Sri Dattatreya Ashtottara Shatanamavali 1 – श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनामावली १

॥ श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनामावली १ ॥
॥ नामावली ॥
ओं अनसूयासुताय नमः ।
ओं दत्ताय नमः ।
ओं अत्रिपुत्राय नमः ।
ओं महामुनये नमः ।
ओं योगीन्द्राय नमः ।
ओं पुण्यपुरुषाय नमः ।
ओं देवेशाय नमः ।
ओं जगदीश्वराय नमः ।
ओं परमात्मने नमः । ९
ओं परस्मै ब्रह्मणे नमः ।
ओं सदानन्दाय नमः ।
ओं जगद्गुरवे नमः ।
ओं नित्यतृप्ताय नमः ।
ओं निर्विकाराय नमः ।
ओं निर्विकल्पाय नमः ।
ओं निरञ्जनाय नमः ।
ओं गुणात्मकाय नमः ।
ओं गुणातीताय नमः । १८
ओं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकाय नमः ।
ओं नानारूपधराय नमः ।
ओं नित्याय नमः ।
ओं शान्ताय नमः ।
ओं दान्ताय नमः ।
ओं कृपानिधये नमः ।
ओं भक्तिप्रियाय नमः ।
ओं भवहराय नमः ।
ओं भगवते नमः । २७
ओं भवनाशनाय नमः ।
ओं आदिदेवाय नमः ।
ओं महादेवाय नमः ।
ओं सर्वेशाय नमः ।
ओं भुवनेश्वराय नमः ।
ओं वेदान्तवेद्याय नमः ।
ओं वरदाय नमः ।
ओं विश्वरूपाय नमः ।
ओं अव्ययाय नमः । ३६
ओं हरये नमः ।
ओं सच्चिदानन्दाय नमः ।
ओं सर्वेशाय नमः ।
ओं योगीशाय नमः ।
ओं भक्तवत्सलाय नमः ।
ओं दिगम्बराय नमः ।
ओं दिव्यमूर्तये नमः ।
ओं दिव्यभूतिविभूषणाय नमः ।
ओं अनादिसिद्धाय नमः । ४५
ओं सुलभाय नमः ।
ओं भक्तवाञ्छितदायकाय नमः ।
ओं एकाय नमः ।
ओं अनेकाय नमः ।
ओं अद्वितीयाय नमः ।
ओं निगमागमपण्डिताय नमः ।
ओं भुक्तिमुक्तिप्रदात्रे नमः ।
ओं कार्तवीर्यवरप्रदाय नमः ।
ओं शाश्वताङ्गाय नमः । ५४
ओं विशुद्धात्मने नमः ।
ओं विश्वात्मने नमः ।
ओं विश्वतोमुखाय नमः ।
ओं सर्वेश्वराय नमः ।
ओं सदातुष्टाय नमः ।
ओं सर्वमङ्गलदायकाय नमः ।
ओं निष्कलङ्काय नमः ।
ओं निराभासाय नमः ।
ओं निर्विकल्पाय नमः । ६३
ओं निराश्रयाय नमः ।
ओं पुरुषोत्तमाय नमः ।
ओं लोकनाथाय नमः ।
ओं पुराणपुरुषाय नमः ।
ओं अनघाय नमः ।
ओं अपारमहिम्ने नमः ।
ओं अनन्ताय नमः ।
ओं आद्यन्तरहिताकृतये नमः ।
ओं संसारवनदावाग्नये नमः । ७२
ओं भवसागरतारकाय नमः ।
ओं श्रीनिवासाय नमः ।
ओं विशालाक्षाय नमः ।
ओं क्षीराब्धिशयनाय नमः ।
ओं अच्युताय नमः ।
ओं सर्वपापक्षयकराय नमः ।
ओं तापत्रयनिवारणाय नमः ।
ओं लोकेशाय नमः ।
ओं सर्वभूतेशाय नमः । ८१
ओं व्यापकाय नमः ।
ओं करुणामयाय नमः ।
ओं ब्रह्मादिवन्दितपदाय नमः ।
ओं मुनिवन्द्याय नमः ।
ओं स्तुतिप्रियाय नमः ।
ओं नामरूपक्रियातीताय नमः ।
ओं निःस्पृहाय नमः ।
ओं निर्मलात्मकाय नमः ।
ओं मायाधीशाय नमः । ९०
ओं महात्मने नमः ।
ओं महादेवाय नमः ।
ओं महेश्वराय नमः ।
ओं व्याघ्रचर्माम्बरधराय नमः ।
ओं नागकुण्डलभूषणाय नमः ।
ओं सर्वलक्षणसम्पूर्णाय नमः ।
ओं सर्वसिद्धिप्रदायकाय नमः ।
ओं सर्वज्ञाय नमः ।
ओं करुणासिन्धवे नमः । ९९
ओं सर्पहाराय नमः ।
ओं सदाशिवाय नमः ।
ओं सह्याद्रिवासाय नमः ।
ओं सर्वात्मने नमः ।
ओं भवबन्धविमोचनाय नमः ।
ओं विश्वम्भराय नमः ।
ओं विश्वनाथाय नमः ।
ओं जगन्नाथाय नमः ।
ओं जगत्प्रभवे नमः । १०८
॥ इति श्री दत्तात्रेय अष्टोत्तरशतनामावली १ सम्पूर्णा ॥
परिचय: श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनामावली १ — गुरु तत्व का सार (Introduction)
श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनामावली १ सनातन धर्म की गुरु-शिष्य परंपरा का वह आधार स्तंभ है, जिसमें भगवान दत्तात्रेय के १०८ दिव्य नामों के माध्यम से त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) की संयुक्त शक्ति की वंदना की गई है। भगवान दत्तात्रेय को अत्रि मुनि और माता अनसूया के पुत्र के रूप में " Incarnation of Trimurti" माना जाता है। इस नामावली का पाठ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि साधक के भीतर सोई हुई "चेतना" को जाग्रत करने का एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक मार्ग है।
भगवान दत्तात्रेय को 'आदि गुरु' और 'योगेश्वर' कहा जाता है। उन्होंने २४ गुरुओं से शिक्षा प्राप्त कर संसार को यह संदेश दिया कि ज्ञान केवल शास्त्रों में नहीं, बल्कि प्रकृति के हर अंश (जैसे पृथ्वी, जल, वायु, और पशु-पक्षी) में व्याप्त है। नामावली का प्रथम नाम 'अनसूयासुताय' उनकी पवित्र उत्पत्ति को दर्शाता है, जबकि 'परमात्मने' और 'जगद्गुरवे' नाम उनकी सर्वोच्च सत्ता की पुष्टि करते हैं। इस नामावली को "मन्त्रराज" भी कहा जाता है क्योंकि इसके प्रत्येक नाम के आगे 'ओं' और पीछे 'नमः' का संपुट लगा है, जो इसे साक्षात सिद्ध मंत्रों के समूह में बदल देता है।
दत्तात्रेय सम्प्रदाय में ऐसी मान्यता है कि कलियुग में, जहाँ मनुष्य अज्ञान, भय और संतापों से घिरा है, वहाँ भगवान दत्त का नाम स्मरण ही रक्षा का अमोघ उपाय है। यह नामावली साधक को मानसिक द्वंद्वों से मुक्त कर उसे उस शांत स्थिति में ले जाती है जहाँ "स्व" का साक्षात्कार संभव होता है। १०८ नामों की यह माला ब्रह्मांडीय मंडल (Cosmic Mandala) के १०८ ऊर्जा केंद्रों का प्रतिनिधित्व करती है, जो पाठ करने वाले के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा कवच निर्मित करती है।
विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व और 'दत्त' तत्व (Significance)
दत्तात्रेय नामावली का महत्व इसके 'त्रिमूर्ति' स्वरूप में निहित है। श्लोक १९ में प्रयुक्त "ब्रह्मविष्णुशिवात्मकाय" नाम यह स्पष्ट करता है कि दत्तात्रेय ही सृजन, पालन और लय के अधिपति हैं। जब कोई व्यक्ति इन नामों का उच्चारण करता है, तो वह अनजाने में ही ब्रह्मांड की तीनों मूल शक्तियों का आह्वान कर रहा होता है। यह नामावली विशेष रूप से उन लोगों के लिए अमोघ है जो "पितृ दोष" (Ancestral Issues) से पीड़ित हैं। दत्तात्रेय भगवान पितरों के अधिपति माने जाते हैं, अतः उनके नाम स्मरण से अतृप्त पूर्वजों को सद्गति मिलती है और परिवार पर उनकी कृपा बरसती है।
भगवान को 'अवधूत' और 'दिगम्बर' भी कहा गया है। 'दिगम्बर' का अर्थ है— जिसका वस्त्र दिशाएं हैं (दिक्+अम्बर), अर्थात जो सर्वव्यापी और निराकार है। वहीं 'अवधूत' वह है जिसने संसार के सभी द्वंद्वों (सुख-दुख, मान-अपमान) को धो दिया है। यह नामावली हमें यह सिखाती है कि जीवन की पूर्णता बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आंतरिक "नित्यतृप्ति" (नाम १३) में है। श्लोक ७२ में प्रभु को "संसारवनदावाग्नये" कहा गया है, जिसका अर्थ है— वह अग्नि जो संसार रूपी वन के कष्टों को जलाकर भस्म कर दे। यह साधक के भीतर के 'काम', 'क्रोध' और 'लोभ' रूपी विकारों का शमन करने की शक्ति रखती है।
नामावली पाठ के फलश्रुति लाभ (Benefits)
दत्त सम्प्रदाय की प्राचीन परंपरा और गुरु-परंपरा के अनुसार, इन १०८ दिव्य नामों के नित्य पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- मानसिक शांति और अज्ञान नाश: 'ज्ञानविज्ञान' स्वरूप प्रभु का नाम लेने से बुद्धि प्रखर होती है और अज्ञान के परदे हट जाते हैं।
- पितृ दोष शांति: भगवान दत्तात्रेय पितरों के स्वामी हैं। इस नामावली का पाठ पूर्वजों को शांति प्रदान करता है और परिवार की उन्नति में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।
- सर्व बाधा मुक्ति: "ओं भवबन्धविमोचनाय नमः" (नाम १०४) का प्रभाव साधक को जन्म-मरण के बंधन और वर्तमान जीवन के संकटों से मुक्त करता है।
- आरोग्य और दीर्घायु: भगवान को 'निरामय' और 'सच्चिदानन्द' माना गया है। उनके नामों का जाप शारीरिक व्याधियों को दूर करने में सहायक है।
- सद्गुरु की प्राप्ति: जो साधक मार्गभ्रष्ट हैं, उन्हें इस पाठ से शीघ्र ही एक सच्चे गुरु का मार्गदर्शन और सानिध्य प्राप्त होता है।
- भय और शत्रुओं का नाश: "ओं भवहराय नमः" होने के कारण यह अज्ञात भय, तंत्र-बाधा और बाहरी विरोधियों के प्रभाव को निष्क्रिय करता है।
- पाप क्षय और शुद्धि: भगवान के पवित्र नामों का उच्चारण करोड़ों जन्मों के संचित पापों का दहन कर अंतःकरण को निर्मल बनाता है।
पाठ विधि एवं विशेष साधना निर्देश (Ritual Method)
दत्तात्रेय साधना में सात्विकता और शुद्धता का सर्वोच्च स्थान है। १०८ नामों की इस नामावली का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाना श्रेष्ठ है:
साधना के नियम
- शुभ समय: गुरुवार (Thursday) गुरु का प्रिय दिन है। इसके अतिरिक्त मार्गशीर्ष पूर्णिमा (दत्त जयंती), पूर्णिमा और एकादशी पर पाठ करना अनंत फलदायी है।
- ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः ४:०० से ६:०० के बीच पाठ करना सर्वोत्तम है। सायंकाल संध्या के समय भी पाठ किया जा सकता है।
- आसन और दिशा: कुशा या ऊनी आसन का प्रयोग करें। मुख उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर होना चाहिए।
- शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। भस्म (विभूति) का तिलक लगाना दत्त साधना में अनिवार्य माना जाता है।
- दीप और नैवेद्य: शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। भगवान दत्त को गुड़, चने की दाल या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं।
- ध्यान: पाठ से पूर्व भगवान दत्तात्रेय के 'त्रिगुण' रूप का ध्यान करें— जिनके तीन मुख और छह हाथ हैं, और वे औदुंबर वृक्ष के नीचे विराजमान हैं।
विशेष अनुष्ठान
यदि जीवन में कोई बड़ा संकट हो, तो संकल्प लेकर लगातार २१ गुरुवार तक प्रतिदिन १०८ नामों का जाप करें। पाठ के अंत में 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' महामंत्र का १०८ बार जाप अवश्य करें। इससे नामावली की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10+ FAQs)
1. श्री दत्तात्रेय अष्टोत्तरशतनामावली १ का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका मुख्य उद्देश्य भगवान दत्तात्रेय के दिव्य स्वरूप का स्मरण कर मानसिक शांति, गुरु कृपा की प्राप्ति और जीवन की भौतिक व आध्यात्मिक बाधाओं का निवारण करना है।
2. भगवान दत्तात्रेय को 'त्रिमूर्ति' क्यों कहा जाता है?
क्योंकि उनमें ब्रह्मा (सृजन), विष्णु (पालन) और महेश (लय) तीनों की शक्तियाँ एकाकार हैं। वे स्वयं परमात्मा का एकीकृत स्वरूप हैं जो गुरु के रूप में मार्गदर्शन करते हैं।
3. क्या इस नामावली के पाठ से पितृ दोष सच में दूर होता है?
जी हाँ। दत्त संप्रदाय में ऐसी प्रबल मान्यता है कि भगवान दत्तात्रेय पितरों के स्वामी माने जाते हैं। १०८ नामों का नित्य पाठ पूर्वजों को शांति प्रदान करता है और परिवार पर उनकी कृपा लाता है।
4. 'अवधूत' स्वरूप का क्या अर्थ है?
अवधूत का अर्थ है वह जो संसार के सभी मायावी बंधनों, सामाजिक वर्जनाओं और देह-अभिमान से ऊपर उठकर परमानंद में स्थित है। यह भगवान दत्त की सर्वोच्च योगिक अवस्था है।
5. क्या स्त्रियाँ इस नामावली का पाठ कर सकती हैं?
अवश्य। भगवान दत्तात्रेय की भक्ति में कोई लिंग भेद नहीं है। माता अनसूया के पुत्र होने के कारण, प्रभु स्त्रियों पर विशेष वात्सल्य रखते हैं। शुद्ध चित्त से कोई भी श्रद्धालु इसका पाठ कर सकता है।
6. पाठ के लिए सबसे उत्तम माला कौन सी है?
दत्तात्रेय साधना के लिए रुद्राक्ष की माला सर्वोत्तम मानी गई है। यदि माला न हो, तो भी श्रद्धापूर्वक और एकाग्र मन से किया गया पाठ स्वीकार्य है।
7. 'स्मर्तृगामी' शब्द का क्या तात्पर्य है?
'स्मर्तृगामी' का अर्थ है— "स्मरण करते ही पहुँचने वाले"। यह भगवान दत्त की वह करुणा को दर्शाता है जहाँ वे किसी कठिन योग के बिना मात्र याद करने से ही भक्त की सहायता करते हैं।
8. भगवान दत्त के साथ चार कुत्ते क्या दर्शाते हैं?
वे चार कुत्ते ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के प्रतीक हैं, जो यह बताते हैं कि संपूर्ण ज्ञान प्रभु के चरणों में ही सुरक्षित है।
9. क्या इस पाठ से नौकरी या व्यापार में लाभ मिलता है?
जी हाँ, क्योंकि यह नामावली 'सर्वसिद्धिप्रदाय' है। गुरु की प्रसन्नता से जातक के बुद्धि दोष दूर होते हैं और निर्णय क्षमता बढ़ती है, जिससे भौतिक उन्नति होती है।
10. पाठ के दौरान किस खाद्य पदार्थ का दान करना शुभ है?
पाठ के पश्चात गाय को भोजन कराना या कुत्तों को रोटी देना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि ये दत्तात्रेय भगवान के साथ सदैव उपस्थित रहते हैं।