Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Gayatri Stotram 1 – श्री गायत्री स्तोत्रम् १ (वसिष्ठ संहिता)

Sri Gayatri Stotram 1 – श्री गायत्री स्तोत्रम् १ (वसिष्ठ संहिता)
॥ श्री गायत्री स्तोत्रम् १ ॥
(श्रीमद्वसिष्ठसंहितायाम्)
नमस्ते देवि गायत्री सावित्री त्रिपदेऽक्षरी । अजरे अमरे माता त्राहि मां भवसागरात् ॥ १ ॥ नमस्ते सूर्यसङ्काशे सूर्यसावित्रिकेऽमले । ब्रह्मविद्ये महाविद्ये वेदमातर्नमोऽस्तु ते ॥ २ ॥ अनन्तकोटिब्रह्माण्डव्यापिनी ब्रह्मचारिणी । नित्यानन्दे महामाये परेशानी नमोऽस्तु ते ॥ ३ ॥ त्वं ब्रह्मा त्वं हरिः साक्षाद्रुद्रस्त्वमिन्द्रदेवता । मित्रस्त्वं वरुणस्त्वं च त्वमग्निरश्विनौ भगः ॥ ४ ॥ पूषाऽर्यमा मरुत्वांश्च ऋषयोऽपि मुनीश्वराः । पितरो नागयक्षांश्च गन्धर्वाऽप्सरसां गणाः ॥ ५ ॥ रक्षोभूतपिशाचाश्च त्वमेव परमेश्वरी । ऋग्यजुस्सामविद्याश्च अथर्वाङ्गिरसानि च ॥ ६ ॥ त्वमेव सर्वशास्त्राणि त्वमेव सर्वसंहिताः । पुराणानि च तन्त्राणि महागममतानि च ॥ ७ ॥ त्वमेव पञ्चभूतानि तत्त्वानि जगदीश्वरी । ब्राह्मी सरस्वती सन्ध्या तुरीया त्वं महेश्वरी ॥ ८ ॥ तत्सद्ब्रह्मस्वरूपा त्वं किञ्चित् सदसदात्मिका । परात्परेशी गायत्री नमस्ते मातरम्बिके ॥ ९ ॥ चन्द्रकलात्मिके नित्ये कालरात्रि स्वधे स्वरे । स्वाहाकारेऽग्निवक्त्रे त्वां नमामि जगदीश्वरी ॥ १० ॥ नमो नमस्ते गायत्री सावित्री त्वं नमाम्यहम् । सरस्वती नमस्तुभ्यं तुरीये ब्रह्मरूपिणी ॥ ११ ॥ अपराध सहस्राणि त्वसत्कर्मशतानि च । मत्तो जातानि देवेशी त्वं क्षमस्व दिने दिने ॥ १२ ॥
॥ इति श्रीमद्वसिष्ठसंहितायां श्री गायत्री स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री गायत्री स्तोत्रम् १ - विस्तृत आध्यात्मिक परिचय

श्री गायत्री स्तोत्रम् १ (Sri Gayatri Stotram 1) महर्षि वसिष्ठ द्वारा रचित 'वसिष्ठ संहिता' का एक अत्यंत तेजस्वी और प्रभावी भाग है। सनातन धर्म में गायत्री को केवल एक मन्त्र नहीं, बल्कि 'वेदमाता' और 'ब्रह्मविद्या' का साक्षात् स्वरूप माना गया है। यह स्तोत्र उन साधकों के लिए एक संजीवनी के समान है जो सांसारिक दुखों (भवसागर) से मुक्ति और आत्मज्ञान की प्राप्ति चाहते हैं।

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सर्वव्यापकता है। वसिष्ठ जी ने इसमें माँ गायत्री को ब्रह्मांड के प्रत्येक तत्व—पंचभूतों, वेदों, शास्त्रों, पुराणों और यहाँ तक कि समस्त देवों के मूल आधार के रूप में वर्णित किया है। यह स्तोत्र हमें यह सिखाता है कि गायत्री ही वह शक्ति है जो ब्रह्मा बनकर सृजन करती है, विष्णु बनकर पालन करती है और रुद्र बनकर संहार करती है।

आध्यात्मिक यात्रा में, यह स्तोत्र साधक के अहंकार को गलाकर उसे माँ की शरण में ले जाता है। इसके अंतिम श्लोक में जो "क्षमा प्रार्थना" की गई है, वह साधक के हृदय को शुद्ध कर देती है। यह स्वीकारोक्ति कि "मुझसे हजारों अपराध हुए हैं, उन्हें क्षमा करें", साधक के प्रारब्ध कर्मों के बोझ को कम करने में सहायक होती है।

वर्तमान समय की भागदौड़ और मानसिक अशांति के बीच, वसिष्ठ संहिता का यह गायत्री स्तोत्र मानसिक शांति और आध्यात्मिक सुरक्षा का एक अभेद्य कवच प्रदान करता है। जो व्यक्ति निष्काम भाव से इसका पाठ करता है, उसकी वाणी में सत्यता और बुद्धि में दिव्यता का समावेश स्वतः होने लगता है।

विशिष्ट महत्व और दार्शनिक आधार

गायत्री स्तोत्र का महत्व इसके दार्शनिक पहलुओं में निहित है। यह स्तोत्र अद्वैत और शक्ति दर्शन का अनूठा संगम है:

  • एकात्म भाव: श्लोक ४ से ६ तक माँ गायत्री को समस्त देवों और यहाँ तक कि यक्ष, गन्धर्व और अप्सराओं के रूप में भी देखा गया है। यह दर्शाता है कि सृष्टि की हर चेतना में उसी एक पराशक्ति का वास है।

  • ज्ञान का पराकाष्ठा: माँ को 'ब्रह्मविद्या' और 'महाविद्या' कहा गया है। इसका अर्थ है कि वे केवल लौकिक ज्ञान नहीं, बल्कि वह परा-विद्या हैं जिससे ईश्वर का साक्षात्कार होता है।

  • पंचभूत और तत्त्व: देवी को पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का स्वरूप बताकर यह सिद्ध किया गया है कि हमारा शरीर और यह दृश्य जगत साक्षात् गायत्रीमयी है।

  • तुरीय स्वरूप: श्लोक ८ में 'तुरीया त्वं महेश्वरी' का उल्लेख है। 'तुरीय' वह अवस्था है जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे शुद्ध चेतना की स्थिति है। माँ गायत्री उसी सर्वोच्च चेतना की स्वामिनी हैं।

फलश्रुति लाभ (Divine Benefits)

वसिष्ठ संहिता के इस गायत्री स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित लाभ सुनिश्चित होते हैं:
१. सर्वपाप प्रक्षालन और क्षमा प्राप्ति
इस स्तोत्र का १२वाँ श्लोक अपराधों की क्षमा के लिए सिद्ध है। इसके नित्य पाठ से साधक के संचित पापों का प्रभाव कम होता है और आत्मग्लानि दूर होती है।
२. बुद्धि और प्रज्ञा का उत्कर्ष
गायत्री स्वयं 'धी' (बुद्धि) की शक्ति हैं। विद्यार्थियों और बौद्धिक कार्य करने वालों के लिए यह स्तोत्र एकाग्रता और निर्णय क्षमता बढ़ाने वाला है।
३. भय और बाधाओं से रक्षा
'त्राहि मां भवसागरात्' की प्रार्थना साधक को हर प्रकार के मानसिक और भौतिक संकटों से उबारने वाली है। यह स्तोत्र नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा करता है।
४. ब्रह्मतेज की प्राप्ति
नित्य पाठ से साधक के चेहरे पर एक सात्विक आभा और तेज प्रकट होता है, जो उसके आध्यात्मिक विकास का सूचक है।

पाठ विधि और अनुष्ठान नियम (Ritual Guide)

गायत्री साधना अत्यंत पवित्र है। इसका पूर्ण लाभ लेने के लिए निम्नलिखित शास्त्रीय मर्यादाओं का पालन करें:
  • समय (Timing): त्रिकाल सन्ध्या का समय (सूर्योदय, मध्याह्न, सूर्यास्त) सर्वोत्तम है। प्रातः काल का पाठ विशेष फलदायी होता है।
  • आसन और दिशा: सफ़ेद या पीले ऊनी आसन पर बैठें। मुख पूर्व (प्रातः) या उत्तर दिशा की ओर रखें।
  • शुद्धि: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मानसिक शांति के लिए ५ मिनट प्राणायाम करें।
  • ध्यान: 'नमस्ते देवि गायत्री...' पढ़ने से पूर्व सूर्य मण्डल के मध्य में स्वर्ण वर्ण वाली माँ गायत्री का ध्यान करें।
  • जप: स्तोत्र पाठ के बाद कम से कम २४ या १०८ बार मूल गायत्री मन्त्र का जप करना सोने पर सुहागा जैसा है।
विशेष टिप: यदि आप किसी संकट में हैं, तो मंगलवार या रविवार को इस स्तोत्र का ११ बार पाठ करना शीघ्र सहायता प्रदान करता है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री गायत्री स्तोत्रम् १ का मूल पाठ किस ग्रन्थ में मिलता है?

यह स्तोत्र 'श्रीमद्वसिष्ठ संहिता' (Vasistha Samhita) के अंतर्गत आता है, जिसे महर्षि वसिष्ठ और श्री राम के संवादों के संदर्भ में भी देखा जाता है।

2. क्या इस स्तोत्र का पाठ गायत्री मन्त्र जप का विकल्प है?

नहीं, गायत्री मन्त्र जप एक 'नित्य कर्म' है। यह स्तोत्र उस मन्त्र की महिमा का गुणगान है और साधना को अधिक प्रभावी बनाने के लिए पढ़ा जाता है।

3. 'त्रिपदेऽक्षरी' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है माँ गायत्री जो तीन चरणों (Three Feet) वाली हैं और अविनाशी अक्षरों का स्वरूप हैं। यह वेदों के तीन मुख्य भागों का प्रतीक है।

4. क्या विद्यार्थी इसे सफलता के लिए पढ़ सकते हैं?

जी हाँ, यह स्तोत्र बुद्धि की जड़ता को खत्म करता है। विद्यार्थियों के लिए यह स्मरण शक्ति और एकाग्रता बढ़ाने का अचूक साधन है।

5. 'परेशानी' शब्द का यहाँ क्या अर्थ है?

स्तोत्र में 'परेशानी' (Para-Ishani) का अर्थ 'परम ईश्वरी' या सर्वोच्च सत्ता की स्वामिनी है, न कि सांसारिक कष्ट या परेशानी।

6. इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

दैनिक रूप से १ या ३ बार पाठ पर्याप्त है। विशेष कामना पूर्ति या शुद्धि के लिए २१ या ५१ बार का संकल्प लिया जा सकता है।

7. क्या पाठ के साथ हवन भी आवश्यक है?

नित्य पाठ के लिए हवन आवश्यक नहीं है, परन्तु विशेष अनुष्ठान की पूर्णता के लिए गायत्री मन्त्र से हवन करना श्रेयस्कर है।

8. गायत्री को 'ब्रह्मचारिणी' क्यों कहा गया है?

इसका अर्थ है—वह जो सदा 'ब्रह्म' (परम सत्य) में विचरण करती हैं और ब्रह्म-तेज को धारण करने वाली हैं।

9. क्या भोजन का कोई नियम है?

गायत्री साधना के दौरान सात्विक आहार (बिना मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन का भोजन) मन को शुद्ध रखने में मदद करता है।

10. क्या इसके पाठ से मानसिक रोगों में लाभ होता है?

हाँ, यह स्तोत्र 'महामाया' और 'नित्यानन्दा' के स्वरूप का वर्णन करता है, जो डिप्रेशन, भय और चिंता जैसी मानसिक व्याधियों को दूर करने में सक्षम है।