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Sri Gayatri Ashtottara Shatanama Stotram 1 – श्री गायत्र्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (वसिष्ठ प्रोक्त)

Sri Gayatri Ashtottara Shatanama Stotram 1 – श्री गायत्र्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (वसिष्ठ प्रोक्त)
॥ श्री गायत्र्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥
(श्रीवसिष्ठ प्रोक्तम्)
श्रीगायत्री जगन्माता परब्रह्मस्वरूपिणी । परमार्थप्रदा जप्या ब्रह्मतेजोविवर्धिनी ॥ १ ॥ ब्रह्मास्त्ररूपिणी भव्या त्रिकालध्येयरूपिणी । त्रिमूर्तिरूपा सर्वज्ञा वेदमाता मनोन्मनी ॥ २ ॥ बालिका तरुणी वृद्धा सूर्यमण्डलवासिनी । मन्देहदानवध्वंसकारिणी सर्वकारणा ॥ ३ ॥ हंसारूढा वृषारूढा गरुडारोहिणी शुभा । षट्कुक्षिस्त्रिपदा शुद्धा पञ्चशीर्षा त्रिलोचना ॥ ४ ॥ त्रिवेदरूपा त्रिविधा त्रिवर्गफलदायिनी । दशहस्ता चन्द्रवर्णा विश्वामित्रवरप्रदा ॥ ५ ॥ दशायुधधरा नित्या सन्तुष्टा ब्रह्मपूजिता । आदिशक्तिर्महाविद्या सुषुम्नाख्या सरस्वती ॥ ६ ॥ चतुर्विंशत्यक्षराढ्या सावित्री सत्यवत्सला । सन्ध्या रात्रिः प्रभाताख्या साङ्ख्यायनकुलोद्भवा ॥ ७ ॥ सर्वेश्वरी सर्वविद्या सर्वमन्त्रादिरव्यया । शुद्धवस्त्रा शुद्धविद्या शुक्लमाल्यानुलेपना ॥ ८ ॥ सुरसिन्धुसमा सौम्या ब्रह्मलोकनिवासिनी । प्रणवप्रतिपाद्यार्था प्रणतोद्धरणक्षमा ॥ ९ ॥ जलाञ्जलिसुसन्तुष्टा जलगर्भा जलप्रिया । स्वाहा स्वधा सुधासंस्था श्रौषड्वौषड्वषट्क्रिया ॥ १० ॥ सुरभिः षोडशकला मुनिबृन्दनिषेविता । यज्ञप्रिया यज्ञमूर्तिः स्रुक्स्रुवाज्यस्वरूपिणी ॥ ११ ॥ अक्षमालाधरा चाऽक्षमालासंस्थाऽक्षराकृतिः । मधुच्छन्दऋषिप्रीता स्वच्छन्दा छन्दसां निधिः ॥ १२ ॥ अङ्गुलीपर्वसंस्थाना चतुर्विंशतिमुद्रिका । ब्रह्ममूर्ती रुद्रशिखा सहस्रपरमाऽम्बिका ॥ १३ ॥ विष्णुहृद्गा चाग्निमुखी शतमध्या दशावरा । सहस्रदलपद्मस्था हंसरूपा निरञ्जना ॥ १४ ॥ चराचरस्था चतुरा सूर्यकोटिसमप्रभा । पञ्चवर्णमुखी धात्री चन्द्रकोटिशुचिस्मिता ॥ १५ ॥ महामाया विचित्राङ्गी मायाबीजनिवासिनी । सर्वयन्त्रात्मिका सर्वतन्त्ररूपा जगद्धिता ॥ १६ ॥ मर्यादापालिका मान्या महामन्त्रफलप्रदा । इत्यष्टोत्तरनामानि गायत्र्याः प्रोक्तवान्मुनिः ॥ १७ ॥
॥ फलश्रुति ॥
एतदष्टोत्तरशतं नित्यं भक्तियुतः शुचिः । त्रिसन्ध्यं यः पठेत्सर्वमन्त्रसिद्धिमवाप्नुयात् ॥ १८ ॥
॥ इति श्रीवसिष्ठ प्रोक्त श्री गायत्र्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री गायत्र्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् - परिचय एवं महात्म्य

श्री गायत्र्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Gayatri Ashtottara Shatanama Stotram) माँ गायत्री के १०८ (108) दिव्य नामों की एक पवित्र माला है। इसकी रचना महर्षि वसिष्ठ ने की है, जो वैदिक ऋषियों में अपनी शांति और ब्रह्मज्ञान के लिए पूजनीय हैं। इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि यह अत्यंत संक्षिप्त होते हुए भी माँ गायत्री के संपूर्ण स्वरूप—वैदिक, तांत्रिक और पौराणिक—को समाहित करता है।

गायत्री उपासना में नाम-साधना का विशेष महत्व है। जब हम देवी को 'ब्रह्मास्त्ररूपिणी', 'वेदमाता', या 'सूर्यमण्डलवासिनी' कहकर पुकारते हैं, तो हम केवल एक शब्द नहीं बोल रहे होते, बल्कि उस विशिष्ट शक्ति का आवाहन कर रहे होते हैं। यह स्तोत्र साधक को गायत्री के विराट् रूप का दर्शन कराता है, जो केवल एक मंत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि वह 'परब्रह्मस्वरूपिणी' है—अर्थात वही सर्वोच्च चेतना है जिससे यह ब्रह्मांड प्रकट हुआ है।

महर्षि वसिष्ठ ने इस स्तोत्र में देवी के सौम्य और उग्र दोनों रूपों का वर्णन किया है। एक ओर वे 'बालिका' और 'तरुणी' हैं, तो दूसरी ओर 'मन्देहदानवध्वंसकारिणी' (राक्षसों का नाश करने वाली) भी हैं। यह स्तोत्र प्रतिदिन की संध्या वंदना का एक अभिन्न अंग बन सकता है, विशेषकर उन साधकों के लिए जो कम समय में देवी की पूर्ण कृपा प्राप्त करना चाहते हैं।

विशिष्ट महत्व और दार्शनिक विश्लेषण

इस स्तोत्र के प्रत्येक नाम के पीछे गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ छिपा है। वसिष्ठ जी ने उन नामों का चयन किया है जो साधक की चेतना को तत्काल जागृत करते हैं:

  • त्रिमूर्ति रूपा: गायत्री माँ वह एकमात्र शक्ति है जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों के रूप में कार्य करती है।

  • सूर्य विज्ञान: माँ गायत्री सौर ऊर्जा की अधिष्ठात्री देवी हैं। उनका ध्यान करने से साधक के भीतर का 'आत्म-सूर्य' जागृत होता है।

  • यज्ञ और कर्मकाण्ड: श्लोक 11 में उन्हें 'यज्ञप्रिया' कहा गया है। यह सिद्ध करता है कि सभी वैदिक यज्ञों का मूल गायत्री ही हैं।

  • तंत्र का सार: श्लोक 16 में 'सर्वयन्त्रात्मिका' कहकर स्पष्ट किया गया है कि सभी साधनाओं की सिद्धि गायत्री के अधीन है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले लाभ

महर्षि वसिष्ठ ने अंत में (श्लोक 18) इस स्तोत्र के पाठ का फल बताया है: "सर्वमन्त्रसिद्धिमवाप्नुयात्"। इसके विस्तार में निम्नलिखित लाभ अनुभवसिद्ध हैं:
१. मंत्र सिद्धि
जो साधक किसी भी मंत्र का जप कर रहा हो, यदि वह इस स्तोत्र का पाठ करता है, तो उसके मंत्र शीघ्र सिद्ध होते हैं। यह एक 'उत्कीलन' (Unlocking) की तरह कार्य करता है।
२. ब्रह्मतेज की वृद्धि
श्लोक 1 में ही कहा गया है—"ब्रह्मतेजोविवर्धिनी"। इसका नियमित पाठ चेहरे पर ओज और वाणी में प्रभाव लाता है।
३. पाप नाश
गायत्री का एक नाम 'पापनाशिनी' है। यह स्तोत्र अज्ञानजन्य और क्रियाजन्य पापों को जलाकर भस्म कर देता है।
४. जलाञ्जलि मात्र से प्रसन्नता
श्लोक 10 के अनुसार, यदि आपके पास पूजा सामग्री नहीं है, तो केवल श्रद्धा से जल अर्पित करके भी आप कृपा पा सकते हैं।

पाठ विधि और अनुष्ठान नियम

इस स्तोत्र का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनानी चाहिए:
  • समय: 'त्रिसन्ध्यं' (प्रातः, दोपहर, सायं) इसका पाठ करना सर्वोत्तम है। सूर्योदय के समय इसका प्रभाव सबसे अधिक होता है।
  • आसन: पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें। रीढ़ की हड्डी सीधी रखें।
  • संकल्प: हाथ में जल लेकर संकल्प करें—"मैं माँ गायत्री के इस स्तोत्र का पाठ आत्मशुद्धि हेतु कर रहा हूँ।"
  • जप: स्तोत्र पाठ के उपरांत गायत्री मन्त्र की कम से कम १०८ बार माला जपें।
नोट: पाठ शुद्ध उच्चारण के साथ करें। मन की एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. इस स्तोत्र के रचयिता कौन हैं और इसका स्रोत क्या है?

इस स्तोत्र की रचना महर्षि वसिष्ठ ने की है। यह प्राचीन संहिताओं में उपलब्ध है।

2. गायत्री अष्टोत्तरशतनाम के पाठ का मुख्य लाभ क्या है?

इसका नित्य पाठ करने से साधक को 'सर्वमन्त्रसिद्धि' प्राप्त होती है और ब्रह्मतेज बढ़ता है।

3. 'मन्देहदानवध्वंसकारिणी' का क्या अर्थ है?

मन्देह राक्षस अज्ञान के प्रतीक हैं; गायत्री माँ उनका विनाश कर ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं।

4. क्या इसे दिन में कभी भी पढ़ा जा सकता है?

हाँ, लेकिन श्लोक 18 के अनुसार 'त्रिसन्ध्यं' समय पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है।

5. इस स्तोत्र में गायत्री के कितने रूप बताए गए हैं?

इसमें गायत्री को बालिका, तरुणी और वृद्धा तीनों रूपों में वर्णित किया गया है।

6. 'जलाञ्जलिसुसन्तुष्टा' का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है कि माँ गायत्री केवल अर्घ्य (जल अर्पण) मात्र से ही प्रसन्न हो जाती हैं।

7. क्या तन्त्र साधना में इसका प्रयोग होता है?

हाँ, उन्हें 'सर्वतन्त्ररूपा' कहा गया है, जो उन्हें समस्त विद्याओं का मूल सिद्ध करता है।

8. 'ब्रह्मास्त्ररूपिणी' नाम का क्या रहस्य है?

गायत्री मन्त्र आध्यात्मिक जगत का 'ब्रह्मास्त्र' है, जो पापों को जड़ से नष्ट करता है।

9. क्या विद्यार्थी इसका पाठ कर सकते हैं?

अवश्य। माँ गायत्री बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी हैं, अतः यह विद्यार्थियों हेतु लाभकारी है।

10. क्या पाठ के लिए दीक्षा अनिवार्य है?

भक्ति हेतु अनिवार्य नहीं है, परंतु मन्त्र सिद्धि हेतु गुरु का मार्गदर्शन सदैव उत्तम है।