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Sri Renuka Kavacham – श्री रेणुका कवचम्

Sri Renuka Kavacham – श्री रेणुका कवचम्
॥ श्री रेणुका कवचम् ॥ ध्यानम् जमदग्निप्रियां देवीं रेणुकामेकमातरं सर्वारम्भे प्रसीद त्वं नमामि कुलदेवताम् । अशक्तानां प्रकारो वै कथ्यतां मम शङ्कर पुरश्चरणकालेषु का वा कार्या क्रियापरा ॥ श्री शङ्कर उवाच विना जपं विना दानं विना होमं महेश्वरि । रेणुका मन्त्रसिद्धि स्यान्नित्यं कवच पाठतः ॥ १ ॥ त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं परमाद्भुतम् । सर्वसिद्धिकरं लोके सर्वराजवशङ्करम् ॥ २ ॥ डाकिनीभूतवेतालब्रह्मराक्षसनाशनम् । पुरा देवासुरे युद्धे माहिषे लोके विग्रहे ॥ ३ ॥ ब्रह्मणा निर्मिता रक्षा साधकानां सुखाय च । मन्त्रवीर्यं समोपेतं भूतापस्मारनाशनम् ॥ ४ ॥ देवैर्देवस्य विजये सिद्धेः खेचरसिद्धये । दिवा रात्रमधीतं स्यात् रेणुका कवचं प्रिये ॥ ५ ॥ वने राजगृहे युद्धे ब्रह्मराक्षससङ्कुले । बन्धने गमने चैव कर्मणि राजसङ्कटे ॥ ६ ॥ कवच स्मरणादेव सर्वं कल्याणमश्नुते । रेणुकायाः महादेव्याः कवचं शृणु पार्वति ॥ ७ ॥ यस्य स्मरणमात्रेण धर्मकामार्थभाजनम् । रेणुकाकवचस्यास्य ऋषिर्ब्रह्मा विधीयते ॥ ८ ॥ छन्दश्चित्राह्वयं प्रोक्तं देवता रेणुका स्मृता । पृथ्वी बीजं रमा शक्तिः पुरुषार्थचतुष्टयम् ॥ ९ ॥ विनियोगो महेशानि तदा काले प्रकीर्तितः । ध्यात्वा देवीं महामायां जगन्मातरमम्बिकाम् ॥ १० ॥ पूर्णकुम्भसमायुक्तां मुक्ताहारविराजिताम् । स्वर्णालङ्कारसम्युक्तां स्वर्णसिंहासनस्थिताम् ॥ ११ ॥ मस्तके गुरुपादाब्जं प्रणम्य कवचं पठेत् । इन्द्रो मां रक्षतु प्राच्यां वह्नौ वह्निः सुरेश्वरि ॥ १२ ॥ याम्यां यमः सदा पातु नैरृत्यां निरृतिस्तथा । पश्चिमे वरुणः पातु वायव्ये वायुदेवता ॥ १३ ॥ धनश्चोत्तरे पातु ईशान्यामीश्वरो विभुः । ऊर्ध्वं ब्रह्मा सदा पातु अनन्तोऽधः सदाऽवतु ॥ १४ ॥ पञ्चान्तको महेन्द्रश्च वामकर्णेन्दुभूषितः । प्रणवं पुटितं कृत्वा तत्कृत्वा प्रणवं पुनः ॥ १५ ॥ समुच्चार्य ततो देवी कवचं प्रपठे तथा । ब्रह्माणी मे शिरः पातु नेत्रे पातु महेश्वरी ॥ १६ ॥ वैष्णवी नासिकायुग्मं कर्णयोः कर्णवासिनी । कण्ठं मातु महालक्ष्मीर्हृदयं चण्डभैरवी ॥ १७ ॥ बाहू मे बगला पातु करौ महिषमर्दिनी । कराङ्गुलीषु केशेषु नाभिं मे चर्चिकाऽवतु ॥ १८ ॥ गुह्यं गुह्येश्वरी पातु ऊरू पातु महामतिः । जानुनी जननी रामा गुल्फयोर्नारसिंहिका ॥ १९ ॥ वसुन्धरा सदा पादौ पायात्पादाङ्गुलीषु च । रोमकूपे मेदमज्जा रक्तमांसास्थिखण्डिके ॥ २० ॥ रेणुका जननी पातु महापुरनिवासिनी । रक्षाहीनं तु यत् स्थानं वर्जितं कवचेन तु ॥ २१ ॥ पूर्वं बीजं समुच्चार्य सम्पुटक्रमयोगतः । मुद्रां वध्वा महेशानि गोलं न्यासं समाचरेत् ॥ २२ ॥ विनियोगः एवं न्यासः अस्य श्रीरेणुका कवचमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः रेणुका देवता लं बीजं रेणुका प्रीत्यर्थे गोलन्यासे विनियोगः । ओं रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ओं रीं तर्जनीभ्यां नमः । ओं रूं मध्यमाभ्यां नमः । ओं रैं अनामिकाभ्यां नमः । ओं रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ओं रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । एवं हृदयादिन्यासः । ओं पं नमः मूर्ध्नि । ओं फं नमः दक्षिणनेत्रे । ओं बं नमः वामनेत्रे । ओं भं नमः दक्षिणनासापुटे । ओं मं नमः वामनासापुटे । ओं यं नमः दक्षिणकर्णे । ओं रं नमः वामकर्णे । ओं लं नमः मुखे । ओं वं नमः गुदे । मूल कवचम् ब्रह्माणी ब्रह्मभागे च शिरो धरणिधारिणी । रक्ष रक्ष महेशानि सदा मां पाहि पार्वती ॥ २३ ॥ भैरवी त्रिपुरा बाला वज्रा मे तारिणी परा । रक्ष रक्ष महेशानि सदा मां पाहि पार्वती ॥ २४ ॥ एषा मेऽङ्गं सदा पातु पार्वती हरवल्लभा । महिषासुरसंहर्त्री विधातृवरदायिनी ॥ २५ ॥ मस्तके पातु मे नित्यं महाकाली प्रसीदतु । आकाशे ताडका पातु पाताले वह्निवासिनी ॥ २६ ॥ वामदक्षिणयोश्चापि कालिका च करालिका । धनुर्बाणधरा चैव खड्गखट्वाङ्गधारिणी ॥ २७ ॥ सर्वाङ्गं मे सदा पातु रेणुका वरदायिनी । रां रां रां रेणुके मातर्भार्गवोद्धारकारिणी ॥ २८ ॥ राजराजकुलोद्भूते सङ्ग्रामे शत्रुसङ्कटे । जलाप्नाव्ये व्याघ्रभये तथा राजभयेऽपि च । श्मशाने सङ्कटे घोरे पाहि मां परमेश्वरि ॥ २९ ॥ रूपं देहि यशो देहि द्विषतां नाशमेव च । प्रसादः स्याच्छुभो मातर्वरदा रेणुके भव ॥ ३० ॥ ऐं महेशि महेश्वरि चण्डिके मे भुजङ्गधारिणि शङ्खकपालिके । कनककुण्डलमण्डलभाजने वपुरिदं च पुनीहि महेश्वरि ॥ ३१ ॥ फलश्रुतिः इदं श्रीकवचं देव्याः रेणुकाया महेश्वरि । त्रिकालं यः पठेन्नित्यं तस्य सिद्धिः प्रजायते ॥ ३२ ॥ ग्रहणेऽर्कस्य चन्द्रस्य शुचिः पूर्वमुपोषितः । शतत्रयावृत्तिपाठाद्मन्त्रसिद्धिः प्रजायते ॥ ३३ ॥ नदीसङ्गममासाद्य नाभिमात्रोदकस्थितः । रविमण्डलमुद्वीक्ष्य जले तत्र स्थितां शिवाम् ॥ ३४ ॥ विचिन्त्य मण्डले देवी कार्ये सिद्धिर्भवेद्ध्रुवम् । घटं तव प्रतिष्ठाप्य विभूतिस्तत्र वेशयेत् । दीपं सर्षपतैलेन कवचं त्रिः पठेत्तदा ॥ ३५ ॥ भूतप्रेतपिशाचाश्च डाकिन्यो यातुधानिका । सर्व ते नाशमायान्ति कवचस्मरणात्प्रिये ॥ ३६ ॥ धनं धान्यं यशो मेधां यत्किञ्चिन्मनसेप्सितम् । कवचस्मरणादेव सर्वमाप्नोति नित्यशः ॥ ३७ ॥ ॥ इति श्री भैरवरुद्रयामले रेणुका कवचम् सम्पूर्णम् ॥

श्री रेणुका कवचम् - परिचय (Introduction)

श्री रेणुका कवचम् (Sri Renuka Kavacham), देवी रेणुका की कृपा प्राप्त करने का एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है। इसे त्रैलोक्य विजय कवच (Trailokya Vijaya Kavacham) भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है - "तीनों लोकों में विजय दिलाने वाला कवच"।

कौन हैं माँ रेणुका?
माँ रेणुका, सप्तर्षियों में से एक महर्षि जमदग्नि की पत्नी और भगवान विष्णु के छठे अवतार, परशुराम की माता हैं। लोक परंपराओं में उन्हें 'यल्लम्मा' (Yellamma) या 'एकवीरा' (Ekvira) के नाम से भी पूजा जाता है। वह शक्ति, त्याग और मातृत्व की प्रतिमूर्ति हैं।

यह कवच भैरव रुद्रयामल तन्त्र से अद्भुत है और माना जाता है कि इसकी रचना स्वयं ब्रह्मा जी ने देवताओं की रक्षा के लिए की थी।

रेणुका देवी का महत्त्व (Significance of Renuka Devi)

माँ रेणुका केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि एक जाग्रत ग्रामदेवता और कुलदेवी हैं।

  • महामारी ना शिनी: उन्हें शीतला माता के समान ही चेचक, हैजा और अन्य संक्रामक रोगों का नाश करने वाली देवी माना जाता है।
  • कुल रक्षिका: वह अपने भक्तों के 'कुल' (Lineage) की रक्षा करती हैं और वंश को आगे बढ़ाती हैं।
  • सती शिरोमणि: उनकी कथा पतिव्रत धर्म की पराकाष्ठा है। जल लाने में विलंब होने पर जमदग्नि के क्रोध और परशुराम जी द्वारा शीश छेदन के बाद पुनर्जीवित होने की घटना, उन्हें 'मृत्युंजय शक्ति' का प्रतीक बनाती है।

फलश्रुति - पाठ के लाभ (Benefits)

इस कवच के नियमित पाठ से साधक को अनेक दैहिक और दैविक लाभ प्राप्त होते हैं:
  • रोग निवारण: यह कवच चर्म रोगों (Skin ailments), फोड़े-फुंसी और अज्ञात बीमारियों से मुक्ति दिलाने में रामबाण माना जाता है।

  • प्रेत-बाधा नाश: श्लोक ३६ के अनुसार, इसका पाठ करने से भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी और शाकिनी जैसी नकारात्मक शक्तियाँ तत्काल नष्ट हो जाती हैं।

  • सर्व सिद्धि: "सर्वसिद्धिकरं लोके" - यह साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की सिद्धि प्रदान करता है।

  • राजभय निवारण: यदि कोई सरकारी संकट या कानूनी समस्या (राजभय) हो, तो यह कवच सुरक्षा प्रदान करता है।

  • अकाल मृत्यु से रक्षा: यह कवच अकाल मृत्यु (Unnatural death) और दुर्घटनाओं से साधक को बचाता है।

पाठ विधि (Ritual Method)

माँ रेणुका (यल्लम्मा) की पूजा विधि अत्यंत सरल किन्तु विशिष्ट है:
  1. पवित्रता: स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें। लाल रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है।

  2. सामग्री: पूजा में नीम के पत्ते (Neem leaves) और हल्दी (Turmeric) का प्रयोग अवश्य करें। यह माँ को अत्यंत प्रिय हैं और आरोग्य का प्रतीक हैं।

  3. दीपक: सरसों के तेल का दीपक जलाएं (जैसा कि श्लोक ३५ में वर्णित है - "दीपं सर्षपतैलेन")।

  4. नैवेद्य: गुड़, भात (चावल) या नारियल का भोग लगाएं। दक्षिण भारत में 'दही-भात' का भोग भी प्रचलित है।

  5. पाठ संख्या: सामान्य फल के लिए १ बार पाठ पर्याप्त है। विशेष सिद्धि के लिए ३०० बार (शतत्रयावृत्ति) पाठ का विधान है।

विशेष: जिनके परिवार में माँ रेणुका कुलदेवी हैं, उन्हें हर मंगलवार को नीम के जल से स्नान कर इस कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री रेणुका कवचम् का मुख्य लाभ क्या है?

इसका मुख्य लाभ 'आरोग्य' और 'कुल रक्षण' है। यह विशेष रूप से चेचक (Smallpox), फोड़े-फुंसी और अन्य चर्म रोगों (Skin Diseases) से मुक्ति दिलाने और वंश की रक्षा करने के लिए प्रसिद्ध है।

2. माँ रेणुका को 'यल्लम्मा' क्यों कहा जाता है?

'यल्लम्मा' का अर्थ है - 'सभी की माता' (Jagadamba)। दक्षिण भारत में उन्हें ग्रामदेवता के रूप में पूजा जाता है जो अपने भक्तों की महामारी और संकटों से रक्षा करती हैं।

3. इस कवच की रचना किसने की?

शास्त्रों के अनुसार, यह कवच स्वयं 'भगवान ब्रह्मा' द्वारा रचा गया है (ब्रह्मणा निर्मिता रक्षा), ताकि देवासुर संग्राम में देवताओं की रक्षा हो सके।

4. पूजन में किन विशेष सामग्रियों का उपयोग होता है?

माँ रेणुका की पूजा में नीम के पत्ते (Neem leaves), हल्दी (Turmeric), और कुमकुम का विशेष महत्त्व है। नीम शीतलता प्रदान करता है और रोगों का नाश करता है।

5. क्या यह कवच 'वंश वृद्धि' (Lineage growth) में सहायक है?

हाँ, यह कवच कुल की रक्षा और वंश वृद्धि के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। इसे 'कुलदेवता' की प्रसन्नता के लिए पढ़ा जाता है।

6. पाठ करने का सर्वोत्तम समय क्या है?

मंगलवार और शुक्रवार (विशेषकर श्रावण मास में) इसका पाठ करना अत्यंत शुभ है। ग्रहण काल या नवरात्रि में इसके पुरश्चरण से मन्त्र सिद्ध होता है।

7. रेणुका देवी का भगवान परशुराम से क्या सम्बन्ध है?

माँ रेणुका भगवान परशुराम की जननी (माता) हैं। परशुराम जी ने अपनी माता को पुनः जीवित कर उन्हें पूजनीय बनाया था।

8. क्या इस कवच से बुरी शक्तियाँ दूर होती हैं?

हाँ, कवच में स्पष्ट उल्लेख है कि यह डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रेत और ब्रह्मराक्षस जैसी नकारात्मक शक्तियों का नाश करता है।

9. क्या पुरुष और स्त्रियाँ दोनों इसका पाठ कर सकते हैं?

जी हाँ, कोई भी भक्त पूर्ण पवित्रता और श्रद्धा के साथ इसका पाठ कर सकता है। स्त्रियाँ विशेष रूप से 'सुहाग' और 'संतान' की रक्षा के लिए इसे पढ़ती हैं।

10. 'जगन्माता' रूप में इनकी पूजा कैसे की जाती है?

कई स्थानों पर केवल उनके 'शीश' (Head) की पूजा की जाती है, जिसे पूर्ण शक्ति का प्रतीक माना जाता है। यह परशुराम जी द्वारा उनके शीश छेदन और पुनर्जीवन की कथा से सम्बंधित है।