Sri Goda Devi Ashtottara Shatanama Stotram – श्री गोदाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (आण्डाळ 108 नाम)
Sri Goda Devi 108 Names Stotram: The Divine Names of Andal

श्री गोदाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)
श्री गोदाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् देवी गोदा (आण्डाळ) के 108 दिव्य नामों का संग्रह है। गोदा देवी (तमिल में आण्डाळ) 12 अळवार संतों में एकमात्र महिला संत हैं और श्री वैष्णव परंपरा में अत्यंत पूज्य हैं। उनका जन्म तमिलनाडु के श्रीविल्लीपुत्तूर में हुआ था।
कथा के अनुसार, विष्णुचित्त (पेरियाळवार, स्वयं एक महान अळवार संत) ने एक दिन अपनी तुलसी वाटिका में एक सुंदर कन्या को पाया। उन्होंने उसे 'गोदा' नाम दिया और पालन-पोषण किया। बचपन से ही गोदा भगवान श्रीकृष्ण पर अनुरक्त थीं। वे प्रतिदिन अपने पिता द्वारा भगवान के लिए गूंथी पुष्पमाला पहले स्वयं पहनती, फिर भगवान को अर्पित करती थीं। इसीलिए उन्हें 'चूडिक्कोडुत्त नाच्चियार' (माला पहनकर देने वाली) और 'आमुक्तमाल्यदा' कहते हैं।
गोदा देवी ने दो महत्वपूर्ण रचनाएं कीं—तिरुप्पावै (30 पाशुरम) जो मार्गळि (दिसंबर-जनवरी) मास में गाया जाता है, और नाच्चियार तिरुमोळि (143 पाशुरम) जो भगवान के प्रति उनके विरह और प्रेम को व्यक्त करता है। अंततः भगवान रंगनाथ ने उन्हें अपनी वधू के रूप में स्वीकार किया और वे श्रीरंगम मंदिर में भगवान की मूर्ति में विलीन हो गईं।
प्रमुख नामों का अर्थ (Significance)
इस स्तोत्र में 108 नाम 28 श्लोकों में संकलित हैं। कुछ प्रमुख नाम:
श्रीरङ्गनायकी: श्रीरंगम की स्वामिनी—भगवान रंगनाथ की पत्नी के रूप में।
विष्णुचित्तात्मजा: विष्णुचित्त (पेरियाळवार) की पुत्री।
गोपीवेषधरा: गोपी के वेश में—तिरुप्पावै में उन्होंने स्वयं को गोपी के रूप में प्रस्तुत किया।
भूसुता: भूमि की पुत्री—सीता की भांति पृथ्वी से प्रकट।
तुलसीकाननोद्भूता: तुलसी वाटिका में प्रकट हुईं।
आमुक्तमाल्यदा: पहनी हुई माला देने वाली।
यतिराजसहोदरी: रामानुजाचार्य (यतिराज) की आध्यात्मिक बहन।
धनुर्मासकृतव्रता: धनुर्मास (मार्गळि) में व्रत करने वाली—तिरुप्पावै व्रत।
मोक्षप्रदाननिपुणा: मोक्ष देने में कुशल।
महापतिव्रता: परम पतिव्रता—भगवान रंगनाथ के प्रति एकनिष्ठ।
पाठ के लाभ (Benefits)
गोदा देवी की उपासना से विशेष लाभ प्राप्त होते हैं:
वैवाहिक सुख: अविवाहित कन्याओं को योग्य वर की प्राप्ति और विवाहितों को सुखी दांपत्य।
सौभाग्य वृद्धि: विशेषकर स्त्रियों के लिए सौभाग्य और सुमंगल।
संतान सुख: संतान प्राप्ति और संतान कल्याण।
भगवद्भक्ति: श्रीविष्णु/कृष्ण के प्रति प्रेमभक्ति की वृद्धि।
मोक्ष प्राप्ति: 'मोक्षप्रदाननिपुणा'—मोक्ष देने में कुशल देवी की कृपा।
वाक्सिद्धि: 'मञ्जुभाषिणी' देवी की कृपा से मधुर वाणी और वाक्पटुता।
पाठ विधि (Ritual Method)
श्री वैष्णव परंपरा में गोदा देवी की उपासना का विशेष महत्व है:
दैनिक पाठ विधि:
- समय: प्रातः काल या संध्या वेला। शुक्रवार विशेष शुभ है।
- स्थान: पूर्व मुख करके स्वच्छ आसन पर बैठें।
- पूजन: आण्डाळ के चित्र या श्रीरंगनाथ-गोदा युगल के सामने घी का दीपक जलाएं। तुलसी माला अवश्य अर्पित करें (देवी तुलसी वाटिका से प्रकट हुईं)।
- पुष्प: चंपक, मल्लिका, पारिजात पुष्प विशेष प्रिय हैं।
- पाठ: 1, 3 या 9 बार पाठ करें।
- तिरुप्पावै: यदि संभव हो तो तिरुप्पावै के एक-दो पाशुरम भी पढ़ें।
मार्गळि (धनुर्मास) व्रत:
दिसंबर-जनवरी के मार्गळि मास में 30 दिनों तक प्रातः 4 बजे उठकर तिरुप्पावै और इस स्तोत्र का पाठ करें। यह आण्डाळ का व्रत है जो विवाह योग्य कन्याओं के लिए विशेष फलदायी है।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. गोदा देवी (आण्डाळ) कौन हैं?
गोदा देवी (तमिल में आण्डाळ या अंडाल) 12 अळवार संतों में एकमात्र महिला संत हैं। उनका जन्म श्रीविल्लीपुत्तूर (तमिलनाडु) में आषाढ़ मास के पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में हुआ था। उन्हें विष्णुचित्त (पेरियाळवार) ने तुलसी वाटिका में पाया था। बचपन से ही भगवान विष्णु पर अनुरक्त, वे प्रतिदिन पिता द्वारा भगवान के लिए बनाई माला पहले स्वयं पहन लेती थीं।
2. 'गोदा' नाम का क्या अर्थ है?
'गोदा' का अर्थ है 'भूमि की पुत्री' (गो = भूमि, दा = देने वाली/पुत्री)। यह सीता जी के समान भूमि से प्रकट होने का संकेत है। 'आण्डाळ' का अर्थ है 'जिसने (भगवान को) नियंत्रित किया' या 'शासन करने वाली'—भगवान रंगनाथ को अपने प्रेम में बांधने वाली।
3. तिरुप्पावै क्या है?
तिरुप्पावै आण्डाळ द्वारा रचित 30 तमिल पाशुरम (भजन) का संग्रह है जो मार्गळि (दिसंबर-जनवरी) मास में गाया जाता है। इसमें गोपियों की भांति आण्डाळ भगवान कृष्ण से मिलने की आकांक्षा व्यक्त करती हैं। यह वेदों का सार माना जाता है।
4. ध्यान श्लोक में क्या वर्णित है?
ध्यान श्लोक में देवी का सुंदर वर्णन है: 'शतमखमणि नीला' (इंद्रनील मणि जैसी कांति), 'कल्हारहस्ता' (कमल हाथ में), 'स्तनभरनमिताङ्गी' (भारी स्तनों से झुकी), 'सान्द्रवात्सल्यसिन्धुः' (वात्सल्य का सागर), 'अलकविनिहिताभिः स्रग्भिराकृष्टनाथा' (बालों में पुष्पमाला जिसने नाथ को आकर्षित किया)।
5. 'विष्णुचित्तात्मजा' और 'यतिराजसहोदरी' का क्या अर्थ है?
'विष्णुचित्तात्मजा' का अर्थ है विष्णुचित्त (पेरियाळवार) की पुत्री। 'यतिराजसहोदरी' का अर्थ है यतिराज (रामानुजाचार्य) की बहन—यह आध्यात्मिक संबंध है क्योंकि रामानुजाचार्य ने आण्डाळ को अपनी बहन के रूप में स्वीकार किया था।
6. श्रीविल्लीपुत्तूर मंदिर की क्या विशेषता है?
श्रीविल्लीपुत्तूर आण्डाळ मंदिर का 192 फीट ऊंचा गोपुरम तमिलनाडु राज्य के प्रतीक का हिस्सा है। यहाँ आण्डाळ का जन्मस्थान और वह तुलसी वाटिका है जहाँ उन्हें पाया गया था। प्रतिवर्ष आडि (जुलाई-अगस्त) मास में आण्डाळ-रंगमन्नार कल्याणोत्सव होता है।
7. 'आमुक्तमाल्यदा' का क्या अर्थ है?
'आमुक्तमाल्यदा' का अर्थ है 'पहनी हुई माला देने वाली'। आण्डाळ प्रतिदिन अपने पिता द्वारा भगवान के लिए गूंथी माला पहले स्वयं पहनती थीं, फिर भगवान को अर्पित करती थीं। इससे वे 'चूडिक्कोडुत्त नाच्चियार' कहलाईं। कृष्णदेवराय ने इसी नाम पर तेलुगु काव्य 'आमुक्तमाल्यदा' लिखा।
8. रंगनाथ विवाह की कथा क्या है?
आण्डाळ बचपन से ही भगवान रंगनाथ से विवाह करना चाहती थीं। जब विवाह का समय आया, भगवान रंगनाथ ने स्वप्न में विष्णुचित्त को आदेश दिया कि गोदा को श्रीरंगम लाएं। वधू के वेश में गोदा श्रीरंगम पहुंचीं और रंगनाथ की मूर्ति में विलीन हो गईं।
9. इसे कब और कैसे पढ़ना चाहिए?
मार्गळि मास (दिसंबर-जनवरी) में तिरुप्पावै के साथ पाठ करना अत्यंत शुभ है। आडि मास (जुलाई-अगस्त) में आण्डाळ जयंती विशेष है। शुक्रवार और प्रतिदिन प्रातः काल पाठ करने से सौभाग्य और वैवाहिक सुख प्राप्त होता है।
10. स्तोत्र में देवी के शरीर का वर्णन क्यों है?
श्लोक 11-22 में देवी के चरणों से मस्तक तक का विस्तृत वर्णन है (पादादिकेशांतवर्णन)। यह श्री वैष्णव परंपरा में भगवद्भक्तों के अंग-वर्णन की शैली है जो ध्यान में सहायक है। प्रत्येक अंग का वर्णन देवी की दिव्यता को प्रकट करता है।