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Sri Tripura Pratah Bhajanam – श्रीत्रिपुराप्रातर्भजनम्

Sri Tripura Pratah Bhajanam – श्रीत्रिपुराप्रातर्भजनम्
॥ श्रीत्रिपुराप्रातर्भजनम् ॥ प्रातःस्मरामि भजतामभयङ्करं तं पादारविन्दमतिसुन्दरमम्बिकायाः । दुस्स्वप्नदोषहरणं करणं सुखानां सुस्वप्नबोधमखिलौघनिबर्हणञ्च ॥ १ ॥ प्रातःस्मरामि सकलार्थवरप्रदानं पादारविन्दमतिकोमलमम्बिकायाः । इन्द्रादिदिक्पतिविरिञ्चमुकुन्दमौलि- रत्नांशुसूर्यकिरणानुविकासितं तत् ॥ २ ॥ प्रातःस्मरामि सुरधेनुपयोधराय- मानं चतुष्टयकराम्बुजमम्बिकायाः । पुण्ड्रेक्षुचापमदनास्त्रभुजङ्गपाश- रत्नाङ्कुशौकनक(शोज्ज्वलित) कङ्कणभूषणाढ्यम् ॥ ३ ॥ प्रातःस्मरामि पृथिवीजलवह्निवायु- व्योमादिरूपमखिलं च पदारविन्दम् । यद्रेणुमाप्य कमलासनमाधवेशाः कुर्वन्ति विश्वहरणस्थितिसर्गकेलिम् ॥ ४ ॥ प्रातःस्मरामि मुखपङ्कजमन्दहासं मन्दस्मिताधरतिरस्कृतचन्द्रबिम्बम् । याद्दश्यकेन फणिताखिलवेदशास्त्र- त (??) कचक्ररथमङ्गजयोधनस्य (?) ॥ ५ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ यः श्लोकपञ्चकमिदं पठति प्रभाते धर्मादिदं परहितं कथितं हरेण । तस्मै ददाति पदवीमणिमादिरूपां जप्ता (तृप्ता) तपोभिरचलां त्रिपुरा भवानी ॥ ६ ॥ ॥ इति श्रीत्रिपुराप्रातर्भजनं सम्पूर्णम् ॥

श्रीत्रिपुराप्रातर्भजनम् — परिचय एवं दार्शनिक महत्व (Introduction & Philosophical Depth)

श्रीत्रिपुराप्रातर्भजनम् (Sri Tripura Pratah Bhajanam) सनातन धर्म और शाक्त परंपरा (विशेषकर श्री विद्या) का एक अत्यंत जाग्रत और प्रभावशाली स्तोत्र है। हिन्दू धर्म में 'प्रातः स्मरण' (Morning Remembrance) का विशेष महत्व है। निद्रा से जागने के तुरंत बाद हमारा अवचेतन मन (Subconscious mind) अत्यंत ग्रहणशील होता है। उस समय जगन्माता त्रिपुरसुन्दरी का ध्यान करने से संपूर्ण दिन सकारात्मक ऊर्जा, सुरक्षा और दिव्य चेतना से भर जाता है।

इस स्तोत्र की रचना स्वयं भगवान शिव (हर) द्वारा की गई है, जैसा कि स्तोत्र के अंतिम श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है — "कथितं हरेण" (इसे भगवान शिव ने कहा है)। भगवान शिव ने इसे जगत के कल्याण (परहितं) के लिए प्रकट किया है। इस स्तोत्र में पाँच मुख्य श्लोक हैं (श्लोकपञ्चकमिदं), इसलिए इसे त्रिपुरा प्रातः पंचकम् भी कहा जाता है।

स्तोत्र का दार्शनिक स्वरूप: यह स्तोत्र माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी के अलौकिक स्वरूप, उनके चरण कमलों की महिमा और उनके आयुधों (हथियारों) का सुंदर चित्रण करता है। श्लोक 1 और 2 में माता के चरण कमलों का ध्यान किया गया है, जो भक्तों को अभय देने वाले हैं (अभयङ्करं) और जिनकी वंदना ब्रह्मा, विष्णु, और शिव सहित इन्द्र आदि दिक्पाल करते हैं। उनके मुकुट की मणियों की चमक से माता के चरण ऐसे खिल उठते हैं जैसे सूर्य की किरणों से कमल खिलता है।

श्लोक 3 में भगवती के चार हाथों का ध्यान है, जो कामधेनु (सुरधेनु) के समान सब कुछ प्रदान करने वाले हैं। इन हाथों में वे पाश (भुजङ्गपाश), अंकुश (रत्नाङ्कुश), गन्ने का धनुष (पुण्ड्रेक्षुचाप) और पुष्प बाण (मदनास्त्र) धारण करती हैं। श्लोक 4 में अद्वैत वेदांत का सत्य उजागर होता है कि माता के चरण ही पंचमहाभूत — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश (पृथिवीजलवह्निवायुव्योमादिरूपम) — स्वरूप हैं। इन्हीं चरणों की धूल पाकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश सृष्टि के सृजन, पालन और संहार का खेल (केलिम्) रचते हैं।

विशिष्ट महत्व (Significance of the Stotra)

इस स्तोत्र का सबसे विशिष्ट गुण इसकी मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक चिकित्सा (Spiritual Healing) क्षमता है। रात्रि में देखे गए बुरे स्वप्न अक्सर हमारे मन में अज्ञात भय और नकारात्मकता भर देते हैं। यह स्तोत्र पहले ही श्लोक में "दुस्स्वप्नदोषहरणं" कहकर उद्घोषणा करता है कि माता का ध्यान सभी बुरे सपनों के प्रभाव को तत्काल नष्ट कर देता है और सुखों का सृजन (करणं सुखानां) करता है।

इसके अतिरिक्त, यह स्तोत्र हमें यह सिखाता है कि जो शक्ति ब्रह्मांड को चला रही है, वही शक्ति हमारे भीतर भी व्याप्त है। जब हम भोर में पंचमहाभूतों (श्लोक 4) के रूप में भगवती को प्रणाम करते हैं, तो हम प्रकृति के साथ एकाकार हो जाते हैं, जिससे हमारा शारीरिक और मानसिक संतुलन (Tridosha Balance) स्थापित होता है।

स्तोत्र के लाभ — फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)

छठे श्लोक (फलश्रुति) में भगवान शिव ने स्वयं इस स्तोत्र के पाठ से मिलने वाले चमत्कारिक लाभों का वर्णन किया है। जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर इस पंचक का पाठ करता है, उसे निम्नलिखित सिद्धियां और फल प्राप्त होते हैं:

  • दुःस्वप्न नाश (Destroyer of Bad Dreams): "दुस्स्वप्नदोषहरणं" — किसी भी प्रकार के भयानक या अशुभ सपनों का प्रभाव तुरंत समाप्त हो जाता है और दिन आनंदपूर्वक बीतता है।
  • अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति: "तस्मै ददाति पदवीमणिमादिरूपां" — भगवती भवानी प्रसन्न होकर साधक को 'अणिमा' आदि अष्ट सिद्धियों की पदवी प्रदान करती हैं (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व)।
  • सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ति: "सकलार्थवरप्रदानं" — माता के चरण कमल सभी प्रकार के अर्थ (धन, विद्या, सफलता) और वरदान देने में सक्षम हैं।
  • पाप कर्मों का नाश: "अखिलौघनिबर्हणञ्च" — यह ध्यान समस्त पापों के समूह (ओघ) का नाश कर देता है, जिससे अंतःकरण शुद्ध हो जाता है।
  • आंतरिक शांति और तेज: भगवती की मंद मुस्कान (मन्दस्मिताधर) का ध्यान करने से साधक के चेहरे पर भी स्वाभाविक तेज और मन में अथाह शांति छा जाती है।

पाठ विधि एवं ध्यान (Ritual Method & Visualization)

चूंकि यह एक 'प्रातः स्मरण' स्तोत्र है, इसकी पाठ विधि अत्यंत सरल और पूर्णतः मानसिक (Mental worship) है। इसके लिए किसी विशेष बाहरी पूजा-सामग्री की आवश्यकता नहीं होती।

  • समय (Time): प्रातःकाल निद्रा खुलते ही (ब्रह्म मुहूर्त में सुबह 4:00 से 6:00 के बीच) इसे पढ़ें।
  • स्थान और आसन: बिस्तर से पैर नीचे रखने से पूर्व (बिस्तर पर बैठे-बैठे ही) अपनी हथेलियों को देखते हुए या आंखें बंद करके इसका पाठ करें।
  • मानसिक स्नान: यदि आप बिस्तर पर हैं, तो स्नान आवश्यक नहीं है। मन ही मन भगवती के नाम रूपी जल से मानसिक स्नान कर लें और पूर्ण पवित्रता की भावना करें।
  • ध्यान (Visualization): हृदय चक्र में माँ राजराजेश्वरी का ध्यान करें, जिनके चार हाथ हैं, जो लाल वस्त्र धारण किए हैं, और जिनके मुख पर चंद्रमा को लजाने वाली मधुर मुस्कान है।
  • स्पर्श: पाठ पूर्ण होने के बाद अपने दोनों हाथों को रगड़कर आंखों और चेहरे पर फेरें, और उसके बाद ही पृथ्वी माता को प्रणाम करके बिस्तर से नीचे उतरें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्रीत्रिपुराप्रातर्भजनम् स्तोत्र की रचना किसने की है?
इस स्तोत्र के अंतिम श्लोक में स्पष्ट रूप से उल्लेख है — "कथितं हरेण"। अर्थात् इस परम कल्याणकारी स्तोत्र की रचना स्वयं भगवान शिव (हर) ने जगत के कल्याण के लिए की है।
2. 'दुस्स्वप्नदोषहरणं' का क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ है बुरे और अशुभ सपनों के प्रभाव को नष्ट करने वाला। रात्रि में देखे गए डरावने स्वप्न जो मन में व्याकुलता पैदा करते हैं, इस स्तोत्र के पाठ से उनका अशुभ फल और मानसिक संताप दूर हो जाता है।
3. क्या इस पाठ को करने से पहले स्नान करना अनिवार्य है?
नहीं, यह प्रातः स्मरण है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, निद्रा से उठते ही बिस्तर पर बैठे हुए (बिना कुल्ला किए और बिना स्नान किए) इसका मानसिक पाठ किया जाता है। इसे भाव स्नान (शुद्ध भावना) माना जाता है।
4. स्तोत्र में देवी के किन आयुधों का वर्णन है?
श्लोक 3 के अनुसार देवी के चार हाथों में पाश (फंदा), अंकुश (गजांकुश), इक्षु चाप (गन्ने का धनुष) और मदनास्त्र (पांच फूलों के बाण) हैं। ये क्रमशः राग, क्रोध, मन और पंच-तन्मात्राओं के प्रतीक हैं।
5. फलश्रुति में वर्णित 'मणिमादिरूपां' पदवी क्या है?
यहाँ 'मणिमादिरूपां' से तात्पर्य 'अणिमा' आदि अष्ट सिद्धियों से है। भगवान शिव कहते हैं कि इस पंचक का नित्य पाठ करने वाले साधक को अणिमा, महिमा आदि अष्ट सिद्धियों की पदवी स्वतः प्राप्त हो जाती है।
6. श्लोक 4 में पंचमहाभूतों का उल्लेख क्यों है?
श्लोक 4 में देवी के चरणों को 'पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश' का स्वरूप बताया गया है। इसका अर्थ है कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड (दृश्य जगत) माँ के चरणों की ही अभिव्यक्ति है। वे ही प्रकृति और पुरुष की नियंता हैं।
7. ब्रह्मा, विष्णु और महेश सृष्टि का निर्माण कैसे करते हैं?
स्तोत्र के अनुसार, ब्रह्मा, विष्णु और महेश माता त्रिपुरसुन्दरी के चरणों की धूल (यद्रेणुमाप्य) प्राप्त करके ही विश्व की उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और संहार का कार्य करने में समर्थ होते हैं।
8. 'त्रिपुरा' नाम का अर्थ क्या है?
'त्रिपुरा' का अर्थ है जो तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल), तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) और तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) से परे है और इन सबकी स्वामिनी है।
9. क्या यह स्तोत्र श्री विद्या साधना का हिस्सा है?
हाँ, यह श्री विद्या (Sri Vidya) परंपरा का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है। श्री विद्या के साधक अपनी दैनिक नित्य-कर्म साधना की शुरुआत 'प्रातः स्मरण' से ही करते हैं, जिसमें यह स्तोत्र अत्यंत उपयोगी है।
10. 'त्रिपुराप्रातर्भजनम्' और 'त्रिपुरसुन्दरी प्रातः स्मरणम्' में क्या अंतर है?
दोनों का उद्देश्य प्रातःकाल भगवती का ध्यान करना है, किंतु उनकी रचना और श्लोक भिन्न हैं। 'त्रिपुरसुन्दरी प्रातः स्मरणम्' (प्रातः स्मरामि शरदिन्दुकरोज्ज्वलाभां...) आदि शंकराचार्य या अन्य आचार्यों की रचना हो सकती है, जबकि यह विशिष्ट 5 श्लोकों वाला स्तोत्र (प्रातःस्मरामि भजतामभयङ्करं) शिव द्वारा रचित आगमोक्त स्तोत्र है।