुभे । तारकं विपुलं वन्दे दत्तात्रेयं नमाम्यहम् ॥ १५ ॥ रक्तोत्पलदलपादं सर्वतीर्थसमुद्भवम् । वन्दितं योगिभिः सर्वैः दत्तात्रेयं नमाम्यहम् ॥ १६ ॥ ज्ञानदाता प्रभुः साक्षाद्गतिर्मोक्षप्रदायकः । आत्मभूरीश्वरः कृष्णः दत्तात्रेयं नमाम्यहम् ॥ १७ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ भृगुविरचितमिदं दत्तपारायणान्वितम् । साक्षाद्दद्यात्स्वयं ब्रह्मा दत्तात्रेयं नमाम्यहम् ॥ १८ ॥ प्राणिनां सर्वजन्तूनां कर्मपाशप्रभञ्जनम् । दत्तात्रेयगुरुस्तोत्रं सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ १९ ॥ अपुत्रो लभते पुत्रं धनधान्यसमन्वितः । राजमान्यो भवेल्लक्ष्मीमप्राप्यं प्राप्नुयान्नरः ॥ २० ॥ त्रिसन्ध्यं जपमानस्तु दत्तात्रेयस्तुतिं सदा । तस्य रोगभयं नास्ति दीर्घायुर्विजयी भवेत् ॥ २१ ॥ कूष्माण्डडाकिनीपक्षपिशाचब्रह्मराक्षसाः । स्तोत्रस्य श्रुतमात्रेण गच्छन्त्यत्र न संशयः ॥ २२ ॥ एतद्विंशतिश्लोकानामावृत्तिं कुरु विंशतिम् । तस्यावृत्तिसहस्रेण दर्शनं नात्र संशयः ॥ २३ ॥ ॥ इति श्रीभृगुविरचितं श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: महर्षि भृगु विरचित श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् (Introduction)

श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् (भृगु कृतम्) वैदिक साहित्य और दत्त सम्प्रदाय का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण रत्न है। इस स्तोत्र की रचना सप्तर्षियों में प्रमुख और ज्योतिष शास्त्र के आदि प्रवर्तक महर्षि भृगु ने की थी। भगवान दत्तात्रेय, जो स्वयं महर्षि अत्रि और माता अनसूया के पुत्र हैं, त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) के साक्षात विग्रह माने जाते हैं। भृगु ऋषि द्वारा की गई यह स्तुति भगवान के उसी एकात्मक स्वरूप को समर्पित है, जहाँ वे "योगिराज" और "अवधूत" के रूप में समस्त ब्रह्मांड का मार्गदर्शन करते हैं।

इस स्तोत्र की महत्ता इसके प्रथम श्लोक से ही स्पष्ट हो जाती है, जहाँ प्रभु को "नादविलीनचित्तपवनं" कहा गया है— अर्थात वे जिनके चित्त और प्राण ओंकार के दिव्य नाद में विलीन हो चुके हैं। महर्षि भृगु ने इस पाठ के माध्यम से दत्तात्रेय भगवान के उस स्वरूप का चित्रण किया है, जो दिगंबर (आकाश ही जिनका वस्त्र है) होते हुए भी समस्त ऐश्वर्यों के अधिपति हैं। दत्त सम्प्रदाय में ऐसी मान्यता है कि यह स्तोत्र केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक सीढ़ी है जो साधक को सामान्य चेतना से उठाकर उच्च आध्यात्मिक धरातल पर ले जाती है।

भगवान दत्तात्रेय को "आदि गुरु" माना गया है। उन्होंने २४ गुरुओं से शिक्षा प्राप्त कर संसार को यह संदेश दिया कि ज्ञान कहीं से भी प्राप्त किया जा सकता है, यदि आपकी दृष्टि निर्मल हो। भृगु ऋषि का यह स्तोत्र हमें उसी निर्मल दृष्टि और प्रभु की अनन्य भक्ति की ओर प्रेरित करता है। इसे "दत्त पारायण" का अनिवार्य अंग माना जाता है।

विशिष्ट महत्व: त्रिगुणात्मक स्वरूप और योग साधना (Significance)

दत्तात्रेय साधना में भृगु कृत स्तोत्र का अपना एक वैज्ञानिक और तांत्रिक महत्व भी है। श्लोक ५ में उन्हें 'हरिहरात्मक' कहा गया है, जो इस बात का प्रतीक है कि विष्णु (हरि) और शिव (हर) में कोई भेद नहीं है। यह समन्वय की भावना ही इस स्तोत्र का प्राण है। महर्षि भृगु ने इसमें भगवान के उन आयुधों का वर्णन किया है— जैसे चक्र, त्रिशूल, डमरू और गदा— जो सृष्टि के निर्माण, पालन और लय की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से, यह स्तोत्र साधक के भीतर के "गुरु तत्व" को जागृत करता है। जब हम श्लोक ८ में "अनन्तप्रणवाकारं" का पाठ करते हैं, तो हम स्वीकार करते हैं कि भगवान स्वयं उस 'ॐ' कार के प्रतीक हैं जिससे समस्त सृष्टि का उदय हुआ है। यह पाठ उन लोगों के लिए विशेष रूप से प्रभावशाली है जो ध्यान और योग के मार्ग पर अग्रसर हैं, क्योंकि भगवान दत्तात्रेय स्वयं योगियों के आराध्य हैं। महर्षि भृगु ने इसमें स्पष्ट किया है कि प्रभु कभी योगी के रूप में शांत रहते हैं तो कभी बाललीला में विनोद करते हैं, जो उनके माया-मुक्त स्वरूप को दर्शाता है।

फलश्रुति: चमत्कारी लाभ और अनुभव (Benefits from Phala Shruti)

इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक १९-२३) में महर्षि भृगु ने इसके पाठ से मिलने वाले अद्भुत परिणामों का विस्तार से वर्णन किया है:

  • सर्व कामना पूर्ति: "सर्वान् कामानवाप्नुयात्" (श्लोक १९) — इस स्तोत्र के पाठ से मनुष्य की सभी जायज मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
  • संतान और धन प्राप्ति: "अपुत्रो लभते पुत्रं धनधान्यसमन्वितः" (श्लोक २०) — जिनके पास संतान नहीं है, उन्हें सुयोग्य पुत्र की प्राप्ति होती है और घर धन-धान्य से भर जाता है।
  • नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा: श्लोक २२ में स्पष्ट कहा गया है कि कूष्माण्ड, डाकिनी, पिशाच और ब्रह्मराक्षस जैसे नकारात्मक तत्व इस स्तोत्र के श्रवण मात्र से दूर भाग जाते हैं।
  • रोग और भय का नाश: त्रिकाल संध्या में पाठ करने से मनुष्य दीर्घायु और विजयी होता है, तथा उसे किसी भी प्रकार के रोग का भय नहीं रहता।
  • साक्षात दर्शन की संभावना: श्लोक २३ में एक अत्यंत गोपनीय विधान बताया गया है कि यदि कोई श्रद्धापूर्वक १००० बार इस स्तोत्र की आवृत्ति करता है, तो उसे साक्षात प्रभु के दर्शन सुलभ हो सकते हैं।
  • पितृ दोष शांति: भगवान दत्तात्रेय पितरों के स्वामी माने जाते हैं, अतः यह पाठ पितृ दोष के प्रभाव को शांत कर कुल की रक्षा करता है।

पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Method & Guidelines)

महर्षि भृगु कृत इस स्तोत्र का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए इसे एक विशेष मर्यादा और विधि के साथ करना चाहिए। भगवान दत्त भाव के भूखे हैं, फिर भी शास्त्रीय अनुशासन एकाग्रता को बढ़ाता है।

पूजा विधान

  • शुभ समय: गुरुवार (Thursday) का दिन दत्तात्रेय भगवान को समर्पित है। इसके अलावा मार्गशीर्ष पूर्णिमा (दत्त जयंती) पर इसका पाठ अनंत फलदायी होता है।
  • आसन और दिशा: कुशा या ऊनी आसन का प्रयोग करें। मुख उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर होना चाहिए।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। पीला रंग भगवान दत्तात्रेय को अत्यंत प्रिय है।
  • दीप और नैवेद्य: शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। भगवान को केसर युक्त दूध, चने की दाल या गुड़ का भोग लगाएं।

विशेष प्रयोग (Anushthan)

यदि आप किसी गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं, तो संकल्प लेकर लगातार २१ दिनों तक प्रतिदिन २१ बार इस स्तोत्र का पाठ करें। पाठ के अंत में 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' महामंत्र का जाप करना न भूलें। इससे स्तोत्र की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10 FAQs)

1. यह स्तोत्र अन्य दत्त स्तोत्रों से अलग कैसे है?

यह स्तोत्र महर्षि भृगु द्वारा रचित है और इसमें भगवान के "हरिहरात्मक" स्वरूप पर बल दिया गया है। इसकी फलश्रुति में विशेष रूप से नकारात्मक शक्तियों (डाकिनी-पिशाच) के नाश का उल्लेख है, जो इसे सुरक्षा हेतु अद्वितीय बनाता है।

2. क्या इस पाठ से पितृ दोष शांत होता है?

जी हाँ। भगवान दत्तात्रेय को पितरों का अधिपति माना जाता है। "भृगु कृत स्तोत्र" का नियमित पाठ करने से अतृप्त पूर्वजों को सद्गति मिलती है और परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है।

3. 'हरिहरात्मक' शब्द का क्या अर्थ है?

'हरि' का अर्थ है भगवान विष्णु और 'हर' का अर्थ है भगवान शिव। दत्तात्रेय भगवान में इन दोनों (तथा ब्रह्मा जी) का समावेश है, इसलिए उन्हें हरिहरात्मक कहा जाता है।

4. क्या स्त्रियाँ इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

अवश्य। भगवती अनसूया के पुत्र होने के नाते, भगवान दत्त स्त्रियों पर विशेष कृपा रखते हैं। शुद्धि के नियमों का पालन करते हुए कोई भी स्त्री इसका पाठ कर सकती है।

5. पाठ के लिए सबसे उत्तम माला कौन सी है?

भगवान दत्तात्रेय की साधना के लिए रुद्राक्ष की माला या स्फटिक की माला सबसे उत्तम मानी गई है।

6. क्या इस स्तोत्र के पाठ से दरिद्रता दूर होती है?

श्लोक १४ में स्पष्ट उल्लेख है— "दरिद्रव्यसनध्वंसी"। यह स्तोत्र आर्थिक तंगी और बुरी आदतों (व्यसन) को नष्ट कर जीवन में लक्ष्मी का आगमन कराता है।

7. 'दत्त पारायण' क्या होता है?

दत्त पारायण मुख्य रूप से 'गुरुचरित्र' या 'दत्त महापुराण' का पाठ है। भृगु कृत स्तोत्र का प्रयोग अक्सर इन पारायणों के समापन या नित्य पाठ के रूप में किया जाता है।

8. 'विंशति' आवर्तनों का क्या अर्थ है?

श्लोक २३ के अनुसार, २० श्लोकों के इस स्तोत्र को यदि २० बार प्रतिदिन पढ़ा जाए, तो उसे एक पूर्ण 'विंशति आवृत्ति' कहा जाता है। १००० बार (सहस्र आवृत्ति) करने पर सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

9. क्या पाठ के साथ दान करना आवश्यक है?

अनिवार्य नहीं, पर दत्त साधना में कुत्तों को भोजन कराना या गाय की सेवा करना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि ये भगवान के साथ सदैव उपस्थित रहते हैं।

10. क्या यह पाठ घर के मंदिर में कर सकते हैं?

हाँ, घर के मंदिर में शांत मन से दीपक जलाकर इसका पाठ किया जा सकता है। सामूहिक पाठ और भी अधिक ऊर्जादायक होता है।