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देवशयनी (पद्मा) एकादशी व्रत कथा

आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी - चातुर्मास का आरंभ

देवशयनी एकादशी का महत्व

आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली इस एकादशी को देवशयनी एकादशी या पद्मा एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी के आराध्य देव भगवान विष्णु हैं।

इस व्रत की विशेषता:

  • चातुर्मास का आरंभ - इसी दिन से चातुर्मास व्रत शुरू होता है
  • भगवान विष्णु का शयन - इस दिन भगवान क्षीरसागर में शयन करते हैं
  • चार माह का विश्राम - देवोत्थानी एकादशी तक (कार्तिक शुक्ल एकादशी)
  • समस्त पापों का नाश
  • समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति
  • अकाल और प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति
  • उपद्रवों को शांत करने वाली
  • सिद्धियों को देने वाली
  • सब व्रतों में श्रेष्ठ

विशेष: इस दिन से चार माह तक कोई शुभ कार्य (विवाह आदि) नहीं किया जाता। भगवान विष्णु शयन में होते हैं।

[!IMPORTANT] देवशयनी का अर्थ है "देवताओं की निद्रा"। इस दिन से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और चार माह बाद देवोत्थानी एकादशी पर जागते हैं। इस बीच का समय चातुर्मास कहलाता है - यह तप और साधना का विशेष समय है।

एकादशी व्रत विधि

पूजा सामग्री

  • फूल और माला - तुलसी दल, सफेद और पीले फूल, कमल पुष्प
  • धूप-दीप - अगरबत्ती, घी का दीपक
  • नैवेद्य - फल, मधु, मिष्ठान
  • चंदन - लाल चंदन, केसर
  • कलश - जल से भरा कलश
  • तुलसी पत्र - पवित्र तुलसी के पत्ते
  • पंचामृत - दूध, दही, घी, शहद, शक्कर
  • अक्षत - चावल के दाने
  • वस्त्र - भगवान को अर्पित करने के लिए
  • शय्या - भगवान विष्णु के शयन के लिए प्रतीकात्मक शय्या
  • दक्षिणा - ब्राह्मणों के लिए

व्रत की विधि

दशमी तिथि पर (एक दिन पहले):

  • सात्त्विक भोजन करें
  • मांस, प्याज, लहसुन से परहेज करें
  • रात्रि में ब्रह्मचर्य का पालन करें
  • चातुर्मास के संकल्प की तैयारी करें

एकादशी के दिन:

  • प्रातःकाल स्नान करें
  • स्वच्छ वस्त्र धारण करें
  • भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करें
  • प्रतीकात्मक शय्या तैयार करें - भगवान के शयन के लिए
  • तुलसी दल, कमल पुष्प, फूल, नैवेद्य अर्पित करें
  • धूप, दीप से पूजन करें
  • 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें
  • विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें
  • चातुर्मास व्रत का संकल्प लें
  • पूर्ण उपवास रखें

चातुर्मास संकल्प:

इस दिन से चार माह तक का संकल्प लें:

"हे भगवान विष्णु! आज से चातुर्मास आरंभ हो रहा है। मैं इस चार माह में विशेष संयम, तप और साधना करूंगा/करूंगी। कृपया मुझे शक्ति प्रदान करें।"


मनोकामना पूर्ति के लिए विशेष प्रार्थना:

"हे भगवान विष्णु! आप देवशयनी एकादशी के स्वामी हैं। आप समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। मेरी मनोकामनाएं पूर्ण करें। उपद्रवों को शांत करें। मुझे सिद्धि प्रदान करें।"


रात्रि जागरण:

  • रात्रि में जागरण करना अत्यंत फलदायी है
  • भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन करें
  • हरि नाम का जाप करें
  • व्रत कथा का श्रवण-पठन करें

द्वादशी पारण:

  • ब्राह्मणों को भोजन कराएं
  • विशेष रूप से दक्षिणा और मिष्टान्न दें
  • गरीबों को अन्न दान करें
  • त्रयोदशी से पूर्व पारण करें

देवशयनी एकादशी माहात्म्य कथा

आषाढ़ शुक्लपक्ष

श्री देवशयनी (पद्मा) एकादशी की संपूर्ण कथा

धनुर्धर अर्जुन बोले – "हे भगवन्! आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या व्रत है? उस दिन कौन से देवता की पूजा होती है? उसकी विधि क्या है? यह सब विस्तारपूर्वक कहिए।


ब्रह्मा और नारद का संवाद:

श्री कृष्ण भगवान् बोले – "हे अर्जुन! एक समय नारदजी ने ब्रह्मा जी से यही प्रश्न पूछा था। तब ब्रह्माजी ने कहा कि नारद! तुमने कलियुग में प्राणिमात्र के उद्धार के लिए सबसे उत्तम प्रश्न किया है, क्योंकि एकादशी का व्रत सब व्रतों में श्रेष्ठ होता है। इसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी का नाम पद्मा है। इसके व्रत करने से विष्णु भगवान् प्रसन्न होते हैं।" इस संदर्भ में मैं तुम्हें एक पौराणिक कथा सुनाता हूं, ध्यानपूर्वक सुनो –


राजा मान्धाता का राज्य:

"मान्धाता नाम का एक सूर्यवंशी राजा था। वह सत्यवादी, महान् प्रतापी और चक्रवर्ती था। वह अपनी प्रजा का पालन सन्तान की तरह करता था। इसकी समस्त प्रजा धन-धान्य से परिपूर्ण थी और सुखपूर्वक रहती थी। उसके राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ता था। कभी किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदा नहीं आती थी। किन्तु न जाने देव क्यों रुष्ट हो गए। राजा से क्या गलती हुई कि एक बार उसके राज्य में अकाल पड़ गया और प्रजा अन्न की कमी के कारण अत्यन्त दु:खी रहने लगी। राज्य में यज्ञ होना बन्द हो गये।


प्रजा की प्रार्थना:

एक दिन दु:खी होकर प्रजा राजा के पास जाकर प्रार्थना करने लगी – "हे राजन्! समस्त विश्व की सृष्टि का मुख्य कारण वर्षा है। इसी वर्षा के अभाव से राज्य में अकाल पड़ गया है और अकाल से प्रजा मर रही है। हे भूपति! आप कोई ऐसा उपाय कीजिए, जिससे हम लोगों का दु:ख दूर हो। यदि शीघ्र ही अकाल से छुटकारा न मिला तो विवश होकर प्रजा को किसी दूसरे राज्य में शरण लेनी होगी।"

इस पर राजा मान्धाता बोला – "आप लोग ठीक कह रहे हैं। वर्षा न होने से आप लोग बहुत दु:खी हैं। राजा के पापों के कारण ही प्रजा को दु:ख भोगना पड़ता है। मैं बहुत सोच-विचार कर रहा हूं, फिर भी मुझे अपना कोई दोष नहीं दिखलाई दे रहा है। आप लोगों के दु:ख को दूर करने के लिए मैं बहुत यत्न कर रहा हूं। किन्तु आप चिंतित न हों, मैं इसका कुछ-न-कुछ उपाय अवश्य ही करूंगा।"


अंगिरा ऋषि के आश्रम में:

आश्वासन पाकर प्रजाजन चले गए। राजा मान्धाता भगवान् की पूजा कर कुछ मुख्य व्यक्तियों को साथ लेकर वन को चल दिया। वहां वह ऋषियों के आश्रमों में घूमते-घूमते अन्त में ब्रह्मा के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम पर पहुंच गया। राजा रथ से उतरा और आश्रम में चला गया। वहां मुनि अभी नित्य कर्म से निवृत्त हुए थे कि राजा ने उनके सम्मुख जाकर प्रणाम किया।

मुनि ने उनको आशीर्वाद दिया, फिर पूछा – "हे राजन्! आप इस स्थान पर किस प्रयोजन से पधारे हैं, सो कहिए।"

राजा बोले – "हे महर्षि! मेरे राज्य में तीन वर्ष से वर्षा नहीं हो रही है। इससे अकाल पड़ गया है और प्रजा दु:ख भोग रही है। राजा के पापों के प्रभाव से ही प्रजा को कष्ट मिलता है, ऐसा शास्त्रों में लिखा है। मैं धर्मानुसार राज्य करता हूं, फिर यह अकाल कैसे पड़ गया, इसका मुझे अभी तक पता न लग सका। अब मैं आपके पास इसी सन्देह की निवृत्ति के लिए आया हूं। आप कृपा कर मेरी इस समस्या का समाधान कर मेरी प्रजा के कष्ट को दूर करने के लिए कोई उपाय बतलाइए।"


अंगिरा ऋषि का निदान:

इस पर वह ऋषि बोले – "हे राजन्! यह सतयुग सब युगों में श्रेष्ठ है। इसमें धर्म के चारों चरण सम्मिलित हैं। इस युग में केवल ब्राह्मणों को ही तपस्या करने तथा वेद पढ़ने का अधिकार है। परन्तु आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है। इसी दोष के कारण आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। यदि आप प्रजा का भला चाहते हैं तो उस शूद्र का वध करवा दीजिए। जब तक ऐसा नहीं करेंगे, तब तक आपका राज्य अकाल की पीड़ा से मुक्त नहीं होगा।"


राजा का नैतिक दुविधा:

इस पर राजा बोले – "हे मुनीश्वर! मैं उस निरपराध तपस्या करने वाले शूद्र को नहीं मार सकता। किसी निर्दोष मनुष्य की हत्या करना मेरे नियमों के विरुद्ध है और मेरी आत्मा इसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं करेगी। आप इस दोष से छूटने का कोई दूसरा उपाय बतलाइये।"


पद्मा (देवशयनी) एकादशी का उपाय:

तब ऋषि बोले – "हे राजन्! यदि तुम ऐसा ही चाहते हो तो आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पद्मा नाम की एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे राज्य में वर्षा होगी और प्रजा भी पूर्व की भांति सुख पायेगी क्योंकि इस एकादशी का व्रत सिद्धियों को देने वाला और उपद्रवों को शान्त करने वाला है।"


व्रत का प्रभाव:

मुनि के इन वचनों को सुनकर राजा अपने नगर को वापस आया और विधिपूर्वक पद्मा एकादशी व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से राज्य में वर्षा हुई और मनुष्यों को सुख पहुंचा।

इस एकादशी को देवशयनी एकादशी भी कहते हैं। इस व्रत के करने से विष्णु भगवान् प्रसन्न होते हैं। अतः मोक्ष की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को एकादशी का व्रत करना चाहिए। चातुर्मास्य व्रत भी इसी एकादशी के व्रत से शुरू किया जाता है।

कथासार

अपनी किसी समस्या से छुटकारा पाने के लिए किसी दूसरे का अहित नहीं करना चाहिए। अपनी शक्ति से और भगवान पर पूरी श्रद्धा और आस्था रखकर सन्तों के कथनानुसार सत्कर्म करने से बड़ी-बड़ी विपदाओं से छुटकारा मिल जाता है।

इस कथा की शिक्षा:

  • किसी निर्दोष का अहित न करें - राजा ने निरपराध शूद्र को मारने से इनकार किया
  • अपनी समस्या का समाधान सत्कर्म और धर्म से खोजें
  • नैतिक मूल्यों से समझौता नहीं - भले ही परिणाम कुछ भी हो
  • राजा के पाप से प्रजा पीड़ित होती है - शासक की जिम्मेदारी
  • संतों के कथनानुसार व्रत और सत्कर्म करने से बड़ी विपदाएं दूर होती हैं
  • देवशयनी एकादशी अकाल और प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति दिलाती है
  • यह व्रत सिद्धियों को देने वाला और उपद्रवों को शांत करने वाला है
  • चातुर्मास का आरंभ - तप और साधना का विशेष काल

जय श्री हरि!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

देवशयनी एकादशी कब मनाई जाती है?

देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। यह आमतौर पर जून या जुलाई के महीने में आती है।

इसे 'देवशयनी' एकादशी क्यों कहते हैं?

'देवशयनी' का अर्थ है 'देवता का सोना'। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन से भगवान श्री हरि विष्णु चार महीनों के लिए क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा (शयन) में चले जाते हैं। इसलिए इसे देवशयनी एकादशी कहते हैं।

क्या देवशयनी एकादशी का कोई और नाम भी है?

जी हाँ, इसे कई अन्य नामों से जाना जाता है: पद्मा एकादशी, हरि-शयनी एकादशी, विष्णु-शयनी एकादशी, और आषाढ़ी एकादशी (महाराष्ट्र में पंढरपुर यात्रा के लिए प्रसिद्ध)।

देवशयनी एकादशी का चातुर्मास से क्या संबंध है?

देवशयनी एकादशी से ही चातुर्मास (चार पवित्र महीनों की अवधि) का आरंभ होता है। भगवान के सोने के बाद अगले 4 महीने (कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी तक) कोई भी मांगलिक कार्य जैसे विवाह, मुंडन, जनेऊ आदि नहीं किए जाते।

देवशयनी एकादशी की व्रत कथा किस राजा से जुड़ी है?

यह कथा सूर्यवंशी राजा मान्धाता से जुड़ी है। उनके राज्य में तीन साल तक भयंकर अकाल पड़ा था। तब अंगिरा ऋषि के कहने पर राजा ने विधि-विधान से 'पद्मा' (देवशयनी) एकादशी का व्रत किया, जिसके प्रभाव से राज्य में वर्षा हुई और अकाल समाप्त हो गया।

इस दिन भगवान विष्णु के किस रूप की पूजा होती है?

इस दिन भगवान विष्णु के 'वामन' अवतार की पूजा का विशेष विधान है। इसके अलावा, भगवान विष्णु को पीतांबर (पीले वस्त्र) पहनाकर विधि-विधान से सुलाने की रस्म भी निभाई जाती है।

देवशयनी एकादशी के दिन 'पंढरपुर यात्रा' का क्या महत्व है?

महाराष्ट्र में इस दिन का विशेष महत्व है। लाखों वारकरी (भक्त) पैदल चलकर पंढरपुर स्थित भगवान विठ्ठल (विष्णु जी का रूप) के दर्शन के लिए जाते हैं। इसे 'महाएकादशी' भी माना जाता है।

क्या देवशयनी एकादशी के दिन चावल खा सकते हैं?

नहीं, किसी भी एकादशी की तरह इस दिन भी चावल (Rice) खाना पूर्णतः वर्जित है। व्रती को फलाहार करना चाहिए और जो व्रत नहीं भी कर रहे, उन्हें भी चावल और तामसिक भोजन से बचना चाहिए।

भगवान विष्णु के सोने के बाद सृष्टि का संचालन कौन करता है?

शास्त्रों के अनुसार, जब भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में होते हैं, तब सृष्टि के संचालन का भार भगवान शिव के पास होता है। यही कारण है कि चातुर्मास का पहला महीना (सावन) भगवान शिव को समर्पित होता है।

देवशयनी एकादशी के व्रत का पारण कब करें?

व्रत का पारण द्वादशी तिथि (अगले दिन) को सूर्योदय के बाद किया जाता है। ध्यान रहे कि पारण हरि वासर समाप्त होने के बाद ही करना चाहिए।

देवशयनी एकादशी में क्या खाना चाहिए?

पूर्ण उपवास या फलाहार (फल, दूध, दही, मखाना, पानी) कर सकते हैं। अन्न, चावल, नमक, लहसुन-प्याज पूर्णतः वर्जित हैं।

देवशयनी एकादशी में पानी पी सकते हैं?

हां, देवशयनी एकादशी में पानी पीना वर्जित नहीं है। यह निर्जला एकादशी की तरह 'निर्जल' व्रत अनिवार्य नहीं है, हालांकि कुछ लोग अपनी श्रद्धा से निर्जल व्रत भी रखते हैं।

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जय श्री हरि! ॥

।। ॐ नमः शिवाय ।।