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Tara Karpura Stotram – ताराकर्पूरस्तोत्रम् (फेत्कारीतन्त्र)

Tara Karpura Stotram – ताराकर्पूरस्तोत्रम् (फेत्कारीतन्त्र)
॥ ताराकर्पूरस्तोत्रम् (फेत्कारीतन्त्रान्तर्गतम्) ॥ ॥ ॐ नमस्तारिण्यै ॥ श्रीकण्ठामृतकेशवर्णघटितं चन्द्रार्धचूडोज्ज्वलं बीजं यत्परमं गुणत्रयमयं कामप्रदं मुक्तिदम् । मातः ! शङ्करवल्लभे ! प्रतिदिनं ध्यायन्ति ये ये सदा ते ते यान्ति चिदात्मकं हरिहरब्रह्मादिसाम्यं मुदा ॥ १॥ व्योमार्णं वामनेत्रान्वितमनलयुतं बिन्दुचन्द्रार्धयुक्तं बीजं ते गुह्यमेतत्त्रिभुवनजननि ! त्रिक्षणे ये जपन्ति । तेषां वक्त्रारविन्दे विहरति मधुरा गद्यपद्यावली गी- र्मातश्चन्द्रार्धचूडे ! सकलभयहरे ! सिद्धिभाजां नराणाम् ॥ २॥ शुक्रार्णं पूतनास्थं कलितशशिकलाबिन्दुभूषं सवह्नि भ्राजद्वामाक्षियुक्तं जननि ! तव वधूबीजमेतज्जपन्ति । ते ते लोलेक्षणानां विगलितरसनापीनवक्षोजवासः केशानां चित्तमाशु स्मरहरमहिले ! मोहयन्ति प्रकामम् ॥ ३॥ ईशानं वामकर्णोल्लसितशशिकलाबिन्दुयुक्तं सुगुह्यं बीजं मातस्त्वदीयं यदि जपति जनो वारमेकं जडात्मा । चञ्चत्पञ्चाशदुग्रग्रथितनरशिरोमालिकाक्रान्तकण्ठे ! मातः शैलेन्द्रपुत्रि ! त्रिभुवनमपि स क्षोभयत्येव शीघ्रम् ॥ ४॥ पश्चादस्त्रं तदन्यत्पुरहरमहिले! बीजमत्यन्तगुह्यं भालोद्यत्पञ्चमुद्रे प्रकटविकटदंष्ट्रोग्रवक्रारविन्दे । नित्यं ये भावयन्ति प्रतिदिनममले! घोररूपाट्टहासे! ते नूनं भावयन्ति त्रिजगदघहरे ! चक्रवद्विश्वमेतत् ॥ ५॥ मायास्त्रीकूर्चबीजैर्नवतपनहरित्सार्धचन्द्रांशुवर्णे मातर्नीलाख्यमेतत्तव मनुमनिशं ये प्रकामं जपन्ति । वित्ते वित्तेशतुल्याः शुकगुरुसदृशास्तर्ककाव्यागमादौ ते ते नीलाम्बुदालीरुचिरुचिरतनो! कामतुल्या भवन्ति ॥ ६॥ भवान्येभिर्बिजैर्हिमगिरिसुते ! चास्त्रसहितै- र्निगूढं ये मातर्मनुमनुजपन्त्येकजटिले!। त्रियामानाथार्धप्रविलसितभाले ! त्रिनयने! गृहे तेषां नित्यं निवसति सदा सिन्धुतनया ॥ ७॥ अमीभिर्बीजैस्ते प्रणवसहितैः शैलतनये ! निजस्वान्ते चास्त्रं परिजपति पञ्चाक्षरमिति । स साक्षात्ते न्यासी स तु पुरहरोऽसौ मुरहरः स धाता यं मुक्तो भवति हि चिदानन्दरसिके ! ॥ ८॥ शवासीनां कण्ठाकलितनृकरोटीं करलसत् कपालासिश्यामोत्पलरुचिरकर्त्रीं त्रिनयनाम् । नवाम्भोदश्यामान्विकटरदभीमान्पृथुकुचां सदैव त्वां ध्यायन् जननि! च जडो वाक्पतिसमः ॥ ९॥ तटे नद्याः सिन्धोर्गिरिशिरसि मालूरगहने श्मशाने गोष्ठे वा गिरिशभवने शून्यसदने । हविष्याशी लक्षं प्रजपति वशी भावनपरः स सर्वज्ञो वाग्मी भवति सुघनापीनजघने! ॥ १०॥ मुदा मातः शुद्धोदकरुचिरगन्धाढ्यसलिलैः स्वयम्भूपुष्पस्रक्कुलतनुभगच्छालन जलैः । शिवे ! त्वां सन्ध्यायन् हरमहिषि ! सन्तर्पयति यः स दैवस्त्रीवृन्दं वशयति स विद्याधरपतिः ॥ ११॥ जपापुष्पैर्बिल्वैर्मरुबकुलवर्गैश्च कुसुमैः सुगन्धैः कर्पूरैरगरुसहितैर्धूपनिकरैः । प्रदीपैरुज्ज्वालैर्घृतरचितनैवेद्यनिकरै- स्तवार्चां यः कुर्यात्स भवति कवीन्द्रः क्षितितले ॥ १२॥ सदूर्वाभिः पद्मैस्त्रिमधुललितैः श्रीफलदलै- र्घृतैर्गव्यै रक्तैः सुकुलभगलिङ्गामृतरसैः । त्रिकोणे कुण्डे यो हुतवहमखे होमविधिना जुहोति त्वां मातः! स भवति कवीन्द्रः क्षितिपतिः ॥ १३॥ निशीथे कल्याणि ! प्रमुदितमना यः पितृवने बलिं ते मेषाद्यैः सनरमहिषैर्वा परिचरेत् । स राजानं क्षिप्रं वशयति मृगाक्षीसमुदयं त्रिलोकीं वा भूमौ स भवति जनः सत्कविवरः ॥ १४॥ महापूजां मातस्तव वितनुते यस्तु मधुना तथा मांसैर्मत्स्यैर्विविधनवमुद्रादिभिरपि । वरस्त्रीभिः सार्धं निधुवनविनोदेन मुदितो निशीथे संसारात्स भवति विमुक्तः पशुभयात् ॥ १५॥ त्रिकोणे पीठे त्वां वरनिधुवनासङ्गहृदयां महाकालेनोद्यत्पुलकनिचयां स्मेरवदनाम् । स्वयं नक्तं कान्तारतिरससमासक्तहृदयो मनुष्यो यो ध्यायेद्भवति शिवतुल्यः स धरणौ ॥ १६॥ समुत्तुङ्गापीनस्तनजघनराजत्कुलवधू- व्यवायव्यासक्तो जपति तव भक्तो यदि मनुम् । गलद्वासःकेशो जननि ! मनुजो मेदिनितले स सिद्धीशः शक्त्या जयति सुचिरं सर्वसुजनम् ॥ १७॥ भवानि ! श्रीर्मातर्निजगलितवीर्याप्तचिकुर- मथ प्रेम्णा लब्ध्वा वचनभुवनेशीयुतमनुम् । समुच्चार्य क्षोणीतनयदिवसे प्रेतसदने स दीर्घायुर्वाग्मी भवति शतहोमात्क्षितितले ॥ १८॥ अजस्रं यो मन्त्रं तव जपति भूमीधरसुते विचिन्त्याग्रे मातः ! कुसुमललितं मारभवनम् । धरण्यां कन्दर्पप्रतिमतनुभूतः स सकला- न्निजेष्टानाप्नोति प्रविशति मुदा तारिणिपदम् ॥ १९॥ तमोग्रस्ते चन्द्रे यदि जपति लोकस्तव मनुं नवम्यां वा मातर्धरणिधरकन्ये ! वितनुते । तथा सूर्ये पृथ्वीवलयतिलकः काव्यतटिनी पयोधिः सिद्धीनां भवति भवनं सर्वविदितः ॥ २०॥ सदा पादाम्भोजे भजतु हृदयं भृङ्ग इव मे सदा पाणिद्वन्द्वं परिचरतु कर्णस्तव कथाम् । श‍ृणोतु त्वकीर्तिं हरमहिषि ! गीर्गायतु सदा सदा दृष्टिर्भूयाद्भवदनुचरालोकनपरा ॥ २१॥ कदाकाले शैलेश्वरतनुभवे ! पादयुगलं मुदा द्रक्ष्ये ब्रह्मप्रमुखविबुधानां परिणुतम् । कृपापारावारे ! भवजननभीतैकशरणे! शरण्ये ! कारुण्यं मयि वितर दीने भगवति ! ॥ २२॥ सदैव स्तोत्रं यः पठति मुदितः साधकवरो न दारिद्र्यं तस्य प्रभवति कदाचित्क्षितितले । त्रिवर्गो हस्ते स्याज्जगदखिलमेतच्च वशगं चिरं जीवन्नन्ते जननि ! लभते मोक्षपदवीम् ॥ २३॥ इदं स्तोत्रं मातः प्रपठति दिवारात्रिमनिशं स सर्वज्ञो योगीश्वरनिकरचूडामणिसमे ! । जडोऽपि त्वद्रूपं जपति यदि सञ्चित्य मनसा त्वदग्रे भूयोच्चैः क्षितिपतिसमानः क्षितितले ॥ २४॥ महापुण्यं धन्यं सकलपुरुषार्थैकनिलयं यशस्यं चायुष्यं सततभवतापापहमिदम् । रहस्यं प्राकाश्यन्न हि खलु कदाचित्पशुजने पठेत्पूजाकाले जननि ! लभते मोक्षपदवीम् ॥ २५॥ ॥ इति श्रीफेत्कारीतन्त्रे ताराकर्पूरस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

ताराकर्पूरस्तोत्रम्: तांत्रिक परिचय एवं रहस्य (Introduction & Tantric Significance)

ताराकर्पूरस्तोत्रम् (Tara Karpura Stotram) तन्त्र शास्त्र के एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गोपनीय ग्रंथ 'फेत्कारी तन्त्र' से लिया गया है। 'फेत्कार' का अर्थ है सियार की आवाज, जो श्मशान और उग्र साधना का प्रतीक है। यह स्तोत्र दशमहाविद्याओं में दूसरी, माँ तारा की उपासना का एक अत्यंत शक्तिशाली साधन है। इसे 'कर्पूर' (Camphor) इसलिए कहा जाता है क्योंकि जैसे कपूर जलकर पूरी तरह लुप्त हो जाता है और केवल सुगंध रह जाती है, वैसे ही यह स्तोत्र साधक के अहंकार और अज्ञान को पूरी तरह भस्म कर उसे दिव्य चेतना में विलीन कर देता है।

बीज मंत्रों का कूट (Code of Seed Mantras): इस स्तोत्र के प्रथम आठ श्लोक केवल स्तुति नहीं हैं, बल्कि वे माँ तारा के गुप्त बीज मंत्रों (जैसे ह्रीं, स्त्रीं, हूं) की कूटबद्ध व्याख्या हैं।

  • प्रथम श्लोक: "श्रीकण्ठामृतकेश..." — यह श्लोक तारा के आद्य बीज 'ॐ' (प्रणव) की ओर संकेत करता है, जो गुणत्रय (सत्व, रज, तम) से युक्त है।
  • द्वितीय श्लोक: "व्योमार्णं वामनेत्रान्वितम्..." — यह तारा के मुख्य बीज 'ह्रीं' (माया बीज) का वर्णन है। 'व्योम' (ह), 'अनल' (र), 'वामनेत्र' (ई) और 'बिन्दु' मिलकर 'ह्रीं' बनाते हैं।
  • तृतीय श्लोक: "शुक्रार्णं..." — यह वधूबीज 'स्त्रीं' (Streem) का वर्णन है, जो तारा का विशिष्ट बीज है।
  • चतुर्थ श्लोक: "ईशानं..." — यह 'हूं' (Hoom - कूर्च बीज) की ओर संकेत करता है, जो क्रोध और शक्ति का प्रतीक है।

देवी का ध्यान और तांत्रिक साधना (Meditation & Tantric Practice)

श्लोक 9 में माँ तारा के उस स्वरूप का ध्यान वर्णित है जिसे साधक को अपने हृदय में धारण करना चाहिए।

  • शवासनस्थिता: देवी श्मशान में शव (शिव) के ऊपर विराजमान हैं। यह मृत्यु और वैराग्य पर उनकी विजय का प्रतीक है।
  • खड्ग और कर्त्री: उनके हाथों में खड्ग (तलवार) और कर्त्री (कैंची) है, जो अज्ञान और मोह के बंधनों को काटते हैं।
  • नील वर्णा: वे 'नवाम्भोदश्यामां' (नए बादलों जैसी नीली/काली) हैं, जो अनंत आकाश और गंभीरता का प्रतीक है।
  • ललज्जिह्वा: उनकी जीभ बाहर निकली हुई है, जो रजो गुण के भक्षण का संकेत है।

साधना के स्थान: श्लोक 10 में साधना के लिए नदी तट, पर्वत शिखर, श्मशान, गोशाला या शिव मंदिर जैसे एकांत स्थानों को उत्तम बताया गया है। हविष्यान्न (सात्विक भोजन) खाकर एक लाख जप करने से साधक 'वशी' (जितेन्द्रिय) हो जाता है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले सिद्ध लाभ (Benefits of Recitation)

फेत्कारी तंत्र के अनुसार, इस स्तोत्र के पाठ और इसमें निहित मंत्रों के जप से साधक को अकल्पनीय सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं:

  • अद्भुत वाक-सिद्धि (Vak Siddhi): श्लोक 2 और 9 के अनुसार, इसका जप करने वाले के मुख में सरस्वती का वास हो जाता है। वह 'गद्य-पद्य' (Prose & Poetry) रचने में समर्थ हो जाता है और 'वाक्पति' (बृहस्पति) के समान विद्वान हो जाता है। जड़ बुद्धि भी महाज्ञानी बन जाता है (श्लोक 24)।
  • अपार धन और कुबेरत्व: श्लोक 6 में कहा गया है कि साधक 'वित्ते वित्तेशतुल्याः' (धन में कुबेर के समान) हो जाता है। उसके घर में लक्ष्मी (सिन्धुतनया) का स्थायी निवास होता है (श्लोक 7)।
  • त्रैलोक्य वशीकरण: श्लोक 4 और 14 के अनुसार, इस मंत्र के प्रभाव से साधक तीनों लोकों को क्षोभित (आकर्षित) कर सकता है। राजा और स्त्रियाँ (शक्ति) उसके वश में हो जाती हैं।
  • शत्रु और भय नाश: यह स्तोत्र 'सकलभयहरे' (सभी भयों को हरने वाला) है। इसके प्रभाव से शत्रु शांत हो जाते हैं और साधक निर्भय हो जाता है।
  • मोक्ष और कैवल्य: अंतिम श्लोक (23 और 25) में कहा गया है कि साधक इस जीवन में सभी सुखों (त्रिवर्ग) को भोगकर अंत में 'मोक्षपदवीम्' (मोक्ष) को प्राप्त करता है।

पाठ विधि एवं अनुष्ठान के नियम (Ritual Method & Guidelines)

यह एक सिद्ध तांत्रिक स्तोत्र है, अतः इसका पाठ विधि-विधान और सावधानी से करना चाहिए।

दैनिक पाठ विधि: स्नानादि से निवृत्त होकर नीले या काले वस्त्र धारण करें। उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। माँ तारा का चित्र या यंत्र स्थापित करें। सबसे पहले 'ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं फट्' (तारा का पंचाक्षरी मंत्र, श्लोक 8) का 108 बार जप करें, फिर इस स्तोत्र का पाठ करें।

विशिष्ट अनुष्ठान (Special Rituals): श्लोक 20 के अनुसार, ग्रहण काल (सूर्य/चंद्र ग्रहण) और नवमी तिथि को इसका जप करना अत्यंत फलदायी है। मंगलवार (क्षोणीतनय दिवस) की रात्रि में श्मशान या एकांत में पाठ करने से 'दीर्घायु' और 'वाक-सिद्धि' प्राप्त होती है (श्लोक 18)।

हवन विधि: श्लोक 12-13 में हवन का विधान है। लाल कमल, बेलपत्र, घी, मधु (शहद) और शक्कर मिश्रित हविष्य से त्रिकोण कुण्ड में हवन करने से साधक 'कवीन्द्र' (महान कवि) और 'क्षितिपति' (राजा) बन जाता है। (नोट: श्लोक 14-15 में वर्णित वाममार्गी अनुष्ठान केवल दीक्षीत साधकों के लिए हैं)।

चेतावनी: अंतिम श्लोक में निर्देश है — "रहस्यं प्राकाश्यन्न हि खलु कदाचित्पशुजने"। अर्थात्, इस गोपनीय स्तोत्र को 'पशु भाव' वाले (अज्ञानी, अभक्त) लोगों के सामने प्रकट नहीं करना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह स्तोत्र किस ग्रंथ से लिया गया है?
यह स्तोत्र तंत्र शास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथ 'फेत्कारी तन्त्र' से लिया गया है।
2. 'कर्पूर स्तोत्र' का क्या अर्थ है?
जैसे कपूर जलकर सुगंध फैलाता है और खुद मिट जाता है, वैसे ही यह स्तोत्र साधक के 'अहंकार' को जलाकर उसे देवीमय बना देता है। यह पूर्ण समर्पण का प्रतीक है।
3. 'पशुजन' (श्लोक 25) किसे कहते हैं?
तंत्र में 'पशु' वह व्यक्ति है जो द्वैत भाव, अज्ञान और सामाजिक बंधनों (पाश) में बंधा हुआ है और जिसने दीक्षा नहीं ली है। यह स्तोत्र 'वीर' और 'दिव्य' भाव के साधकों के लिए है।
4. तारा और काली में क्या अंतर है?
काली 'काल' (समय) की देवी हैं और तारा 'तारण' (मोक्ष) की। दोनों का स्वरूप लगभग समान है (नील वर्ण, मुण्डमाला), लेकिन तारा के मस्तक पर अक्षोभ्य शिव (नाग रूप में) विराजमान होते हैं।
5. क्या गृहस्थ इसका पाठ कर सकते हैं?
जी हाँ। श्लोक 23 में कहा गया है कि यह 'त्रिवर्ग' (धर्म, अर्थ, काम) भी देता है। गृहस्थ इसे सात्विक भाव से विद्या, धन और सुरक्षा के लिए पढ़ सकते हैं।
6. 'गद्यपद्यमयी वाणी' का क्या लाभ है?
इसका अर्थ है कि साधक में साहित्य, कविता और भाषण की अद्भुत क्षमता आ जाती है। वह सरस्वती पुत्र बन जाता है।
7. क्या इस पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?
सामान्य पाठ के लिए अनिवार्य नहीं है, लेकिन इसमें निहित बीज मंत्रों (ह्रीं, स्त्रीं, हूं) की सिद्धि और तांत्रिक प्रयोगों के लिए गुरु दीक्षा अत्यंत आवश्यक है।
8. 'एकजटिले' का क्या अर्थ है?
यह माँ तारा का एक नाम है। उनकी जटाएं (बाल) एक साथ बंधी हुई हैं, जो उनकी एकाग्रता और तपस्या का प्रतीक है।
9. पाठ का सबसे अच्छा समय क्या है?
श्लोक 20 के अनुसार, ग्रहण काल (तमोग्रस्ते चन्द्रे/सूर्ये) और नवमी तिथि इस पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं। नित्य पाठ के लिए प्रातःकाल उत्तम है।
10. 'नीलाम्बुदाली' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'नीले बादलों की पंक्ति'। देवी का रंग गहरे नीले बादलों के समान है, जो उनकी अनंतता और करुणा (वर्षा) का प्रतीक है।