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Sri Pratyangira Sahasrakshari Mantra – श्री प्रत्यङ्गिरा सहस्राक्षरी मन्त्रः

Sri Pratyangira Sahasrakshari Mantra – श्री प्रत्यङ्गिरा सहस्राक्षरी मन्त्रः
॥ श्री प्रत्यङ्गिरा सहस्राक्षरी मन्त्रः ॥ विनियोगः अस्य श्रीप्रत्यङ्गिरा सहस्राक्षरी मन्त्रस्य भैरव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीप्रत्यङ्गिरा देवताः क्रीं बीजं ह्रीं शक्तिः हूं कीलकं श्रीप्रत्यङ्गिरा देवता प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥ ऋष्यादिन्यासः भैरव ऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे । श्री प्रत्यङ्गिरा देवतायै नमः हृदि । क्रीं बीजाय नमः गुह्ये । ह्रीं शक्तये नमः पादयोः । हूं कीलकाय नमः नाभौ । विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥ करन्यासः ओं क्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ओं क्रीं तर्जनीभ्यां नमः । ओं क्रूं मध्यमाभ्यां नमः । ओं क्रैं अनामिकाभ्यां नमः । ओं क्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ओं क्रः करतल करपृष्ठाभ्यां नमः । हृदयादिन्यासः ओं क्रां हृदयाय नमः । ओं क्रीं शिरसे स्वाहा । ओं क्रूं शिखायै वषट् । ओं क्रैं कवचाय हुम् । ओं क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् । ओं क्रः अस्त्राय फट् । ध्यानम् सिंहारूढां कृष्णवर्णां भीषणां नीलविग्रहां । ज्वालामुखीं शूलकरां ग्रसन्तीं रिपुमञ्जसाम् ॥ १ ॥ व्याघ्रचर्माम्बरधरां सितशार्दूलवाहिनीं । विकरालमुखीं तिग्मदंष्ट्रां कृच्छ्रादिभूषणाम् ॥ २ ॥ दधतीं छुरिकावज्रशूलतोमरकाङ्करैः । भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गीं नीलकुञ्चितकुन्तलाम् ॥ ३ ॥ भयङ्करीं तु दुष्टानां भक्तानामभयङ्करीं । चिन्तनीयां सदा देवैः चेतसा परमेश्वरीम् ॥ ४ ॥ ॥ सहस्राक्षरी मन्त्र (Sahasrakshari Mantra) ॥ ओं नमश्चामुण्डायै अभय-वर-कपालमाला-धरे गृद्ध्रोलूककङ्कपरिवारे श्मशानप्रिये नररुधिरमांसप्रियभोजने सिद्धविद्याधर वन्दितचरणे ब्रह्म-सूर्य-शशि-यम-वरुण-कुबेर-विष्णु-पूजिते रुद्रकोटिनिर्गतशरीरे द्वादशादित्यप्रभे एहि चामुण्डास्वरूपिणि, अस्मिन् मण्डले प्रविश शीघ्रं दक्षिणां दिशं असिभिः पूरय पूरय धुनु-धुनु विधुन-विधुन कटु-कटु चूर्णय-चूर्णय आवेशय-आवेशय प्रवेशय-प्रवेशय स्फोटय-स्फोटय त्रोटय-त्रोटय धियं रोधय-रोधय पातालं स्तम्भय-स्तम्भय परमुद्रां स्फोटय-स्फोटय अन्यभूतानि जम्भय [जम्भय] ब्रह्मराक्षसान् उत्सादय-उत्सादय भूतप्रेतपिशाचान् मोचय-मोचय वृक्षान् सङ्क्रामय-सङ्क्रामय नदीं चालय-चालय अग्निं स्तम्भय-स्तम्भय नदां कीलय-कीलय अङ्गारान् वृक्षस्योपरि पातय-पातय सीलिवमभितोलूखले पीडय-पीडय नदीं परिवर्तय-परिवर्तय पात्रं पूरय-पूरय भूतं भव्यं भविष्यं यत् किञ्चित् कथय-कथय हन-हन दह-दह पच-पच मथ-मथ प्रमथ-प्रमथ कट-कट ग्रस-ग्रस विद्रावय-विद्रावय उत्सादय-उत्सादय विष्णुचक्रेण रुद्रत्रिशूलेन इन्द्रवज्रेण वरुणपाशेन यमदण्डेन गरुडपक्षपातेन विषं निर्विषं कुरु-कुरु ज्वरं नाशय-नाशय विरोधीन् स्फोटय-स्फोटय यन्त्रं भञ्जय-भञ्जय सत्यं साधय-साधय सिद्धिं प्रयच्छ सर्वसत्त्वानि वशं कुरु-कुरु पातय-पातय पश्चिमदिशं स्तम्भय-स्तम्भय दक्षिणदिशं रोधय-रोधय ज्वालिनि जृम्भिणि स्तम्भिनि भृकुटी विचित्रहारमण्डलविभूषित नाना नाग वासुकी कृत हार भूषण शरीरे नमो लेलिहानि विकृतमेखले मरुहृच्छरीरे चन्द्रार्काभा प्रभञ्जनीये विद्युत् स्फटिकसङ्काश अट्‍टहासिनी वेतालप्रिये क्रीङ्कार हुङ्कार जृम्भणीये मुसलपट्‍टिशतोमरछुरिकाविग्रहे सहस्रबाहुधारिणी ओङ्कारहृदये विष्णुभावशरीरे सर्वदुष्टान् विनाशय-विनाशय विदारय-विदारय योजनशतं रक्ष-रक्ष नगरान् निर्विषं कुरु-कुरु पवनान् नाशय-नाशय भयान् मोचय-मोचय वृक्षाश्चूर्णय-चूर्णय शस्त्रमस्त्रं नष्टं कुरु-कुरु सेनां त्रोटय-त्रोटय गोभक्षकाणां तुण्डं बन्धं कुरु-कुरु ओं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः एकविंशति जपादग्निं विदारय ऊर्ध्वप्रलम्बकेशे नीलाम्बरे सितशार्दूलप्रिये महा आवर्तबले भैरवरूपेण हर-हर प्रयच्छ-प्रयच्छ रुद्ररूपेण यत्कालदृष्टं तत्सर्वं उल्कापय उल्कापय कालकूटविषं निर्विषं कुरु-कुरु ज्वरं नाशय-नाशय एकाहिकं द्व्याहिकं त्र्याहिकं चातुर्थिकं दृष्टिज्वरं सन्निपातं सततज्वरं तत्क्षणिकं षाण्मासिकं सांवत्सरिकं वा गुग्गुलधूपेन अष्टाभिमन्त्रितं तेन ज्वरं नाशय-नाशय गौरसर्षप अभिमन्त्रितेन कुमारिकं पिण्डं बध्नामि अन्तरिक्षगतं बध्नामि, श्रोत्रं बध्नामि, पातालं बध्नामि आकर्षय ब्रह्मक्षत्रियवैश्यशूद्राङ्ग नानाचाण्डालाष्टप्रकृतिनां भस्मोद्धूलितशरीरे नमः ओं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः ऐं ह्रीं क्लीं नमः ॥ ॥ फलश्रुतिः (Benefits) ॥ मृतवत्सा तु या नारी सा च गर्भे न मुञ्चति । बालो रोदिति यस्यास्ति स्तनपानं पिबेन्न चेत् ॥ १ ॥ सर्वासु ग्रहबाधासु गुग्गुलं सप्तमन्त्रितम् । विधाय धूपयेत्तेन सर्वबाधा प्रशाम्यति ॥ २ ॥ युद्धादौ मन्त्रयेच्छत्रं तेनासौ विजयी भवेत् । अरिष्टशान्तये तोयमष्टवाराभिमन्त्रितम् ॥ ३ ॥ प्राशयेदभिषिञ्चेद्वा यथा सूर्योदये तमः । डाकिनी भूतग्रहादौ जाप्येति सहस्राक्षरी ॥ ४ ॥

श्री प्रत्यङ्गिरा सहस्राक्षरी - परिचय (Introduction)

सहस्राक्षरी (Sahasrakshari) का अर्थ है 'हजार अक्षरों वाला'। यह मन्त्र कोई साधारण जप नहीं, बल्कि एक 'माला मन्त्र' (Mala Mantra) है जिसमें देवी प्रत्यङ्गिरा की अनंत शक्तियों और आयुधों का वर्णन है।
इस मन्त्र में देवी को 'चामुंडा स्वरूपिणी' और 'भैरव रूपेण' संबोधित किया गया है, जो यह दर्शाता है कि यह विद्या अत्यंत उग्र और त्वरित प्रभाव वाली है। यह मन्त्र दसों दिशाओं को बांधने (Digbandhan), शत्रुओं को स्तंभित करने (Stambhan), और विष/रोग को नष्ट करने (Visha/Roga Nashana) के लिए अमोघ अस्त्र है।

महत्त्व और लाभ (Significance & Benefits)

"ज्वरं नाशय-नाशय... विषं निर्विषं कुरु-कुरु..."
भावार्थ: यह मन्त्र सभी प्रकार के ज्वर (Fever) और विष (Poison) को तत्काल नष्ट करने की आज्ञा देता है।
  • ज्वर नाश (Fever Cure): मन्त्र में स्पष्ट उल्लेख है कि यह एकाहिक (Daily), द्व्याहिक (Alternate day), और अन्य सभी प्रकार के पुराने से पुराने बुखार को नष्ट करता है।
  • विष निवारण (Poison Removal): सर्प दंश, कीड़े के काटने, या 'कल्कूट' जैसे विषों के प्रभाव को यह मन्त्र 'निर्विष' (Detoxify) कर देता है।
  • शत्रु संहार: 'मम शत्रून् भञ्जय भञ्जय' - यह शत्रुओं के अहंकार और शक्ति को चूर-चूर कर देता है।
  • युद्ध विजय: प्राचीन काल में योद्धा अपने शस्त्रों को इस मन्त्र से अभिमंत्रित करके युद्ध में विजय प्राप्त करते थे।

साधना विधि (Ritual Method)

इस मन्त्र की सिद्धि के लिए 'गुग्गुल धूप' (Guggul) और 'गौर सरषप' (सफेद सरसों) का विशेष महत्त्व है।
  1. धूप प्रयोग: "गुग्गुलं सप्तमन्त्रितम्" - किसी भी ग्रह बाधा या ऊपरी बाधा को दूर करने के लिए, गुग्गुल को इस मन्त्र से 7 बार अभिमंत्रित करके जलाएं और उसका धूप पूरे घर में दें।
  2. ज्वर शांति: रोगी के ऊपर से 21 बार पानी उतारकर या सरसों (Sarshap) को अभिमंत्रित करके प्रयोग करने से ज्वर शांत होता है।
  3. जल प्रयोग: "अरिष्टशान्तये तोयमष्टवाराभिमन्त्रितम्" - किसी भी अरिष्ट (दुर्घटना/विपत्ति) की शांति के लिए जल को 8 बार अभिमंत्रित करके पिएं या छिड़कें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. 'सहस्राक्षरी' का क्या अर्थ है?

'सहस्राक्षरी' का अर्थ है 'एक हजार अक्षरों वाला' (1000 Syllables)। यह मन्त्र एक विशाल 'माला मन्त्र' है जिसमें देवी की अनेक शक्तियों का आवाहन है।

2. क्या यह मन्त्र बुखार (Jwara) ठीक कर सकता है?

हाँ, फलश्रुति के अनुसार, यह मन्त्र एकाहिक (एक दिन का), द्व्याहिक, त्र्याहिक और चातुर्थिक (चौथिया) ज्वर (Fevers) को नष्ट करने में विशेष प्रभावी है।

3. इस मन्त्र के ऋषि कौन हैं?

इस उग्र मन्त्र के ऋषि भगवान 'भैरव' हैं, जो इसकी तीव्र संहारक और रक्षक शक्ति का प्रतीक हैं।

4. हवन के लिए किस सामग्री का प्रयोग करें?

इस मन्त्र की सिद्धि और ज्वर नाश के लिए 'गुग्गुल' (Guggul) और 'गौर-सरषप' (पीली/सफेद सरसों) का धूप और हवन विशेष लाभकारी बताया गया है।

5. क्या यह विष (Poison) प्रभाव को कम करता है?

हाँ, मन्त्र में 'कालकूटविषं निर्विषं कुरु कुरु' का स्पष्ट उल्लेख है, जो सर्प दंश और अन्य विषों के प्रभाव को नष्ट करने की शक्ति रखता है।

6. मन्त्र का जाप कितनी बार करना चाहिए?

विशेष प्रयोजन (जैसे ज्वर शांति) के लिए पाठ में 'एकविंशति' (21 बार) जाप करने का विधान बताया गया है।

7. क्या इसे युद्ध या मुकदमों में प्रयोग किया जा सकता है?

हाँ, 'युद्धादौ मन्त्रयेच्छत्रं' - युद्ध या अदालती विवादों में विजय प्राप्ति के लिए शस्त्र (या कलम) को इस मन्त्र से अभिमंत्रित करना चाहिए।

8. क्या स्त्रियां और बच्चे इसका पाठ कर सकते हैं?

बाल रक्षा ('बालो रोदिति यस्यास्ति...') के लिए माता-पिता इसका पाठ करके बच्चों को अभिमंत्रित जल या भस्म दे सकते हैं। स्वयं बच्चे इसे न जपें।

9. देवी का स्वरूप कैसा है?

देवी 'सिंहारूढा' (शेर पर सवार), 'कृष्णवर्णा' (काले रंग की), 'ज्वालामुखी' (अग्नि मुख वाली) और 'शूलकरा' (हाथ में त्रिशूल लिए) हैं।

10. पाठ के लिए कौन सा समय उत्तम है?

अमावस्या की रात्रि, ग्रहण काल, या मंगलवार/शनिवार की मध्यरात्रि इस मन्त्र की साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ है।