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Sri Tulja Bhavani Stotram – श्री तुलजा भवानी स्तोत्रम् (Shivaji Maharaj's Kuldevi)

Sri Tulja Bhavani Stotram: Hymn to the Goddess of Tuljapur

Sri Tulja Bhavani Stotram – श्री तुलजा भवानी स्तोत्रम् (Shivaji Maharaj's Kuldevi)
नमोऽस्तु ते महादेवि शिवे कल्याणि शाम्भवि । प्रसीद वेदविनुते जगदम्ब नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥ जगतामादिभूता त्वं जगत्त्वं जगदाश्रया । एकाऽप्यनेकरूपासि जगदम्ब नमोऽस्तु ते ॥ २ ॥ सृष्टिस्थितिविनाशानां हेतुभूते मुनिस्तुते । प्रसीद देवविनुते जगदम्ब नमोऽस्तु ते ॥ ३ ॥ सर्वेश्वरि नमस्तुभ्यं सर्वसौभाग्यदायिनि । सर्वशक्तियुतेऽनन्ते जगदम्ब नमोऽस्तु ते ॥ ४ ॥ विविधारिष्टशमनि त्रिविधोत्पातनाशिनि । प्रसीद देवि ललिते जगदम्ब नमोऽस्तु ते ॥ ५ ॥ प्रसीद करुणासिन्धो त्वत्तः कारुणिका परा । यतो नास्ति महादेवि जगदम्ब नमोऽस्तु ते ॥ ६ ॥ शत्रून् जहि जयं देहि सर्वान्कामांश्च देहि मे । भयं नाशय रोगांश्च जगदम्ब नमोऽस्तु ते ॥ ७ ॥ जगदम्ब नमोऽस्तु ते हिते जय शम्भोर्दयिते महामते । कुलदेवि नमोऽस्तु ते सदा हृदि मे तिष्ठ यतोऽसि सर्वदा ॥ ८ ॥ तुलजापुरवासिन्या देव्याः स्तोत्रमिदं परम् । यः पठेत्प्रयतो भक्त्या सर्वान्कामान्स आप्नुयात् ॥ ९ ॥ इति श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीवासुदेवानन्दसरस्वती विरचितं श्रीतुलजापुरवासिन्या देव्याः स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

श्री तुलजा भवानी स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री तुलजा भवानी स्तोत्रम् श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री वासुदेवानंद सरस्वती (टेंबे स्वामी, 1854-1914) द्वारा रचित एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है। टेंबे स्वामी महाराष्ट्र के महान संत थे जिन्होंने दत्तात्रेय और देवी भक्ति पर अनेक ग्रंथों की रचना की। यह स्तोत्र 9 श्लोकों में तुलजापुर की अधिष्ठात्री देवी की स्तुति करता है।

तुलजापुर मंदिर महाराष्ट्र के धाराशिव (पूर्व में उस्मानाबाद) जिले में स्थित है। यह भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है और महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों (कोल्हापुर की महालक्ष्मी, माहुर की रेणुकादेवी, तुलजापुर की भवानी और आधा—सप्तशृंगी) में गिना जाता है। मंदिर का निर्माण लगभग 12वीं शताब्दी में हुआ था और यहाँ स्थापित मूर्ति स्वयंभू मानी जाती है।

इस स्तोत्र का ऐतिहासिक महत्व अद्वितीय है। छत्रपति शिवाजी महाराज और संपूर्ण भोसले वंश की कुलदेवी तुलजा भवानी हैं। मान्यता है कि जब शिवाजी ने स्वराज्य स्थापना का संकल्प लिया, तब उन्होंने माँ का दर्शन किया और प्रसन्न होकर माँ ने उन्हें 'भवानी तलवार' प्रदान की। 'जय भवानी' का नारा मराठा सेना का युद्ध घोष था।

श्लोकों का भावार्थ (Significance)

प्रत्येक श्लोक 'जगदम्ब नमोऽस्तु ते' (हे विश्वमाता, तुम्हें नमस्कार) से समाप्त होता है:

  • श्लोक 1 (स्तुति): 'महादेवि, शिवे, कल्याणि, शाम्भवि'—ये देवी के चार प्रमुख नाम हैं। वे वेदों द्वारा स्तुत हैं और कल्याण प्रदान करती हैं।

  • श्लोक 2 (विश्वरूप): 'जगतामादिभूता' (जगत की आदि), 'जगत्त्वं' (तुम ही जगत हो), 'जगदाश्रया' (जगत का आश्रय)। 'एकाऽप्यनेकरूपासि'—एक होते हुए भी अनेक रूपों में प्रकट।

  • श्लोक 3 (त्रिकार्य): सृष्टि, स्थिति और विनाश—त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) के ये तीनों कार्य देवी की ही शक्ति से संपन्न होते हैं।

  • श्लोक 4 (सर्वशक्ति): 'सर्वेश्वरि' (सबकी स्वामिनी), 'सर्वसौभाग्यदायिनि' (सभी सौभाग्य देने वाली), 'सर्वशक्तियुता' (सभी शक्तियों से युक्त), 'अनन्ते' (अनंत)।

  • श्लोक 5 (विपत्ति नाश): 'विविधारिष्टशमनि' (विविध अनिष्टों को शांत करने वाली), 'त्रिविधोत्पातनाशिनि' (आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक—तीनों प्रकार की विपत्तियों का नाश करने वाली)।

  • श्लोक 6 (करुणा): 'करुणासिन्धु' (करुणा का समुद्र)। तुमसे अधिक करुणामयी कोई नहीं है।

  • श्लोक 7 (प्रार्थना): शत्रु नाश, विजय प्राप्ति, कामना पूर्ति, भय नाश और रोग नाश—ये पाँच प्रार्थनाएं योद्धाओं के लिए विशेष हैं।

  • श्लोक 8 (कुलदेवी): 'जय शम्भोर्दयिते' (शिव की प्रिया को जय), 'कुलदेवि' (कुलदेवी), 'हृदि मे तिष्ठ' (मेरे हृदय में रहो)।

पाठ के लाभ (Benefits)

फलश्रुति (श्लोक 9) में स्पष्ट कहा गया है—'सर्वान्कामान्स आप्नुयात्' (सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं):

  • शत्रु विजय: 'शत्रून् जहि जयं देहि'—शत्रुओं पर विजय। शिवाजी महाराज की विजय इसी कृपा का प्रमाण है।

  • भय नाश: सभी प्रकार के भय (राज्यभय, चोरभय, रोगभय) से मुक्ति।

  • रोग निवारण: शारीरिक और मानसिक रोगों का नाश।

  • त्रिविध ताप शांति: आध्यात्मिक (मानसिक कष्ट), आधिदैविक (प्राकृतिक आपदाएं), आधिभौतिक (अन्य जीवों से कष्ट)—तीनों तापों का शमन।

  • सर्व सौभाग्य: स्त्रियों के लिए सौभाग्य, सुमंगल और परिवार में सुख-शांति।

  • कुल रक्षा: कुलदेवी के रूप में संपूर्ण परिवार/वंश की रक्षा।

पाठ विधि (Ritual Method)

तुलजापुर में चैत्र और आश्विन नवरात्रि में लाखों भक्त आते हैं:

दैनिक पाठ विधि:

  1. समय: प्रातः काल या संध्या वेला। शुक्रवार और मंगलवार विशेष शुभ हैं।
  2. स्थान: पूर्व या उत्तर मुख करके लाल आसन पर बैठें।
  3. पूजन: देवी के चित्र या मूर्ति के सामने घी का दीपक जलाएं। कुमकुम, सिंदूर, लाल पुष्प और श्रृंगार सामग्री अर्पित करें।
  4. नैवेद्य: पूरन पोळी (मराठी परंपरा) या खीर-पूड़ी अर्पित करें।
  5. पाठ: 1, 3, 9 या 108 बार पाठ करें।
  6. आरती: पाठ के बाद देवी की आरती करें।

विशेष अनुष्ठान (विजय/सफलता हेतु):

नवरात्रि में 9 दिनों तक प्रतिदिन 21 पाठ करें। अंतिम दिन कन्या पूजन करें। यदि संभव हो तो तुलजापुर मंदिर में जाकर पाठ करें। शिवाजी महाराज की भांति किसी भी महत्वपूर्ण कार्य से पूर्व माँ का आशीर्वाद लें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. इस स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

इस स्तोत्र के रचयिता श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री वासुदेवानंद सरस्वती (टेंबे स्वामी, 1854-1914) हैं। वे महाराष्ट्र के महान संत थे जिन्होंने दत्तात्रेय और देवी पर अनेक स्तोत्रों की रचना की।

2. तुलजापुर मंदिर कहाँ स्थित है?

तुलजापुर मंदिर महाराष्ट्र के धाराशिव (पूर्व में उस्मानाबाद) जिले में स्थित है। यह भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है और महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों (कोल्हापुर, माहुर, तुलजापुर और आधा सप्तशृंगी) में शामिल है। मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में हुआ था।

3. शिवाजी महाराज और तुलजा भवानी का क्या संबंध है?

तुलजा भवानी छत्रपति शिवाजी महाराज और संपूर्ण भोसले वंश की कुलदेवी हैं। मान्यता है कि स्वराज्य स्थापना का संकल्प लेने के बाद शिवाजी ने तुलजापुर में माँ का दर्शन किया और प्रसन्न होकर माँ ने उन्हें 'भवानी तलवार' प्रदान की। 'जय भवानी' का नारा मराठा सेना का युद्ध घोष था।

4. 'जगदम्ब नमोऽस्तु ते' का क्या अर्थ है?

'जगदम्ब' (जगत् + अम्बा) का अर्थ है 'संसार की माता' और 'नमोऽस्तु ते' का अर्थ है 'आपको नमस्कार'। प्रत्येक श्लोक का अंत इसी पंक्ति से होता है, जो देवी के विश्वमातृ स्वरूप की स्तुति है।

5. श्लोक 2 में 'एकाऽप्यनेकरूपासि' का क्या भाव है?

यह अद्वैत शक्ति दर्शन है। देवी एक होते हुए भी अनेक रूपों में प्रकट होती हैं—दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, काली आदि। सभी देवियाँ एक ही आदिशक्ति की अभिव्यक्ति हैं। 'जगत्त्वं जगदाश्रया'—तुम ही जगत हो और जगत का आश्रय भी तुम्हीं हो।

6. श्लोक 7 में क्या प्रार्थनाएं हैं?

श्लोक 7 में तीन प्रमुख प्रार्थनाएं हैं: (1) 'शत्रून् जहि'—शत्रुओं का नाश करो, (2) 'जयं देहि'—विजय प्रदान करो, (3) 'भयं नाशय रोगांश्च'—भय और रोगों का नाश करो। यह शिवाजी महाराज जैसे योद्धाओं की प्रार्थना भी है।

7. 'कुलदेवी' का क्या महत्व है?

कुलदेवी परिवार/वंश की आराध्य देवी होती हैं। भोसले वंश के लिए तुलजा भवानी कुलदेवी हैं। श्लोक 8 में 'कुलदेवि नमोऽस्तु ते सदा, हृदि मे तिष्ठ' कहकर यही भाव व्यक्त है—हे कुलदेवी, मेरे हृदय में सदा निवास करो।

8. फलश्रुति (श्लोक 9) में क्या कहा गया है?

'यः पठेत्प्रयतो भक्त्या सर्वान्कामान्स आप्नुयात्'—जो पवित्र और शुद्ध होकर भक्तिपूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

9. इसे कब और कैसे पढ़ना चाहिए?

नवरात्रि, शुक्रवार और मंगलवार विशेष शुभ हैं। तुलजापुर के वार्षिक उत्सव (चैत्र और आश्विन नवरात्रि) में लाखों भक्त आते हैं। प्रतिदिन स्नान करके, देवी के सामने घी का दीपक जलाकर 1, 3 या 9 बार पाठ करें।

10. क्या यह स्तोत्र केवल मराठी भक्तों के लिए है?

नहीं, यह संस्कृत स्तोत्र है और सभी भक्तों के लिए है। तुलजा भवानी को 'जगदम्बा' (विश्व की माता) कहा गया है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से विशेष श्रद्धालु आते हैं, परंतु देवी की कृपा सभी के लिए समान है।