॥ अथ त्रैलोक्यविजयविद्या (अग्निपुराणान्तर्गतम्) ॥
श्री महेश्वर उवाच –
त्रैलोक्यविजयां वक्ष्ये सर्वयन्त्रविमर्दिनीम् ॥ १ ॥
ओं हूं क्षूं ह्रूं ओं नमो भगवति दंष्ट्रणि भीमवक्त्रे महोग्ररूपे हिलि हिलि रक्तनेत्रे किलि किलि महानिस्वने कुलु कुलु ओं विद्युज्जिह्वे हुलु हुलु ओं निर्मांसे कट कट गोनसाभरणे चिलि चिलि जीवमालाधारिणि द्रावय ओं महारौद्री सार्धचर्मकृताच्छदे विजृंभ ओं नृत्य असिलताधारिणि भृकुटिकृतापाङ्गे विषमनेत्रकृतानने वसामेदो विलिप्तगात्रे कह कह ओं हस हस क्रुद्ध क्रुद्ध ओं नीलजीमूतवर्णे अभ्रमालाकृदाभरणे विस्फुर ओं घण्टारवाविकीर्णदेहे ओं सिंसिद्धे अरुणवर्णे ओं ह्रां ह्रीं ह्रूं रौद्ररूपे हूं ह्रीं क्लीं ओं ह्रीं हूं ओं आकर्ष ओं धून धून ओं हे हः खः वज्रिणि हूं क्षूं क्षां क्रोधरूपिणि प्रज्वल प्रज्वल ओं भीमभीषणे भिन्दि ओं महाकाये छिन्दि ओं करालिनि किटि किटि महाभूतमातः सर्वदुष्टनिवारिणि जये ओं विजये ओं त्रैलोक्य विजये हूं फट् स्वाहा ॥ २ ॥
॥ फलश्रुति (Benefits) ॥
नीलवर्णां प्रेतसंस्थां विंशहस्तां यजेज्जये ।
न्यासं कृत्वा तु पञ्चाङ्गं रक्तपुष्पाणि होमयेत् ।
सङ्ग्रामे सैन्यभङ्गस्स्यात्त्रैलोक्यविजया पठात् ॥ ३ ॥
ओं बहुरूपाय स्तंभय स्तंभय ओं मोहय ओं सर्वशत्रून् द्रावय ओं ब्रह्माणमाकर्षय ओं विष्णुमाकर्षय ओं महेश्वरमाकर्षय ओं इन्द्रं चालय ओं पर्वतान् चालय ओं सप्तसागराञ्छोषय ओं छिन्दि छिन्दि बहुरूपाय नमः ॥ ४ ॥
भुजङ्गनाम्नीमुन्मूर्तिसंस्थां विद्याधरीं ततः ॥ ५ ॥
॥ इति श्रीमहापुराणे आग्नेये उमामहेश्वर संवादे युद्धजयार्णवे त्रैलोक्यविजयविद्यानाम चतुस्त्रिंशदधिकशततमोध्यायः सम्पूर्णः ॥
त्रैलोक्यविजयविद्या - परिचय (Introduction)
त्रैलोक्यविजयविद्या का वर्णन अग्नि पुराण के 134वें अध्याय में मिलता है। यह प्रसंग 'उमा-महेश्वर संवाद' के अंतर्गत आता है, जहाँ भगवान शिव ने देवी पार्वती को युद्ध में निश्चित विजय (Sure Victory) प्राप्त करने के रहस्य बताए हैं। इसे 'युद्धजयार्णव' (Victory in War) के नाम से भी जाना जाता है।
यह विद्या एक अत्यंत उग्र और प्रलयंकारी देवी का आवाहन है, जिनका स्वरूप महाकाली या चामुंडा के समान भयंकर है। वे नील वर्ण (Blue Complexioned) की हैं, 20 भुजाओं (20 Arms) से युक्त हैं और युद्धभूमि में शत्रुओं के शवों (Corpses) पर खड़ी होकर नृत्य करती हैं।
महत्त्व और लाभ (Significance & Benefits)
"सङ्ग्रामे सैन्यभङ्गस्स्यात्... सर्वयन्त्रविमर्दिनीम्..."
यह विद्या युद्ध में शत्रु सेना को भंग (Destroy/Disperse) करने वाली और सभी प्रकार के दुष्ट यन्त्रों (Evil Spells) को नष्ट करने वाली है।
यह विद्या युद्ध में शत्रु सेना को भंग (Destroy/Disperse) करने वाली और सभी प्रकार के दुष्ट यन्त्रों (Evil Spells) को नष्ट करने वाली है।
- शत्रु सेना विध्वंस (Destruction of Enemy Army): प्राचीन काल में राजा इसका प्रयोग युद्ध जीतने के लिए करते थे। आज के संदर्भ में, यह कानूनी लड़ाई (Litigation), प्रतिस्पर्धी (Competitors) या विरोधियों के समूह को परास्त करने में अचूक है।
- सर्व यन्त्र विमर्दिनी: यदि किसी ने तन्त्र-मन्त्र या यन्त्र द्वारा कोई बंधन (Black Magic) किया हो, तो यह विद्या उसे तत्काल नष्ट (Crush) कर देती है।
- भय नाश: मन्त्र के बीजाक्षर (हूं, क्षूं, ह्रूं) और शब्द (हिलि हिलि, किलि किलि) साधक के भीतर असीम साहस और निर्भयता का संचार करते हैं।
- तीनों लोकों पर विजय: 'त्रैलोक्य विजये' - यह साधक को अपने मन, इन्द्रियों और बाहरी परिस्थितियों पर पूर्ण नियंत्रण प्रदान करती है।
साधना और पूजन विधि (Ritual Method)
शास्त्रों में इस विद्या की सिद्धि के लिए विशिष्ट 'हवन' और 'ध्यान' का विधान बताया गया है।
- ध्यान (Visualization):
"नीलवर्णां प्रेतसंस्थां विंशहस्तां यजेज्जये"
साधक को ध्यान करना चाहिए कि देवी का वर्ण गहरा नीला है, वे 20 भुजाओं वाली हैं और युद्धभूमि में प्रेत (शव) के ऊपर विराजमान हैं। यह रौद्र ध्यान शत्रुओं के मनोबल को तोड़ने के लिए आवश्यक है। - रक्त पुष्प हवन (Red Flower Homa):
इस मन्त्र की सिद्धि के लिए लाल फूलों (Red Flowers) का हवन अनिवार्य बताया गया है। कनेर (Oleander) या गुड़हल (Hibiscus) के फूलों को घी में डुबोकर "स्वाहा" के साथ अग्नि में आहुति दें। - न्यास (Nyasa): पाठ शुरू करने से पहले 'पंचांग न्यास' (Panchanga Nyasa) करें ताकि शरीर और मन सुरक्षित रहे।
- दिशा (Direction): युद्ध या शत्रु नाश के लिए 'दक्षिण' (South) दिशा की ओर मुख करके पाठ या हवन करें।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. 'त्रैलोक्यविजयविद्या' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'तीनों लोकों को जीतने वाली विद्या'। यह साधक को भौतिक (Physical), मानसिक (Mental) और आध्यात्मिक (Spiritual) तीनों स्तरों पर विजय और नियंत्रण प्रदान करती है।
2. यह मन्त्र किस ग्रंथ से लिया गया है?
यह मन्त्र 'अग्नि पुराण' के 134वें अध्याय से उद्धृत है, जो 'युद्धजयार्णव' (युद्ध में विजय का महासागर) प्रकरण का हिस्सा है। इसे भगवान शिव ने देवी उमा को सुनाया था।
3. देवी का स्वरूप कैसा है?
शास्त्रों में देवी का स्वरूप अत्यंत उग्र बताया गया है। वे नील वर्ण (Blue complexioned) की हैं, उनकी 20 भुजाएं हैं, और वे प्रेत (शव) पर आरूढ़ होकर शत्रुओं का नाश करती हैं।
4. मन्त्र में 'रक्तपुष्पाणि होमयेत्' का क्या महत्त्व है?
इसका अर्थ है 'लाल फूलों से हवन करें'। लाल रंग शक्ति और उग्रता का प्रतीक है। देवी को प्रसन्न करने और शत्रु नाश के लिए लाल कनेर या गुड़हल (Hibiscus) के फूलों की आहुति दी जाती है।
5. क्या यह मन्त्र कोर्ट-कचहरी में जीत दिला सकता है?
हाँ, चूंकि यह 'युद्ध जय' (Victory in War) की विद्या है, इसलिए आधुनिक युग में मुकदमे, वाद-विवाद और चुनाव आदि में विजय प्राप्ति के लिए यह अचूक माना जाता है।
6. 'सैन्यभंग' का क्या अर्थ है?
मन्त्र फल में कहा गया है: 'सङ्ग्रामे सैन्यभङ्गस्स्यात्'। इसका अर्थ है कि इस मन्त्र के प्रभाव से शत्रु की पूरी सेना (Army/Organization) में भगदड़ मच जाती है और वे परास्त हो जाते हैं।
7. मन्त्र में 'हिलि हिलि, किलि किलि' शब्दों का क्या अर्थ है?
ये तांत्रिक ध्वनि-संकेत (Sound Vibrations) हैं जो वातावरण में प्रचंड ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। इनका कोई शाब्दिक अर्थ नहीं, बल्कि ध्वन्यात्मक प्रभाव (Sonic Effect) होता है जो शत्रु को भयभीत करता है।
8. क्या इसे घर पर जपा जा सकता है?
यह उग्र मन्त्र है। इसे घर के बजाय मंदिर, एकांत स्थान या विशेष साधना कक्ष में जपना बेहतर है। यदि घर पर करें, तो सात्विकता और पवित्रता का कड़ा पालन करें।
9. साधना के लिए कौन सी दिशा शुभ है?
शत्रु विजय और उग्र कर्मों के लिए 'दक्षिण' (South) दिशा उपयुक्त है। सामान्य विजय और शक्ति अर्जन के लिए 'पूर्व' (East) दिशा की ओर मुख करें।
10. क्या स्त्रियां यह मन्त्र जप सकती हैं?
हाँ, शक्ति साधना में स्त्री-पुरुष का भेद नहीं है। माँ आदिशक्ति स्वयं स्त्री स्वरूपा हैं, इसलिए महिलाएं भी अपनी रक्षा और विजय के लिए इसका पाठ कर सकती हैं।
