Vishnudatta Kruta Dattatreya Stotram – श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् (विष्णुदत्त कृतम्)

परिचय: भक्त विष्णुदत्त और भगवान दत्तात्रेय की अपार करुणा
श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् (विष्णुदत्त कृतम्) की कथा हिंदू धर्म के भक्ति साहित्य में एक स्वर्णिम अध्याय की तरह है। विष्णुदत्त, आंध्र प्रदेश के पीठापुरम् (Pithapuram) के एक अत्यंत निष्ठावान और विद्वान ब्राह्मण थे। उनकी भक्ति इतनी प्रगाढ़ थी कि वे अपनी हर क्रिया को भगवान दत्तात्रेय के चरणों में समर्पित करते थे। पीठापुरम् वही पावन क्षेत्र है जहाँ कलियुग के प्रथम दत्त अवतार भगवान श्रीपाद श्रीवल्लभ का प्राकट्य हुआ था।
विष्णुदत्त के जीवन की सबसे प्रसिद्ध घटना उनके द्वारा किए गए एक श्राद्ध कर्म से जुड़ी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, विष्णुदत्त अपने पूर्वजों के श्राद्ध के लिए योग्य ब्राह्मणों की प्रतीक्षा कर रहे थे, लेकिन कोई नहीं आया। उनकी व्याकुलता देख स्वयं भगवान दत्तात्रेय ने एक संन्यासी और दो अन्य ब्राह्मणों का रूप धारण किया और विष्णुदत्त के घर भोजन ग्रहण करने पहुँचे। भगवान ने विष्णुदत्त के श्रद्धापूर्ण समर्पण को स्वीकार किया और उन्हें दर्शन दिए। इसी दिव्य साक्षात्कार के क्षण में विष्णुदत्त के मुख से जो उद्गार निकले, वही आगे चलकर "विष्णुदत्त कृत दत्तात्रेय स्तोत्रम्" के रूप में विख्यात हुए।
यह स्तोत्र भगवान दत्तात्रेय के 'उन्मत्त' (Ecstatic) और 'पिशाच' (Eccentric) स्वरूपों की वंदना करता है। दत्त सम्प्रदाय में इन शब्दों का अर्थ लोक-मर्यादा से परे उस सर्वोच्च योगिक अवस्था से है जहाँ साधक को न तो संसार की चिंता रहती है और न ही देह का भान। विष्णुदत्त ने प्रभु को 'ज्ञानसागर' और 'सर्वदेवस्वरूपिणम्' कहकर पुकारा है, जो यह सिद्ध करता है कि दत्तात्रेय ही समस्त शक्तियों के मूल केंद्र हैं।
विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व: 'भोग' और 'मोक्ष' का संगम
विष्णुदत्त कृत इस स्तोत्र का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसके तीसरे श्लोक में मिलता है— "भोगमोक्षप्रदं वन्दे सर्वदेवस्वरूपिणम्"। अधिकांश साधनाएं या तो सांसारिक सुख (भोग) देती हैं या फिर आध्यात्मिक मुक्ति (मोक्ष)। लेकिन दत्तात्रेय की यह स्तुति साधक को दोनों प्रदान करने का सामर्थ्य रखती है। यह 'दत्त तत्व' की वह विशेषता है जो गृहस्थों और संन्यासियों दोनों के लिए इसे समान रूप से फलदायी बनाती है।
विष्णुदत्त ने इस पाठ में भगवान के 'विश्वरूप' का चित्रण किया है। श्लोक १२ में वे प्रभु को 'गह्वरप्रियम्' कहते हैं, जिसका अर्थ है— गुफाओं या गहन एकान्त में रहने वाले। यह उन योगियों के लिए प्रेरणा है जो अंतर्मुखी साधना (Inner Contemplation) करना चाहते हैं। वहीं, श्लोक ८ में 'राजराज्यप्रदं शिवम्' शब्द यह स्पष्ट करते हैं कि भगवान दत्त की कृपा से साधक को समाज में उच्च पद, मान-सम्मान और असीम ऐश्वर्य की प्राप्ति हो सकती है।
इस स्तोत्र की वैज्ञानिकता इसके 'अद्वैत' दर्शन में छिपी है। भगवान को 'वियत्समम्' (आकाश के समान व्यापक) कहा गया है। आकाश की तरह ही गुरु की कृपा भी सर्वत्र व्याप्त है, बस हमें विष्णुदत्त जैसी 'पात्रता' विकसित करने की आवश्यकता है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि भक्ति में जब 'अहंकार' शून्य हो जाता है, तब भगवान स्वयं भक्त के द्वार पर भोजन मांगने आ जाते हैं।
फलश्रुति: विष्णुदत्त कृत स्तोत्र पाठ के लाभ
दत्त सम्प्रदाय की गुरु-परंपरा के अनुसार, विष्णुदत्त द्वारा रचित इस स्तोत्र के नित्य पाठ से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:
- भोग और मोक्ष की प्राप्ति: साधक को जीवन की भौतिक आवश्यकताएं (धन, वैभव) सहज प्राप्त होती हैं और अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
- मानसिक रोगों और तनाव से मुक्ति: प्रभु के 'उन्मत्त' और 'आनन्ददायक' स्वरूप का स्मरण अवसाद (Depression) और मानसिक अशांति को जड़ से मिटा देता है।
- पितृ दोष शांति: चूंकि यह स्तोत्र एक श्राद्ध प्रसंग से जुड़ा है, अतः इसके पाठ से अतृप्त पितरों को शांति मिलती है और कुल की उन्नति होती है।
- शत्रु और बाधा निवारण: 'असुरारातिं' और 'प्रणतार्तिहरं' नामों के प्रभाव से शत्रुओं की कुचेष्टाएं विफल होती हैं और जीवन के संकट दूर होते हैं।
- ज्ञान और प्रज्ञा का विकास: 'ज्ञानसागर' स्वरूप की वंदना से बुद्धि प्रखर होती है और साधक में विवेक जाग्रत होता है।
- दत्त सायुज्य: भगवान दत्तात्रेय "स्मर्तृगामी" हैं, अतः निरंतर पाठ से साधक को गुरु तत्व की साक्षात अनुभूति होने लगती है।
सिद्ध पाठ विधि एवं विशेष नियम
दत्तात्रेय साधना में 'भाव' का सर्वोच्च स्थान है, लेकिन शास्त्रीय विधि एकाग्रता को बढ़ाने में सहायक होती है। विष्णुदत्त कृत स्तोत्र को सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाएं।
साधना के नियम
- शुभ समय: गुरुवार (Thursday) गुरु का दिन है। पूर्णिमा, दत्त जयंती, और मार्गशीर्ष मास में इसका पाठ करना अनंत फलदायी है।
- ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः ४:०० से ६:०० के बीच पाठ करना सर्वोत्तम है। सायंकाल संध्या के समय भी पाठ किया जा सकता है।
- शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले (Yellow) या श्वेत वस्त्र धारण करें। भस्म (विभूति) का तिलक लगाना दत्त साधना में अनिवार्य माना जाता है।
- आसन: ऊनी आसन या कुशा के आसन का प्रयोग करें। मुख उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर होना चाहिए।
- दीप और नैवेद्य: शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। भगवान को गुड़, चने की दाल या दूध से बनी सफेद मिठाई का भोग लगाएं।
विशेष मनोकामना हेतु प्रयोग
यदि आप किसी गंभीर संकट या ऋण (कर्ज) से मुक्त होना चाहते हैं, तो संकल्प लेकर लगातार २१ दिनों तक प्रतिदिन ११ या २१ बार इस स्तोत्र का पाठ करें। पाठ के अंत में 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' महामंत्र का १०८ बार जाप करना इसकी शक्ति को कई गुना बढ़ा देता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10+ FAQs)