Sri Tripada Gayatri Panchangam (Rudrayamala Tantra) – श्री त्रिपदा गायत्री पञ्चाङ्गम् (रुद्रयामल तन्त्र)

श्री त्रिपदा गायत्री पञ्चाङ्गम् - एक विस्तृत परिचय
श्री त्रिपदा गायत्री पञ्चाङ्गम् (Sri Tripada Gayatri Panchangam), जिसे 'त्रिपदा गायत्री स्तवराज' के नाम से भी जाना जाता है, तन्त्र शास्त्र के अत्यंत प्रतिष्ठित ग्रन्थ 'रुद्रयामल तन्त्र' (Rudrayamala Tantra) के 'गायत्री रहस्य' अध्याय से लिया गया है। यह स्तोत्र साक्षात् भगवान भैरव और शक्ति स्वरूपा देवी पार्वती के मध्य हुआ एक परम गोपनीय संवाद है। तन्त्र के क्षेत्र में गायत्री साधना को अत्यंत उग्र और शीघ्र फलदायी माना गया है, और यह 'पञ्चाङ्ग' उसी साधना की आधारशिला है।
'पञ्चाङ्ग' शब्द यहाँ अत्यंत अर्थपूर्ण है। तान्त्रिक परंपरा में किसी भी देवता की पूर्ण साधना के पांच अंग अनिवार्य होते हैं: पटल (पद्धति), कवच, सहस्रनाम, हृदय और स्तोत्र। यह 'अङ्ग पञ्चाङ्ग' इन सभी का सार अपने भीतर समेटे हुए है। भगवान भैरव स्वयं कहते हैं कि यह स्तोत्र 'मन्त्रमय' है और सभी तन्त्रों में अत्यंत गोपनीय (गोपितं सर्वतन्त्रेषु) रखा गया है ताकि अयोग्य लोग इसका दुरुपयोग न कर सकें।
इस स्तोत्र की अद्वितीयता इसमें निहित 'त्रिपदा' रहस्य में है। गायत्री मन्त्र के तीन मुख्य चरण—तत्सवितुर्वरेण्यं, भर्गो देवस्य धीमहि, और धियो यो नः प्रचोदयात्—तीन महान शक्तियों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और तीन लोकों के प्रतीक हैं। 'त्रिपदा गायत्री पञ्चाङ्गम्' इन तीनों चरणों की शक्ति को साधक के भीतर जाग्रत करने का विज्ञान है। यह स्तोत्र साधक को मात्र भौतिक सुखों तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे 'परमार्थ' (Paramartha) अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है।
रुद्रयामल तन्त्र के अनुसार, यह स्तोत्र उन साधकों के लिए एक 'ब्रह्मास्त्र' है जो जीवन के घनघोर संकटों, महापातकों (महापाप) और मानसिक अवरोधों से घिरे हुए हैं। इसके पाठ से न केवल पापों का क्षय होता है, बल्कि साधक की चेतना का विस्तार होता है, जिससे वह साक्षात् 'वेदमाता' के विराट् स्वरूप का अनुभव करने में सक्षम होता है।
विशिष्ट महत्व और तान्त्रिक रहस्य
रुद्रयामल तन्त्र के इस स्तवराज का महत्व इसके प्रयोगात्मक पक्ष में निहित है, जो इसे अन्य साधारण स्तोत्रों से भिन्न बनाता है:
निशीथ साधना (Midnight Worship): श्लोक ४ और १७ में 'निशीथ' (अर्धरात्रि) का विशेष उल्लेख है। तन्त्र शास्त्र के अनुसार, अर्धरात्रि में जब बाहरी कोलाहल शांत होता है, तब गायत्री के बीजों का कंपन साधक की सुषुम्ना नाड़ी को सीधे प्रभावित करता है।
बीज मन्त्रों का विन्यास: स्तोत्र में नृबीज, त्रिकूट बीज, लक्ष्मी बीज (रमा), और माया बीज (ह्रीं) के रहस्यों का उद्घाटन किया गया है। ये बीज मन्त्र साधक के शरीर में ऊर्जा के विशिष्ट केंद्र जाग्रत करते हैं।
वाक सिद्धि और सरस्वती वास: श्लोक १८ में कहा गया है कि जो जड़ भाव से मुक्त होकर इसका पाठ करता है, उसके मुख-कमल में साक्षात् वाणी (सरस्वती) वास करती है। यह वक्ताओं और कवियों के लिए सर्वोत्तम साधना है।
कपाल-खट्वाङ्ग धारण: ध्यान श्लोक में माँ गायत्री को 'कपालखट्वाङ्गधरां' कहा गया है, जो उनके अत्यंत उग्र और तान्त्रिक 'भैरवी' स्वरूप को दर्शाता है। यह स्वरूप संहार और नव-सृजन दोनों का प्रतीक है।
फलश्रुति लाभ (Divine Benefits)
पाठ विधि और अनुष्ठान नियम (Ritual Guide)
- समय: प्रातः काल सन्ध्या या निशीथ काल (रात्रि ९ से १२ के बीच) सर्वश्रेष्ठ है। 'कुजदिने' (मंगलवार) को पाठ करने से मंगल ग्रह की अनुकूलता प्राप्त होती है।
- न्यास: विनियोग के बाद ऋष्यादिन्यास और कर-हृदयादिन्यास अवश्य करें। यह आपके शरीर को माँ गायत्री की तान्त्रिक ऊर्जा को सहने योग्य बनाता है।
- आसन: लाल या पीला ऊनी आसन उपयोग करें। मुख पूर्व दिशा (सांसारिक लाभ हेतु) या उत्तर दिशा (आध्यात्मिक लाभ हेतु) रखें।
- ध्यान: पञ्चमुखी माँ गायत्री का ध्यान करें जो अपने चार हाथों में कपाल, खट्वाङ्ग और अन्य शस्त्र धारण किए हुए हैं।
- गोपनीयता: भगवान भैरव ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि इसे किसी अयोग्य, अभक्त या अन्य गुरु के शिष्य को न दें। यह केवल सुपात्र और गुरुभक्त साधक के लिए है।