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चातुर्मास्य व्रत विधान

देवशयनी से देवोत्थानी तक - चार माह का पवित्र व्रत

चातुर्मास का महत्व

चातुर्मास (चार माह का व्रत) आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) से कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवोत्थानी) तक किया जाता है।

इस व्रत की विशेषता:

  • भगवान विष्णु का शयन काल - क्षीरसागर में विश्राम
  • चार माह का तप और साधना - विशेष आध्यात्मिक समय
  • कोई मांगलिक कार्य नहीं - विवाह आदि वर्जित
  • समस्त पापों का नाश
  • विष्णुलोक की प्राप्ति
  • धन, संपत्ति, नीरोगता और ईश्वर की कृपा
  • मानसिक रोगों की शांति
  • विष्णु भक्ति में वृद्धि

व्रत आरंभ: देवशयनी एकादशी, द्वादशी, पूर्णिमा, अष्टमी या संक्रांति से
व्रत समापन: कार्तिक शुक्ल द्वादशी (देवोत्थानी एकादशी)

[!IMPORTANT] जब सूर्य नारायण कर्क राशि में होते हैं तब भगवान विष्णु शयन करते हैं, और जब सूर्य तुला राशि में आते हैं तब भगवान उठते हैं। इस काल में तप, दान, जप और संयम का विशेष महत्व है।

चातुर्मास व्रत विधि

भगवान विष्णु का शयन विधान

कुन्ती पुत्र अर्जुन बोले – "हे मधुसूदन! विष्णु भगवान् का शयन व्रत किस प्रकार किया जाता है। सो सब कृपापूर्वक कहिए।"

श्री कृष्ण बोले – "हे अर्जुन! अब मैं तुम्हें विष्णु के शयन का व्रत विस्तार से कहता हूं। इसे ध्यानपूर्वक स्मरण करो –


शयन की तिथि:

जब सूर्य नारायण कर्क राशि में स्थित हों, तब भगवान् विष्णु शयन करते हैं और जब सूर्य नारायण तुला राशि में आते हैं तब भगवान् उठते है। लौंद (अधिक) माह के आने पर भी विधि इसी प्रकार रहती है। इस विधि से अन्य देवताओं को शयन न कराना चाहिए।


देवशयनी एकादशी पर विधि:

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करना चाहिए। उस दिन विष्णु भगवान् की प्रतिमा बनानी चाहिए और चातुर्मास्य व्रत नियम से करना चाहिए।

  • सबसे प्रथम उस प्रतिमा को स्नान कराना चाहिए
  • फिर सफेद वस्त्रों को धारण कराना चाहिए
  • तकियादार शैय्या पर शयन कराना चाहिए
  • उनका धूप, दीप और नैवेद्यादि से पूजन कराना चाहिए
  • भगवान् का पूजन शास्त्र ज्ञाता ब्राह्मणों के द्वारा कराना चाहिए

शयन स्तुति:

तत्पश्चात् भगवान् विष्णु की इस प्रकार स्तुति करनी चाहिए –

"हे भगवान्! मैंने आपको शयन कराया है। आपके शयन से सम्पूर्ण विश्व सो जाता है।"

इस तरह विष्णु भगवान् के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना करनी चाहिए –

"हे भगवान्! आप जब चार मास तक शयन करें, तब तक मेरे इस चातुर्मास्य व्रत को निर्विघ्न रखें।"


व्रत नियम:

इस प्रकार विष्णु भगवान् की स्तुति करके शुद्ध भाव से मनुष्यों को दातुन आदि के नियम को ग्रहण करना चाहिए।

चातुर्मास में दान और उनके फल

हे राजन्! अब आप इसमें दान का पृथक्-पृथक् फल सुनें –


मंदिर सजावट:

जो मनुष्य देव मन्दिरों में रंगीन बेल-बूटे बनाता है, उसे सात जन्म तक ब्राह्मण की योनि मिलती है।


पंचामृत स्नान:

जो मनुष्य चातुर्मास्य के दिनों में विष्णु भगवान् को दही, दूध, घी, शहद और मिश्री आदि पंचामृत के द्वारा स्नान कराता है, वह वैभवशाली होकर सुख भोगता है।


भूमि, स्वर्ण, दक्षिणा दान:

जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक भूमि, स्वर्ण, दक्षिणा आदि ब्राह्मणों को दान स्वरूप देता है, वह स्वर्ग में जाकर इन्द्र के समान सुख भोगता है।


स्वर्ण प्रतिमा पूजन:

जो विष्णु भगवान् की स्वर्ण प्रतिमा बनाकर धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य आदि से पूजा करता है, वह इन्द्र लोक में अक्षय सुख भोगता है।


तुलसी अर्पण:

जो मनुष्य चातुर्मास्य के अन्दर नित्य भगवान् को तुलसीजी अर्पित करता है, वह स्वर्ण के विमान पर बैठकर विष्णु लोक को जाता है।


धूप-दीप पूजन:

जो मनुष्य विष्णु भगवान् की धूप-दीप से पूजा करता है, उनको अनन्त धन मिलता है।


दीपदान:

इस चातुर्मास्य व्रत में जो मनुष्य संध्या के समय देवताओं तथा ब्राह्मणों को दीपदान करते हैं तथा ब्राह्मणों को सोने के पात्र में वस्त्र दान देते हैं, वह विष्णु लोक को जाते हैं।


चरणामृत पान:

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक भगवान् का चरणामृत लेते हैं, वे इस संसार के आवागमन के चक्र से छूट जाते हैं।


गायत्री जप:

जो विष्णु मन्दिर में नित्य प्रति १०८ बार गायत्री मंत्र का जप करते हैं, वे पापों में लिप्त नहीं होते।


पुराण श्रवण और वस्त्र दान:

जो मनुष्य पुराण तथा धर्मशास्त्र को सुनते हैं और वेदपाठी ब्राह्मण को वस्त्रों का दान करते हैं वे दानी, धनी, ज्ञानी और यशस्वी होते हैं।


सूर्य अर्घ्य और गौदान:

जो मनुष्य सूर्य नारायण को अर्घ्य देते हैं और समाप्ति में गौदान करते हैं, वे नीरोगिता, दीर्घायु, कीर्ति, धन और बल पाते हैं।


तिल होम और दान:

चातुर्मास्य में जो मनुष्य गायत्री मंत्र द्वारा तिल से होम करते हैं और चातुर्मास्य समाप्त हो जाने पर तिल का दान करते हैं; उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और नीरोग शरीर मिलता है तथा अच्छी संस्कारशील सन्तान उत्पन्न होती है।


दूर्वा दान:

जो मनुष्य चातुर्मास्य व्रत में भगवान् के शयन के उपरान्त उनके मस्तक पर नित्य-प्रति दूध चढ़ाते हैं और अन्त में स्वर्ण की दूर्वा दान करते हैं तथा दान देते समय जो इस प्रकार की स्तुति करते हैं कि -

'हे दूर्वे! जिस भांति इस पृथ्वी पर शाखाओं सहित फैली हुई हो, उसी प्रकार मुझे भी अजर-अमर सन्तान दो'

ऐसा करने वाले मनुष्य के सब पाप छूट जाते हैं और अन्त में स्वर्ग को जाते हैं।


घण्टा दान:

जो मनुष्य चातुर्मास्य व्रत करते हैं, उनको उत्तम ध्वनि वाला घण्टा दान करना चाहिए और इस प्रकार स्तुति करनी चाहिए -

'हे भगवान्! हे जगदीश्वर! आप पापों का नाश करने वाले हैं। मेरे न करने योग्य कार्यों को करने से जो पाप उत्पन्न हुए हैं, आप उनको नष्ट कीजिये।'


ब्राह्मण चरणामृत:

चातुर्मास्य व्रत के अन्दर जो नित्य-प्रति ब्राह्मणों का चरणामृत पान करते हैं; वे समस्त पापों तथा दु:खों से छूट जाते हैं और आयुवान, लक्ष्मीवान होते हैं।

प्राजापत्य और चान्द्रायण व्रत

चातुर्मास में प्राजापत्य तथा चान्द्रायण व्रत पद्धति का पालन भी किया जाता है।


प्राजापत्य व्रत (12 दिन):

प्राजापत्य व्रत को १२ दिनों में पूर्ण करते हैं:

  • पहले 3 दिन: 12 ग्रास भोजन प्रतिदिन
  • अगले 3 दिन: 26 ग्रास भोजन प्रतिदिन
  • फिर 3 दिन: 28 ग्रास भोजन प्रतिदिन
  • अंतिम 3 दिन: निराहार

फल: इस व्रत के करने से मनोकामना पूर्ण होती है। व्रत करने वाला साधक प्राजापत्य व्रत करते हुए चातुर्मास्य के हेतु उपयुक्त सभी धार्मिक कृत्य जैसे पूजन, जप, तप, दान, शास्त्रों का पठन-पाठन तथा कीर्तनादि करता रहे।


चान्द्रायण व्रत (पूरे माह):

यह व्रत पूरे माह किया जाता है। पापों की निवृत्ति के लिए किया जाने वाला यह व्रत बढ़ता-घटता रहता है:

कृष्ण पक्ष (अमावस्या से पूर्णिमा):

  • अमावस्या: 1 ग्रास
  • प्रतिपदा: 2 ग्रास
  • द्वितीया: 3 ग्रास
  • ...इसी क्रम में बढ़ाते हुए...
  • चतुर्दशी: 14 ग्रास
  • पूर्णिमा: 15 ग्रास

शुक्ल पक्ष (पूर्णिमा के बाद):

  • 14, 13, 12, 11... इस क्रम में घटाते हुए

फल: इस लोक में धन सम्पत्ति, शारीरिक नीरोगता तथा ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। इसमें कांसे का पात्र और वस्त्र दान की शास्त्रीय व्यवस्था है।

मासिक त्याग नियम

वर्षा ऋतु में विशेष त्याग नियम:

  • श्रावण (Sawan): शाक का त्याग
  • भादों (Bhadrapad): दही का त्याग
  • आश्विन (Ashwin): दूध का त्याग
  • कार्तिक (Kartik): दाल का त्याग

इन नियमों का पालन करने वाले नीरोगी होते हैं।


अन्य महत्वपूर्ण नियम:

  • एक बार भोजन करना
  • भूखे को अन्न देना
  • भूमि पर शयन करना
  • इन्द्रिय निग्रह करना

ये सब करने से अभीष्ट को प्राप्त किया जाता है और अनन्त फल मिलता है।

उद्यापन (व्रत समापन) विधि

चातुर्मास्य व्रत का पालन करने पर उद्यापन किया जाए। जब भगवान् को शय्या त्यागने का अनुरोध करें तब विशेष पूजन करना चाहिए।


समापन के समय:

  • निरभिमानी, विद्वान् ब्राह्मण को अपनी क्षमता के अनुसार दान-दक्षिणा देकर सन्तुष्ट करना चाहिए
  • गौ-दान करना चाहिए। यदि गौ-दान न कर सकें तो वस्त्र दान अवश्य करना चाहिए
  • ब्राह्मणों को भोजन कराना - इससे आयु तथा धन में वृद्धि होती है
  • शय्यादान करने से अक्षय सुख मिलता है और कुबेर के समान धनवान होते हैं
  • चांदी या तांबा-पात्र गुड़ और तिल के साथ दान करना चाहिए

विशेष दान:

  • अलंकार सहित बछड़े वाली कपिला गाय वेदपाठी ब्राह्मणों को दान करने वाले चक्रवर्ती आयुवान्, पुत्रवान् राजा होते हैं और स्वर्ग लोक में प्रलय के अन्त तक इन्द्र के समान राज्य करते हैं

हे पाण्डुनन्दन! देवशयनी एकादशी और चातुर्मास का माहात्म्य पुण्य फलदायी है, इससे मानसिक रोगों की शान्ति और भगवान् विष्णु के प्रति निष्ठा बढ़ती है।

कथासार

चातुर्मास्य भगवान् विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए लगभग चार माह तक किया जाने वाला व्रत है।

इस व्रत की शिक्षा:

  • इस व्रत को देवशयनी से देवोत्थान एकादशियों से जोड़ने से प्रभु के प्रति अनुराग दृढ़ होता है
  • चतुर्मास चौमासे में जब भगवान् श्री हरि विष्णु शयन करते हैं, उस समय कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किए जाते
  • मांगलिक कार्यों का आरम्भ देवोत्थानी एकादशी से पुनः प्रारम्भ करते हैं
  • चातुर्मास में तप, दान, जप, संयम का विशेष महत्व है
  • प्राजापत्य और चान्द्रायण व्रत पापों की निवृत्ति के लिए अत्यंत फलदायी हैं
  • मासिक त्याग नियम (शाक, दही, दूध, दाल) से नीरोगता मिलती है
  • गौदान सबसे उत्तम दान है
  • ब्राह्मण भोजन कराने से आयु और धन में वृद्धि

जय श्री हरि!

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

चातुर्मास क्या है और यह कितने दिनों का होता है?

'चातुर्मास' का अर्थ है चार महीने की अवधि। हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) तक के समय को चातुर्मास कहते हैं। यह वह समय है जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं।

चातुर्मास 2024 में कब से कब तक है?

(यह हर साल बदलता है, लेकिन आप एक सामान्य उत्तर लिख सकते हैं): चातुर्मास की शुरुआत देवशयनी एकादशी (जुलाई के आसपास) से होती है और इसका समापन देवउठनी एकादशी (अक्टूबर/नवंबर) को होता है।

चातुर्मास में कौन-कौन से 4 महीने आते हैं?

चातुर्मास में ये चार प्रमुख हिंदी महीने आते हैं: श्रावण (सावन), भाद्रपद (भादो), आश्विन (क्वार), और कार्तिक।

चातुर्मास में शुभ कार्य (विवाह आदि) क्यों वर्जित होते हैं?

मान्यताओं के अनुसार, इन चार महीनों में सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु पाताल लोक में राजा बलि के यहाँ विश्राम (शयन) करते हैं। देवताओं के शयन के कारण विवाह, मुंडन, जनेऊ, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों में उनका आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता, इसलिए ये कार्य वर्जित माने जाते हैं।

क्या चातुर्मास में संन्यासी एक ही जगह रहते हैं?

जी हाँ, जैन और हिंदू धर्म के साधु-संत चातुर्मास के दौरान यात्रा करना बंद कर देते हैं और एक ही स्थान पर रुककर तप, साधना और प्रवचन करते हैं। इसका एक कारण वर्षा ऋतु में होने वाले छोटे जीवों की हिंसा से बचना भी है।

चातुर्मास में खान-पान के क्या नियम हैं? (महीने के अनुसार त्याग)

आयुर्वेद और धर्मशास्त्रों के अनुसार हर महीने कुछ चीजों का त्याग करना चाहिए: श्रावण (सावन) में हरी पत्तेदार सब्जियों (Leafy Vegetables) का त्याग (वात बढ़ता है और कीड़े हो सकते हैं), भाद्रपद (भादो) में दही (Curd) का त्याग, आश्विन में दूध (Milk) का त्याग, और कार्तिक में दालों (विशेषकर उड़द और मसूर) का त्याग।

क्या चातुर्मास में बैंगन खाना मना है?

जी हाँ, शास्त्रों के अनुसार चातुर्मास में बैंगन, मूली और परवल जैसी सब्जियों का सेवन निषिद्ध माना गया है। बैंगन को अशुद्ध सब्जी माना जाता है और बरसात में इसमें कीड़े पड़ने की संभावना अधिक होती है।

चातुर्मास व्रत का पालन कैसे करें?

चातुर्मास व्रत के संकल्प कई प्रकार के हो सकते हैं: एकभुक्त (दिन में केवल एक बार भोजन), अयाचित (बिना मांगे जो मिल जाए), मौनी (दिन में कुछ समय मौन रहना), या भूमि शयन (बिस्तर का त्याग करके जमीन पर सोना)।

चातुर्मास में किस देवता की पूजा करनी चाहिए?

चूँकि भगवान विष्णु सो रहे होते हैं, इसलिए सृष्टि का कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं। विशेषकर 'श्रावण' मास में शिव जी की पूजा का अत्यधिक महत्व है। इसके अलावा, भाद्रपद में गणेश जी और आश्विन में देवी दुर्गा (नवरात्रि) की पूजा होती है।

चातुर्मास में बाल और दाढ़ी कटवाना चाहिए या नहीं?

जो लोग कड़ा व्रत रखते हैं, वे इन चार महीनों में बाल, दाढ़ी और नाखून नहीं कटवाते। इसे एक प्रकार की तपस्या माना जाता है। हालांकि, गृहस्थ लोग अपनी सुविधा और मान्यताओं के अनुसार इसका पालन करते हैं।

चातुर्मास का वैज्ञानिक कारण (Scientific Reason) क्या है?

यह समय वर्षा ऋतु (Monsoon) का होता है। पाचन तंत्र: इस मौसम में सूर्य कमजोर होता है और पाचन अग्नि मंद पड़ जाती है। इसलिए हल्का और एक समय भोजन करना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। इम्यूनिटी: बरसात में पानी से होने वाली बीमारियाँ फैलती हैं, इसलिए व्रत रखने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ती है।

'विष्णु पंचायतन' क्या है?

चातुर्मास में कई भक्त 5 देवताओं की पूजा करते हैं, जिसे 'विष्णु पंचायतन' कहते हैं: 1. विष्णु, 2. शिव, 3. गणेश, 4. सूर्य और 5. दुर्गा।

चातुर्मास व्रत का उद्यापन कैसे करें?

कार्तिक शुक्ल द्वादशी (तुलसी विवाह के बाद) को व्रत का उद्यापन किया जाता है। व्रती को ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और जिन चीजों (जैसे- दूध, दही, बैंगन, मीठा) का उसने 4 महीने त्याग किया था, उनका दान करके फिर सेवन शुरू करना चाहिए।

क्या चातुर्मास में नए घर या गाड़ी की बुकिंग कर सकते हैं?

'गृह प्रवेश' (Shift होना) वर्जित है, लेकिन संपत्ति की खरीदारी (Booking/Registration) की जा सकती है। व्यापारिक सौदे भी किए जा सकते हैं, केवल वैदिक मांगलिक अनुष्ठान (Rituals) वर्जित होते हैं।

जय श्री हरि! ॥

।। ॐ नमः शिवाय ।।