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Sri Gayatri Kavacham Alabhya – अलभ्य श्री गायत्री कवच (चतुष्पाद गायत्री सहित)

Sri Gayatri Kavacham Alabhya – अलभ्य श्री गायत्री कवच (चतुष्पाद गायत्री सहित)
॥ श्री गायत्री कवचम् अलभ्यम् ॥
(कवच सहिता चतुष्पाद गायत्री)
॥ विनियोगः ॥ॐ अस्य श्रीगायत्रीकवचस्य ब्रह्माविष्णुरुद्राः ऋषयः । ऋग्यजुःसामाथर्वाणि छन्दांसि । परब्रह्मस्वरूपिणी गायत्री देवता । भूः बीजम् । भुवः शक्तिः । स्वः कीलकम् । चतुर्विंशत्यक्षरा श्रीगायत्रीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः । (जल छोड़ें) ॥ ध्यानम् ॥वस्त्राभां कुण्डिकां हस्तां, शुद्धनिर्मलज्योतिषीम् । सर्वतत्त्वमयीं वन्दे, गायत्रीं वेदमातरम् ॥ मुक्ताविद्रुमहेमनीलधवलैश्छायैः मुखेस्त्रीक्षणैः । युक्तामिन्दुनिबद्धरत्नमुकुटां तत्त्वार्थवर्णात्मिकाम् ॥ गायत्रीं वरदाभयाङ्कुशकशां शूलं कपालं गुणैः । शङ्खं चक्रमथारविन्दयुगलं हस्तैर्वहन्तीं भजे ॥ ॥ कवच पाठः (न्यासात्मक कवच) ॥ॐ ॐ ॐ ॐ भूः ॐ ॐ भुवः ॐ ॐ स्वः ॐ ॐ त ॐ ॐ त्स ॐ ॐ वि ॐ ॐ तु ॐ ॐ र्व ॐ ॐ रे ॐ ॐ ण्यं ॐ ॐ भ ॐ ॐ र्गो ॐ ॐ दे ॐ ॐ व ॐ ॐ स्य ॐ ॐ धी ॐ ॐ म ॐ ॐ हि ॐ ॐ धि ॐ ॐ यो ॐ ॐ यो ॐ ॐ नः ॐ ॐ प्र ॐ ॐ चो ॐ ॐ द ॐ ॐ या ॐ ॐ त् ॐ ॐ । ॥ शरीर-न्यास (अंग-रक्षा) ॥ॐ ॐ ॐ ॐ भूः ॐ पातु मे मूलं चतुर्दलसमन्वितम् । ॐ भुवः ॐ पातु मे लिङ्गं सज्जलं षट्दलात्मकम् । ॐ स्वः ॐ पातु मे कण्ठं साकाशं दलषोडशम् । ॐ त ॐ पातु मे रूपं ब्राह्मणं कारणं परम् । ॐ त्स ॐ ब्रह्मरसं पातु मे सदा मम । ॐ वि ॐ पातु मे गन्धं सदा शिशिरसंयुतम् । ॐ तु ॐ पातु मे स्पर्शं शरीरस्य कारणं परम् । ॐ र्व ॐ पातु मे शब्दं शब्दविग्रहकारणम् । ॐ रे ॐ पातु मे नित्यं सदा तत्त्वशरीरकम् । ॐ ण्यं ॐ पातु मे अक्षं सर्वतत्त्वैककारणम् । ॐ भ ॐ पातु मे श्रोत्रं शब्दश्रवणैककारणम् । ॐ र्गो ॐ पातु मे घ्राणं गन्धोत्पादानकारणम् । ॐ दे ॐ पातु मे चास्यं सभायां शब्दरूपिणीम् । ॐ व ॐ पातु मे बाहुयुगलं च कर्मकारणम् । ॐ स्य ॐ पातु मे लिङ्गं षट्दलयुतम् । ॐ धी ॐ पातु मे नित्यं प्रकृति शब्दकारणम् । ॐ म ॐ पातु मे नित्यं नमो ब्रह्मस्वरूपिणीम् । ॐ हि ॐ पातु मे बुद्धिं परब्रह्ममयं सदा । ॐ धि ॐ पातु मे नित्यमहङ्कारं यथा तथा । ॐ यो ॐ पातु मे नित्यं जलं सर्वत्र सर्वदा । ॐ यो ॐ पातु मे नित्यं जलं सर्वत्र सर्वदा । ॐ नः ॐ पातु मे नित्यं तेजःपुञ्जो यथा तथा । ॐ प्र ॐ पातु मे नित्यमनिलं कायकारणम् । ॐ चो ॐ पातु मे नित्यमाकाशं शिवसन्निभम् । ॐ द ॐ पातु मे जिह्वां जपयज्ञस्य कारणम् । ॐ यात् ॐ पातु मे नित्यं शिवं ज्ञानमयं सदा । ॐ तत्त्वानि पातु मे नित्यं, गायत्री परदैवतम् । कृष्णं मे सततं पातु, ब्रह्माणि भूर्भुवः स्वरोम् ॥ ॥ महामन्त्र जप ॥ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । ॥ वैदिक प्रार्थना एवं शान्ति पाठ ॥ॐ जातवेदसे सुनवाम सोममाराती यतो निदहाति वेदाः । स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेवं सिन्धुं दुरितात्यग्निः ॥ ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । ऊर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥ ॐ नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परो रजसेऽसावदों मा प्रापत ॥
॥ इति कवचसहिता चतुष्पादगायत्री सम्पूर्णा ॥

अलभ्य श्री गायत्री कवच - विस्तृत परिचय

श्री गायत्री कवच (अलभ्य), जिसे 'चतुष्पाद गायत्री कवच' भी कहा जाता है, तन्त्र शास्त्र की एक परम गोपनीय धरोहर है। संस्कृत में 'अलभ्य' का अर्थ है वह जो सामान्यतः अप्राप्य हो। यह कवच अन्य साधारण स्तोत्रों से इसलिए भिन्न है क्योंकि यह केवल स्तुति नहीं, बल्कि एक उच्च स्तरीय मन्त्र-विज्ञान (Mantra Science) है। इसमें गायत्री मन्त्र के २४ अक्षरों को बीजाक्षरों के रूप में प्रयोग कर शरीर के रोम-रोम की रक्षा का विधान किया गया है।

प्राचीन काल में ऋषियों ने अनुभव किया कि नकारात्मक ऊर्जाएँ मनुष्य के कमजोर अंगों या चक्रों के माध्यम से प्रविष्ट होती हैं। इस समस्या के समाधान हेतु उन्होंने 'न्यास' (Nyasa) की पद्धति विकसित की। अलभ्य गायत्री कवच इसी न्यास पद्धति का शिखर है। इसमें साधक अपने शरीर के प्रत्येक सूक्ष्म केंद्र (जैसे- मूल, लिंग, कंठ) और इन्द्रियों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) को गायत्री की महाशक्ति से अभिमंत्रित कर लेता है।

इस कवच का एक अन्य रहस्य इसका 'चतुष्पाद' होना है। सामान्यतः गायत्री मन्त्र में तीन चरण (पाद) होते हैं, परन्तु तान्त्रिक और वेदान्तिक साधनाओं में एक चौथा पद (परो रजसे...) भी जोड़ा जाता है, जो माया से परे 'तुरीय' अवस्था का प्रतीक है। यह कवच साधक को भौतिक सुरक्षा के साथ-साथ आत्म-ज्ञान की ओर भी प्रेरित करता है, जिससे वह साक्षात् 'ब्रह्ममय' अनुभव करने लगता है।

विशिष्ट महत्व और तान्त्रिक विज्ञान

अलभ्य गायत्री कवच का महत्व इसके बहुआयामी प्रभावों में निहित है, जो स्थूल शरीर से लेकर चेतना की गहराइयों तक कार्य करते हैं:

  • षट्चक्रों का शोधन: कवच में 'मूलाधार', 'स्वाधिष्ठान' और 'विशुद्धि' चक्रों की रक्षा हेतु विशिष्ट बीजों का उल्लेख है। यह कुण्डलिनी ऊर्जा के उर्ध्वगमन (Rising) के लिए मार्ग प्रशस्त करता है।

  • पंचमहाभूतों पर विजय: नामों के माध्यम से पृथ्वी (गंध), जल (रस), अग्नि (रूप), वायु (स्पर्श) और आकाश (शब्द) के अधिपति तत्वों को जाग्रत किया जाता है, जिससे प्रकृति की बाधाएं साधक के अनुकूल होने लगती हैं।

  • अभेद्य सुरक्षा (Shield of Light): न्यास के कम्पनों से साधक के चारों ओर एक 'दिव्य प्रकाश' का गोला निर्मित होता है, जो तान्त्रिक अभिचार (Black Magic), नजर दोष और नकारात्मक विचारों से अभेद्य ढाल प्रदान करता है।

  • त्रिमूर्ति ऋषि संगम: इस कवच के ऋषि साक्षात् ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं। इसका अर्थ है कि इसमें सृजन, पालन और संहार—तीनों शक्तियों का पूर्ण संतुलन है।

फलश्रुति लाभ: अभय और आत्मसिद्धि

इस दुर्लभ कवच के पाठ से प्राप्त होने वाले लाभ अनुभवसिद्ध और शास्त्रोक्त हैं:
१. पूर्ण शारीरिक और मानसिक रक्षा
कवच का न्यास साधक के शरीर को मन्त्रमय बना देता है। यह बाहरी शत्रुओं के प्रहार और आन्तरिक विकारों (क्रोध, मोह, लोभ) से रक्षा कर मन को 'वज्र' के समान दृढ़ बनाता है।
२. इन्द्रिय संयम और तेज की प्राप्ति
ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की रक्षा के माध्यम से साधक अपनी ऊर्जा को व्यर्थ बहने से रोकता है। इससे उसके मुख मण्डल पर अलौकिक 'ब्रह्म-तेज' प्रकट होता है।
३. सर्वत्र विजय और अनुकूलता
श्लोक के अनुसार, सभा में 'शब्दरूपिणी' माँ वाणी की रक्षा करती हैं, जिससे साधक के वचन प्रभावशाली होते हैं और उसे शास्त्रार्थ, व्यापार तथा राजकीय कार्यों में सफलता मिलती है।
४. अकाल मृत्यु से मुक्ति
अंत में महामृत्युञ्जय मन्त्र का संगम इस कवच को और भी उग्र बना देता है, जो साधक को अकाल मृत्यु के भय से मुक्त कर आरोग्य और पूर्ण आयु प्रदान करता है।

पाठ विधि और न्यास विज्ञान (Ritual Guide)

अलभ्य गायत्री कवच का पाठ तान्त्रिक विधि से करना अनिवार्य है। इसकी सही पद्धति निम्नलिखित है:
  • समय (Timing): सन्ध्या काल (सूर्योदय या सूर्यास्त) या मध्यरात्रि का समय तान्त्रिक न्यास के लिए सर्वोत्तम है।
  • आसन और दिशा: कुशा या ऊनी आसन पर बैठें। मुख पूर्व दिशा (सांसारिक लाभ) या उत्तर दिशा (आध्यात्मिक लाभ) की ओर रखें।
  • न्यास की क्रिया (Practical Nyasa): जब आप "ॐ त ॐ पातु मे रूपं..." पढ़ें, तो अपना ध्यान रूप (नेत्रों) पर ले जाएँ। इसी प्रकार प्रत्येक मन्त्र के साथ उस अंग का मानसिक चिन्तन करें।
  • शुद्धि: पाठ से पूर्व आचमन करें और हाथ जोड़कर माँ गायत्री के पंचमुखी स्वरूप का ध्यान करें।
  • जप: कवच पाठ के उपरान्त १०८ बार मूल गायत्री मन्त्र का जप करना अनिवार्य है ताकि जाग्रत हुई ऊर्जा शरीर में स्थिर हो सके।
नोट: चूँकि यह न्यासात्मक कवच है, अतः प्रारम्भ में इसे धीरे-धीरे पढ़ें और शरीर के अंगों पर एकाग्रता बढ़ाने का अभ्यास करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. इसे 'अलभ्य' (Alabhya) कवच क्यों कहा गया है?

क्योंकि यह मन्त्र विज्ञान के अत्यंत गुप्त सूत्रों पर आधारित है और प्राचीन काल में यह केवल उच्च स्तर के साधकों को ही प्राप्त होता था। इसे सार्वजनिक करना वर्जित था।

2. 'न्यास' का अर्थ क्या है और यह कवच में क्यों है?

न्यास का अर्थ है—देवता की चेतना को अपने शरीर में विलीन करना। इस कवच में २४ अक्षरों का न्यास शरीर को साक्षात् माँ गायत्री का विग्रह बना देता है।

3. क्या इस कवच से कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है?

हाँ, इसमें मूलाधार (चतुर्दल) और स्वाधिष्ठान चक्रों की सुरक्षा के मन्त्र हैं, जो ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी बनाने में अत्यंत सहायक होते हैं।

4. चतुष्पाद गायत्री क्या है?

गायत्री मन्त्र के तीन चरण ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के प्रतीक हैं। चौथा पाद (तुरीय पाद) माया से परे परब्रह्म की ज्योति का प्रतीक है।

5. क्या यह कवच शत्रुओं से रक्षा करता है?

बिल्कुल, यह कवच मानसिक और भौतिक—दोनों प्रकार के शत्रुओं का दमन करता है और साधक को किसी भी 'अभिचार' (तन्त्र प्रहार) से बचाता है।

6. क्या पाठ के लिए गायत्री मन्त्र की दीक्षा जरूरी है?

सामान्य सुरक्षा हेतु कोई भी भक्त इसे पढ़ सकता है, परन्तु तान्त्रिक 'न्यास' की पूर्ण सफलता हेतु गुरु से मन्त्र दीक्षा लेना अनिवार्य माना गया है।

7. इसमें महामृत्युञ्जय मन्त्र क्यों शामिल है?

गायत्री मन्त्र बुद्धि और प्रकाश देता है, जबकि महामृत्युञ्जय मन्त्र जीवन और आरोग्य। दोनों का संगम साधक को काल (समय) और अकाल मृत्यु पर विजय दिलाता है।

8. 'परो रजसे' का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है—वह ज्योति जो रजोगुण (संसार की चंचलता) से परे है। यह साधक के मन को संसार से ऊपर उठाकर शान्ति प्रदान करती है।

9. क्या यह कवच भय और चिन्ता दूर करता है?

हाँ, माँ गायत्री को 'अघनाशिनी' (पाप और दुख का नाश करने वाली) कहा गया है। यह कवच मन के गहरे अचेतन भयों को भी जड़ से मिटा देता है।

10. क्या इसके पाठ के साथ कोई परहेज भी है?

साधना काल में सात्विक आहार लें और अपनी वाणी पर संयम रखें, क्योंकि यह कवच वाणी की अधिष्ठात्री सरस्वती की रक्षा भी करता है।