Sri Gayatri Ashtottara Shatanama Stotram 1 – श्री गायत्र्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (वसिष्ठ प्रोक्त)

श्री गायत्र्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् - परिचय एवं महात्म्य
श्री गायत्र्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Gayatri Ashtottara Shatanama Stotram) माँ गायत्री के १०८ (108) दिव्य नामों की एक पवित्र माला है। इसकी रचना महर्षि वसिष्ठ ने की है, जो वैदिक ऋषियों में अपनी शांति और ब्रह्मज्ञान के लिए पूजनीय हैं। इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि यह अत्यंत संक्षिप्त होते हुए भी माँ गायत्री के संपूर्ण स्वरूप—वैदिक, तांत्रिक और पौराणिक—को समाहित करता है।
गायत्री उपासना में नाम-साधना का विशेष महत्व है। जब हम देवी को 'ब्रह्मास्त्ररूपिणी', 'वेदमाता', या 'सूर्यमण्डलवासिनी' कहकर पुकारते हैं, तो हम केवल एक शब्द नहीं बोल रहे होते, बल्कि उस विशिष्ट शक्ति का आवाहन कर रहे होते हैं। यह स्तोत्र साधक को गायत्री के विराट् रूप का दर्शन कराता है, जो केवल एक मंत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि वह 'परब्रह्मस्वरूपिणी' है—अर्थात वही सर्वोच्च चेतना है जिससे यह ब्रह्मांड प्रकट हुआ है।
महर्षि वसिष्ठ ने इस स्तोत्र में देवी के सौम्य और उग्र दोनों रूपों का वर्णन किया है। एक ओर वे 'बालिका' और 'तरुणी' हैं, तो दूसरी ओर 'मन्देहदानवध्वंसकारिणी' (राक्षसों का नाश करने वाली) भी हैं। यह स्तोत्र प्रतिदिन की संध्या वंदना का एक अभिन्न अंग बन सकता है, विशेषकर उन साधकों के लिए जो कम समय में देवी की पूर्ण कृपा प्राप्त करना चाहते हैं।
विशिष्ट महत्व और दार्शनिक विश्लेषण
इस स्तोत्र के प्रत्येक नाम के पीछे गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ छिपा है। वसिष्ठ जी ने उन नामों का चयन किया है जो साधक की चेतना को तत्काल जागृत करते हैं:
त्रिमूर्ति रूपा: गायत्री माँ वह एकमात्र शक्ति है जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों के रूप में कार्य करती है।
सूर्य विज्ञान: माँ गायत्री सौर ऊर्जा की अधिष्ठात्री देवी हैं। उनका ध्यान करने से साधक के भीतर का 'आत्म-सूर्य' जागृत होता है।
यज्ञ और कर्मकाण्ड: श्लोक 11 में उन्हें 'यज्ञप्रिया' कहा गया है। यह सिद्ध करता है कि सभी वैदिक यज्ञों का मूल गायत्री ही हैं।
तंत्र का सार: श्लोक 16 में 'सर्वयन्त्रात्मिका' कहकर स्पष्ट किया गया है कि सभी साधनाओं की सिद्धि गायत्री के अधीन है।
फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले लाभ
पाठ विधि और अनुष्ठान नियम
- समय: 'त्रिसन्ध्यं' (प्रातः, दोपहर, सायं) इसका पाठ करना सर्वोत्तम है। सूर्योदय के समय इसका प्रभाव सबसे अधिक होता है।
- आसन: पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें। रीढ़ की हड्डी सीधी रखें।
- संकल्प: हाथ में जल लेकर संकल्प करें—"मैं माँ गायत्री के इस स्तोत्र का पाठ आत्मशुद्धि हेतु कर रहा हूँ।"
- जप: स्तोत्र पाठ के उपरांत गायत्री मन्त्र की कम से कम १०८ बार माला जपें।