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Sri Tripurasundari Pushpanjali Stava – श्रीत्रिपुरसुन्दरीपुष्पाञ्जलिस्तवः

Sri Tripurasundari Pushpanjali Stava – श्रीत्रिपुरसुन्दरीपुष्पाञ्जलिस्तवः
॥ श्रीत्रिपुरसुन्दरीपुष्पाञ्जलिस्तवः ॥ श्रीगणेशाय नमः । कल्याणदात्रि कमनीयतनूलते त्वां कं चापि कालमनुचिन्त्य हृदाब्जमध्ये । कामं प्रहर्षभरितेन मया तवाद्य पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरयमम्ब कीर्णः ॥ १॥ एतन्मदीयसुकृत्तं परमं पुराणं यत्त्वामहं प्रतिदिनं मनसा भजामि । साक्षात्कृतेन तव रूपमनेन चाद्य पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरयमम्ब कीर्णः ॥ २॥ ईशादिदेवमहनीयमहानुभावे दीनं त्विमं भवभयेन परिस्फुरन्तम् । दीनार्तिहर्त्रि दयया परिपालयाशु पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरयमम्ब कीर्णः ॥ ३॥ लज्जां विहाय बहुधा बहवोऽपि देवाः सम्पूजिता जडधिया नतु कोऽपि दृष्टः । लब्धं तवैव रमणीयवपुर्दृशा मे पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरयमम्ब कीर्णः ॥ ४॥ ह्रीं‍कारमन्त्रनिलये बहुशो भवाब्धौ मग्नः परं तु न कदापि गतोऽस्मि पारम् । तत्तारणे निपुणयोस्त्रिपुरे मयाद्य पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरयमम्ब कीर्णः ॥ ५॥ हस्तेषु पाशमहनीयसितेक्षुचापे पुष्पास्त्रमङ्कुशवरं ललितं दधाने । हेमाद्रितुङ्गतरश‍ृङ्गनिवासशीले पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरयमम्ब कीर्णः ॥ ६॥ सर्वेषु देवि समयेषु गतिस्त्वमेव नान्यं कदापि मनसा समनुस्मरामि । सर्वत्र रूपमतुलं तव पश्यताद्य पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरयमम्ब कीर्णः ॥ ७॥ कस्ते पुरेशि विधिवत्तु समर्हणायां शक्तः समस्तपरिवर्हयुतोऽपि धीमान् । हृत्पङ्कजेन भवतीं भजता मयाद्य पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरयमम्ब कीर्णः ॥ ८॥ हन्तातिस्थभवपावकशोषितेन कुत्राप्यलब्धशरणेन सरोजवक्त्रे । अन्ते मयात्रभवतीं शरणं गतेन पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरयमम्ब कीर्णः ॥ ९॥ लक्ष्यासि देवि बहुजन्मतपोबलेन लक्ष्मीशधातृपरिपूज्यपदास्तुजाते । आलक्ष्य रूपमरुणं तव विस्मितेन पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरयमम्ब कीर्णः ॥ १०॥ ह्रीङ्कारमेव शरणं जगतां वदन्ति ह्रीङ्कारमेव परमं भुवने रहस्यम् । ह्रीङ्कारमेव सततं स्मरता मयाद्य पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरयमम्ब कीर्णः ॥ ११॥ सर्वस्य देवि भुवनस्य निदानभूता त्वय्येव सर्वमनघे विलयं गतं स्यात् । सञ्चिन्त्य चैतदधुना त्रिपुरे मया ते पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरमम्ब कीर्णः ॥ १२॥ कश्चिद्यदा भवनिहन्त्रि विचिन्तयेत्त्वां दीनं तदैव हि कटाक्षयसे दृशा त्वम् । एवं विचिन्त्य भवतीं स्मरता मयाद्य युष्पाञ्जलिश्चरणयोरमम्ब कीर्णः ॥ १३॥ लब्ध्वा त्वदीयचरणान्धुजमम्ब जन्तुर्नावर्तते पुनरपि प्रभवाय लोके । वेदोक्तिमेवमसकृत्स्मरता मयाद्य पुष्पालिश्चरणयोरयमम्ब कीर्णः ॥ १४॥ ह्रीङ्कारमेव जपतां प्रतिवासरं च ह्रीङ्कारमेव भजतां सकलेष्टसिद्ध्यै । ह्रीङ्कारमेव परमं शरणं गतेन पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरयमप्य कीर्णः ॥ १५॥ श्रीङ्कारमन्त्रकनकाब्जनिवासशीले श्रीरूपधारिणि शिवो श्रितकल्पवल्लि । श्रीमद्गुहस्तुतमहाविभवे पुरेशि पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरयमम्ब कीर्णः ॥ १६॥ ॥ इति श्रीत्रिपुरसुन्दरीपुष्पाञ्जलिस्तवः सम्पूर्णः ॥

श्रीत्रिपुरसुन्दरीपुष्पाञ्जलिस्तवः का परिचय (Introduction)

श्रीत्रिपुरसुन्दरीपुष्पाञ्जलिस्तवः (Sri Tripurasundari Pushpanjali Stava) शाक्त परम्परा और श्री विद्या साधना का एक अत्यंत मधुर, भावपूर्ण और रहस्यमय स्तोत्र है। 'पुष्पांजलि' का अर्थ है - दोनों हाथों की अंजुली में पुष्प भरकर देवता को अर्पित करना। इस स्तोत्र में साधक भौतिक पुष्पों के साथ-साथ मंत्र और स्तुति रूपी भाव-पुष्पों को माता ललिता त्रिपुरसुन्दरी के श्रीचरणों में अर्पित करता है। इस स्तोत्र की प्रत्येक पंक्ति का अंत "पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरयमम्ब कीर्णः" (हे माता! मैं आपके चरणों में यह पुष्पांजलि अर्पित करता हूँ) के साथ होता है, जो भक्त के पूर्ण समर्पण को दर्शाता है।

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी और गोपनीय विशेषता इसकी मंत्र-गर्भित (Mantra-Garbhita) संरचना है। जिस प्रकार श्रीचक्रराज स्तोत्र पञ्चदशी मंत्र पर आधारित है, उसी प्रकार इस पुष्पांजलि स्तव के १६ श्लोक भी श्री विद्या के सर्वोच्च मंत्र—पञ्चदशी और षोडशी (Panchadashi and Shodashi)—के १६ बीजाक्षरों से प्रारंभ होते हैं।

श्लोकों का प्रथम अक्षर ध्यान से देखने पर यह क्रम बनता है: क, ए, ई, ल, ह्रीं (वाग्भव कूट), ह, स, क, ह, ल, ह्रीं (कामराज कूट), स, क, ल, ह्रीं (शक्ति कूट) और अंत में १६वां अक्षर श्रीं (षोडशी बीज)। इस प्रकार, यह स्तोत्र मात्र एक कविता नहीं है, बल्कि साक्षात श्री विद्या महामंत्र का ही विस्तृत और काव्यात्मक स्वरूप है। जो साधक इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह अनजाने में ही ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली मंत्रों में से एक का जप कर रहा होता है।

स्तोत्र में माता के सगुण और निर्गुण दोनों रूपों का वर्णन है। श्लोक ६ में उनके सगुण रूप का अत्यंत सुंदर चित्रण है— "हस्तेषु पाशमहनीयसितेक्षुचापे पुष्पास्त्रमङ्कुशवरं ललितं दधाने" (जिनके हाथों में पाश, इक्षु-चाप (गन्ने का धनुष), पुष्प बाण और अंकुश सुशोभित हैं)। वहीं, श्लोक १२ में उन्हें संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल कारण (निदानभूता) बताया गया है, जिसमें प्रलय के समय सब कुछ विलीन हो जाता है। यह स्तोत्र भक्त को दीनता और सांसारिक भयों से निकालकर माता के वात्सल्य और मोक्ष की ओर ले जाता है।

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance)

श्रीत्रिपुरसुन्दरीपुष्पाञ्जलिस्तवः का तांत्रिक और भक्ति दोनों दृष्टियों से अत्यधिक महत्व है। इसे मानस पूजा (Mental Worship) का एक उत्कृष्ट माध्यम माना जाता है। जो साधक श्रीयंत्र की विस्तृत नव-आवरण पूजा या बाह्य कर्मकांड करने में असमर्थ हैं, वे केवल इस स्तोत्र का पाठ करके माता को संपूर्ण पुष्पांजलि अर्पित करने का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।

श्लोक १० में कहा गया है— "लक्ष्यासि देवि बहुजन्मतपोबलेन" (हे देवी! आप अनेक जन्मों के तप के बल से ही लक्षित यानी प्राप्त होती हैं)। यह पंक्ति दर्शाती है कि इस स्तोत्र तक पहुँचना और माता के इस मंत्रमयी रूप का दर्शन करना कोई साधारण बात नहीं है, यह पिछले कई जन्मों के पुण्यों का फल है।

इसके अतिरिक्त, यह स्तोत्र शरणागति (Surrender) का सबसे प्रबल उदाहरण है। श्लोक ८ में साधक विनम्रतापूर्वक स्वीकार करता है कि "हे पुरेशि! समस्त साधनों के होते हुए भी आपकी विधिवत पूजा करने में कौन सक्षम है? इसलिए मैं अपने हृदय रूपी कमल (हृत्पङ्कजेन) से ही आपकी वंदना कर रहा हूँ।" यह भाव माता को अत्यंत प्रिय है और इसी भाव के कारण यह स्तोत्र शीघ्र फलदायी माना जाता है।

फलश्रुति और लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र के पाठ से प्राप्त होने वाले लाभों का वर्णन स्वयं इन श्लोकों में समाहित है। जो साधक नित्य प्रति माता को यह मंत्रमयी पुष्पांजलि अर्पित करता है, उसे निम्नलिखित सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं:

  • भव-भय का नाश: श्लोक ३ (दीनं त्विमं भवभयेन परिस्फुरन्तम्) के अनुसार, इस संसार रूपी सागर के दुखों और जन्म-मृत्यु के भयों से कांपते हुए जीव की माता रक्षा करती हैं।
  • संसार सागर से पार: श्लोक ५ में वर्णन है कि जो जीव भव-सागर (संसार) में डूबा हुआ है और पार नहीं जा पा रहा है, उसे माता त्रिपुरसुन्दरी इस स्तोत्र के प्रभाव से पार लगा देती हैं।
  • मोक्ष की प्राप्ति (पुनर्जन्म से मुक्ति): इस स्तोत्र का सबसे बड़ा लाभ श्लोक १४ में वर्णित है— "जन्तुर्नावर्तते पुनरपि प्रभवाय लोके" (जो आपके चरण कमलों को प्राप्त कर लेता है, वह इस लोक में पुनः जन्म नहीं लेता)। यह स्पष्ट रूप से मोक्ष (कैवल्य पद) की प्राप्ति का प्रमाण है।
  • इष्टसिद्धि (समस्त कामनाओं की पूर्ति): श्लोक १५ में स्पष्ट कहा गया है कि 'ह्रींकार' स्वरूप माता का भजन करने से "सकलेष्टसिद्ध्यै" (सभी इच्छित कार्यों की सिद्धि) होती है।
  • माता की कृपादृष्टि: श्लोक १३ के अनुसार, जब कोई दीन व्यक्ति माता का स्मरण करता है, तो वे तुरंत उस पर अपनी करुणापूर्ण कटाक्ष (कृपादृष्टि) डालती हैं।
  • श शारीरिक और मानसिक शांति: मानसिक उद्वेग, तनाव और जीवन की निराशाओं से मुक्त होकर साधक को परमानंद और शांति की अनुभूति होती है।

पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Method)

चूँकि यह एक पुष्पांजलि स्तोत्र है, इसलिए इसका पाठ करते समय वास्तविक पुष्पों का अर्पण करना इसकी शक्ति को कई गुना बढ़ा देता है।

दैनिक पाठ विधि:
  • प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र (लाल या पीले) धारण करें।
  • पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशासन या ऊनी आसन पर बैठें।
  • अपने सामने एक पात्र में ताजे पुष्प (विशेषकर लाल पुष्प, गुलाब, गुड़हल या कमल) और कुमकुम/रोली मिश्रित अक्षत (चावल) रख लें।
  • सामने माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी का चित्र या श्रीयंत्र स्थापित करें और घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • स्तोत्र का पाठ आरंभ करें। प्रत्येक श्लोक के अंत में जब "पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरयमम्ब कीर्णः" का उच्चारण करें, तब एक पुष्प (या पुष्प की पंखुड़ी) माता के चरणों या श्रीयंत्र पर अर्पित करें।
  • १६ श्लोकों के पूर्ण होने पर १६ पुष्प अर्पित हो जाएंगे। अंत में माता को प्रणाम कर अपनी मनोकामना व्यक्त करें।
विशेष अवसर:
  • नवरात्रि (चैत्र, शारदीय और गुप्त): नवरात्रि के दिनों में विशेषकर अष्टमी और नवमी तिथि को यह पुष्पांजलि अर्पित करना अनंत पुण्यों का प्रदाता है।
  • पूर्णिमा और शुक्रवार: श्री विद्या की देवी को पूर्णिमा की रात्रि और शुक्रवार का दिन अत्यंत प्रिय है। इस दिन पंचोपचार पूजा के बाद यह स्तोत्र पढ़ना चाहिए।
  • ललिता जयंती: माता के प्राकट्य दिवस पर इस स्तोत्र से श्रीयंत्र का अर्चन करना विशेष फलदायी माना गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्रीत्रिपुरसुन्दरीपुष्पाञ्जलिस्तवः क्या है?

यह 16 श्लोकों का एक दिव्य स्तोत्र है, जिसमें माता ललिता त्रिपुरसुन्दरी के श्रीचरणों में स्तुति रूपी पुष्पों की अंजलि अर्पित की जाती है। यह श्री विद्या का एक अत्यंत गोपनीय स्तोत्र है।

2. इस स्तोत्र की मंत्रात्मक विशेषता क्या है?

इस स्तोत्र के 16 श्लोक पञ्चदशी और षोडशी महामंत्र के 16 बीजाक्षरों (क, ए, ई, ल, ह्रीं...) से क्रमशः प्रारंभ होते हैं। इसलिए यह मात्र एक स्तुति नहीं, बल्कि साक्षात मंत्र का ही रूप है।

3. 'पुष्पाञ्जलिश्चरणयोरयमम्ब कीर्णः' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है - "हे माता (अम्ब)! मैं आपके चरणों में यह पुष्पांजलि बिखेर रहा हूँ (अर्पित कर रहा हूँ)।" यह प्रत्येक श्लोक की अंतिम पंक्ति है।

4. क्या इस स्तोत्र के पाठ से मोक्ष प्राप्त होता है?

हाँ, श्लोक 14 में स्पष्ट उल्लेख है कि जो जीव माता के चरण कमलों को प्राप्त कर लेता है, वह इस संसार में दोबारा जन्म नहीं लेता (जन्तुर्नावर्तते पुनरपि), जो मोक्ष की प्राप्ति का प्रतीक है।

5. पाठ करते समय कौन से पुष्प अर्पित करने चाहिए?

माता त्रिपुरसुन्दरी को लाल रंग के पुष्प अति प्रिय हैं। गुड़हल (जपापुष्प), लाल गुलाब, कमल, या पारिजात के पुष्प अर्पित करना सर्वोत्तम माना जाता है।

6. क्या मैं बिना श्रीयंत्र के इसका पाठ कर सकता हूँ?

बिल्कुल। यदि आपके पास श्रीयंत्र नहीं है, तो आप माता ललिता के चित्र के सामने या मानसिक रूप से (मानस पूजा के रूप में) हृदय चक्र में उनका ध्यान करके यह पुष्पांजलि अर्पित कर सकते हैं।

7. स्तोत्र में माता के किन अस्त्र-शस्त्रों का वर्णन है?

श्लोक 6 के अनुसार, माता के चारों हाथों में क्रमशः पाश (राग/इच्छा), अंकुश (क्रोध/ज्ञान), गन्ने का धनुष (मन) और पुष्प बाण (पंच तन्मात्राएं) सुशोभित हैं।

8. 'ह्रीं' बीज मंत्र इस स्तोत्र में कई बार क्यों आता है?

ह्रीं (माया बीज या शक्ति बीज) पञ्चदशी मंत्र के तीनों कूटों (खंडों) के अंत में आता है। चूँकि यह स्तोत्र उसी मंत्र की संरचना का पालन करता है, इसलिए 5वें, 11वें और 15वें श्लोक 'ह्रीं' अक्षर से प्रारंभ होते हैं।

9. क्या इस पाठ के लिए गुरु दीक्षा आवश्यक है?

चूँकि यह भक्ति-प्रधान स्तोत्र है, इसलिए पूर्ण श्रद्धा के साथ कोई भी इसका पाठ कर सकता है। हालांकि, इसमें छिपे मंत्रों के पूर्ण तांत्रिक लाभों को जाग्रत करने के लिए श्री विद्या में गुरु दीक्षा लाभदायक होती है।

10. अंतिम श्लोक 'श्रीं' से क्यों शुरू होता है?

'श्रीं' लक्ष्मी बीज है और यह पञ्चदशी (15 अक्षरों के मंत्र) को षोडशी (16 अक्षरों के मंत्र) में परिवर्तित करता है। यह परम ऐश्वर्य, पूर्णता और राजराजेश्वरी के सर्वोच्च रूप का प्रतीक है, इसलिए स्तोत्र की पूर्णता 'श्रीं' से होती है।