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Sri Tripada Gayatri Panchangam (Rudrayamala Tantra) – श्री त्रिपदा गायत्री पञ्चाङ्गम् (रुद्रयामल तन्त्र)

Sri Tripada Gayatri Panchangam (Rudrayamala Tantra) – श्री त्रिपदा गायत्री पञ्चाङ्गम् (रुद्रयामल तन्त्र)
॥ श्री त्रिपदा गायत्री पञ्चाङ्गम् (स्तवराजः) ॥
(रुद्रयामल तन्त्रे गायत्री रहस्ये भैरव-पार्वती संवादे)
॥ भैरव उवाच ॥श‍ृणु देवि प्रवक्ष्यामि गायत्रीतत्त्वमुत्तमम् । स्तोमं मन्त्रमयं नाम सर्वतन्त्रेषु गोपितम् ॥ १॥ अङ्गपञ्चाङ्गमीशानि महापातकनाशनम् । पुण्यप्रदं वेदसारं सर्वतत्त्वोत्तमोत्तमम् ॥ २॥ परमार्थाभिख्यातस्य स्तोत्रस्यास्ति ऋषिः शिवः । त्रिष्टुप् छन्दो महादेवि त्रिपदी देवता स्मृता ॥ ३॥ तारं बीजं शिरः शक्तिः स्वर्गं कीलकमीश्वरि । धर्मार्थकाममोक्षार्थे विनियोग इति स्मृतः ॥ ४॥ ॥ विनियोगः ॥अस्य श्रीत्रिपदागायत्रीस्तवराजस्य शिव ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, त्रिपदागायत्रीदेवता, ॐ बीजं, शिवः शक्तिः, खं गं कीलकं। मम धर्मार्थकाममोक्षार्थे पाठे विनियोगः ॥ (जल छोड़ें) ॥ ऋष्यादिन्यासः ॥शिवऋषये नमः (शिरसि), त्रिष्टप्छन्दसे नमः (मुखे), त्रिपदागायत्रीदेवतायै नमः (हृदये), ॐ बीजाय नमः (गुह्ये), शिवःशक्तये नमः (पादयोः), खं गं कीलकाय नमः (नाभौ), विनियोगाय नमः (सर्वाङ्गे) । ॥ ध्यानम् ॥चतुर्भुजामर्कसहस्रकोटिभां त्रिलोचनां हारकिरीटशोभिताम् । कपालखट्वाङ्गधरां महोज्ज्वलां श्रुतीश्वरी पञ्चमुखीं भजाम्यहम् ॥ १॥ विविधमणिमयूरवैः स्फीतकेयूरहारां प्रवरकनककाञ्चीकिङ्किणीकिङ्किणाढ्याम् । सकलभुवनरक्षासृष्टिसंहारकर्त्रीं निगमपरमविद्यामाश्रये वेदधात्रीम् ॥ २॥ ॥ स्तोत्रम् ॥प्रणवं मनुराजमौलिरत्नोपरि देवेश्वरि वेदसागरोत्थाम् । प्रजये हृदये दयः समुद्रः सततं ब्रह्मविदीश्वरो भवेद्य एकः ॥ ३॥ शङ्का भवेच्चैव विहाय शङ्का कङ्कालमालाभरणो निशीथे । कृशानुभानुप्रभया समानो विमानचारी स भवेत समानः ॥ ४॥ नृबीजमन्तः शिवशक्तिरूपं विभोर्जपेद्यः त्रिपदीरहस्यम् । स कामुकः कामकलाविदग्धो भवेत्तु रम्भाङ्गविलासभागी ॥ ५॥ त्रिकूटबीजं तव मन्त्रमध्ये जपेद्भवानि स्मरतप्तचेता । स मीनकामांश्च निदाघमेधो भवेद्भुवो भूपबुधो जनेन्द्रः ॥ ६॥ स्मरजपेद्यः परमार्थपथ्यां निर्वाणपथ्यां तव पञ्चवक्त्रे । समस्तलोकाधिपतिः पुरेऽसौ भवेत्परानुग्रहभाजनं सः ॥ ७॥ परां जपेद्यः परमार्थतथ्यां निर्वाणरथ्यां तव पञ्चवक्त्रे । सुलोचनांलोचनवीक्षणोरु प्रभावपीयूषरसाकुलात्मा ॥ ८॥ लक्ष्मीं जपेद्यः परवर्गभीतः श्मशानभूमौ शिववेषधारी । तस्यै (-व) वश्या कमलाकरस्था या विष्णुपत्नी कमलाकरस्था ॥ ९॥ वाणी यदा कण्ठजले जपेद्यो दशायुतं दुर्दशयाभिभूतः । स वैरिवर्ग समरे निहत्य भवेद्भवानीतनयो दिवेन्द्रः ॥ १०॥ भीमां जपेद्यो वरतान्तकाले नितान्तमम्भोजदलासनस्थः । स भीमरूपोऽरिकुलं विहन्यादन्ते लभेत्कामपदं त्रिपाद्याः ॥ ११॥ मन्त्र जपेद्यः शुचिरर्चनायां चतुर्भुजे हव्यभुजः समक्षम् । स गाणपत्यं प्रतिपद्य देव्यास्तथा भवेद्विश्वनृपाधिनाथः ॥ १२॥ गायत्रीत्यभिधाक्षरत्रयमिदं वेदार्थतत्त्वं परं यो ध्यायेद्धृदयारविन्दकुहरे प्रातर्निशीथेऽथवा । चैनाचारविचारमार्गनिपुणो वेदान्तसारोद्धृतं प्रोद्भूतागमतत्त्ववित्तु त्रिपदीधाम स्वयं यास्यति ॥ १३॥ रमा (सुयोगी) गिरिगह्वरान्ते जपेद्गिरीशाङ्कपतेः समीपे । स योगिगम्यो गुरुगर्वहारी गिरां भवेदिन्द्रसमुच्चिताघ्रिः ॥ १४॥ मायां जपेद्यः स्मरयुक्तचेता जटाकिरीटेन्दुकले तवाग्रे । स वैष्णवेन्दौ सुरनाथमौलिः स्फुरन्मणिज्योतिविराजिताङ्घ्रिः ॥ १५॥ मा बीजमिन्दुस्फुरतोर्ध्वबीजं जपेन्निशीथे शीर्षासनस्थः । यो वीरमातैकपरः स सद्यो भवेद्धरायां नृपसार्वभौमः ॥ १६॥ मायायुगं यः प्रजपेद्रतादौ नारीमुखासक्तमुखो निशीथे । स लोकपालार्चितपादपद्मो भवेद्भवान्ते भुवनाधि नाथः ॥ १७॥ वाणी जपेद्यो जडभावयुक्तो वेदान्ततत्त्वैकपरो भवेच्च । तस्यास्यपद्मे वसतिं विधाय ननर्त्ति वाणी विदुषां सभायाम् ॥ १८॥ यो वायुपूज्यां सुरतावसाने जपेन्निशीथे शशिखण्डचूडे । स वायुपूज्यो बलवान् प्रयाति तद्धाम सत्यं त्रिदिवेन्द्रतुल्यः ॥ १९॥ कान्तार्णमन्तर्जपते स्मरान्ते यो वेदमातर्दिवसावसाने । वश्यो वशी तस्य पदारविन्दे सुश्रूषमाणो भवता भवन्ति ॥ २०॥ मन्त्रान्तरस्थं ठद्वयं जपेद्यस्तेजोरूपं साधकसाधकेशि । तस्याप्यास्ये भारती तस्य हस्ते लक्ष्मीः कुर्याद्वास आकल्पकालम् ॥ २१॥ भूगेहवृत्तस्रयषोडशार नानास्त्रदिक्कोणयुगानि विन्दौ । निषेदुषीं शीधुरसाकुलाक्षी ज्यक्षीं त्रिवर्णां त्रिपदां भजामि ॥ २२॥ देवि त्रैलोक्यमातर्लगुडवरकरे पुष्पमालावतंसे नानारत्नप्रभाढ्ये त्रिनयनविलसत्सूर्यचन्द्राग्निनेत्रे । पीठे वै पञ्चवक्त्रे वलयमणिविभाभासुरे नूपुराढ्ये श्रीमन्नीलोत्पलाभे त्रिभुवनहृदये वेदमातः प्रसीद ॥ २३॥ इति स्तोत्रं पुण्यं परममनुमयतत्त्वसहितं पठेद्वा गायत्रीं निशि कुजदिने वापि सततम् । पठेद्वाऽसौ दान्तः सकलमपि शास्त्रं गमयति लभेल्लक्ष्मीं प्रान्ते परमपदवीमातृकामपि ॥ २४॥ ॥ उपसंहार ॥एतद्देवीपञ्चाङ्गं सर्व सारमनुत्तमम् । गायत्र्यास्तत्त्वमीशानि चतुर्वेदरहस्यकम् ॥ २६॥ सर्वसारमयं सिद्धिप्रदं भोगापवर्गदम् । सर्वतन्त्रेषु गुप्तं च महादिव्यं महापदम् ॥ २७॥ न दातव्यमभक्ताय कुचैलाय दुरात्मने । अन्यशिष्याय नो देयं दत्त्वा निरयमाप्नुयात् ॥ २८ ॥ शिष्याय शुद्धमनसे गुरुभक्ताय पार्वति । दीक्षिताय कुलीनाय देयं साधकसत्तमे ॥ २९॥ इतीदं देवि गायत्र्यास्तत्त्वसाररहस्यकम् । गुह्यं गोप्यं न दातव्यं गोपनीयं प्रयत्नतः ॥ ३०॥
॥ इति श्री रुद्रयामलतन्त्रे गायत्रीरहस्ये त्रिपदा गायत्री पञ्चाङ्गं सम्पूर्णम् ॥

श्री त्रिपदा गायत्री पञ्चाङ्गम् - एक विस्तृत परिचय

श्री त्रिपदा गायत्री पञ्चाङ्गम् (Sri Tripada Gayatri Panchangam), जिसे 'त्रिपदा गायत्री स्तवराज' के नाम से भी जाना जाता है, तन्त्र शास्त्र के अत्यंत प्रतिष्ठित ग्रन्थ 'रुद्रयामल तन्त्र' (Rudrayamala Tantra) के 'गायत्री रहस्य' अध्याय से लिया गया है। यह स्तोत्र साक्षात् भगवान भैरव और शक्ति स्वरूपा देवी पार्वती के मध्य हुआ एक परम गोपनीय संवाद है। तन्त्र के क्षेत्र में गायत्री साधना को अत्यंत उग्र और शीघ्र फलदायी माना गया है, और यह 'पञ्चाङ्ग' उसी साधना की आधारशिला है।

'पञ्चाङ्ग' शब्द यहाँ अत्यंत अर्थपूर्ण है। तान्त्रिक परंपरा में किसी भी देवता की पूर्ण साधना के पांच अंग अनिवार्य होते हैं: पटल (पद्धति), कवच, सहस्रनाम, हृदय और स्तोत्र। यह 'अङ्ग पञ्चाङ्ग' इन सभी का सार अपने भीतर समेटे हुए है। भगवान भैरव स्वयं कहते हैं कि यह स्तोत्र 'मन्त्रमय' है और सभी तन्त्रों में अत्यंत गोपनीय (गोपितं सर्वतन्त्रेषु) रखा गया है ताकि अयोग्य लोग इसका दुरुपयोग न कर सकें।

इस स्तोत्र की अद्वितीयता इसमें निहित 'त्रिपदा' रहस्य में है। गायत्री मन्त्र के तीन मुख्य चरण—तत्सवितुर्वरेण्यं, भर्गो देवस्य धीमहि, और धियो यो नः प्रचोदयात्—तीन महान शक्तियों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और तीन लोकों के प्रतीक हैं। 'त्रिपदा गायत्री पञ्चाङ्गम्' इन तीनों चरणों की शक्ति को साधक के भीतर जाग्रत करने का विज्ञान है। यह स्तोत्र साधक को मात्र भौतिक सुखों तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे 'परमार्थ' (Paramartha) अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है।

रुद्रयामल तन्त्र के अनुसार, यह स्तोत्र उन साधकों के लिए एक 'ब्रह्मास्त्र' है जो जीवन के घनघोर संकटों, महापातकों (महापाप) और मानसिक अवरोधों से घिरे हुए हैं। इसके पाठ से न केवल पापों का क्षय होता है, बल्कि साधक की चेतना का विस्तार होता है, जिससे वह साक्षात् 'वेदमाता' के विराट् स्वरूप का अनुभव करने में सक्षम होता है।

विशिष्ट महत्व और तान्त्रिक रहस्य

रुद्रयामल तन्त्र के इस स्तवराज का महत्व इसके प्रयोगात्मक पक्ष में निहित है, जो इसे अन्य साधारण स्तोत्रों से भिन्न बनाता है:

  • निशीथ साधना (Midnight Worship): श्लोक ४ और १७ में 'निशीथ' (अर्धरात्रि) का विशेष उल्लेख है। तन्त्र शास्त्र के अनुसार, अर्धरात्रि में जब बाहरी कोलाहल शांत होता है, तब गायत्री के बीजों का कंपन साधक की सुषुम्ना नाड़ी को सीधे प्रभावित करता है।

  • बीज मन्त्रों का विन्यास: स्तोत्र में नृबीज, त्रिकूट बीज, लक्ष्मी बीज (रमा), और माया बीज (ह्रीं) के रहस्यों का उद्घाटन किया गया है। ये बीज मन्त्र साधक के शरीर में ऊर्जा के विशिष्ट केंद्र जाग्रत करते हैं।

  • वाक सिद्धि और सरस्वती वास: श्लोक १८ में कहा गया है कि जो जड़ भाव से मुक्त होकर इसका पाठ करता है, उसके मुख-कमल में साक्षात् वाणी (सरस्वती) वास करती है। यह वक्ताओं और कवियों के लिए सर्वोत्तम साधना है।

  • कपाल-खट्वाङ्ग धारण: ध्यान श्लोक में माँ गायत्री को 'कपालखट्वाङ्गधरां' कहा गया है, जो उनके अत्यंत उग्र और तान्त्रिक 'भैरवी' स्वरूप को दर्शाता है। यह स्वरूप संहार और नव-सृजन दोनों का प्रतीक है।

फलश्रुति लाभ (Divine Benefits)

भगवान भैरव ने इस स्तोत्र की फलश्रुति में अमोघ लाभों का वर्णन किया है:
१. महापातक और ऋण नाश
'महापातकनाशनम्'—अर्थात् वह पाप जिनका प्रायश्चित कठिन है, वे भी इस पञ्चाङ्ग साधना से भस्म हो जाते हैं। इसके साथ ही यह साधक को दरिद्रता और ऋण के बोझ से मुक्त करता है।
२. राज्य, ऐश्वर्य और प्रभुत्व
श्लोक ६ और १६ के अनुसार, जो साधक निशीथ में पाठ करता है, वह धरा पर 'नृपसार्वभौम' (चक्रवर्ती सम्राट) के समान सम्मान और ऐश्वर्य प्राप्त करता है। उसे समाज में सर्वोच्च प्रतिष्ठा मिलती है।
३. शत्रु और भय पर विजय
'वैरिवर्ग समरे निहत्य'—यह स्तोत्र युद्ध, विवाद और मुकदमों में साधक को अपराजित रखता है। शत्रुओं की बुरी बुद्धि का स्तम्भन कर उन्हें वश में कर देता है।
४. भोग और मोक्ष का संगम
यह स्तोत्र 'भोगापवर्गदम्' है। यह साधक को जीवन भर समस्त सांसारिक सुख (भोग) प्रदान करता है और अंत में 'परमपद' (निर्वाण) की ओर ले जाता है।

पाठ विधि और अनुष्ठान नियम (Ritual Guide)

रुद्रयामल तन्त्र के इस 'स्तवराज' का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित मर्यादाओं का पालन आवश्यक है:
  • समय: प्रातः काल सन्ध्या या निशीथ काल (रात्रि ९ से १२ के बीच) सर्वश्रेष्ठ है। 'कुजदिने' (मंगलवार) को पाठ करने से मंगल ग्रह की अनुकूलता प्राप्त होती है।
  • न्यास: विनियोग के बाद ऋष्यादिन्यास और कर-हृदयादिन्यास अवश्य करें। यह आपके शरीर को माँ गायत्री की तान्त्रिक ऊर्जा को सहने योग्य बनाता है।
  • आसन: लाल या पीला ऊनी आसन उपयोग करें। मुख पूर्व दिशा (सांसारिक लाभ हेतु) या उत्तर दिशा (आध्यात्मिक लाभ हेतु) रखें।
  • ध्यान: पञ्चमुखी माँ गायत्री का ध्यान करें जो अपने चार हाथों में कपाल, खट्वाङ्ग और अन्य शस्त्र धारण किए हुए हैं।
  • गोपनीयता: भगवान भैरव ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि इसे किसी अयोग्य, अभक्त या अन्य गुरु के शिष्य को न दें। यह केवल सुपात्र और गुरुभक्त साधक के लिए है।
विशेष टिप: यदि आप किसी बड़ी समस्या से जूझ रहे हैं, तो मंगलवार को ११ पाठ का संकल्प लें और पाठ के बाद किसी ब्राह्मण को दान दें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. 'त्रिपदा' गायत्री का वास्तव में क्या अर्थ है?

गायत्री मन्त्र के तीन चरण (Foot) होते हैं। तन्त्र में ये 'त्रिगुणा' (सत्, रज, तम) और 'त्रिलोक' का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। तीन चरणों वाली होने के कारण माँ को त्रिपदा कहा जाता है।

2. क्या यह स्तोत्र सामान्य गायत्री मन्त्र से अलग है?

यह मन्त्र नहीं, बल्कि मन्त्र का 'स्तवराज' (राजा के समान शक्तिशाली स्तुति) है। यह गायत्री मन्त्र की सोई हुई तान्त्रिक शक्तियों को जाग्रत करने का कार्य करता है।

3. 'कङ्कालमालाभरणो' शब्द का प्रयोग शिव जी के लिए क्यों हुआ है?

तान्त्रिक गायत्री साधना में साधक को शिव स्वरूप (भैरव) होकर माँ की आराधना करनी पड़ती है। यह अहंकार के विनाश और परम वैराग्य का प्रतीक है।

4. क्या स्त्रियाँ इस तान्त्रिक पञ्चाङ्ग का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, रुद्रयामल तन्त्र में शिव जी ने माता पार्वती को ही इसका उपदेश दिया है। पूरी शुचिता और श्रद्धा के साथ स्त्रियाँ इसका पाठ कर सकती हैं।

5. 'गाणपत्यं' पद मिलने का क्या तात्पर्य है?

गाणपत्य का अर्थ है देवी के गणों (शक्तियों) का स्वामी बनना। अर्थात् साधक को वह शक्तियाँ प्राप्त होती हैं जो देवताओं की सेना के पास होती हैं।

6. क्या पाठ के लिए दीक्षा अनिवार्य है?

भैरव जी ने 'दीक्षिताय' शब्द का प्रयोग किया है (श्लोक २९)। अतः किसी योग्य गुरु से दीक्षा लेकर पाठ करना करोड़ों गुना अधिक फलदायी होता है।

7. क्या यह स्तोत्र रोगों से रक्षा करता है?

हाँ, इसमें वर्णित ऊर्जा साधक के शरीर की नाड़ियों को शुद्ध करती है, जिससे दीर्घकालिक और कष्टदायक रोगों में शांति मिलती है।

8. 'चैनाचार' (Chayanachara) का यहाँ क्या संदर्भ है?

यह तान्त्रिक आचार (पद्धति) का एक विशेष मार्ग है, जो साधक को वेदान्त के सार और मन्त्रों की क्रियाशीलता को समझने में मदद करता है।

9. क्या इसके पाठ से बुद्धि की जड़ता समाप्त होती है?

श्लोक १८ स्पष्ट कहता है कि 'जडभावयुक्त' व्यक्ति भी यदि इसका पाठ करे, तो वह महान विद्वान् बन जाता है।

10. इसे 'सर्वतन्त्रेषु गोपितं' क्यों कहा गया है?

क्योंकि इसमें मन्त्रों के उत्कीलन के ऐसे गुप्त सूत्र हैं जो अनधिकारी के हाथ लगने पर आध्यात्मिक ऊर्जा का असंतुलन पैदा कर सकते हैं।