Sri Surya Sahasranama Stotram – श्री सूर्य सहस्रनाम स्तोत्रम् (Bhavishya Purana)

श्री सूर्य सहस्रनाम का महत्व एवं ऐतिहासिक संदर्भ
भविष्य पुराण और सौर परंपरा: भविष्य पुराण के ब्रह्म पर्व को भारतीय सौर परंपरा (Sun Worship Tradition) का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इसमें सूर्य पूजा की विधि, सूर्य मंदिरों का निर्माण और सूर्य की महिमा का विस्तृत वर्णन है। यह स्तोत्र उसी परंपरा का एक अमूल्य रत्न है।
शतानीक-सुमन्तु संवाद: यह स्तोत्र कुरुवंशी राजा शतानीक (पांडवों के वंशज) और महर्षि सुमन्तु (वेदव्यास के शिष्य) के संवाद के रूप में है। जब शतानीक ने पूछा कि कलयुग में शीघ्र फल देने वाला देवता कौन है, तब सुमन्तु जी ने सूर्य देव की महिमा और इस सहस्रनाम का उपदेश दिया।
साम्ब का कुष्ठ निवारण: पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को ऋषियों के शाप से कुष्ठ रोग (Leprosy) हो गया था। तब उन्होंने चंद्रभागा नदी (वर्तमान कोणार्क/मुल्तान क्षेत्र) के तट पर सूर्य की कठोर तपस्या की और सूर्य की कृपा से ही वे रोगमुक्त होकर सुंदर काया वाले बने। इस स्तोत्र को 'कुष्ठिनां परमौषधम्' कहा गया है।
शत्रु विजय और राजत्व: प्राचीन काल में राजा युद्ध में विजय (Jaya) और राज्य (Rajya) की स्थिरता के लिए इस स्तोत्र का अनुष्ठान करते थे। फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है - 'राज्याय राज्यकामैश्च... क्षत्रियाणां जयावहम्'।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)