॥ श्री विपरीत प्रत्यङ्गिरा मालामन्त्रः ॥
ओं ओं ओं ओं ओं कुं कुं कुं मां सां खां चां लां क्षां ओं ह्रीं ह्रीं ओं ओं ह्रीं वां धां मां सां रक्षां कुरु ।
ओं ह्रीं ह्रीं ओं सः हुं ओं क्षौं वां लां धां मां सां रक्षां कुरु ।
ओं ओं हुं प्लुं रक्षां कुरु ।
ओं नमो विपरीत प्रत्यङ्गिरायै विद्याराज्ञि त्रैलोक्यवशङ्करि (तुष्टिपुष्टिकरि) सर्वपीडापहारिणि सर्वापन्नाशिनि सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिनि मोदिनि सर्वशस्त्राणां भेदिनि क्षोभिणि तथा परमन्त्रतन्त्रयन्त्रविषचूर्ण-सर्वप्रयोगादीनन्येषां निवर्तयित्वा यत्कृतं तन्मे अस्तु कलिपातिनि सर्वहिंसा मा कारयति अनुमोदयति मनसा वाचा कर्मणा ये देवाऽसुरराक्षसास्तिर्यग्योनि-सर्वहिंसका विरूपेकं कुर्वन्ति मम मन्त्रतन्त्रयन्त्रविषचूर्ण-सर्वप्रयोगादीनात्महस्तेन यः करोति करिष्यति कारयिष्यति तान् सर्वान्येषां निवर्तयित्वा पातय कारय मस्तके स्वाहा ॥
॥ इति भैरवतन्न्रान्तर्गत श्री विपरीत प्रत्यङ्गिरा मालामन्त्रः सम्पूर्णः ॥
संलिखित ग्रंथ
श्री विपरीत प्रत्यङ्गिरा मालामन्त्र - परिचय (Introduction)
श्री विपरीत प्रत्यङ्गिरा मालामन्त्रः भैरव तंत्र का एक अत्यंत गोपनीय अस्त्र है। जहाँ सामान्य मन्त्र 'जप' (Chanting) के लिए होते हैं, वहीं 'मालामन्त्र' एक सुगठित 'रक्षा-चक्र' (Protection Grid) का निर्माण करते हैं।
इस मन्त्र में देवी को 'विद्याराज्ञी' (समस्त विद्याओं की महारानी) और 'त्रैलोक्यवशंकरी' (तीनों लोकों को वश में करने वाली) कहकर पुकारा गया है। इसका मुख्य कार्य केवल रक्षा करना नहीं, बल्कि 'विपरीत' (Reversal) क्रिया द्वारा शत्रु के प्रहार को उसी की ओर मोड़ देना है।
महत्त्व और लाभ (Significance & Benefits)
"परमन्त्र तन्त्र यन्त्र विष चूर्ण... निवर्तयित्वा..."
भावार्थ: दूसरों द्वारा किये गए मन्त्र, तन्त्र, यन्त्र, विष (Poison) और चूर्ण (Powders) के प्रयोगों को पूरी तरह 'लौटाकर' (Reverse) निष्प्रभावी कर दें।
भावार्थ: दूसरों द्वारा किये गए मन्त्र, तन्त्र, यन्त्र, विष (Poison) और चूर्ण (Powders) के प्रयोगों को पूरी तरह 'लौटाकर' (Reverse) निष्प्रभावी कर दें।
- पूर्ण अभिचार मुक्ति: यह मन्त्र न केवल जादू-टोने को काटता है, बल्कि 'खिलाए-पिलाए' गए पदार्थों (विष/चूर्ण) के दुष्प्रभाव को भी शरीर से बाहर निकालता है।
- सर्व पीड़ा अपहारिणी: देवी 'सर्वपीडापहारिणि' हैं, अर्थात वे शारीरिक रोग, मानसिक तनाव और आध्यात्मिक बाधाओं—तीनों प्रकार की पीड़ाओं का हरण करती हैं।
- अस्त्र-शस्त्र भेदन: 'सर्वशस्त्राणां भेदिनि' - यह मन्त्र शत्रुओं के भौतिक और दैविक, सभी प्रकार के अस्त्रों को भेदने (Destroy/Neutralize) की क्षमता रखता है।
- दंड विधान: मन्त्र के अंत में 'मस्तके पातय' (सिर पर गिराओ) का आदेश है, जो यह सुनिश्चित करता है कि बुराई करने वाले को उसके कर्मों का दंड तत्काल मिले।
साधना और प्रयोग विधि (Ritual Method)
मालामन्त्र की साधना में दिशा और सामग्री का विशेष महत्त्व है। यह एक 'संहार' और 'प्रत्यावर्तन' (Reversal) प्रक्रिया है।
- दिशा (Direction): साधक को दक्षिण (South) दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए, क्योंकि यह दिशा यम और संहार की मानी जाती है।
- निवारण प्रयोग: यदि किसी व्यक्ति पर तंत्र बाधा हो, तो एक नींबू (Lemon) या कुष्मांड (Ash Gourd/Petha) लेकर उसे रोगी के ऊपर से 7 बार 'उल्टा' (Anti-clockwise) घुमाएं। फिर इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए उसे तेज चाकू से काट दें। यह शत्रु के प्रयोग को 'काटने' का प्रतीक है।
- समय (Time): इस प्रयोग के लिए मध्यरात्रि (Midnight) या गोधूलि बेला (जब दिन और रात मिल रहे हों) सबसे उपयुक्त है।
- रक्षा सूत्र: इस मन्त्र को भोजपत्र पर लिखकर और ताबीज (कवच) में भरकर गले या भुजा में धारण करने से 24 घंटे रक्षा होती है।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. 'मालामन्त्र' (Mala Mantra) क्या है?
'मालामन्त्र' मन्त्रों की एक लंबी श्रृंखला या माला होती है। सामान्य मन्त्र की तुलना में इसमें बीजाक्षरों और आदेशात्मक वाक्यों (Commands) का विस्तृत समावेश होता है, जो इसे एक अभेद्य सुरक्षा कवच बनाता है।
2. 'सर्व प्रयोग निवर्तयित्वा' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'सभी प्रयोगों को वापस लौटाकर'। यह वाक्यांश मन्त्र की मूल क्रिया है, जो शत्रु द्वारा किये गए किसी भी तांत्रिक प्रयोग को बीच में रोककर उसे वापस भेज देता है।
3. देवी को 'विद्याराज्ञी' क्यों कहा गया है?
'विद्याराज्ञी' का अर्थ है 'विद्याओं की रानी'। प्रत्यङ्गिरा सभी तांत्रिक विद्याओं और सिद्धियों की स्वामिनी हैं, इसलिए उनकी अनुमति के बिना कोई भी क्षुद्र विद्या (Black Magic) प्रभाव नहीं डाल सकती।
4. क्या यह मन्त्र विष (Poison) और चूर्ण (Powders) का असर काट सकता है?
हाँ, मन्त्र में स्पष्ट उल्लेख है: 'विषचूर्ण-सर्वप्रयोगादीन्'। यह खिलाए-पिलाए गए विषैले पदार्थों और वशीकरण चूर्णों के प्रभाव को शरीर से बाहर निकाल फेंकता है।
5. साधना के लिए कौन सी दिशा श्रेष्ठ है?
चूंकि यह 'विपरीत' (Reversal) साधना है, इसलिए शत्रु नाश और नकारात्मकता को वापस भेजने के लिए 'दक्षिण' (South) दिशा की ओर मुख करना चाहिए।
6. 'त्रैलोक्यवशंकरी' का क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ है 'तीनों लोकों को वश में करने वाली'। यह शक्ति साधक को न केवल सुरक्षा देती है, बल्कि उसके व्यक्तित्व में ऐसा आकर्षण और तेज भर देती है जिससे जगत वशीभूत होता है।
7. क्या हवन में नींबू या पेठे का प्रयोग होता है?
हाँ, इस उग्र साधना में शत्रु-प्रयोग को 'काटने' (Cutting) के प्रतीक के रूप में नींबू (Lemon) या कुष्मांड (Ash Gourd/Petha) की बलि (काटना) दी जाती है।
8. मन्त्र में 'मस्तके पातय' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है '(शत्रु के) मस्तक पर गिराओ'। यह देवी से प्रार्थना है कि शत्रु ने जो बुराई भेजी है, उसे उसी के सिर पर वापस डाल दिया जाए।
9. क्या इसे बिना गुरु के जपा जा सकता है?
मालामन्त्र अत्यंत शक्तिशाली और उग्र होते हैं। इसे गुरु दीक्षा के बाद या कम से कम किसी सिद्ध साधक के मार्गदर्शन में ही जपना सुरक्षित है।
10. इस मन्त्र का पाठ कब करना चाहिए?
गहन संकट, शत्रु भय, या ऊपरी बाधा महसूस होने पर। नियमित रूप से इसे अमावस्या या अष्टमी की रात्रि को जपना चाहिए।
