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Sri Tara Pratah Smaranam – श्रीताराप्रातःस्मरणम्

Sri Tara Pratah Smaranam – श्रीताराप्रातःस्मरणम्
॥ श्रीताराप्रातःस्मरणम् ॥ प्रातः स्मरामि भवतारिणि तारिणीं त्वां मन्दस्मितां त्रिनयनां घननीलवर्णाम् । कर्त्रीकपालोत्पलखड्गधर्त्रीं धात्रीं सुरासुरनृणामखिलेश्वरीं च ॥ १॥ प्रातः स्मरामि खर्वामपवर्गदात्री- मक्षोभ्यशम्भुसहितामहिभूषणाढ्याम् । प्रत्यर्पिताङ्घ्रिशिववक्षसि सुप्रसन्नां भक्तार्तिभयवारणकर्मदक्षाम् ॥ २॥ प्रातः स्मरामि षट्कोणत्रिकोणगेहां वस्वारधरणीगृहशोभमानाम् । शक्रादिसुरसङ्घसुसेव्यमाना- मानन्दकन्दां पञ्चार्णवीं ताम् ॥ ३॥ प्रातर्नमामि नृकरोटिविशालमालां हालाविघूर्णिततरां सुत्रिनेत्रजालाम् । व्याघ्राम्बरावृतकटीतटभासमानां जाड्यापहां त्वरितसिद्धिप्रदां परेशीम् ॥ ४॥ प्रातर्भजामि भवतापविनाशिकाम्बां सद्यः समृद्धिनिधिबुद्धिप्रकाशिकां च । ज्वलच्चितामध्यगतातिघोरां दंष्ट्राकरालामपि भक्तपालाम् ॥ ५॥ ॥ फलश्रुति ॥ यः श्लोकपञ्चकमिदं पठति प्रभाते तारां स्मरन्प्रतिदिनं भुविभारहाराम् । विद्याविभूतिसुखशान्तियशांस्यवाप्य सोऽन्ते प्रयाति सालोक्यपदं जनन्याः ॥ ६॥ ॥ इति श्रीताराप्रातःस्मरणं सम्पूर्णम् ॥

श्रीताराप्रातःस्मरणम्: परिचय एवं भावार्थ (Introduction & Meaning)

श्रीताराप्रातःस्मरणम् पाँच श्लोकों का एक लघु किंतु अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है, जिसे 'तारा पञ्चक' भी कहा जाता है। इसमें साधक प्रातःकाल जागते ही अपने मन, वाणी और शरीर को माँ तारा के चरणों में समर्पित करता है। 'तारा' का अर्थ है 'तारने वाली' (Saviour)। यह स्तोत्र देवी के नील सरस्वती और उग्र तारा दोनों स्वरूपों का समन्वय है, जो ज्ञान और सुरक्षा दोनों प्रदान करती हैं।

प्रथम श्लोक (प्रातः स्मरामि...): भक्त कहता है—"मैं प्रातःकाल उस भवतारिणी (संसार सागर से पार लगाने वाली) देवी का स्मरण करता हूँ, जो मंद-मंद मुस्कुरा रही हैं, जिनके तीन नेत्र हैं और जिनका वर्ण घने नीले बादलों (घननीलवर्णाम्) जैसा है। जो अपने चार हाथों में कैंची (कर्त्री), कपाल, कमल (उत्पल) और खड्ग धारण करती हैं और जो सुर-असुर और मनुष्यों की पालक हैं।"

द्वितीय श्लोक (खर्वाम् अपवर्गदात्रीम्...): "मैं उस देवी का स्मरण करता हूँ जो 'खर्वा' (छोटे कद वाली/लंबोदरी) हैं और मोक्ष (अपवर्ग) देने वाली हैं। जो 'अक्षोभ्य शिव' (नाग रूप में) के साथ मस्तक पर सुशोभित हैं और साँपों के आभूषणों से लदी हैं। जो शिव की छाती पर पैर रखकर खड़ी हैं, फिर भी प्रसन्न मुद्रा में हैं और भक्तों के भय को दूर करने में कुशल हैं।"

तृतीय श्लोक (यंत्र रहस्य): "मैं उस देवी का स्मरण करता हूँ जो षट्कोण (छह कोनों वाले) और त्रिकोण (तीन कोनों वाले) यंत्र के मध्य में निवास करती हैं। जो आठ दलों वाले कमल और भूपुर (धरणीगृह) से सुशोभित हैं। जो 'पञ्चार्ण' (पाँच अक्षरों वाले मंत्र - ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं फट्) स्वरूपा हैं और आनंद का कन्द (मूल) हैं।"

स्तोत्र का विशिष्ट तांत्रिक और आध्यात्मिक महत्व (Significance)

यह स्तोत्र केवल भक्ति नहीं, बल्कि उच्च कोटि के तांत्रिक प्रतीकों से भरा हुआ है।

  • जाड्यापहां (Destroyer of Ignorance): श्लोक 4 में देवी को 'जाड्यापहां' कहा गया है। 'जाड्य' का अर्थ है जड़ता, मूर्खता या अज्ञान। माँ तारा 'नील सरस्वती' हैं, इसलिए वे जीभ की जड़ता को दूर कर साधक को वाक-सिद्धि और तीव्र बुद्धि प्रदान करती हैं।
  • अक्षोभ्य शिव: देवी के मस्तक पर 'अक्षोभ्य ऋषि' (शिव) विराजमान हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, हलाहल विष पीने से शिवजी को जब जलन हुई, तो तारा ने उन्हें अपना स्तनपान कराया। इसलिए वे शिव की गुरु और माता तुल्य भी हैं। यह देवी की सर्वोच्चता का प्रतीक है।
  • पञ्चार्णवी (Pancharnavi): श्लोक 3 में देवी को 'पञ्चार्णवी' कहा गया है। इसका अर्थ है कि वे तारा के प्रसिद्ध पंचाक्षरी मंत्र "ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं फट्" का साक्षात् विग्रह हैं। इस स्तोत्र का पाठ इस महामंत्र के जप के समान फल देता है।
  • चित्ता और श्मशान: श्लोक 5 में देवी को 'ज्वलच्चितामध्यगता' (जलती हुई चिता के मध्य स्थित) कहा गया है। यह श्मशान वैराग्य और मृत्यु के भय पर विजय का प्रतीक है। वे उग्र होते हुए भी 'भक्तपाला' (भक्तों की रक्षक) हैं।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले सिद्ध लाभ (Benefits of Recitation)

अंतिम श्लोक (6) में इस प्रातः स्मरण के पाठ का स्पष्ट फल बताया गया है:

  • विद्या और विभूति: जो व्यक्ति प्रतिदिन प्रभात (सुबह) में इसका पाठ करता है, उसे उच्च विद्या (Knowledge) और ऐश्वर्य (Vibhuti) की प्राप्ति होती है। वह समाज में विद्वान के रूप में पूजा जाता है।
  • सुख, शांति और यश: इसके पाठ से गृह क्लेश शांत होते हैं और मानसिक शांति मिलती है। साधक को यश और कीर्ति प्राप्त होती है।
  • भार-हरण: देवी को 'भुविभारहाराम्' (पृथ्वी का भार हरने वाली) कहा गया है। वे साधक के जीवन के बोझ और चिंताओं को भी हर लेती हैं।
  • सालोक्य मुक्ति: अंत में, साधक को 'सालोक्यपदं' (देवी के लोक में निवास) प्राप्त होता है, जो मोक्ष का एक प्रकार है।
  • त्वरित सिद्धि: श्लोक 4 में उन्हें 'त्वरितसिद्धिप्रदां' कहा गया है। तारा साधना का फल बहुत शीघ्र मिलता है, इसमें विलंब नहीं होता।

पाठ विधि एवं अनुष्ठान (Ritual Method & Guidelines)

प्रातः स्मरण होने के कारण इसकी विधि बहुत सरल है, जिसे कोई भी कर सकता है।

बिस्तर पर पाठ (Bedside Recitation): सबसे उत्तम विधि यह है कि जैसे ही आपकी नींद खुले, बिस्तर पर बैठे-बैठे ही पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके, हाथ जोड़कर इन 5 श्लोकों का पाठ करें। मानसिक रूप से माँ तारा के नील वर्ण का ध्यान करें।

स्नान के बाद: यदि संभव हो, तो स्नान के बाद पूजा घर में दीपक जलाकर इसका पाठ करें। यह अधिक प्रभावी है। देवी को नीले फूल (अपराजिता) अर्पित करना अत्यंत शुभ होता है।

विशेष प्रयोग: यदि किसी बच्चे का मन पढ़ाई में न लगता हो या वाणी दोष (हकलाना आदि) हो, तो उसे रोज सुबह यह स्तोत्र सुनवाएं या पढ़वाएं। इससे अद्भुत लाभ होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'प्रातःस्मरण' और सामान्य स्तोत्र में क्या अंतर है?
प्रातःस्मरण विशेष रूप से दिन की शुरुआत (जागते ही) करने के लिए होता है। इसका उद्देश्य दिन भर के लिए मन को ईश्वरीय चेतना से जोड़ना है। अन्य स्तोत्र पूजा के समय पढ़े जाते हैं।
2. 'खर्वा' का क्या अर्थ है?
'खर्वा' का अर्थ है 'छोटे कद वाली' या 'नाटी'। देवी तारा को खर्वा और लम्बोदरी (बड़े पेट वाली) कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे अपने उदर में पूरे ब्रह्मांड को समाहित रखती हैं।
3. क्या इसे बिना दीक्षा के पढ़ सकते हैं?
जी हाँ। यह एक स्तुति परक स्तोत्र है, कोई बीज मंत्र नहीं। इसे कोई भी भक्त श्रद्धा पूर्वक पढ़ सकता है।
4. 'हालाविघूर्णिततरां' का क्या मतलब है?
इसका अर्थ है 'मदिरा (हाला) के पान से जिनकी आँखें घूम रही हैं'। यह तांत्रिक संकेत है, जो देवी की ईश्वरीय मस्ती और परमानंद की अवस्था को दर्शाता है।
5. 'पञ्चार्णवीं' किसे कहा गया है?
पञ्चार्णवी का अर्थ है 'पाँच अक्षरों वाली'। यह तारा के मूल मंत्र "ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं फट्" की ओर संकेत करता है। यह स्तोत्र उसी मंत्र का विस्तार है।
6. क्या यह स्तोत्र धन प्राप्ति के लिए है?
हाँ। श्लोक 5 में देवी को 'सद्यः समृद्धिनिधि...' (तत्काल समृद्धि और खजाना देने वाली) कहा गया है। यह विद्या और धन दोनों देती हैं।
7. 'व्याघ्राम्बरावृत' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'बाघ की खाल (व्याघ्र-चर्म) को वस्त्र के रूप में लपेटने वाली'। यह देवी के वैराग्य और पशुपतिनाथ (शिव) से उनके संबंध को दर्शाता है।
8. 'कर्त्री' और 'कपाल' किसके प्रतीक हैं?
कर्त्री (कैंची) अज्ञान और मोह के बंधनों को काटने का प्रतीक है, और कपाल (खोपड़ी) उस कटे हुए अहंकार को धारण करने का पात्र है।
9. क्या केवल नवरात्रि में ही पाठ करना चाहिए?
नहीं, यह 'प्रतिदिन' (Daily) करने वाला पाठ है। जैसा कि फलश्रुति में कहा गया है—'पठति प्रभाते... प्रतिदिनं'। नित्य पाठ से ही पूर्ण लाभ मिलता है।
10. 'सालोक्यपदं' क्या है?
यह मुक्ति के चार प्रकारों में से एक है—सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य। सालोक्य का अर्थ है मृत्यु के बाद उसी लोक में निवास करना जहाँ देवी रहती हैं (मणिद्वीप/तारापीठ)।