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Sri Gayatri Ashtavimshati Shatanam Stotram – श्री गायत्री अष्टविंशतिशतनाम स्तोत्रम् (१२८ नाम)

Sri Gayatri Ashtavimshati Shatanam Stotram – श्री गायत्री अष्टविंशतिशतनाम स्तोत्रम् (१२८ नाम)
॥ श्री गायत्री अष्टविंशतिशतनाम स्तोत्रम् ॥
(श्रीमद्वसिष्ठसंहितायाम् ब्रह्मनारदसंवादे - १२८ नाम)
॥ ब्रह्मोवाच ॥शताक्षरात्मकं देव्या नामाष्टाविंशतिः शतम् । श‍ृणु वक्ष्यामि तत्सर्वमतिगुह्यं सनातनम् ॥ १॥ भूतिदा भुवना वाणी वसुधा सुमना मही । हरिणी जननी नन्दा सविसर्गा तपस्विनी ॥ २॥ पयस्विनी सती त्यागा चैन्दवी सत्यवीरसा । विश्वा तुर्या परा रेच्या निर्घृणी यमिनी भवा ॥ ३॥ गोवेद्या च जरिष्ठा च स्कन्दिनी धीर्मतिर्हिमा । भीषणा योगिनी पक्षी नदी प्रज्ञा च चोदिनी ॥ ४॥ धनिनी यामिनी पद्मा रोहिणी रमणी ऋषिः । सेनामुखी सामयी च बकुला दोषवर्जिता ॥ ५॥ सर्वकामदुघा सोमोद्भवाऽहङ्कारवर्जिता । द्विपदा च चतुष्पादा त्रिपदा चैव षट्पदा ॥ ६॥ अष्टापदी नवपदी सा सहस्राक्षरात्मिका । इदं यः परमं गुह्यं सावित्रीमन्त्रगर्भितम् ॥ ७॥ नामाष्टविंशतिशतं श‍ृणुयाच्छ्रावयेत्पठेत् । मर्त्यानाममृतत्वाय भीतानामभयाय च ॥ ८॥ ॥ फलश्रुति ॥मोक्षाय च मुमुक्षूणां श्रीकामान् प्राप्तये श्रियः । विजयाय युयुत्सूनां व्याधितानामरोगकृत् ॥ ९॥ वश्याय वश्यकामानां विद्यायै वेदकामिनाम् । द्रविणाय दरिद्राणां पापिनां पापशान्तये ॥ १०॥ वादिनां वादविजये कवीनां कविताप्रदम् । अन्नाय क्षुधितानां च स्वर्गाय नाकमिच्छताम् ॥ ११॥ पशुभ्यः पशुकामानां पुत्रेभ्यः पुत्रकाङ्क्षिणाम् । क्लेशिनां शोकशान्त्यर्थं नृणां शत्रुभयाय च ॥ १२॥ राजवश्याय द्रष्टव्यं परमं नृपसेविनाम् । भक्त्यर्थं विष्णुभक्तानां विष्णौ सर्वान्तरात्मनि ॥ १३॥ नायकं विधिसृष्टानां शान्तये भवति ध्रुवम् । निःस्पृहाणां नृणां मुक्तिः शाश्वती भवति ध्रुवम् ॥ १४॥ जप्यं त्रिवर्गसंयुक्तं गृहस्थेन विशेषतः । मुनीनां ज्ञानसिद्ध्यर्थं यतीनां मोक्षसिद्धये ॥ १५॥ उद्यतं चन्द्रकिरणमुपस्थाय कृताञ्जलिः । कानने वा स्वभवने तिष्ठन् शुद्धो जपेदिदम् ॥ १६॥ सर्वान् कामानवाप्नोति तथैव शिवसन्निधौ । मम प्रीतिकरं दिव्यं विष्णुभक्तिविवर्धनम् ॥ १७॥ ॥ विशेष प्रयोग विधि ॥ज्वरार्तानां कुशाग्रेण मार्जयेत्कुष्ठरोगिणाम् । अङ्गमङ्गं यथालिङ्गं कवचेन तु साधकः ॥ १८॥ मण्डलेन विशुध्येत सर्वरोगैर्न संशयः । मृतप्रजा च या नारी जन्मवन्ध्या तथैव च ॥ १९॥ कन्यादिवन्ध्या या नारी तासामङ्गं प्रमार्जयेत् । पुत्रा नरोगिणस्तास्तु लभन्ते दीर्घजीविनः ॥ २०॥ तास्ताः संवत्सरादर्वाक् गर्भं तु दधिरे पुनः । पतिविद्वेषिणी या स्त्री अङ्गं तस्याः प्रमार्जयेत् ॥ २१॥ तमेव भजते सा स्त्री पतिं कामवशं नयेत् । अश्वत्थे राजवश्यार्थं बिल्वमूले स्वरूपभाक् ॥ २२॥ पालाशमूले विद्यार्थी तेजसोऽभिमुखो रवौ । कन्यार्थी चण्डिकागेहे जपेच्छत्रुभयाय च ॥ २३॥ श्रीकामो विष्णुगेहे च उद्याने श्रीर्वशीभवेत् । आरोग्यार्थे स्वगेहे च मोक्षार्थी शैलमस्तके ॥ २४॥ सर्वकामो विष्णुगेहे मोक्षार्थी यत्र कुत्रचित् । जपारम्भे तु हृदयं जपान्ते कवचं पठेत् ॥ २५॥ किमत्र बहुनोक्तेन श‍ृणु नारद तत्त्वतः । यं यं चिन्तयते नित्यं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ॥ २६॥
॥ इति श्रीमद्वसिष्ठसंहितायां ब्रह्मनारदसंवादे गायत्रीनामाष्टाविंशतिस्तोत्रं समाप्तम् ॥

श्री गायत्री अष्टविंशतिशतनाम स्तोत्रम् - एक विस्तृत परिचय

श्री गायत्री अष्टविंशतिशतनाम स्तोत्रम् (Sri Gayatri Ashtavimshati Shatanam Stotram) भारतीय सनातन परम्परा का वह गोपनीय मणि है जो माँ गायत्री के १२८ (१००+२८) सिद्ध नामों की व्याख्या करता है। यह स्तोत्र प्राचीन 'श्रीमद्वसिष्ठ संहिता' (Sri Vasistha Samhita) से लिया गया है, जहाँ स्वयं जगत के रचयिता भगवान ब्रह्मा अपने पुत्र देवर्षि नारद को इस ब्रह्माण्डीय शक्ति का उपदेश देते हैं। ब्रह्मा जी इसे "अतिगुह्यं सनातनम्" अर्थात् अत्यंत गोपनीय और सनातन सत्य बताते हैं।

इस स्तोत्र की अद्वितीयता इसके 'शताक्षरात्मक' स्वरूप में है। इसका अर्थ है कि ये नाम साक्षात् 'शताक्षरा गायत्री' (सौ अक्षरों वाली गायत्री) की शक्ति को साधक के भीतर प्रवाहित करते हैं। जहाँ सामान्य गायत्री मन्त्र २४ अक्षरों का होता है, वहीं यह स्तोत्र मन्त्र की उस ऊर्जा का विस्तार करता है जो हमारे शरीर की सूक्ष्म नाड़ियों और चेतना के केंद्रों को झंकृत करती है। इसमें माँ को 'सावित्रीमन्त्रगर्भितम्' कहा गया है, अर्थात् प्रत्येक नाम के भीतर सावित्री मन्त्र की शक्ति छिपी हुई है।

महर्षि वसिष्ठ ने इस स्तोत्र को केवल एक प्रार्थना के रूप में नहीं, बल्कि एक 'आध्यात्मिक चिकित्सा पद्धति' के रूप में संकलित किया है। इस स्तुति में माँ के उन नामों का संकलन है जो अनाथ, दरिद्र, रोगी और भयभीत व्यक्ति को तत्काल सहारा प्रदान करते हैं। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि माँ गायत्री केवल ज्ञान की देवी नहीं हैं, बल्कि वे 'भूतिदा' (वैभव देने वाली), 'जननी' (माता), और 'अरोगकृत्' (रोगों को नष्ट करने वाली) दयामयी सत्ता हैं।

वर्तमान युग में, जहाँ मनुष्य असुरक्षा और व्याधियों से घिरा है, वसिष्ठ संहिता का यह १२८ नामों वाला पाठ एक अभेद्य 'रक्षा कवच' की तरह कार्य करता है। यह स्तोत्र साधक के अंतःकरण को शुद्ध कर उसे उस स्थिति तक ले जाता है जहाँ उसे संसार की किसी भी वस्तु से भय नहीं रहता, जैसा कि फलश्रुति में कहा गया है—'भीतानामभयाय च' (भयभीत लोगों के लिए अभय प्रदाता)।

विशिष्ट महत्व और तात्विक रहस्य (Significance)

गायत्री अष्टविंशतिशतनाम स्तोत्र का महत्व इसके तात्विक और प्रयोगात्मक पक्ष में निहित है, जो इसे अन्य स्तोत्रों से श्रेष्ठ बनाता है:

  • अक्षर विज्ञान और मन्त्र शक्ति: माँ को 'अष्टापदी' और 'सहस्राक्षरात्मिका' कहा गया है। यह दर्शाता है कि माँ गायत्री की शक्ति अनन्त अक्षरों और आयामों में व्याप्त है। १२८ नामों का उच्चारण साक्षात् मन्त्र-शक्ति को जाग्रत करता है।

  • वृक्ष-साधना का रहस्य: इस स्तोत्र में विभिन्न वृक्षों (पीपल, बेल, पलाश) के नीचे पाठ करने का विधान है। तन्त्र शास्त्र के अनुसार, ये वृक्ष ब्रह्माण्ड की विशिष्ट ऊर्जाओं को खींचते हैं। गायत्री पाठ इन ऊर्जाओं को साधक के अनुकूल बना देता है।

  • त्रिवर्ग फल: श्लोक १५ में इसे 'त्रिवर्गसंयुक्तं' कहा गया है। अर्थात् यह धर्म, अर्थ और काम—तीनों की सिद्धि एक साथ प्रदान करता है, जो गृहस्थों के लिए अत्यंत आवश्यक है।

  • स्वाभाविक करुणा: नामों में माँ को 'मही' (पृथ्वी), 'सुमना' (सुन्दर मन वाली) और 'जननी' कहा गया है, जो साधक के प्रति माँ की असीम ममता और सहज प्रेम को व्यक्त करता है।

फलश्रुति लाभ: आरोग्य, संतान और सौभाग्य

ब्रह्मा जी ने इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक ९-२६) में इसके चमत्कारी लाभों का विस्तृत विवरण दिया है:
१. असाध्य रोगों से मुक्ति (Ardhya Siddhi)
श्लोक १८-१९ के अनुसार, ज्वर (बुखार) और कुष्ठ (Leprosy) जैसे गंभीर रोगों में कुशा के अग्रभाग से रोगी के शरीर का मार्जन (झाड़ा) करते हुए पाठ करने से रोगी रोगमुक्त हो जाता है।
२. संतान और वंश की रक्षा
जो स्त्रियाँ संतानहीन (वन्ध्या) हैं या जिनकी संतानें जीवित नहीं रहतीं (मृतप्रजा), उनके अंगों का इस स्तोत्र से मार्जन करने पर उन्हें दीर्घजीवी और निरोगी पुत्रों की प्राप्ति होती है।
३. ऐश्वर्य और राज-सम्मान (Success)
अश्वत्थ (पीपल) के नीचे पाठ करने से राजकीय कार्यों और नौकरियों में सफलता (राजवश्य) मिलती है। दरिद्रों को धन (द्रविणाय दरिद्राणां) और कवियों को काव्य शक्ति प्राप्त होती है।
४. मोक्ष और अनन्त शांति
मुमुक्षुओं (मोक्ष चाहने वालों) के लिए यह 'शाश्वती मुक्ति' का द्वार है। पर्वत के शिखर (शैलमस्तके) पर पाठ करने से साधक सीधे गायत्री के परम पद को प्राप्त करता है।

पाठ विधि और विशिष्ट वृक्ष-प्रयोग (Ritual Guide)

वसिष्ठ संहिता के अनुसार इस स्तोत्र का पाठ निम्नलिखित विशिष्ट विधियों से करना चाहिए:
  • सामान्य पाठ: प्रातः काल ब्रह्म-मुहूर्त में या सन्ध्या समय स्वच्छ होकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके पाठ करें।
  • राज-कार्य/नौकरी हेतु: 'अश्वत्थे' अर्थात् पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर एकाग्रचित्त होकर पाठ करें।
  • विद्या प्राप्ति हेतु: 'पालाशमूले' अर्थात् पलाश के पेड़ की जड़ के पास, सूर्य की ओर मुख करके पाठ करें।
  • लक्ष्मी/धन प्राप्ति हेतु: 'विष्णुगेहे' (विष्णु मंदिर) या सुन्दर उद्यान (बगीचे) में बैठकर पाठ करें।
  • रोग निवारण हेतु: 'कुशाग्रेण मार्जयेत्'—कुशा घास को जल में डुबोकर रोगी के शरीर पर छिड़कते हुए पाठ सम्पन्न करें।
  • न्यास विधान: श्लोक २५ के अनुसार, जपारम्भ में 'हृदयम्' और जपान्त में 'कवचम्' (गायत्री कवच) पढ़ना अनिवार्य है ताकि फल पूर्णतः प्राप्त हो।
नोट: पाठ के दौरान मन में पूर्ण श्रद्धा और "यं यं चिन्तयते नित्यं" का भाव रखें, माँ गायत्री आपके मनोरथ अवश्य पूर्ण करेंगी।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. अष्टविंशतिशतनाम का क्या अर्थ है और यह १०८ नामों से कैसे अलग है?

'अष्टविंशति' का अर्थ है २८ और 'शत' का अर्थ है १००। इस प्रकार यह १२८ नामों का संग्रह है। १०८ नामों वाला स्तोत्र 'अष्टोत्तरशतनाम' कहलाता है, जो कि एक भिन्न स्तुति है।

2. 'शताक्षरात्मकं' का आध्यात्मिक महत्व क्या है?

यह संकेत देता है कि ये नाम १०० दिव्य अक्षरों की ऊर्जा समाहित किए हुए हैं। यह साधक की बुद्धि को मन्त्र की सर्वोच्च गहराई से जोड़ता है।

3. क्या इस स्तोत्र से संतान सुख की बाधाएं दूर होती हैं?

हाँ, श्लोक २०-२१ के अनुसार 'मृतप्रजा' और 'वन्ध्या' दोषों के निवारण हेतु यह स्तोत्र अमोघ औषधि माना गया है।

4. क्या 'कुष्ठ' जैसे रोगों में यह वास्तव में प्रभावी है?

शास्त्रों के अनुसार, कुशा के जल से मार्जन करते हुए पाठ करने से त्वचा संबंधी रोगों और गंभीर ज्वर में दिव्य लाभ प्राप्त होता है।

5. 'अश्वत्थ' (पीपल) के नीचे पाठ करने का निर्देश क्यों है?

पीपल को साक्षात् विष्णु स्वरूप और देवताओं का निवास माना गया है। वहाँ पाठ करने से साधक को 'राजवश्य' अर्थात् सरकारी कार्यों और समाज में प्रभुत्व प्राप्त होता है।

6. 'पतिविद्वेषिणी' फल का क्या अर्थ है?

श्लोक २१ के अनुसार, यदि दांपत्य जीवन में कलह हो या स्त्री-पुरुष के मध्य वैमनस्य हो, तो इस स्तोत्र के प्रभाव से पुनः प्रेम और सामंजस्य स्थापित होता है।

7. क्या विद्यार्थी परीक्षा में सफलता हेतु इसे पढ़ सकते हैं?

हाँ, 'पालाशमूले विद्यार्थी' श्लोक के अनुसार पलाश वृक्ष के नीचे पाठ करने से प्रज्ञा (intelligence) जाग्रत होती है और एकाग्रता बढ़ती है।

8. 'जपारम्भे तु हृदयं' नियम का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है कि गायत्री जप शुरू करने से पहले 'गायत्री हृदयम्' और अंत में 'गायत्री कवचम्' का पाठ करना चाहिए, जिससे साधना के बीच ऊर्जा का क्षरण न हो।

9. क्या स्त्रियों के लिए पाठ के नियम अलग हैं?

नहीं, माँ गायत्री जगन्माता हैं। पूरी शुचिता और श्रद्धा के साथ स्त्रियाँ इसका पाठ कर सकती हैं। मासिक धर्म के समय पाठ वर्जित है।

10. क्या इसके पाठ से मोक्ष प्राप्त होता है?

हाँ, श्लोक २४ के अनुसार 'मोक्षार्थी शैलमस्तके'—पर्वत पर पाठ करने से या निष्काम भाव से नित्य पाठ करने से शाश्वत मोक्ष की प्राप्ति होती है।