श्रीसूर्यसहस्रनामस्तोत्रम् स्कन्दपुराणान्तर्गतम्
Sri Surya Sahasranama Stotram - Skanda Purana

श्री सूर्यसहस्रनामस्तोत्रम् (स्कन्दपुराण) का परिचय
श्री सूर्यसहस्रनामस्तोत्रम् स्कन्दपुराण से लिया गया है। यह देवगुरु बृहस्पति और सूर्यवर्चा ऋषि (आदित्योपासक) के संवाद में प्रकट हुआ। सूर्यवर्चा ने बृहस्पति से सूर्यदेव के दिव्य सहस्रनाम सुनने की इच्छा व्यक्त की, और बृहस्पति ने नारायण का ध्यान करके भानुमण्डलमध्यग सूर्य के सहस्र नामों का उपदेश दिया।
यह तीसरा सूर्यसहस्रनामस्तोत्र है — पहला भविष्यपुराण से, दूसरा रुद्रयामल तन्त्र से, और यह स्कन्दपुराण से। तीनों में नाम, संवाद-शैली और उपासना पद्धति भिन्न हैं। इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें सम्पूर्ण विनियोग, करन्यास, हृदयादिन्यास और ध्यान सविस्तार दिया गया है।
फलश्रुति (श्लोक 153-160) में कहा गया — विद्याकामी को विद्या, धनार्थी को धन, पुत्रहीन को पुत्र, राज्यहीन को राज्य मिलता है। ग्रहपीड़ा और ब्रह्मराक्षस नष्ट होते हैं। रोगी को आरोग्य और कामी को कामनापूर्ति होती है। 'किमत्र बहुनोक्तेन सर्वसिद्धिर्भविष्यति' — अधिक क्या कहें, सर्वसिद्धि होगी।
अन्त में विश्वावसु, गन्धर्वगण, वालखिल्य ऋषि, वैखानस, वैष्णव और रुद्रगण — सभी ने भानुमण्डलमध्यग नारायण की स्तुति की, जो इस स्तोत्र की अनन्यता दर्शाता है। श्रीसूत ने ऋषियों से कहा — व्यासप्रसाद से मैंने यह सुना, आप सब सर्वधर्मार्थसिद्धि के लिए नित्य इसका पाठ करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)