Sri Tripurasundari Manasa Pujana Stotram (Samaraja Dikshita) – श्रीत्रिपुरसुन्दरीमानसपूजनस्तोत्रम्

श्रीत्रिपुरसुन्दरीमानसपूजनस्तोत्रम् का परिचय (Introduction)
शाक्त परम्परा और श्री विद्या साधना में बाह्य कर्मकांड (यंत्र, मूर्ति, सामग्री आदि द्वारा पूजा) से कहीं अधिक महत्व 'मानस पूजा' (Mental Worship) को दिया गया है। मानस पूजा का अर्थ है— बिना किसी भौतिक सामग्री के, अपनी शुद्ध भावना, कल्पना और ध्यान के माध्यम से अपने हृदय रूपी सिंहासन पर इष्ट देवता की विस्तृत राजोपचार पूजा संपन्न करना। श्रीत्रिपुरसुन्दरीमानसपूजनस्तोत्रम् इसी मानसिक आराधना का एक अत्यंत भव्य, काव्यात्मक और विस्तृत स्वरूप है।
यह ७० श्लोकों का एक अत्यंत दुर्लभ स्तोत्र है, जिसकी रचना प्रसिद्ध श्री विद्या साधक और कवि सामराज दीक्षित (Samaraja Dikshita) ने की है, जिन्हें दीक्षा के उपरांत 'सत्यानन्दनाथ' (Satyanandanatha) के नाम से जाना जाता था (जैसा कि अंतिम श्लोक ७० और फलश्रुति में स्पष्ट उल्लेख है: "इति श्रीसत्यानन्दनाथापरनामधेयसामराजदीक्षितविरचिते...")। यह स्तोत्र आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित मानस पूजा स्तोत्र से भिन्न और अधिक विस्तृत है।
इस स्तोत्र की काव्यात्मक सुंदरता (Poetic beauty) अद्वितीय है। यह स्तोत्र मणिद्वीप (माता का निवास स्थान) के वर्णन से आरंभ होता है (श्लोक १-२)। इसके बाद साधक मानसिक रूप से माता ललिता त्रिपुरसुन्दरी के श्रीचरणों को अपने भक्ति रूपी आंसुओं (भक्तिगङ्गापयोभिः) से धोता है, उन्हें पाद्य, अर्घ्य और आचमन अर्पित करता है। श्लोक १० से १५ तक माता के दिव्य स्नान, वस्त्र धारण और शृंगार का अत्यंत सजीव चित्रण है। श्लोक २८ में विविध पुष्पों से अर्चना, श्लोक ३३ में छप्पन भोगों (नैवेद्य) का अर्पण और श्लोक ३८-४० में भव्य आरती (नीराजन) का मानसिक दृश्य उपस्थित किया गया है।
स्तोत्र के उत्तरार्ध (श्लोक ४७-४९) में अद्वैत वेदांत और कुंडलिनी योग का अत्यंत गूढ़ रहस्य पिरोया गया है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि काली, तारा, भुवनेश्वरी आदि सभी महाविद्याएं त्रिपुरसुन्दरी का ही रूप हैं और मूलाधार (कुलकुण्ड) से लेकर सहस्रार (बिन्दु) तक माता ही कुंडलिनी शक्ति के रूप में जाग्रत होकर परमानंद की वर्षा करती हैं।
मानस पूजा का विशिष्ट महत्व (Significance of Manasa Puja)
तंत्र शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है— "बाह्य पूजा तु कनिष्ठा, उत्तमा मानस पूजा" (बाहरी पूजा सबसे निम्न स्तर की है, मानसिक पूजा सर्वोत्तम है)। इसका कारण यह है कि बाह्य सामग्री में त्रुटि, अशुद्धि या अभाव हो सकता है, लेकिन मन की भावना अनंत और सर्वदा शुद्ध होती है।
सामराज दीक्षित जी ने इस स्तोत्र में इसी तत्व को दर्शाया है। श्लोक ५६ में साधक कहता है— "अथ कृतपरिवाराभ्यर्चनं ते समर्प्य..." अर्थात् इस मानसिक पूजा से मैंने आपके पूरे परिवार (नव आवरणों के देवताओं) की पूजा संपन्न कर दी है। मानस पूजा के माध्यम से गरीब से गरीब साधक भी मानसिक रूप से माता को बहुमूल्य रत्न, स्वर्ण सिंहासन और ब्रह्मांड की सभी दुर्लभ वस्तुएं अर्पित कर सकता है, जिसे माता उसी प्रेम से स्वीकार करती हैं जिस प्रेम से एक राजा की भेंट।
यह स्तोत्र साधक को एकाग्रता (Concentration) के चरम शिखर पर ले जाता है। जब साधक श्लोक दर श्लोक माता के शृंगार (जैसे श्लोक २३ में आँखों में अंजन लगाना, श्लोक २४ में कुमकुम लगाना) का मानसिक चित्रण करता है, तो उसका मन बाहरी संसार से पूरी तरह कटकर आज्ञा चक्र या हृदय चक्र में स्थिर हो जाता है। यही ध्यान (Meditation) की वास्तविक अवस्था है।
फलश्रुति और लाभ (Benefits)
इस ७० श्लोकों के विस्तृत मानस पूजन स्तोत्र का पाठ करने से साधक को तंत्र और योग दोनों के लाभ प्राप्त होते हैं:
- श्री विद्या राजोपचार का फल: जो साधक किसी कारणवश श्रीयंत्र की विस्तृत नव-आवरण पूजा नहीं कर सकते, वे केवल इस स्तोत्र का पाठ करके पूर्ण बाह्य पूजा का फल प्राप्त कर सकते हैं।
- कुंडलिनी जागरण में सहायक: श्लोक ४९ (कुलकुण्डे त्वं कुरुषे शयने प्रस्वापं...) में कुंडलिनी योग का स्पष्ट वर्णन है। इस स्तोत्र का ध्यानपूर्वक पाठ मूलाधार से आज्ञा चक्र तक ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन (upward flow) में सहायता करता है।
- त्रिवर्ग और मोक्ष की प्राप्ति: श्लोक ५७ में स्पष्ट वर्णन है कि जिसके कानों में एक बार भी यह स्मरण पड़ता है, उसे धर्म, अर्थ और काम (त्रिवर्ग) तो सरलता से मिल जाते हैं, और चौथा पुरुषार्थ (मोक्ष) स्वयं उसके पीछे चलता है।
- आवागमन से मुक्ति: श्लोक ५३ (सकृदपि विनताङ्घ्रिस्त्वां परिक्रम्य...) के अनुसार, जो एक बार भी माता की इस प्रकार मानसिक परिक्रमा कर लेता है, उसका मन सांसारिक यज्ञों और कर्मकांडों के फलों से विरक्त हो जाता है और वह परम तृप्ति को प्राप्त होता है।
- रोग और ताप का शमन: श्लोक ३९ में वर्णन है कि यह मानसिक आरती (नीराजन) भव-ताप (जन्म-मरण के क्लेश, शारीरिक और मानसिक दुःख) को शांत करने वाली है।
- अद्वैत बोध: श्लोक ४८ के अनुसार साधक को यह बोध हो जाता है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, ब्रह्मा और ईश्वर सब कुछ माता का ही स्वरूप हैं। यह बोध भय और द्वेष का नाश करता है।
पाठ विधि और ध्यान (Ritual Method)
मानस पूजा स्तोत्र का पाठ अन्य सामान्य स्तोत्रों की तरह केवल 'पढ़ने' के लिए नहीं होता, बल्कि इसे 'जीने' और 'दृश्यमान' (Visualize) करने के लिए होता है।
- समय और स्थान: प्रातःकाल या रात्रि के शांत प्रहर में एकांत स्थान पर बैठें।
- आसन: पद्मासन या सुखासन में मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी) सीधा करके बैठें।
- प्रारंभिक ध्यान: आँखें बंद करें। कुछ गहरी साँसें लें। अपने हृदय के मध्य (अनाहत चक्र) में एक अत्यंत सुंदर, प्रकाशमय मणिद्वीप और उसमें रत्नों से जड़े हुए एक भव्य सिंहासन की कल्पना करें।
- स्तोत्र पाठ: शांत स्वर में या मानसिक रूप से स्तोत्र का पाठ आरंभ करें।
- मानसिक चित्रण (Visualization): जैसे-जैसे श्लोकों में वर्णन आए (जैसे— पाद्य अर्पण, स्नान, वस्त्र पहनाना, आभूषण पहनाना, नैवेद्य खिलाना), बंद आँखों से स्पष्ट रूप से देखें कि आप स्वयं अपने हाथों से माता ललिता को ये वस्तुएं अर्पित कर रहे हैं और माता प्रसन्नतापूर्वक उन्हें स्वीकार कर रही हैं।
- पूर्णता: ७०वें श्लोक के बाद दोनों हाथ जोड़कर मानसिक साष्टांग प्रणाम करें। महसूस करें कि माता ने आपके हृदय में स्थायी रूप से निवास कर लिया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)