Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Deena Bandhu Ashtakam – श्री दीनबन्ध्वष्टकम् (स्वामी ब्रह्मानन्द विरचितम्)

Sri Deena Bandhu Ashtakam – श्री दीनबन्ध्वष्टकम् (स्वामी ब्रह्मानन्द विरचितम्)
॥ श्री दीनबन्ध्वष्टकम् ॥ यस्मादिदं जगदुदेति चतुर्मुखाद्यं यस्मिन्नवस्थितमशेषमशेषमूले । यत्रोपयाति विलयं च समस्तमन्ते दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः ॥ १ ॥ चक्रं सहस्रकरचारु करारविन्दे गुर्वी गदा दरवरश्च विभाति यस्य । पक्षीन्द्रपृष्ठपरिरोपितपादपद्मो दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः ॥ २ ॥ येनोद्धृता वसुमती सलिले निमग्ना नग्ना च पाण्डववधूः स्थगिता दुकूलैः । सम्मोचितो जलचरस्य मुखाद्गजेन्द्रो दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः ॥ ३ ॥ यस्यार्द्रदृष्टिवशतस्तु सुराः समृद्धिं कोपेक्षणेन दनुजा विलयं व्रजन्ति । भीताश्चरन्ति च यतोऽर्कयमानिलाद्याः दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः ॥ ४ ॥ गायन्ति सामकुशला यमजं मखेषु ध्यायन्ति धीरमतयो यतयो विविक्ते । पश्यन्ति योगिपुरुषाः पुरुषं शरीरे दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः ॥ ५ ॥ आकाररूपगुणयोगविवर्जितोऽपि भक्तानुकम्पननिमित्तगृहीतमूर्तिः । यः सर्वगोऽपि कृतशेषशरीरशय्यो दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः ॥ ६ ॥ यस्याङ्घ्रिपङ्कजमनिद्रमुनीन्द्रबृन्दै- -राराध्यते भवदवानलदाहशान्त्यै । सर्वापराधमविचिन्त्य ममाखिलात्मा दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः ॥ ७ ॥ यन्नामकीर्तनपरः श्वपचोऽपि नूनं हित्वाखिलं कलिमलं भुवनं पुनाति । दग्ध्वा ममाघमखिलं करुणेक्षणेन दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः ॥ ८ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ दीनबन्ध्वष्टकं पुण्यं ब्रह्मानन्देन भाषितम् । यः पठेत् प्रयतो नित्यं तस्य विष्णुः प्रसीदति ॥ ९ ॥ ॥ इति श्रीमत्परमहंस स्वामि ब्रह्मानन्द विरचितं दीनबन्ध्वष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

श्री दीनबन्ध्वष्टकम्: परिचय एवं 'दीनबन्धु' तत्व का मर्म (Introduction)

श्री दीनबन्ध्वष्टकम् (Sri Deena Bandhu Ashtakam) सनातन भक्ति साहित्य की एक परम कारुणिक और तेजस्वी रचना है। 'दीनबन्धु' शब्द दो गहन अर्थों को समेटे हुए है — 'दीन' (असहाय, दरिद्र या वह भक्त जो स्वयं को प्रभु के सम्मुख लघु मानता है) और 'बन्धु' (सखा, रक्षक या एकमात्र संबंधी)। इस दिव्य अष्टक की रचना महान दार्शनिक, परम साधक और परमहंस संन्यासी स्वामी ब्रह्मानन्द द्वारा की गई है। स्वामी ब्रह्मानन्द अद्वैत वेदांत के प्रकांड विद्वान होने के साथ-साथ रसमय भक्ति के भी अनन्य उपासक थे। उन्होंने इस अष्टक में भगवान विष्णु के उस स्वरूप का गान किया है जो केवल प्रेम और शरणागति के वश में होकर अपने भक्तों के कष्टों को हरने के लिए दौड़ पड़ता है।

इस अष्टक की अद्वितीयता इसकी प्रत्येक पंक्ति के अंत में आने वाले पुकार मंत्र में है — "दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः"। इसका अर्थ है: "वे दीनबन्धु (भगवान विष्णु) आज मेरी आँखों के सामने प्रत्यक्ष हों।" यह पंक्ति केवल एक सामान्य प्रार्थना नहीं है, बल्कि एक भक्त की वह तीव्र तड़प है जो ईश्वर के केवल परोक्ष रूप से संतुष्ट नहीं है, बल्कि उन्हें साक्षात् अनुभव करना चाहती है। श्लोक संख्या १ में भगवान को जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय का मूल कारण बताया गया है, जो वेदान्त के 'ब्रह्म' की पुष्टि करता है। स्वामी ब्रह्मानन्द ने निर्गुण निराकार ब्रह्म को 'दीनबन्धु' के रूप में सगुण बनाकर भक्तों के लिए अत्यंत सुलभ कर दिया है।

५०० से अधिक शब्दों के इस विस्तृत परिचय में हमें यह समझना चाहिए कि 'दीनबन्धु' नाम भगवान विष्णु का वह आभूषण है जो उन्हें समस्त देवी-देवताओं में सबसे अधिक 'भक्त-वत्सल' बनाता है। इस अष्टक में भगवान के उन सभी ऐतिहासिक प्रसंगों को पिरोया गया है जहाँ उन्होंने विधि-विधान या मर्यादा की प्रतीक्षा किए बिना अपने भक्तों का उद्धार किया। चाहे वह वराह रूप में पृथ्वी को समुद्र से बाहर निकालना हो, द्रौपदी की लाज बचाना हो या गजेन्द्र को ग्राह (मगरमच्छ) के मुख से मुक्त करना हो; यह पाठ हमें यह दृढ़ विश्वास दिलाता है कि जब हम संसार से थककर प्रभु को पुकारते हैं, तो वे अवश्य सुनते हैं।

आधुनिक युग की मानसिक अशांति, असुरक्षा और भय के वातावरण में, यह अष्टक हृदय को वह साहस और आध्यात्मिक बल प्रदान करता है जो केवल 'अच्युत' के चरणों में संभव है। इसकी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक प्रासंगिकता यह है कि यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि भक्ति के मार्ग में 'अहंकार' का कोई स्थान नहीं है। जब भक्त स्वयं को 'दीन' (अकिंचन) मानकर प्रभु के चरणों में गिर पड़ता है, तभी 'दीनबन्धु' का वास्तविक प्राकट्य होता है। स्वामी ब्रह्मानन्द की यह वाणी करोड़ों भक्तों के लिए अंधकार में एक प्रकाश स्तंभ की तरह है।

स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं लीला चित्रण (Significance)

श्री दीनबन्ध्वष्टकम् का आध्यात्मिक महत्व इसके 'करुणा-रस' और 'विष्णु-ऐश्वर्य' के अद्भुत समन्वय में निहित है। अष्टक के दूसरे श्लोक में भगवान के शस्त्रों और उनके वाहन गरुड़ का वर्णन है — सहस्रों किरणों वाला सुदर्शन चक्र, गुरुतर गदा और श्रेष्ठ शंख। यह वर्णन भगवान के रक्षक स्वरूप को उजागर करता है। वहीं तीसरे श्लोक में प्रयुक्त प्रसंग अत्यंत मर्मस्पर्शी हैं। यहाँ द्रौपदी (पाण्डववधू) की रक्षा और गजेन्द्र के मोक्ष का उल्लेख है, जो यह सिद्ध करता है कि भगवान के लिए न कोई छोटा है न बड़ा, वे केवल भक्ति और भक्त की आर्त पुकार देखते हैं।

श्लोक ४ और ५ में भगवान की उस सर्वव्यापी सत्ता का वर्णन है जिससे सूर्य, यमराज और पवन भी अनुशासित रहकर अपने कार्य में संलग्न रहते हैं। स्वामी ब्रह्मानन्द कहते हैं कि जिस पुरुषोत्तम को सामवेद के ज्ञाता यज्ञों में गाते हैं और परम योगी पुरुष अपने हृदय की गुफा में देखते हैं, वही रक्षक 'दीनबन्धु' मेरे नेत्रों के सम्मुख प्रकट हों। श्लोक ६ में एक गहरा दार्शनिक रहस्य उजागर किया गया है — "आकाररूपगुणयोगविवर्जितोऽपि"। अर्थात्, यद्यपि भगवान निराकार और गुणातीत हैं, फिर भी वे केवल भक्तों पर अनुकम्पा करने के लिए 'मूर्ति' (रूप) धारण करते हैं। यह अष्टक सगुण-निर्गुण के विवाद को समाप्त कर केवल 'प्रेम' को श्रेष्ठ बताता है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले दिव्य लाभ (Benefits from Phala Shruti)

अष्टक के ९वें श्लोक में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जो व्यक्ति पवित्र होकर नित्य इस पाठ को करता है, उसे निम्नलिखित अलौकिक फलों की प्राप्ति होती है:

  • भगवत्-प्रसन्नता: "तस्य विष्णुः प्रसीदति" — इस अष्टक के नित्य पाठ से भगवान विष्णु साक्षात् प्रसन्न होते हैं और साधक पर अपनी अहेतुकी कृपा बरसाते हैं।
  • पाप और कलिमल का नाश: श्लोक ८ के अनुसार, भगवान का नाम कीर्तन चाण्डाल (श्वपच) को भी पवित्र कर देता है। यह पाठ साधक के पूर्व संचित सभी पापों (अघम) को दग्ध कर देता है।
  • भय से पूर्ण मुक्ति: "शरणागतभीतिहरं" — जो व्यक्ति प्रभु की शरण में आ जाता है, उसे मृत्यु, व्याधि या शत्रुओं का भय कभी नहीं सताता।
  • मानसिक शांति: "भवदवानलदाहशान्त्यै" — जिस प्रकार वर्षा वन की अग्नि को शांत करती है, यह पाठ संसार के त्रिविध तापों (दुखों) को शांत कर मन को शीतल बनाता है।
  • साक्षात् दर्शन की पात्रता: निरंतर 'दृग्गोचरो भवतु' की प्रार्थना साधक के अंतःकरण को इतना शुद्ध कर देती है कि उसे प्रभु का साक्षात् सान्निध्य अनुभव होने लगता है।
  • आरोग्य और समृद्धि: भगवान की 'आर्द्र दृष्टि' (करुणा भरी दृष्टि) से भक्तों के जीवन में समृद्धि और आरोग्यता का संचार होता है।

पाठ विधि एवं विशेष साधना नियम (Ritual Method)

श्री दीनबन्ध्वष्टकम् का पाठ अत्यंत श्रद्धा और आर्त भाव से किया जाना चाहिए। इसकी पूर्ण शक्ति का अनुभव करने के लिए निम्नलिखित विधि सर्वोत्तम मानी गई है:

  • शुभ समय: प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) ४ से ६ बजे के बीच पाठ करना सर्वोच्च फलदायी है। संध्या काल में दीप जलाकर पाठ करने से नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है।
  • शुद्धि और वस्त्र: स्नान के पश्चात स्वच्छ श्वेत या पीले वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु को पीला रंग प्रिय है, अतः पीताम्बर वस्त्र शुभ हैं।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • पूजन सामग्री: भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या नारायण के विग्रह/चित्र के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक जलाएं। भगवान को तुलसी दल (Tulsi Leaves) अर्पित करना अनिवार्य है।
  • एकाग्रता: प्रत्येक श्लोक को पढ़ते समय भगवान की उन लीलाओं का मानसिक चित्रण करें जो श्लोक में वर्णित हैं (जैसे द्रौपदी रक्षा या गजेन्द्र उद्धार)।
  • विशेष प्रयोग: किसी बड़े संकट के निवारण हेतु ४१ दिनों तक नित्य ८ बार पाठ करने का संकल्प लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री दीनबन्ध्वष्टकम् के रचयिता कौन हैं?

इस दिव्य अष्टक की रचना श्रीमत्परमहंस स्वामी ब्रह्मानन्द ने की है। वे एक महान सिद्ध संत और वेदान्ताचार्य थे।

2. 'दीनबन्धु' शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है?

'दीन' का अर्थ है जो असहाय या पूर्णतः प्रभु पर आश्रित है, और 'बन्धु' का अर्थ है सखा या रक्षक। अर्थात् भगवान विष्णु, जो निर्बलों के एकमात्र सहायक हैं।

3. 'दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य' का क्या प्रभाव होता है?

यह पंक्ति साधक के हृदय में तीव्र उत्कंठा जाग्रत करती है। इसका अर्थ है "वे प्रभु आज मेरी आँखों के सामने प्रत्यक्ष हों"। इसके निरंतर गान से भक्ति की गहनता बढ़ती है।

4. क्या इस पाठ से पितृ दोष शांत होता है?

हाँ, 'कलिमल' और 'अघम' (पाप) नाशक होने के कारण, इस अष्टक का पाठ करने से कुल के पूर्वजों को भी शांति और उत्तम गति प्राप्त होती है।

5. क्या इसे बिना संस्कृत जाने पढ़ा जा सकता है?

ईश्वर केवल भक्त के 'भाव' को ग्रहण करते हैं। यदि आप इसका हिंदी अर्थ समझकर भावपूर्वक पाठ करते हैं या सुनते हैं, तो भी आपको पूर्ण फल प्राप्त होता है।

6. श्लोक ३ में द्रौपदी और गजेन्द्र का उल्लेख क्यों है?

ये दोनों प्रसंग भगवान की 'अकारण करुणा' को दर्शाते हैं। यह विश्वास दिलाने के लिए कि जैसे प्रभु ने उन्हें बचाया, वैसे ही वे हमें भी बचाएंगे।

7. क्या यह अष्टक मानसिक तनाव (Depression) को कम कर सकता है?

जी हाँ, 'भवदवानलदाहशान्त्यै' होने के कारण यह पाठ मन की जलन और अशांति को शांत कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

8. पाठ के दौरान तुलसी चढ़ाना क्यों जरूरी है?

भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है। बिना तुलसी के वे भोग या पूजा स्वीकार नहीं करते, अतः तुलसी अर्पण से पाठ का फल बढ़ जाता है।

9. 'श्वपचोऽपि नूनं' शब्द का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति जो सामाजिक रूप से बहिष्कृत या निम्न माना जाता है, वह भी यदि हरि नाम लेता है, तो वह पूरे विश्व को पवित्र करने की शक्ति रखता है।

10. क्या स्त्रियाँ इस अष्टक का पाठ कर सकती हैं?

बिल्कुल, भगवान की भक्ति पर प्रत्येक प्राणी का समान अधिकार है। स्त्रियाँ पूरी शुद्धि और श्रद्धा के साथ इसका गान कर सकती हैं।