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Sri Tripura Sundari Pratah Smaranam 2 (Mantra Garbhita) – श्री त्रिपुरसुन्दरी प्रातः स्मरणम् २

Sri Tripura Sundari Pratah Smaranam 2 (Mantra Garbhita) – श्री त्रिपुरसुन्दरी प्रातः स्मरणम् २
॥ त्रिपुरसुन्दरीप्रातःस्मरणम् ॥ श्रीगणेशाय नमः । कस्तूरिकाकृतमनोज्ञललामभास्व- दर्धेन्दुमुग्धनिटिलाञ्चलनीलकेशीम् । प्रालम्बमाननवमौक्तिकहारभूषां प्रातः स्मरामि ललितां कमलायताक्षीम् ॥ १॥ एणाङ्कचूडसमुपार्जितपुण्यराशि- मुत्तप्तहेमतनुकान्तिझरीपरीताम् । एकाग्रचित्तमुनिमानसराजहंसीं प्रातः स्मरामि ललितापरमेश्वरीं ताम् ॥ २॥ ईषद्विकासिनयनान्तनिरीक्षणेन साम्राज्यदानचतुरां चतुराननेड्याम् । ईशाङ्कवासरसिकां रससिद्धिदात्रीं प्रातः स्मरामि मनसा ललिताधिनाथाम् ॥ ३॥ लक्ष्मीशपद्मभवनादिपदैश्चतुर्भिः संशोभिते च फलकेन सदाशिवेन । मञ्चे वितानसहिते ससुखं निषण्णां प्रातः स्मरामि मनसा ललिताधिनाथाम् ॥ ४॥ ह्रीं‍कारमन्त्रजपतर्पणहोमतुष्टां ह्रीं‍कारमन्त्रजलजातसुराजहंसीम् । ह्रीं‍कारहेमनवपञ्जरसारिकां तां प्रातः स्मरामि मनसा ललिताधिनाथाम् ॥ ५॥ हल्लीसलास्यमृदुगीतिरसं पिबन्ती- माकूणिताक्षमनवद्यगुणाम्बुराशिम् । सुप्तोत्थितां श्रुतिमनोहरकीरवाग्भिः प्रातः स्मरामि मनसा ललिताधिनाथाम्॥ ६॥ सच्चिन्मयीं सकललोकहितैषिणी च सम्पत्करीहयमुखीमुखदेवतेड्याम् । सर्वानवद्यसुकुमारशरीररम्यां प्रातः स्मरामि मनसा ललिताधिनाथाम् ॥ ७॥ कन्याभिरर्धशशिमुग्धकिरीटभास्व- च्चूडाभिरङ्कगतहृद्यविपञ्चिकाभिः । संस्तूयमानचरितां सरसीरुहाक्षीं प्रातः स्मरामि मनसा ललिताधिनाथाम् ॥ ८॥ हत्वाऽसुरेन्द्रमतिमात्रबलावलिप्त- भण्डासुरं समरचण्डमघोरसैन्यम् । संरक्षितार्तजनतां तपनेन्दुनेत्रां प्रातः स्मरामि मनसा ललिताधिनाथाम् ॥ ९॥ लज्जावनम्ररमणीयमुखेन्दुबिम्बां लाक्षारुणाङ्घ्रिसरसीरुहशोभमानाम् । रोलम्बजालसमनीलसुकुन्तलाड्यां प्रातः स्मरामि मनसा ललिताधिनाथाम् ॥ १०॥ ह्रीं‍कारिणी हिममहीधरपुण्यराशिं ह्रीं‍कारमन्त्रमहनीयमनोज्ञरूपाम् । ह्रीं‍कारगर्भमनुसाधकसिद्धिदात्रीं प्रातः स्मरामि मनसा ललिताधिनाथाम् ॥ ११॥ सञ्जातजन्ममरणादिभयेन देवीं सम्फुल्लपद्मविलयां शरदिन्दुशुभ्राम् । अर्धेन्दुचूडवनितामणिमादिवन्द्यां प्रातः स्मरामि मनसा ललिताधिनाथाम् ॥ १२॥ कल्याणशैलशिखरेषु विहारशीलां कामेश्वराङ्कनिलयां कमनीयरूपाम् । काद्यर्णमन्त्रमहनीयमहानुभावां प्रातः स्मरामि मनसा ललिताधिनाथाम् ॥ १३॥ लम्बोदरस्य जननीं तनुरोमराजीं बिम्बाधरां च शरदिन्दुमुखीं मृडानीम् । लावण्यपूर्णजलधिं जलजातहस्तां प्रातः स्मरामि मनसा ललीताधिनाथाम् ॥ १४॥ ह्रीं‍कारपूर्णनिगमैः प्रतिपाद्यमानां ह्रीं‍कारपद्मनिलयां हतदानवेन्द्राम् । ह्रीं‍कारगर्भमनुराजनिषेव्यमाणां प्रातः स्मरामि मनसा ललिताधिनाथाम् ॥ १५॥ श्रीचक्रराजनिलयां श्रितकामधेनुं श्रीकामराजजननीं शिवभागधेयाम् । श्रीमद्गुहस्य कुल्यमङ्गलदेवतां तां प्रातः स्मरामि मनसा ललिताधिनाथाम् ॥ १६॥ ॥ इति श्रीत्रिपुरसुन्दरीप्रातःस्मरणं समाप्तम् ॥

श्री त्रिपुरसुन्दरी प्रातः स्मरणम् २ का परिचय (Introduction)

सनातन धर्म में दिन का आरंभ ईश्वर के स्मरण से करने की महान परंपरा है, जिसे 'प्रातः स्मरण' (Pratah Smaranam) कहा जाता है। प्रातः स्मरण का अर्थ है— निद्रा से जागते ही, बिस्तर छोड़ने से पूर्व, अपने इष्ट देवता का ध्यान और वंदना करना। श्री त्रिपुरसुन्दरी प्रातः स्मरणम् शाक्त परंपरा और विशेषकर श्री विद्या (Sri Vidya) के साधकों के लिए दिन की शुरुआत करने का सबसे पवित्र माध्यम है। इस स्तोत्र के पाठ से साधक का मन भौतिक संसार की चिंताओं में उलझने से पहले ही ईश्वरीय चेतना से जुड़ जाता है।

सामान्यतः जो प्रातः स्मरण स्तोत्र प्रचलित हैं (जैसे आदि शंकराचार्य कृत), वे ३ या ५ श्लोकों के होते हैं। परंतु यह विशिष्ट स्तोत्र १६ श्लोकों का एक अत्यंत दुर्लभ और गूढ़ संस्करण है। इस स्तोत्र की सबसे बड़ी और रहस्यमयी विशेषता यह है कि यह मंत्र-गर्भित (Mantra-Garbhita) है।

यदि आप इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक के प्रथम अक्षर पर ध्यान दें, तो यह क्रमशः बनता है: क, ए, ई, ल, ह्रीं (श्लोक १-५), ह, स, क, ह, ल, ह्रीं (श्लोक ६-११), स, क, ल, ह्रीं (श्लोक १२-१५) और अंतिम १६वां श्लोक श्रीं से प्रारंभ होता है। यह अक्षरों का क्रम और कुछ नहीं, बल्कि साक्षात श्री विद्या का सर्वोच्च पञ्चदशी महामंत्र और षोडशी महामंत्र है। अतः, इस स्तोत्र का पाठ करने वाला व्यक्ति केवल कविता नहीं पढ़ रहा होता, बल्कि वह निद्रा से उठते ही ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली मंत्र का सस्वर जप कर रहा होता है। यह एक काव्यात्मक आवरण में लिपटा हुआ महामंत्र है।

इस स्तोत्र में देवी ललिता त्रिपुरसुन्दरी के अत्यंत मनमोहक, करुणामय और शक्तिशाली स्वरूपों का वर्णन है। श्लोक ९ में उन्हें भंडासुर (अहंकार और अज्ञान का प्रतीक) का नाश करने वाली बताया गया है (हत्वाऽसुरेन्द्रमतिमात्रबलावलिप्त-भण्डासुरं)। श्लोक ४ में उनके उस ब्रह्मांडीय स्वरूप का दर्शन है जहाँ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर उनके सिंहासन के पाए (पैर) हैं और सदाशिव उस सिंहासन का फलक हैं। प्रत्येक श्लोक का अंत "प्रातः स्मरामि मनसा ललिताधिनाथाम्" या इसी भाव की पंक्तियों से होता है, जो मन को देवी के चरणों में एकाग्र करता है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

आयुर्वेद और योग शास्त्र के अनुसार, ब्रह्म मुहूर्त (Brahmamuhurta)— सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पहले का समय— आध्यात्मिक साधना के लिए सबसे उत्तम होता है। इस समय वातावरण में सात्विक ऊर्जा चरम पर होती है और मन शांत तथा ग्रहणशील होता है। निद्रा से जागने के ठीक बाद के कुछ क्षण अवचेतन मन (Subconscious mind) के सबसे अधिक जाग्रत क्षण होते हैं।

जब आप जागते ही इस मंत्र-गर्भित प्रातः स्मरण का पाठ करते हैं, तो पञ्चदशी और षोडशी मंत्र की ध्वनि-तरंगें सीधे आपके अवचेतन मन में प्रवेश कर जाती हैं। यह आपके पूरे दिन को सकारात्मक ऊर्जा, शांति और देवी के सुरक्षा कवच से आच्छादित कर देता है।

श्री विद्या साधना में गुरु द्वारा प्राप्त मंत्र का अत्यंत गुप्त रखा जाता है। यह स्तोत्र प्राचीन ऋषियों की उस अद्भुत मेधा का प्रमाण है, जिसके माध्यम से उन्होंने अत्यंत गोपनीय मंत्रों को स्तुति के रूप में जनमानस के लिए सुलभ बना दिया। श्लोक १३ में कहा गया है— "काद्यर्णमन्त्रमहनीयमहानुभावां" (जो 'क' आदि वर्णों वाले मंत्र से पूजनीय हैं), जो स्पष्ट रूप से पञ्चदशी मंत्र (कादि विद्या) की ओर संकेत करता है।

फलश्रुति और लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र का नित्य प्रातः पाठ करने से साधक को अकल्पनीय भौतिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • सकारात्मक दिन की शुरुआत: सुबह आँख खुलते ही माता का दिव्य स्वरूप (कस्तूरी की बिंदी, नीले केश, मोतियों का हार - श्लोक 1) याद करने से पूरा दिन उत्साह और आनंद से बीतता है।
  • मानसिक शांति और एकाग्रता: श्लोक 2 में देवी को 'मुनिमानसराजहंसीं' (मुनियों के एकाग्र मन रूपी सरोवर की राजहंसी) कहा गया है। इसके पाठ से चंचल मन शांत और एकाग्र होता है।
  • कार्यसिद्धि और साम्राज्य प्राप्ति: श्लोक 3 के अनुसार, देवी की एक कृपादृष्टि साम्राज्य (सफलता, नेतृत्व) और रस-सिद्धि प्रदान करने में सक्षम है। दिन भर के कार्यों में सफलता मिलती है।
  • अज्ञान और भयों का नाश: श्लोक 12 में बताया गया है कि यह स्मरण जन्म-मरण आदि के भयों (सञ्जातजन्ममरणादिभयेन) को दूर करता है। साथ ही भंडासुर रूपी आंतरिक विकारों का शमन होता है।
  • वाकसिद्धि: श्लोक 6 में तोतों की श्रुति-मनोहर वाणी का उल्लेख है। इस वाग्भव कूट प्रधान स्तोत्र के पाठ से साधक की वाणी में आकर्षण और प्रभाव उत्पन्न होता है।
  • सौभाग्य और ऐश्वर्य: अंतिम श्लोकों में देवी को श्रीचक्रराज की निवासिनी और कामधेनु (श्रितकामधेनुं) कहा गया है, अतः यह पाठ दरिद्रता का नाश कर अखंड ऐश्वर्य प्रदान करता है।

पाठ विधि और नियम (Ritual Method)

चूँकि यह 'प्रातः स्मरण' है, इसलिए इसकी पाठ विधि अन्य स्तोत्रों से थोड़ी भिन्न और अत्यंत सरल है। इसमें बाह्य कर्मकांड से अधिक मानसिक शुद्धि पर बल दिया जाता है।

  • समय: इसका पाठ प्रातःकाल निद्रा खुलते ही, बिस्तर पर बैठे-बैठे (कराग्रे वसते लक्ष्मी... के बाद) किया जाना चाहिए। ब्रह्म मुहूर्त सबसे उत्तम है।
  • स्नान की अनिवार्यता नहीं: चूँकि यह जागते ही किया जाने वाला मानसिक कर्म है, इसलिए इसके पाठ के लिए तुरंत स्नान करने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप चाहें तो स्नान के पश्चात् पूजा घर में भी इसका पाठ कर सकते हैं।
  • दिशा और आसन: बिस्तर पर ही उठकर बैठ जाएं, आँखें बंद करें, पूर्व या उत्तर की ओर मुख करें।
  • ध्यान विधि: अपने हृदय चक्र या सहस्रार चक्र में माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी के परम तेजस्वी और शांत स्वरूप का ध्यान करें। श्लोकों के अर्थों का मानसिक चित्रण करें (जैसे उनके हाथों में पाश, अंकुश, गन्ने का धनुष और पुष्प बाण)।
  • पाठ: शांत और स्थिर मन से, बिना किसी जल्दबाजी के 16 श्लोकों का पाठ करें। पाठ के अंत में माता को मानसिक प्रणाम करें और फिर बिस्तर से पृथ्वी पर पैर रखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. प्रातः स्मरण स्तोत्र क्या होता है?

प्रातः स्मरण वे विशेष स्तोत्र होते हैं जिनका पाठ प्रातःकाल निद्रा से जागते ही किया जाता है। इनका उद्देश्य दिन की शुरुआत ईश्वरीय चेतना, कृतज्ञता और सकारात्मकता के साथ करना होता है।

2. यह प्रातः स्मरण अन्य स्तोत्रों से कैसे भिन्न है?

सामान्य प्रातः स्मरण स्तोत्र 3 या 5 श्लोकों के होते हैं, लेकिन यह 16 श्लोकों का है। इसकी सबसे बड़ी भिन्नता यह है कि यह 'मंत्र-गर्भित' है—इसके 16 श्लोक श्री विद्या के पञ्चदशी और षोडशी मंत्र के 16 बीजाक्षरों से शुरू होते हैं।

3. क्या इस पाठ से पहले स्नान करना अनिवार्य है?

नहीं। प्रातः स्मरण का मूल उद्देश्य जागते ही पहला विचार ईश्वर का लाना है। अतः इसे निद्रा खुलते ही बिस्तर पर बैठे-बैठे मानसिक शुद्धि के साथ बिना स्नान किए भी पढ़ा जा सकता है।

4. पञ्चदशी मंत्र क्या है जिसका इसमें समावेश है?

पञ्चदशी मंत्र माता ललिता का 15 अक्षरों का महामंत्र है (क, ए, ई, ल, ह्रीं, ह, स, क, ह, ल, ह्रीं, स, क, ल, ह्रीं)। इस स्तोत्र के पहले 15 श्लोक इन्हीं अक्षरों से शुरू होते हैं।

5. 16वें श्लोक का क्या महत्व है?

16वां श्लोक 'श्रीं' अक्षर से शुरू होता है। जब पञ्चदशी मंत्र के अंत में 'श्रीं' (लक्ष्मी बीज) जुड़ जाता है, तो वह सर्वोच्च 'षोडशी मंत्र' बन जाता है। यह पूर्णता और अखंड ऐश्वर्य का प्रतीक है।

6. श्लोक 9 में वर्णित 'भंडासुर' कौन था?

भंडासुर कामदेव की भस्म से उत्पन्न एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था जिसने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। देवी ललिता त्रिपुरसुन्दरी का प्राकट्य विशेष रूप से इसी असुर (जो हमारे आंतरिक अहंकार का प्रतीक है) के वध के लिए हुआ था।

7. 'ललिताधिनाथाम्' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "ललिता जो सभी की अधिनाथ (स्वामी या परमेश्वरी) हैं।" यह संबोधित करता है कि देवी ही संपूर्ण ब्रह्मांड की सर्वोच्च सत्ता और नियंत्रक हैं।

8. श्लोक 4 में वर्णित देवी का आसन क्या है?

श्लोक 4 में बताया गया है कि देवी जिस पलंग (सिंहासन) पर विराजती हैं, उसके चार पाए (पैर) ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर हैं, और उसका फलक (जिस पर वे बैठती हैं) स्वयं भगवान सदाशिव हैं। यह उनकी ब्रह्मांडीय श्रेष्ठता दर्शाता है।

9. क्या इस स्तोत्र का पाठ कोई भी कर सकता है?

जी हाँ, भक्ति भाव रखने वाला कोई भी व्यक्ति इसका पाठ कर सकता है। हालांकि इसमें मंत्र छिपे हैं, लेकिन स्तोत्र रूप में होने के कारण इसके पठन के लिए तांत्रिक दीक्षा की अनिवार्यता नहीं है।

10. नित्य पाठ का सबसे बड़ा लाभ क्या है?

नित्य पाठ का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह आपके अवचेतन मन को ईश्वरीय चेतना (Mindfulness) से प्रोग्राम कर देता है। इससे दिन भर में आने वाली चुनौतियों का सामना करने की शक्ति मिलती है और अकारण भय दूर होते हैं।