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Tripura Sundari Pratah Smaranam – श्री त्रिपुरसुन्दरी प्रातः स्मरणम्

Tripura Sundari Pratah Smaranam: 9 Verses Morning Prayer

Tripura Sundari Pratah Smaranam – श्री त्रिपुरसुन्दरी प्रातः स्मरणम्
॥ श्री त्रिपुरसुन्दरी प्रातः स्मरणम् ॥ प्रातर्नमामि जगतां जनन्याश्चरणाम्बुजम् । श्रीमत्त्रिपुरसुन्दर्या वन्दिताया हरादिभिः ॥ १ ॥ प्रातस्त्रिपुरसुन्दर्याः व्रजामि चरणाम्बुजम् । हरिर्हरो विरिञ्चिश्च सृष्ट्यादीन् कुरुते यया ॥ २ ॥ प्रातस्त्रिपुरसुन्दर्याः नमामि पदपङ्कजम् । यत्पाद्यमम्बु शिरसि भाति गङ्गा महेशितुः ॥ ३ ॥ प्रातः पाशाङ्कुश शर चापहस्तां नमाम्यहम् । उद्यदादित्यसङ्काशां श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरीम् ॥ ४ ॥ प्रातर्नमामि पादाब्जं ययेदं भासते जगत् । तस्यास्त्रिपुरसुन्दर्याः यत्प्रसादान्निवर्तते ॥ ५ ॥ यः श्लोक पञ्चकमिदं प्रातर्नित्यं पठेन्नरः । तस्मै दद्यादात्मपदं श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी ॥ ६ ॥ त्रैलोक्यचैतन्यमये परेशि श्रीनाथनित्ये भवदाज्ञयैव । प्रातः समुत्थाय तव प्रियार्थं संसारयात्रामनुवर्तयिष्ये ॥ ७ ॥ संसारयात्रामनुवर्तमानं त्वदाज्ञाया श्रीत्रिपुरे परेशि । स्पर्धा तिरस्कार कलिप्रमाद भयानि मामभिभवन्तु मातः ॥ ८ ॥ जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः । त्वया हृषीकेशि हृदिस्थयाऽहं यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि ॥ ९ ॥ ॥ इति श्री त्रिपुरसुन्दरी प्रातः स्मरणम् सम्पूर्णम् ॥

श्री त्रिपुरसुन्दरी प्रातः स्मरणम् - परिचय (Introduction)

श्री त्रिपुरसुन्दरी प्रातः स्मरणम् 9 श्लोकों का एक अत्यंत दुर्लभ और प्रभावशाली स्तोत्र है। इसमें प्रथम 5 श्लोक (पंचकम्) देवी के विभिन्न स्वरूपों की वंदना करते हैं (जगज्जननी, सृष्टि-स्थिति-लय कारिणी, शिव-पूजिता)।

अंतिम 3 श्लोक साधक की दिनचर्या और मनोभाव को शुद्ध करने के लिए हैं। इसमें साधक प्रार्थना करता है कि "मैं जो कुछ भी करूँगा, वह आपकी आज्ञा मानकर करूँगा" और "स्पर्धा, तिरस्कार और कलह मुझे न सताएं"। अंतिम श्लोक पूर्ण आत्म-समर्पण (Surrender) का अनुपम उदाहरण है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

पूर्ण समर्पण: "जानामि धर्मं..." श्लोक महाभारत/गीता के भाव (दुर्योधन के मुख से, पर यहाँ सकारात्मक अर्थ में) को दर्शाता है कि हमारी हर प्रवृत्ति और निवृत्ति देवी की इच्छा (दैवीय शक्ति) से ही संचालित है। यह अहंकार नाश का अचूक उपाय है।

दैनिक सुरक्षा कवच: श्लोक 8 में साधक स्पष्ट रूप से मांगता है कि दिन भर की भागदौड़ (संसार यात्रा) में उसे भय, अपमान और झगड़ों से मुक्ति मिले। यह आज के तनावपूर्ण जीवन के लिए बहुत प्रासंगिक है।

पाठ के लाभ (Benefits)

  • आत्म-पद (मोक्ष): फलश्रुति (श्लोक 6) में कहा गया है कि इसका पाठ करने वाले को देवी अपना परम पद (आत्म-ज्ञान/मोक्ष) प्रदान करती हैं।

  • शत्रु और भय नाश: "स्पर्धा तिरस्कार..." श्लोक के पाठ से प्रतियोगियों, शत्रुओं और अपमान का भय समाप्त हो जाता है।

  • कर्म योग: यह स्तोत्र हमें कर्म करते हुए भी निर्लिप्त रहने की कला सिखाता है (सब कुछ देवी को अर्पित)।

  • सृष्टि संचालिका: यह याद दिलाता है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी जिस शक्त्ति से कार्य करते हैं, वही हमारे भीतर भी है।

पाठ विधि (Ritual Method)

  • समय: प्रातःकाल बिस्तर छोड़ते ही या स्नान के बाद। इसे "कर दर्शन" के बाद पढ़ा जा सकता है।

  • संकल्प: हाथ में जल लेकर या मानसिक रूप से संकल्प लें - "हे माँ! आज का मेरा पूरा दिन आपकी पूजा है। मुझसे कोई भी अनुचित कार्य न हो।"

  • ध्यान: देवी के "उद्यदादित्य संकाशा" (उगते सूरज जैसी लाल) स्वरूप का ध्यान करें जो पाश, अंकुश, धनुष और बाण धारण किए हुए हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. त्रिपुरसुन्दरी प्रातः स्मरणम् में कितने श्लोक हैं?

इसमें कुल 9 श्लोक हैं। पहले 5 श्लोक मुख्य स्तुति (पंचकम्) हैं, छठा फलश्रुति है, और अंतिम 3 श्लोक प्रार्थना और समर्पण के हैं।

2. 'जानामि धर्मं...' श्लोक का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है: "मैं धर्म जानता हूँ पर कर नहीं पाता, अधर्म जानता हूँ पर छोड़ नहीं पाता। हे हृषीकेशी/देवी! आप मेरे हृदय में स्थित होकर जैसा करवाती हैं, मैं वैसा ही करता हूँ।" यह पूर्ण शरणागति है।

3. क्या यह शंकराचार्य कृत 'प्रातः स्मरामि' से अलग है?

हाँ, शंकराचार्य कृत 'प्रातः स्मरामि' में 3 श्लोक हैं (त्रिकरण शुद्धि)। यह 9 श्लोकों का एक विस्तृत और अलग स्तोत्र है।

4. क्या इसका पाठ शाम को कर सकते हैं?

इसका नाम ही 'प्रातः स्मरण' है, इसलिए इसका विशेष फल सुबह ही मिलता है। इसे दिन की शुरुआत के लिए बनाया गया है।

5. 'संसार यात्रा' का क्या मतलब है?

संसार यात्रा का अर्थ है हमारा दैनिक जीवन, हमारे कर्तव्य, सुख-दुख और संघर्ष। साधक इसे देवी की आज्ञा मानकर पूरा करता है।

6. क्या इससे भय दूर होता है?

हाँ, 8वें श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि "भयानि मामभिभवन्तु मातः" (हे माँ! भय मुझे पराजित न करें/आप मुझे भय से बचाएं)।

7. 'उद्यदादित्य संकाशा' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "उगते हुए सूर्य के समान लाल आभा वाली"। यह देवी के तेज और शक्ति का प्रतीक है।

8. क्या बच्चे यह पाठ कर सकते हैं?

अवश्य। विशेषकर अंतिम 3 श्लोक बच्चों में आत्मविश्वास और सही मार्ग पर चलने की बुद्धि जगाते हैं।

9. क्या यह श्री विद्या दीक्षा का अंग है?

दीक्षित साधक इसका पाठ नित्य पूजा से पहले या सुबह उठते ही करते हैं, ताकि पूरा दिन साधना-मय रहे।

10. 'हृषीकेशी' शब्द यहाँ क्यों आया है?

हृषीकेश (इंद्रियों के स्वामी) विष्णु का नाम है, पर यहाँ देवी को 'हृषीकेशी' कहा गया है क्योंकि वे ही अंतर्यामी शक्ति के रूप में हमारी इंद्रियों को प्रेरित करती हैं।