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Sri Vishnu Sahasranama Stotram Uttarapeetika – श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र – उत्तरपीठिका

Sri Vishnu Sahasranama Stotram Uttarapeetika – श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र – उत्तरपीठिका
॥ श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र – उत्तरपीठिका (फलश्रुति) ॥ ॥ उत्तरन्यासः ॥ श्री भीष्म उवाच- इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः । नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥ १ ॥ य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् । नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः ॥ २ ॥ वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत् । वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥ ३ ॥ धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् । कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात्प्रजाम् ॥ ४ ॥ भक्तिमान् यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः । सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥ ५ ॥ यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च । अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ६ ॥ न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति । भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः ॥ ७ ॥ रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् । भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ ८ ॥ दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् । स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥ ९ ॥ वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः । सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥ १० ॥ न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् । जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥ ११ ॥ इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः । युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥ १२ ॥ न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः । भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥ १३ ॥ द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः । वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥ १४ ॥ ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् । जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥ १५ ॥ इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः । वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥ १६ ॥ सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते । आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥ १७ ॥ ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः । जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥ १८ ॥ योगो ज्ञानं तथा साङ्ख्यं विद्याः शिल्पादि कर्म च । वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात् ॥ १९ ॥ एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः । त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ २० ॥ इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् । पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥ २१ ॥ विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभुमव्ययम् । भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥ २२ ॥ न ते यान्ति पराभवम् ओं नम इति । अर्जुन उवाच- पद्मपत्रविशालाक्ष पद्मनाभ सुरोत्तम । भक्तानामनुरक्तानां त्राता भव जनार्दन ॥ २३ ॥ श्रीभगवानुवाच- यो मां नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति पाण्डव । सोहऽमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशयः ॥ २४ ॥ स्तुत एव न संशय ओं नम इति । व्यास उवाच- वासनाद्वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रयम् । सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥ २५ ॥ श्री वासुदेव नमोऽस्तुत ओं नम इति । पार्वत्युवाच- केनोपायेन लघुना विष्णोर्नामसहस्रकम् । पठ्यते पण्डितैर्नित्यं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ २६ ॥ ईश्वर उवाच- श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ॥ २७ ॥ श्रीरामनाम वरानन ओं नम इति । ब्रह्मोवाच- नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे । सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटी युगधारिणे नमः ॥ २८ ॥ सहस्रकोटी युगधारिणे ओं नम इति । सञ्जय उवाच- यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ २९ ॥ श्रीभगवानुवाच- अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ ३० ॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ३१ ॥ आर्ताः विषण्णाः शिथिलाश्च भीताः घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः । सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्तु ॥ ३२ ॥ कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतिस्वभावात् । करोमि यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ॥ ३३ ॥ ॥ इति श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्री विष्णु सहस्रनाम उत्तरपीठिका: परिचय एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि (Introduction)

श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र उत्तरपीठिका (Sri Vishnu Sahasranama Uttarapeetika), जिसे 'फलश्रुति' के नाम से भी जाना जाता है, महाभारत के अनुशासन पर्व का वह स्वर्णिम भाग है जहाँ भीष्म पितामह भगवान विष्णु के सहस्र नामों के पाठ से मिलने वाले अलौकिक लाभों का वर्णन करते हैं। पूर्वपीठिका में युधिष्ठिर द्वारा पूछे गए ६ मौलिक प्रश्नों और मुख्य स्तोत्र में १००० नामों के उच्चारण के बाद, उत्तरपीठिका उस आध्यात्मिक यात्रा की पूर्णता है। यह केवल एक धार्मिक पाठ नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म के सार और ईश्वर के प्रति शरणागति (Prapatti) का महाप्रमाण है।

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था और कुरुक्षेत्र की भूमि पर शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह अपनी अंतिम घड़ियाँ गिन रहे थे। उस समय धर्मराज युधिष्ठिर अपने मन की अशांति और धर्म के रहस्यों को जानने के लिए उनके पास पहुँचे। भीष्म जी ने स्पष्ट किया कि कलयुग के मनुष्यों के लिए नाम-संकीर्तन ही सबसे बड़ा यज्ञ है। उत्तरपीठिका हमें यह विश्वास दिलाती है कि भगवान का नाम केवल शब्द नहीं है, बल्कि वह स्वयं परमात्मा का स्वरूप है।

इस भाग में प्रसिद्ध मंत्र "श्रीराम राम रामेति..." का भी समावेश है, जिसे स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को बताया था। यह उत्तरपीठिका सिद्ध करती है कि विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने वाला व्यक्ति कभी 'पराभव' (हार) को प्राप्त नहीं होता। इसमें न केवल मनुष्यों के लिए निर्देश हैं, बल्कि इसमें स्वयं ब्रह्मा, शिव और सञ्जय के महत्वपूर्ण कथन भी शामिल हैं, जो इस स्तोत्र की सार्वभौमिकता (Universality) को सिद्ध करते हैं।

विशिष्ट महत्व: भीष्म द्वारा उपदिष्ट फलश्रुति का रहस्य (Significance)

उत्तरपीठिका का महत्व वेदान्त और भक्ति मार्ग—दोनों के लिए अतुलनीय है। भीष्म पितामह श्लोक ३ में स्पष्ट करते हैं कि यह स्तोत्र समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए वरदान है। जहाँ ब्राह्मण को इसके पाठ से वेदान्त का ज्ञान मिलता है, वहीं क्षत्रिय विजयी होता है, वैश्य धनवान बनता है और शूद्र को सुख की प्राप्ति होती है। यह वर्ण व्यवस्था से परे एक 'सार्वभौमिक उपचार' (Universal Remedy) है।

आध्यात्मिक मनोविज्ञान: आधुनिक समय में जहाँ मानसिक तनाव और अवसाद बढ़ रहा है, उत्तरपीठिका का श्लोक १३ अत्यंत प्रासंगिक है। भीष्म जी कहते हैं कि भगवान विष्णु के सच्चे भक्तों के मन में कभी क्रोध, ईर्ष्या (मात्सर्य), लोभ या अशुभ विचार उत्पन्न नहीं होते। यह पाठ साधक के 'चित्त' का शुद्धिकरण करता है और उसे सात्विक ऊर्जा से भर देता है।

इस पाठ का एक और विशेष पक्ष 'समर्पण' (Surrender) है। 'कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा...' मंत्र के माध्यम से साधक अपने प्रत्येक कर्म को नारायण को अर्पित कर देता है। यह 'निष्काम कर्म' की पराकाष्ठा है, जो गीता के उपदेशों का सार है। उत्तरपीठिका यह बोध कराती है कि संपूर्ण ब्रह्मांड (सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, पृथ्वी) केवल भगवान विष्णु की शक्ति से ही टिका हुआ है।

फलश्रुति लाभ: उत्तरपीठिका पाठ के अमोघ फल (Benefits)

उत्तरपीठिका के ३३ श्लोकों में भगवान विष्णु की कृपा से मिलने वाले अनगिनत लाभों का वर्णन है:

  • अशुभ का नाश: "नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित" — जो नित्य इस स्तोत्र का पाठ या श्रवण करता है, उसे लोक और परलोक में कभी किसी अशुभ का सामना नहीं करना पड़ता।
  • आरोग्य और दीर्घायु: श्लोक ७ और ८ के अनुसार, यह पाठ असाध्य रोगों से मुक्ति दिलाता है (रोगार्तो मुच्यते रोगात्) और साधक को ओजस्वी व बलवान बनाता है।
  • भय और बन्धन से मुक्ति: चाहे वह शत्रुभय हो, मृत्युभय हो या कानूनी बन्धन—विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने वाला व्यक्ति सभी बाधाओं को पार कर जाता है।
  • पाप मुक्ति: "सर्वपापविशुद्धात्मा" — करोड़ों जन्मों के संचित पाप इस नाम-संकीर्तन की अग्नि में भस्म हो जाते हैं और साधक शुद्ध होकर 'ब्रह्म सनातनम्' को प्राप्त करता है।
  • मोक्ष की प्राप्ति: जो भक्त श्रद्धापूर्वक इसका गान करते हैं, वे पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होकर भगवान विष्णु के परम पद (वैकुंठ) को प्राप्त करते हैं।
  • विद्या और यश: विद्यार्थियों के लिए यह स्तोत्र मेधा शक्ति बढ़ाता है और समाज में मान-सम्मान व यश की प्राप्ति कराता है।

पाठ विधि एवं विशेष 'राम-नाम' विधान (Ritual Method)

विष्णु सहस्रनाम का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु श्रद्धा और पवित्रता अनिवार्य है। शास्त्रसम्मत विधि निम्नलिखित है:

१. श्रेष्ठ समय और आसन:

स्तोत्र के अनुसार 'सदौत्थाय शुचिः' अर्थात् प्रातः काल स्नान के उपरांत शुद्ध मन से पाठ करना सर्वोत्तम है। पीला रंग भगवान विष्णु को प्रिय है, अतः पीले वस्त्र पहनें और कुश या ऊनी आसन पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।

२. एकाग्रता और भक्ति:

पाठ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं होना चाहिए। प्रत्येक नाम के पीछे छिपे अनंत नारायण का ध्यान करें। यदि समय की अत्यधिक कमी हो, तो श्लोक २७ का पाठ करें— "श्रीराम राम रामेति..."। भगवान शिव के अनुसार, 'राम' नाम का तीन बार जप १००० नामों के बराबर फल देता है।

३. पूजन एवं अर्पण:

सामने भगवान विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम स्थापित करें। शुद्ध घी का दीपक जलाएं और प्रभु को तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) अर्पित करें। पाठ के अंत में 'कायेन वाचा...' मंत्र पढ़कर सब कुछ प्रभु को समर्पित कर दें।

४. विशेष अवसर:

एकादशी, गुरुवार, पूर्णिमा और चतुर्मास के दौरान इसका पाठ करना अनंत गुना फलदायी माना गया है। सामूहिक पाठ से वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा तत्काल नष्ट हो जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. उत्तरपीठिका का पाठ करना क्यों आवश्यक है?

उत्तरपीठिका वास्तव में 'फलश्रुति' है। किसी भी स्तोत्र के पाठ के बाद उसके फल और महत्व को पढ़ना उस साधना को पूर्णता प्रदान करता है और साधक के विश्वास को दृढ़ करता है।

2. 'श्रीराम राम रामेति' मंत्र का क्या रहस्य है?

शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव माता पार्वती को बताते हैं कि जो लोग व्यस्तता के कारण १००० नाम नहीं पढ़ सकते, वे केवल इस श्लोक का ३ बार जप कर समान पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।

3. क्या इस पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

नहीं, भीष्म पितामह ने इसे लोक कल्याण हेतु युधिष्ठिर को सुनाया था। कोई भी श्रद्धालु शुद्ध चित्त और भक्ति के साथ इसे पढ़ सकता है। नाम-संकीर्तन के लिए दीक्षा की बाधा नहीं है।

4. क्या महिलाएं इसका पाठ कर सकती हैं?

निश्चित रूप से। भगवान विष्णु की भक्ति में कोई लिंग भेद नहीं है। महिलाएं पूर्ण शुद्धि और श्रद्धा के साथ अपने और अपने परिवार के मंगल हेतु इसका पाठ कर सकती हैं।

5. क्या इस पाठ से कुंडली के ग्रह दोष शांत होते हैं?

जी हाँ, विशेष रूप से बुध और बृहस्पति (गुरु) ग्रहों की प्रतिकूलता को शांत करने के लिए विष्णु सहस्रनाम को सबसे शक्तिशाली ज्योतिषीय उपचार माना गया है।

6. 'वासुदेवाश्रयो मर्त्यो' का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है—"वह मनुष्य जो भगवान वासुदेव की शरण में है"। स्तोत्र के अनुसार, ऐसे व्यक्ति को संसार की कोई भी बाधा परास्त नहीं कर सकती।

7. पाठ के लिए सबसे उत्तम माला कौन सी है?

भगवान विष्णु की साधना के लिए तुलसी की माला सर्वश्रेष्ठ है। मंत्र जप हेतु इसका प्रयोग करें, स्तोत्र पाठ मात्र के लिए माला अनिवार्य नहीं है।

8. क्या केवल उत्तरपीठिका पढ़ने से लाभ मिलता है?

सम्पूर्ण पाठ (पूर्वपीठिका, स्तोत्र और उत्तरपीठिका) ही पूर्ण फलदायी है। परंतु समय की कमी में केवल मुख्य स्तोत्र या फलश्रुति पढ़ने से भी भगवान की कृपा प्राप्त होती है।

9. 'कायेन वाचा' मंत्र का पाठ के अंत में क्या महत्व है?

यह समर्पण का मंत्र है। पाठ में हुई किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा माँगते हुए हम अपना सर्वस्व ईश्वर को अर्पित कर देते हैं, जिससे अहंकार का नाश होता है।

10. पाठ का फल कितने दिनों में मिलता है?

यह साधक की श्रद्धा और निरंतरता पर निर्भर है। २१ या ४१ दिनों तक नित्य पाठ करने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन और दैवीय सुरक्षा का अनुभव होने लगता है।