Sri Gayatri Ashtavimshati Shatanam Stotram – श्री गायत्री अष्टविंशतिशतनाम स्तोत्रम् (१२८ नाम)

श्री गायत्री अष्टविंशतिशतनाम स्तोत्रम् - एक विस्तृत परिचय
श्री गायत्री अष्टविंशतिशतनाम स्तोत्रम् (Sri Gayatri Ashtavimshati Shatanam Stotram) भारतीय सनातन परम्परा का वह गोपनीय मणि है जो माँ गायत्री के १२८ (१००+२८) सिद्ध नामों की व्याख्या करता है। यह स्तोत्र प्राचीन 'श्रीमद्वसिष्ठ संहिता' (Sri Vasistha Samhita) से लिया गया है, जहाँ स्वयं जगत के रचयिता भगवान ब्रह्मा अपने पुत्र देवर्षि नारद को इस ब्रह्माण्डीय शक्ति का उपदेश देते हैं। ब्रह्मा जी इसे "अतिगुह्यं सनातनम्" अर्थात् अत्यंत गोपनीय और सनातन सत्य बताते हैं।
इस स्तोत्र की अद्वितीयता इसके 'शताक्षरात्मक' स्वरूप में है। इसका अर्थ है कि ये नाम साक्षात् 'शताक्षरा गायत्री' (सौ अक्षरों वाली गायत्री) की शक्ति को साधक के भीतर प्रवाहित करते हैं। जहाँ सामान्य गायत्री मन्त्र २४ अक्षरों का होता है, वहीं यह स्तोत्र मन्त्र की उस ऊर्जा का विस्तार करता है जो हमारे शरीर की सूक्ष्म नाड़ियों और चेतना के केंद्रों को झंकृत करती है। इसमें माँ को 'सावित्रीमन्त्रगर्भितम्' कहा गया है, अर्थात् प्रत्येक नाम के भीतर सावित्री मन्त्र की शक्ति छिपी हुई है।
महर्षि वसिष्ठ ने इस स्तोत्र को केवल एक प्रार्थना के रूप में नहीं, बल्कि एक 'आध्यात्मिक चिकित्सा पद्धति' के रूप में संकलित किया है। इस स्तुति में माँ के उन नामों का संकलन है जो अनाथ, दरिद्र, रोगी और भयभीत व्यक्ति को तत्काल सहारा प्रदान करते हैं। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि माँ गायत्री केवल ज्ञान की देवी नहीं हैं, बल्कि वे 'भूतिदा' (वैभव देने वाली), 'जननी' (माता), और 'अरोगकृत्' (रोगों को नष्ट करने वाली) दयामयी सत्ता हैं।
वर्तमान युग में, जहाँ मनुष्य असुरक्षा और व्याधियों से घिरा है, वसिष्ठ संहिता का यह १२८ नामों वाला पाठ एक अभेद्य 'रक्षा कवच' की तरह कार्य करता है। यह स्तोत्र साधक के अंतःकरण को शुद्ध कर उसे उस स्थिति तक ले जाता है जहाँ उसे संसार की किसी भी वस्तु से भय नहीं रहता, जैसा कि फलश्रुति में कहा गया है—'भीतानामभयाय च' (भयभीत लोगों के लिए अभय प्रदाता)।
विशिष्ट महत्व और तात्विक रहस्य (Significance)
गायत्री अष्टविंशतिशतनाम स्तोत्र का महत्व इसके तात्विक और प्रयोगात्मक पक्ष में निहित है, जो इसे अन्य स्तोत्रों से श्रेष्ठ बनाता है:
अक्षर विज्ञान और मन्त्र शक्ति: माँ को 'अष्टापदी' और 'सहस्राक्षरात्मिका' कहा गया है। यह दर्शाता है कि माँ गायत्री की शक्ति अनन्त अक्षरों और आयामों में व्याप्त है। १२८ नामों का उच्चारण साक्षात् मन्त्र-शक्ति को जाग्रत करता है।
वृक्ष-साधना का रहस्य: इस स्तोत्र में विभिन्न वृक्षों (पीपल, बेल, पलाश) के नीचे पाठ करने का विधान है। तन्त्र शास्त्र के अनुसार, ये वृक्ष ब्रह्माण्ड की विशिष्ट ऊर्जाओं को खींचते हैं। गायत्री पाठ इन ऊर्जाओं को साधक के अनुकूल बना देता है।
त्रिवर्ग फल: श्लोक १५ में इसे 'त्रिवर्गसंयुक्तं' कहा गया है। अर्थात् यह धर्म, अर्थ और काम—तीनों की सिद्धि एक साथ प्रदान करता है, जो गृहस्थों के लिए अत्यंत आवश्यक है।
स्वाभाविक करुणा: नामों में माँ को 'मही' (पृथ्वी), 'सुमना' (सुन्दर मन वाली) और 'जननी' कहा गया है, जो साधक के प्रति माँ की असीम ममता और सहज प्रेम को व्यक्त करता है।
फलश्रुति लाभ: आरोग्य, संतान और सौभाग्य
पाठ विधि और विशिष्ट वृक्ष-प्रयोग (Ritual Guide)
- सामान्य पाठ: प्रातः काल ब्रह्म-मुहूर्त में या सन्ध्या समय स्वच्छ होकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके पाठ करें।
- राज-कार्य/नौकरी हेतु: 'अश्वत्थे' अर्थात् पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर एकाग्रचित्त होकर पाठ करें।
- विद्या प्राप्ति हेतु: 'पालाशमूले' अर्थात् पलाश के पेड़ की जड़ के पास, सूर्य की ओर मुख करके पाठ करें।
- लक्ष्मी/धन प्राप्ति हेतु: 'विष्णुगेहे' (विष्णु मंदिर) या सुन्दर उद्यान (बगीचे) में बैठकर पाठ करें।
- रोग निवारण हेतु: 'कुशाग्रेण मार्जयेत्'—कुशा घास को जल में डुबोकर रोगी के शरीर पर छिड़कते हुए पाठ सम्पन्न करें।
- न्यास विधान: श्लोक २५ के अनुसार, जपारम्भ में 'हृदयम्' और जपान्त में 'कवचम्' (गायत्री कवच) पढ़ना अनिवार्य है ताकि फल पूर्णतः प्राप्त हो।