॥ श्री काली प्रत्यङ्गिरा मालामन्त्रः ॥
श्रीदेव्युवाच
कथयेशान सर्वज्ञ यतोऽहं तव वल्लभा ।
या प्रोक्ता त्वया नाथ सिद्धविद्या पुरा दश ।
तासां प्रत्यङ्गिराख्यं तु कवचं चैकशः परम् ॥ १ ॥
श्रीशिव उवाच
शृणु प्रिये प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं परम् ।
विना येन न सिद्ध्यन्ति मन्त्राः कोटिक्रियान्विता ॥ २ ॥
प्रत्यङ्ग रक्षणकरी तेन प्रत्यङ्गिरा मता ।
काली प्रत्यङ्गिरा वक्ष्ये शृणुष्वावहितानघे ॥ ३ ॥
श्रीदेव्युवाच
प्रभो प्रत्यङ्गिराविद्या सर्वविद्योत्तमा स्मृता ।
अभिचारादि दोषाणां नाशिनी सिद्धिदायिनी ।
मह्यं तत् कथयस्वाद्य करुणा यदि ते मयि ॥ ४ ॥
श्रीशिव उवाच
साधु साधु महादेवि त्वं हि संसारमोचिनी ।
शृणुष्व सुखचित्तेन वक्ष्ये देवि समासतः ॥ ५ ॥
देवि प्रत्यङ्गिराविद्या सर्वग्रहनिवारिणी ।
मर्दिनी सर्वदुष्टानां सर्वपापप्रमोचिनी ॥ ६ ॥
स्त्री बाल प्रभृतीनां च जन्तूनां हितकारिणी ।
सौभाग्यजननी देवि बलपुष्टिकरी सदा ॥ ७ ॥
अङ्गिरास्य मुनिप्रोक्तश्छन्दोनुष्टुपुदाहृतः ।
देवता च स्वयं काली काम्येषु विनियोजयेत् ॥ ८ ॥
विनियोगः
ओं ओं ओं अस्य श्री प्रत्यङ्गिरा मन्त्रस्य श्री अङ्गिरा ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्री काली प्रत्यङ्गिरा देवता हूं बीजं ह्रीं शक्तिः क्रीं कीलकं ममाभीष्टसिद्धये पाठे विनियोगः ।
अङ्गन्यासः
श्री अङ्गिरा ऋषये नमः शिरसि ।
अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे ।
श्री काली प्रत्यङ्गिरा देवतायै नमः हृदि ।
हूं बीजाय नमः गुह्ये ।
ह्रीं शक्तये नमः पादयोः ।
क्रीं कीलकाय नमः सर्वाङ्गे ।
ममाभीष्टसिद्धये पाठे विनियोगाय नमः अञ्जलौ ॥
ध्यानम्
भुजैश्चतुर्भिर्धृत तीक्ष्णबाण-
-धनुर्वराभीश्च शवाङ्घ्रियुग्मा ।
रक्ताम्बरा रक्ततनुस्त्रिनेत्रा
प्रत्यङ्गिरेयं प्रणतं पुनातु ॥
॥ मालामन्त्रः ॥
ओं नमः सहस्रसूर्येक्षणाय श्रीकण्ठानादिरूपाय पुरुषाय पुरुहूताय ऐं महासुखायव्यापिने महेश्वराय जगत्सृष्टिकारिणे ईशानाय सर्वव्यापिने महाघोरातिघोराय ओं ओं ओं प्रभावं दर्शय दर्शय । ओं ओं ओं हिलि हिलि ओं ओं ओं विद्युज्जिह्वे बन्ध बन्ध मथ मथ प्रमथ प्रमथ विध्वंसय विध्वंसय ग्रस ग्रस पिब पिब नाशय नाशय त्रासय त्राशय विदारय विदारय मम शत्रून् खाहि खाहि मारय मारय मां सपरिवारं रक्ष रक्ष करिकुम्भस्तनि सर्वापद्रवेभ्यः । ओं महा मेघौघ राशि संवर्तक विद्युदन्त कपर्दिनि दिव्यकनकाम्भोरुह विकचमालाधारिणि परमेश्वरप्रिये छिन्धि छिन्धि विद्रावय विद्रावय देवि पिशाच नागासुर गरुड किन्नर विद्याधर गन्धर्व यक्ष राक्षस लोकपालान् स्तम्भय स्तम्भय कीलय कीलय घातय घातय विश्वमूर्ति महातेजसे ओं हूं सः मम शत्रूणां विद्यां स्तम्भय स्तम्भय ओं हूं सः मम शत्रूणां मुखं स्तम्भय स्तम्भय ओं हूं सः मम शत्रूणां हस्तौ स्तम्भय स्तम्भय ओं हूं सः मम शत्रूणां पादौ स्तम्भय स्तम्भय ओं हूं सः मम शत्रूणां गृहागत कुटुम्ब मुखानि स्तम्भय स्तम्भय स्थानं कीलय कीलय ग्रामं कीलय कीलय मण्डलं कीलय कीलय देशं कीलय कीलय सर्वसिद्धि महाभागे धारकस्य सपरिवारस्य शान्तिं कुरु कुरु फट् स्वाहा ॥ १ ॥
ओं ओं ओं ओं ओं अं अं अं अं अं हूं हूं हूं हूं हूं खं खं खं खं खं फट् स्वाहा ॥ २ ॥
जय प्रत्यङ्गिरे धारकस्य सपरिवारस्य मम रक्षां कुरु कुरु ओं हूं सः जय जय स्वाहा ॥ ३ ॥
ओं ऐं ह्रीं श्रीं ब्रह्माणि मम शिरो रक्ष रक्ष हूं स्वाहा ॥ ४ ॥
ओं ऐं ह्रीं श्रीं कौमारि मम वक्त्रं रक्ष रक्ष हूं स्वाहा ॥ ५ ॥
ओं ऐं ह्रीं श्रीं वैष्णवि मम कण्ठं रक्ष रक्ष हूं स्वाहा ॥ ६ ॥
ओं ऐं ह्रीं श्रीं नारसिंहि मम उदरं रक्ष रक्ष हूं स्वाहा ॥ ७ ॥
ओं ऐं ह्रीं श्रीं इन्द्राणि मम नाभिं रक्ष रक्ष हूं स्वाहा ॥ ८ ॥
ओं ऐं ह्रीं श्रीं चामुण्डे मम गुह्यं रक्ष रक्ष हूं स्वाहा ॥ ९ ॥
ओं नमो भगवति उच्छिष्टचाण्डालिनि त्रिशूलवज्राङ्कुशधरे मांसभक्षिणि खट्वाङ्ग कपाल वज्राऽसिधारिणि दह दह धम धम सर्व दुष्टान् ग्रस ग्रस ओं ऐं ह्रीं श्रीं फट् स्वाहा ॥ १० ॥
ओं दंष्ट्राकरालि मम मन्त्रतन्त्रबृन्दादीन् विषशास्त्राभिचारकेभ्यो रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ ११ ॥
स्तम्भिनी मोहिनी चैव क्षोभिणी द्राविणी तथा ।
जृम्भिणी त्रासिनी रौद्री तथा संहारिणीति च ॥ १२ ॥
शक्तयः क्रम योगेन शत्रुपक्षे नियोजिताः ।
धारिताः साधकेन्द्रेण सर्वशत्रुनिवारिणी ॥ १३ ॥
ओं स्तम्भिनि स्फ्रें मम शत्रून् स्तम्भय स्तम्भय स्वाहा ।
ओं मोहिनि स्फ्रें मम शत्रून् मोहय मोहय स्वाहा ।
ओं क्षोभिणि स्फ्रें मम शत्रून् क्षोभय क्षोभय स्वाहा ।
ओं द्राविणि स्फ्रें मम शत्रून् द्रावय द्रावय स्वाहा ।
ओं जृम्भिणि स्फ्रें मम शत्रून् जृम्भय जृम्भय स्वाहा ।
ओं त्रासिनि स्फ्रें मम शत्रून् त्रासय त्रासय स्वाहा ।
ओं रौद्रि स्फ्रें मम शत्रून् सन्तापय सन्तापय स्वाहा ।
ओं संहारिणि स्फ्रें मम शत्रून् संहारय संहारय स्वाहा ॥ १४ ॥
॥ फलश्रुतिः (Benefits) ॥
य इमां धारयेद्विद्यां त्रिसन्ध्यं वाऽपि यः पठेत् ।
सोऽपि व्यथागतश्चैव हन्याच्छत्रून् न संशयः ॥ १ ॥
सर्वतो रक्षतो देवि भयेषु च विपत्तिषु ।
महाभयेषु सर्वेषु न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २ ॥
विद्यानामुत्तमा विद्या वाचिता धारिता पुनः ।
लिखित्वा च करे कण्ठे बाहो शिरसि धारयेत् ॥ ३ ॥
स मुच्यते महाघोरैर्मृत्युतुल्यैर्दुरासदै ।
दुष्ट ग्रह व्याल चौर रक्षो यक्ष गणास्तथा ॥ ४ ॥
पीडां न तस्य कुर्वन्ति ये चान्ये पीडकाग्रहाः ।
हरिचन्दनमिश्रेण गोरोचनकुङ्कमेन च ॥ ५ ॥
लिखित्वा भूर्जपत्रे तु धारणीया सदा नृभिः ।
पुष्पधूपविचित्रैश्च बल्युपहार वन्दनैः ॥ ६ ॥
पूजयित्वा यथा न्यायं त्रिलोहेनैव वेष्टयेत् ।
धारयेद्य इमां मन्त्री लिखित्वा रिपुनाशिनीम् ॥ ७ ॥
विलयं यान्ति रिपवः प्रत्यङ्गिरा विधारणात् ।
यं यं स्पृशति हस्तेन यं यं खादति जिह्वया ॥ ८ ॥
अमृतत्वं भवेत् तस्य मृत्युर्नास्ति कदाचन ।
त्रिपुरं तु मया दग्धमिमं मन्त्रं विजानता ॥ ९ ॥
निर्जितास्ते सुराः सर्वे देवैर्विद्याधरादिभिः ।
दिव्यैर्मन्त्रपदैर्गुह्यैः सुखोपायैः सुरक्षितैः ॥ १० ॥
पठेद्रक्षाविधानेन मन्त्रराज प्रकीर्तितः ।
क्रान्ता दमनकं चैव रोचनं कुङ्कुमं तथा ॥ ११ ॥
अरुष्करं विषाविष्टं सिद्धार्थं मालतीं तथा ।
एतद्द्रव्यगणं भद्रे गोलमध्ये निधापयेत् ।
संस्कृतं धारयेन्मन्त्री साधको ब्रह्मवित् सदा ॥ १२ ॥
॥ इति श्रीअङ्गिरा ऋषि कृतं श्री काली प्रत्यङ्गिरा मालामन्त्रम् ॥
श्री काली प्रत्यङ्गिरा मालामन्त्रः - परिचय (Introduction)
श्री काली प्रत्यङ्गिरा मालामन्त्रः माँ महाकाली और माँ प्रत्यङ्गिरा का एक दुर्लभ और अत्यंत उग्र संयुक्त स्वरूप है। भगवान शिव द्वारा माँ पार्वती को उपदेशित यह विद्या 'सर्व विद्या उत्तमा' (सभी विद्याओं में श्रेष्ठ) मानी गई है।
ध्यान में देवी का वर्णन 'रक्ताम्बरा' (लाल वस्त्र धारण करने वाली) और 'रक्ततनु' (लाल शरीर वाली) के रूप में किया गया है। यह उनका 'तामसिक' या 'संहार' रूप नहीं, बल्कि 'राजसिक' और 'क्रियाशील' रूप है जो भक्तों की रक्षा और शत्रुओं के नाश के लिए तत्पर रहता है।
महत्त्व और लाभ (Significance & Benefits)
"य इमां धारयेद्विद्यां... हन्याच्छत्रून् न संशयः"
भावार्थ: जो इस विद्या को धारण करता है या तीनों संध्याओं में इसका पाठ करता है, वह निश्चित रूप से अपने शत्रुओं का नाश कर देता है।
भावार्थ: जो इस विद्या को धारण करता है या तीनों संध्याओं में इसका पाठ करता है, वह निश्चित रूप से अपने शत्रुओं का नाश कर देता है।
- शत्रु स्तम्भन: यह मन्त्र शत्रुओं की वाणी, बुद्धि और गति को जड़वत (स्तम्भित) कर देता है।
- महाभय निवारण: यह साधक को मृत्यु तुल्य कष्टों, घोर संकटों और भय से मुक्त करता है।
- ग्रह और बाधा नाश: दुष्ट ग्रह, यक्ष, राक्षस, और ऊपरी हवाओं का प्रभाव इस मन्त्र के साधक के पास नहीं फटकता।
- अजेय रक्षा: इसे धारण करने वाला व्यक्ति देवताओं और विद्याधरों द्वारा भी अजेय हो जाता है।
धारण विधि (Ritual for Wearing)
ग्रंथ के अनुसार, इस मन्त्र को एक विशेष यन्त्र के रूप में धारण करने का विधान है, जिससे यह एक शक्तिशाली रक्षा कवच बन जाता है।
- लेखन सामग्री: भूर्जपत्र (Bhojpatra) पर गोरोचन (Gorochan) और कुमकुम (Kumkum) को हरिचंदन (सफ़ेद चन्दन) में मिलाकर स्याही बनाएं।
- कलम: अनार की कलम या सोने की सलाई से इस मन्त्र (या मन्त्र के प्रमुख बीजों) को लिखें।
- कवच: लिखित यन्त्र को त्रिलोह (Tri-loha - सोना, चाँदी, तांबा मिश्रित धातु) के ताबीज (कवच) में बंद करें।
- पूजन: लाल फूल, धूप और नैवेद्य से विधिवत पूजन करें।
- धारण: इसे भुजा, गले या सिर पर धारण करें। यह शत्रुओं का नाश करने वाला (रिपुनाशिनी) अमोघ अस्त्र सिद्ध होगा।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. 'काली प्रत्यङ्गिरा' का स्वरूप कैसा है?
इस मन्त्र के ध्यान में देवी का वर्णन 'रक्ताम्बरा' (लाल वस्त्र वाली) और 'रक्ततनु' (लाल शरीर वाली) के रूप में किया गया है। यह उनका उग्र, क्रियाशील और तत्काल फल देने वाला स्वरूप है।
2. इस मन्त्र का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
इसका सबसे बड़ा लाभ 'अभिचार नाश' (Black Magic Removal) और 'शत्रु स्तम्भन' है। यह भयानक से भयानक शत्रु और ग्रह दोषों को भी शांत कर देता है।
3. यन्त्र लेखन की विधि क्या है?
ग्रंथ के अनुसार, इस मन्त्र को 'भूर्जपत्र' पर 'गोरोचन' और 'कुमकुम' व 'हरिचंदन' के मिश्रण से लिखकर धारण करने का विधान है।
4. 'त्रिलोह' (Tri-loha) कवच का क्या महत्त्व है?
इस मन्त्र को लिखकर तांबे, चाँदी और सोने (त्रिलोह) के कवच (ताबीज) में धारण करने से यह अभेद्य सुरक्षा प्रदान करता है।
5. क्या यह मन्त्र ग्रह दोषों को दूर करता है?
हाँ, फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है कि यह 'दुष्ट ग्रह', 'राक्षस', 'यक्ष' और अन्य सभी प्रकार की ऊपरी बाधाओं से मुक्ति दिलाता है।
6. इस मन्त्र के ऋषि कौन हैं?
इस मन्त्र के ऋषि 'श्री अंगिरा' (Sri Angira) हैं, जिन्होंने सर्वप्रथम इस विद्या का साक्षात्कार किया था।
7. पाठ के लिए कौन सा समय उपयुक्त है?
त्रिकाल संध्या (प्रातः, मध्याह्न, सायं) या मध्यरात्रि का समय इस मन्त्र की सिद्धि के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
8. क्या इसे बिना गुरु दीक्षा के जपा जा सकता है?
चूंकि यह एक 'माला मन्त्र' है और इसमें बीज मन्त्रों का प्रयोग है, गुरु से दीक्षा लेकर जपना अधिक सुरक्षित और फलदायी होता है।
9. नैवेद्य (भोग) में क्या चढ़ाना चाहिए?
माँ को गुड़, लाल फल, या मिश्री का भोग प्रिय है। तांत्रिक पूजा में विशेष बलि का विधान भी होता है, जो गुरु निर्देशानुसार ही करें।
10. क्या यह मन्त्र मृत्यु तुल्य कष्टों से बचा सकता है?
जी हाँ, श्लोक 8-9 के अनुसार, जो साधक इसे धारण करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता और वह 'मृत्युतुल्य' कष्टों से मुक्त हो जाता है।
